श्रीगणेशाय नमः।

श्रीमद्भागवत महापुराण - १ — पृष्ठ 1191–1200

श्रीमद्भागवत महापुराण - १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1191–1200

पृष्ठ 1191

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वृतो देवगणैः सर्वैर्गजेन्द्रोपर्यशोभत ।

स्तूयमानो मुनिगणैस्त्रैलोक्यं हर्षयन्निव ॥१४

वृत्रमभ्यद्रवच्छेत्तुमसुरानीकयूथपैः ।

पर्यस्तमोजसा राजन् क्रुद्धो रुद्र इवान्तकम् ॥१५

दधीचि ऋषिने कहा — देवताओ! मैंने आपलोगोंके मुँहसे धर्मकी बात सुननेके लिये ही आपकी माँगके प्रति उपेक्षा दिखलायी थी । यह लीजिये, मैं अपने प्यारे शरीरको आप लोगोंके

लिये अभी छोड़े देता हूँ । क्योंकि एक दिन यह स्वयं ही मुझे छोड़नेवाला है ॥७ ॥

देवशिरोमणियो! जो मनुष्य इस विनाशी शरीरसे दुःखी प्राणियोंपर दया करके मुख्यतः धर्म और गौणतः यशका सम्पादन नहीं करता, वह जड़ पेड़ - पौधोंसे भी गया- बीता है || ८ || बड़े-बड़े महात्माओंने इस अविनाशी धर्मकी उपासना की है । उसका स्वरूप बस, इतना ही है कि मनुष्य किसी भी प्राणीके दुःखमें दुःखका अनुभव करे और सुखमें सुखका ॥९ ॥ जगत्के

धन, जन और शरीर आदि पदार्थ क्षणभंगुर हैं । ये अपने किसी काम नहीं आते, अन्तमें दूसरोंके ही काम आयेंगे । ओह! यह कैसी कृपणता है, कितने दुःखकी बात है कि यह मरणधर्मा मनुष्य इनके द्वारा दूसरोंका उपकार नहीं कर लेता ॥१० ॥

श्रीशुकदेवजी कहते हैं - परीक्षित्! अथर्ववेदी महर्षि दधीचिने ऐसा निश्चय करके अपनेको परब्रह्म परमात्मा श्रीभगवान्‌में लीन करके अपना स्थूल शरीर त्याग दिया ॥ ११ ॥

उनके इन्द्रिय, प्राण, मन और बुद्धि संयत थे, दृष्टि तत्त्वमयी थी, उनके सारे बन्धन कट चुके थे । अतः जब वे भगवान् से अत्यन्त युक्त होकर स्थित हो गये, तब उन्हें इस बातका पता ही न चला कि मेरा शरीर छूट गया ॥१२ ॥

भगवान्की शक्ति पाकर इन्द्रका बल - पौरुष उन्नतिकी सीमापर पहुँच गया । अब विश्वकर्माजीने दधीचि ऋषिकी हड्डियोंसे वज्र बनाकर उन्हें दिया और वे उसे हाथमें लेकर ऐरावत हाथीपर सवार हुए । उनके साथ - साथ सभी देवतालोग तैयार हो गये । बड़े - बड़े ऋषि-मुनि देवराज इन्द्रकी स्तुति करने लगे । अब उन्होंने त्रिलोकीको हर्षित करते हुए वृत्रासुरका वध करनेके लिये उसपर पूरी शक्ति लगाकर धावा बोल दिया- ठीक वैसे ही, जैसे भगवान् रुद्र क्रोधित होकर स्वयं कालपर ही आक्रमण कर रहे हों । परीक्षित्! वृत्रासुर भी दैत्य-सेनापतियोंकी बहुत बड़ी सेनाके साथ मोर्चेपर डटा हुआ था ॥१३-१५ ॥

ततः सुराणामसुरै रणः परमदारुणः ।

त्रेतामुखे नर्मदायामभवत् प्रथमे युगे ॥१६

रुद्रैर्वसुभिरादित्यैरश्विभ्यां पितृवह्निभिः ।

मरुद्भिरृभुभिः साध्यैर्विश्वेदेवैर्मरुत्पतिम् ॥१७

दृष्ट्वा वज्रधरं शक्रं रोचमानं स्वया श्रिया ।

नामृष्यन्नसुरा राजन् मृधे वृत्रपुरःसराः ॥१८

पृष्ठ 1192

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नमुचिः शम्बरोऽनर्वा द्विमूर्धा ऋषभोऽम्बरः ।

हयग्रीवः शङ्कुशिरा विप्रचित्तिरयोमुखः ॥१९

पुलोमा वृषपर्वा च प्रहेतिर्हेतिरुत्कलः ।

दैतेया दानवा यक्षा रक्षांसि च सहस्रशः ॥२०

सुमालिमालिप्रमुखाः कार्तस्वरपरिच्छदाः ।

प्रतिषिध्येन्द्रसेनाग्रं मृत्योरपि दुरासदम् ॥२१

अभ्यर्दयन्नसंभ्रान्ताः सिंहनादेन दुर्मदाः ।

गदाभिः परिघैर्बाणैः प्रासमुद्गरतोमरैः ॥ २२

शूलैः परश्वधैः खड्गैः शतघ्नीभिर्भुशुण्डिभिः ।

सर्वतोऽवाकिरन् शस्त्रैरस्त्रैश्च विबुधर्षभान् ॥ २३

न तेऽदृश्यन्त संछन्नाः शरजालैः समन्ततः ।

पुङ्खानुपुङ्खपतितैर्ज्योतींषीव नभोघनैः ॥ २४

न ते शस्त्रास्त्रवर्षौघा ह्यासेदुः सुरसैनिकान् ।

छिन्नाः सिद्धपथे देवैर्लघुहस्तैः सहस्रधा ॥२५

अथ क्षीणास्त्रशस्त्रौघा गिरिशृङ्गद्रुमोपलैः ।

अभ्यवर्षन् सुरबलं चिच्छिदुस्तांश्च पूर्ववत् ॥२६

तानक्षतान् स्वस्तिमतो निशाम्य

शस्त्रास्त्रपूगैरथ वृत्रनाथाः ।

द्रुमैर्दृषद्भिर्विविधाद्रिशृङ्गै-रविक्षतांस्तत्रसुरिन्द्रसैनिकान् ॥२७

जो वैवस्वत मन्वन्तर इस समय चल रहा है, इसकी पहली चतुर्युगीका त्रेतायुग अभी आरम्भ ही हुआ था । उसी समय नर्मदातटपर देवताओंका दैत्योंके साथ यह भयंकर संग्राम हुआ ॥१६ ॥ उस समय देवराज इन्द्र हाथमें वज्र लेकर रुद्र, वसु, आदित्य, दोनों

अश्विनीकुमार, पितृगण, अग्नि, मरुद्गण, ऋभुगण, साध्यगण और विश्वेदेव आदिके साथ अपनी कान्तिसे शोभायमान हो रहे थे । वृत्रासुर आदि दैत्य उनको अपने सामने आया देख और भी चिढ़ गये ॥१७-१८ ॥ तब नमुचि, शम्बर, अनर्वा, द्विमूर्धा, ऋषभ, अम्बर, हयग्रीव, शंकुशिरा, विप्रचित्ति, अयोमुख, पुलोमा, वृषपर्वा, प्रहेति, हेति, उत्कल, सुमाली, माली आदि हजारों दैत्य - दानव एवं यक्ष - राक्षस स्वर्णके साज - सामान से सुसज्जित होकर देवराज इन्द्रकी सेनाको आगे बढ़नेसे रोकने लगे । परीक्षित! उस समय देवताओंकी सेना स्वयं मृत्युके लिये भी अजेय थी ॥१९ -२१ ॥ वे घमंडी असुर सिंहनाद करते हुए बड़ी सावधानीसे देवसेनापर प्रहार करने लगे । उन लोगोंने गदा, परिघ, बाण, प्रास, मुद्गर, तोमर, शूल, फरसे, तलवार, शतघ्नी ( तोप ), भुशुण्डि आदि अस्त्र - शस्त्रोंकी बौछारसे देवताओंको सब ओरसे ढक

पृष्ठ 1193

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दिया ॥२२-२३ ॥ एक पर एक इतने बाण चारों ओरसे आ रहे थे कि उनसे ढक जानेके कारण देवता दिखलायी भी नहीं पड़ते थे - जैसे बादलोंसे ढक जानेपर आकाशके तारे नहीं दिखायी देते ॥२४ ॥ परीक्षित्! वह शस्त्रों और अस्त्रोंकी वर्षा देवसैनिकोंको छूतक नसकी ।

उन्होंने अपने हस्तलाघवसे आकाशमें ही उनके हजार - हजार टुकड़े कर दिये || २५ || जब असुरोंके अस्त्र - शस्त्र समाप्त हो गये, तब वे देवताओंकी सेनापर पर्वतोंके शिखर, वृक्ष और पत्थर बरसाने लगे । परन्तु देवताओंने उन्हें पहले की ही भाँति काट गिराया ॥२६ ॥

परीक्षित्! जब वृत्रासुरके अनुयायी असुरोंने देखा कि उनके असंख्य अस्त्र - शस्त्र भी देव - सेनाका कुछ न बिगाड़ सके - यहाँतक कि वृक्षों, चट्टानों और पहाड़ोंके बड़े - बड़े शिखरोंसे भी उनके शरीरपर खरोंचतक नहीं आयी, सब - के - सब सकुशल हैं - तब तो वे बहुत डर गये! दैत्यलोग देवताओंको पराजित करनेके लिये जो - जो प्रयत्न करते, वे सब - के - सब निष्फल हो जाते — ठीक वैसे ही, जैसे भगवान् श्रीकृष्णके द्वारा सुरक्षित भक्तोंपर क्षुद्र मनुष्योंके कठोर और अमंगलमय दुर्वचनोंका कोई प्रभाव नहीं पड़ता ॥ २७-२८ ॥ सर्वे प्रयासा अभवन् विमोघाः कृताः कृता देवगणेषु दैत्यैः । कृष्णानुकूलेषु यथा महत्सु क्षुद्रैः प्रयुक्ता रुशती रूक्षवाचः ॥२८ ते स्वप्रयासं वितथं निरीक्ष्य हरावभक्ता हतयुद्धदर्पाः । पलायनायाजिमुखे विसृज्य पतिं मनस्ते दधुरात्तसाराः ॥२९ वृत्रोऽसुरांस्ताननुगान् मनस्वी प्रधावतः प्रेक्ष्य बभाष एतत् । पलायितं प्रेक्ष्य बलं च भग्नं भयेन तीव्रेण विहस्य वीरः ॥३० कालोपपन्नां रुचिरां मनस्विना-मुवाच वाचं पुरुषप्रवीरः । हे विप्रचित्ते नमुचे पुलोमन् मयानर्वञ्छम्बर मे शृणुध्वम् ॥३१ जातस्य मृत्युर्ध्रुव एष सर्वतः प्रतिक्रिया यस्य न चेह क्लृप्ता । लोको यशश्चाथ ततो यदि ह्यमुं

पृष्ठ 1194

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को नाम मृत्युं न वृणीत युक्तम् ॥३२ द्वौ संमताविह मृत्यू दुरापौ यद् ब्रह्मसंधारणया जितासुः । कलेवरं योगरतो विजह्याद् यदग्रणीर्वीरशयेऽनिवृत्तः ॥३३ भगवद्विमुख असुर अपना प्रयत्न व्यर्थ देखकर उत्साहरहित हो गये । उनका वीरताका घमंड जा॒ता रहा । अब वे अपने सरदार वृत्रासुरको युद्धभूमिमें ही छोड़कर भाग खड़े हुए; क्योंकि देवताओंने उनका सारा बल - पौरुष छीन लिया था ॥२९ ॥

जब धीर - वीर वृत्रासुरने देखा कि मेरे अनुयायी असुर भाग रहे हैं और अत्यन्त भयभीत होकर मेरी सेना भी तहस - नहस और तितर - बितर हो रही है, तब वह हँसकर कहने लगा ॥३० ॥

वीरशिरोमणि वृत्रासुरने समयानुसार वीरोचित वाणीसे विप्रचित्ति, नमुचि, पुलोमा, मय, अनर्वा, शम्बर आदि दैत्योंको सम्बोधित करके कहा – ' असुरो! भागो मत, मेरी एक बात सुन लो ॥३१ ॥

इसमें सन्देह नहीं कि जो पैदा हुआ है, उसे एक न एक दिन अवश्य मरना पड़ेगा । इस जगत्में विधाताने मृत्युसे बचने का कोई उपाय नहीं बताया है । ऐसी स्थितिमें यदि मृत्युके द्वारा स्वर्गादि लोक और सुयश भी मिल रहा हो तो ऐसा कौन बुद्धिमान् है, जो उस उत्तम मृत्युको न अपनायेगा ॥ ३२ ॥

संसारमें दो प्रकारकी मृत्यु परम दुर्लभ और श्रेष्ठ मानी गयी है - एक तो योगी पुरुषका अपने प्राणोंको वशमें करके ब्रह्मचिन्तनके द्वारा शरीरका परित्याग और दूसरा युद्धभूमिमें सेनाके आगे रहकर बिना पीठ दिखाये जूझ मरना ( तुमलोग भला, ऐसा शुभ अवसर क्यों खो रहे हो ) ' ॥३३ ॥

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां षष्ठस्कन्धे इन्द्रवृत्रासुरयुद्धवर्णनं नाम दशमोऽध्यायः ॥१० ॥

पृष्ठ 1195

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अथैकादशोऽध्यायः वृत्रासुरकी वीरवाणी और भगवत्प्राप्ति श्रीशुक उवाच

त एवं शंसतो धर्मं वचः पत्युरचेतसः ।

नैवागृह्णन् भयत्रस्ताः पलायनपरा नृप ॥१

विशीर्यमाणां पृतनामासुरीमसुरर्षभः ।

कालानुकूलैस्त्रिदशैः काल्यमानामनाथवत् ॥२

दृष्ट्वातप्यत संक्रुद्ध इन्द्रशत्रुरमर्षितः ।

तान्निवार्यौजसा राजन् निर्भर्त्स्न्येदमुवाच ह ॥३

किं व उच्चरितैर्मातुर्थावद्भिः पृष्ठतो हतैः ।

न हि भीतवधः श्लाघ्यो न स्वर्ग्यः शूरमानिनाम् ॥४

यदि वः प्रधने श्रद्धा सारं वा क्षुल्लका हृदि ।

अग्रे तिष्ठत मात्रं मे न चेद् ग्राम्यसुखे स्पृहा ॥५

एवं सुरगणान् क्रुद्धो भीषयन् वपुषा रिपून् ।

व्यनदत् सुमहाप्राणो येन लोका विचेतसः ॥ ६

तेन देवगणाः सर्वे वृत्रविस्फोटनेन वै ।

निपेतुर्मूर्च्छिता भूमौ यथैवाशनिना हताः ॥७

ममर्द पद्भ्यां सुरसैन्यमातुरं निमीलिताक्षं रणरङ्गदुर्मदः । गां कम्पयन्नुद्यतशूल ओजसा नालं वनं यूथपतिर्यथोन्मदः ॥ ८ श्रीशुकदेवजी कहते हैं - परीक्षित्! असुरसेना भयभीत होकर भाग रही थी । उसके सैनिक इतने अचेत हो रहे थे कि उन्होंने अपने स्वामीके धर्मानुकूल वचनोंपर भी ध्यान न दिया ॥१ ॥ वृत्रासुरने देखा कि समयकी अनुकूलताके कारण देवतालोग असुरोंकी सेनाको

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खदेड़ रहे हैं और वह इस प्रकार छिन्न - भिन्न हो रही है, मानो बिना नायककी हो ॥२ ॥

राजन्! यह देखकर वृत्रासुर असहिष्णुता और क्रोधके मारे तिलमिला उठा । उसने बलपूर्वक देवसेनाको आगे बढ़नेसे रोक दिया और उन्हें डाँटकर ललकारते हुए कहा ॥३ ॥ ' क्षुद्र देवताओ! रणभूमिमें पीठ दिखानेवाले कायर असुरोंपर पीछेसे प्रहार करनेमें

क्या लाभ है । ये लोग तो अपने माँ - बापके मल - मूत्र हैं । परन्तु अपनेको शूरवीर माननेवाले तुम्हारे - जैसे पुरुषोंके लिये भी तो डरपोकोंको मारना कोई प्रशंसाकी बात नहीं है और न इससे तुम्हें स्वर्ग ही मिल सकता है ॥४ ॥ यदि तुम्हारे मनमें युद्ध करनेकी शक्ति और उत्साह

है तथा अब जीवित रहकर विषय - सुख भोगनेकी लालसा नहीं है, तो क्षणभर मेरे सामने डट जाओ और युद्धका मजा चख लो ' ॥५ ॥

परीक्षित्! वृत्रासुर बड़ा बली था । वह अपने डील - डौलसे ही शत्रु देवताओंको भयभीत करने लगा । उसने क्रोधमें भरकर इतने जोरका सिंहनाद किया कि बहुत - से लोग तो उसे सुनकर ही अचेत हो गये ॥ ६ ॥ वृत्रासुरकी भयानक गर्जनासे सब - के - सब देवता मूर्च्छित

होकर पृथ्वीपर गिर पड़े, मानो उनपर बिजली गिर गयी हो || ७ || अब जैसे मदोन्मत्त गजराज नरकटका वन रौंद डालता है, वैसे ही रणबांकुरा वृत्रासुर हाथमें त्रिशूल लेकर भयसे नेत्र बंद किये पड़ी हुई देवसेनाको पैरोंसे कुचलने लगा । उसके वेगसे धरती डगमगाने लगी ॥८ ॥

विलोक्य तं वज्रधरोऽत्यमर्षितः स्वशत्रवेऽभिद्रवते महागदाम् । चिक्षेप तामापततीं सुदुःसहां जग्राह वामेन करेण लीलया ॥९ स इन्द्रशत्रुः कुपितो भृशं तया महेन्द्रवाहं गदयोग्रविक्रमः । जघान कुम्भस्थल उन्नदन् मृधे तत्कर्म सर्वे समपूजयन्नृप ॥१० ऐरावतो वृत्रगदाभिमृष्टो विघूर्णितोऽद्रिः कुलिशाहतो यथा । अपासरद् भिन्नमुखः सहेन्द्रो मुञ्चन्नसृक् सप्तधनुर्भृशार्तः ॥ ११ न सन्नवाहाय विषण्णचेतसे

प्रायुङ्क्त भूयः स गदां महात्मा ।

इन्द्रोऽमृतस्यन्दिकराभिमर्श-वीतव्यथक्षतवाहोऽवतस्थे ॥१२

स तं नृपेन्द्राहवकाम्यया रिपुं वज्रायुधं भ्रातृहणं विलोक्य ।

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स्मरंश्च तत्कर्म नृशंसमंहः शोकेन मोहेन हसञ्जगाद ॥१३ वृत्र उवाच दिष्ट्या भवान् मे समवस्थितो रिपु-र्यो ब्रह्महा गुरुहा भ्रातृहा च । दिष्ट्यानृणोऽद्याहमसत्तम त्वया मच्छूलनिर्भिन्नदृषद्धृदाचिरात् ॥१४ यो नोऽग्रजस्यात्मविदो द्विजाते-र्गुरोरपापस्य च दीक्षितस्य । विश्रभ्य खड्गेन शिरांस्यवृश्चत् पशोरिवाकरुणः स्वर्गकामः ॥१५ वज्रपाणि देवराज इन्द्र उसकी यह करतूत सह न सके । जब वह उनकी ओर झपटा, तब उन्होंने और भी चिढ़कर अपने शत्रुपर एक बहुत बड़ी गदा चलायी । अभी वह असह्य गदा वृत्रासुरके पास पहुँची भी न थी कि उसने खेल - ही खेलमें बायें हाथसे उसे पकड़ लिया ॥९ ॥

राजन्! परम पराक्रमी वृत्रासुरने क्रोधसे आग - बबूला होकर उसी गदासे इन्द्रके वाहन ऐरावतके सिरपर बड़े जोरसे गरजते हुए प्रहार किया । उसके इस कार्यकी सभी लोग बड़ी प्रशंसा करने लगे ॥१० ॥ वृत्रासुरकी गदाके आघातसे ऐरावत हाथी वज्राहत पर्वतके समान

तिलमिला उठा । सिर फट जानेसे वह अत्यन्त व्याकुल हो गया और खून उगलता हुआ इन्द्रको लिये हुए ही अट्ठाईस हाथ पीछे हट गया ॥ ११ ॥ देवराज इन्द्र अपने वाहन ऐरावतके

मूर्च्छित हो जानेसे स्वयं भी विषादग्रस्त हो गये । यह देखकर युद्धधर्मके मर्मज्ञ वृत्रासुरने उनके ऊपर फिरसे गदा नहीं चलायी । तबतक इन्द्रने अपने अमृतस्रावी हाथके स्पर्शसे घायल ऐरावतकी व्यथा मिटा दी और वे फिर रणभूमिमें आ डटे ॥१२ ॥ परीक्षित्! जब वृत्रासुरने

देखा कि मेरे भाई विश्वरूपका वध करनेवाला शत्रु इन्द्र युद्धके लिये हाथमें वज्र लेकर फिर सामने आ गया है, तब उसे उनके उस क्रूर पापकर्मका स्मरण हो आया और वह शोक और मोहसे युक्त हो हँसता हुआ उनसे कहने लगा ॥१३ ॥

वृत्रासुर बोला — आज मेरे लिये बड़े सौभाग्यका दिन है कि तुम्हारे जैसा शत्रु — जिसने विश्वरूपके रूपमें ब्राह्मण, अपने गुरु एवं मेरे भाईकी हत्या की है— मेरे सामने खड़ा है । अरे दुष्ट! अब शीघ्र - से - शीघ्र मैं तेरे पत्थरके समान कठोर हृदयको अपने शूलसे विदीर्ण करके भाईसे उऋण होऊँगा । अहा! यह मेरे लिये कैसे आनन्दकी बात होगी ॥१४ ॥ इन्द्र! तूने मेरे

आत्मवेत्ता और निष्पाप बड़े भाईके, जो ब्राह्मण होनेके साथ ही यज्ञमें दीक्षित और तुम्हारा गुरु था, विश्वास दिलाकर तलवारसे तीनों सिर उतार लिये - ठीक वैसे ही जैसे स्वर्गकामी निर्दय मनुष्य यज्ञमें पशुका सिर काट डालता है ॥१५ ॥

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ह्री श्रीदयाकीर्तिभिरुज्झितं त्वां

स्वकर्मणा पुरुषादैश्च गर्ह्यम् ।

कृच्छ्रेण मच्छूलविभिन्नदेह-मस्पृष्टवह्निं समदन्ति गृध्राः ॥१६

अन्येऽनु ये त्वेह नृशंसमज्ञा

ये ह्युद्यतास्त्राः प्रहरन्ति मह्यम् ।

तैर्भूतनाथान् सगणान् निशात-त्रिशूलनिर्भिन्नगलैर्यजामि ॥१७

अथो हरे मे कुलिशेन वीर हर्ता प्रमथ्यैव शिरो यदीह । तत्रानृणो भूतबलिं विधाय मनस्विनां पादरजः प्रपत्स्ये ॥१८ सुरेश कस्मान्न हिनोषि वज्रं पुरः स्थिते वैरिणि मय्यमोघम् । मा संशयिष्ठा न गदेव वज्रं स्यान्निष्फलं कृपणार्थेव याच्ञा ॥१९ नन्वेष वज्रस्तव शक्र तेजसा हरेर्दधीचेस्तपसा च तेजितः । तेनैव शत्रुं जहि विष्णुयन्त्रितो यतो हरिर्विजयः श्रीर्गुणास्ततः ॥२० अहं समाधाय मनो यथाऽऽह सङ्कर्षणस्तच्चरणारविन्दे । त्वद्वज्ररंहोलुलितग्राम्यपाशो गतिं मुनेर्याम्यपविद्धलोकः ॥ २१ पुंसां किलैकान्तधियां स्वकानां

याः सम्पदो दिवि भूमौ रसायाम् ।

न राति यद् द्वेष उद्वेग आधि-र्मदः कलिर्व्यसनं संप्रयासः ॥२२

दया, लज्जा, लक्ष्मी और कीर्ति तुझे छोड़ चुकी है । तूने ऐसे - ऐसे नीच कर्म किये हैं, जिनकी निन्दा मनुष्योंकी तो बात ही क्या - राक्षसतक करते हैं । आज मेरे त्रिशूलसे तेरा शरीर टूक - टूक हो जायगा । बड़े कष्टसे तेरी मृत्यु होगी । तेरे जैसे पापीको आग भी नहीं जलायेगी, तुझे तो गीध नोंच नोंचकर खायेंगे ॥ १६ ॥ ये अज्ञानी देवता तेरे - जैसे नीच और

पृष्ठ 1199

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क्रूरके अनुयायी बनकर मुझपर शस्त्रोंसे प्रहार कर रहे हैं । मैं अपने तीखे त्रिशूलसे उनकी गरदन काट डालूँगा और उनके द्वारा गणोंके सहित भैरवादि भूतनाथोंको बलि चढ़ाऊँगा ॥१७ ॥

वीर इन्द्र! यह भी सम्भव है कि तू तू मेरी सेनाको छिन्न - भिन्न करके अपने वज्रसे मेरा सिर काट ले । तब तो मैं अपने शरीरकी बलि पशु - पक्षियोंको समर्पित करके, कर्म - बन्धनसे मुक्त हो महापुरुषोंकी चरणरजका आश्रय ग्रहण करूँगा - जिस लोकमें महापुरुष जाते हैं, वहाँ पहुँच जाऊँगा ॥१८ ॥ देवराज! मैं तेरे सामने खड़ा हूँ, तेरा शत्रु हूँ; अब तू मुझपर अपना

अमोघ वज्र क्यों नहीं छोड़ता? तू यह सन्देह न कर कि जैसे तेरी गदा निष्फल हो गयी, कृपण पुरुषसे की हुई याचनाके समान यह वज्र भी वैसे ही निष्फल हो जायगा ॥१९ ॥ इन्द्र! तेरा

यह वज्र श्रीहरिके तेज और दधीचि ऋषिकी तपस्यासे शक्तिमान् हो रहा है । विष्णुभगवान्ने मुझे मारनेके लिये तुझे आज्ञा भी दी है । इसलिये अब तू उसी वज्रसे मुझे मार डाल । क्योंकि जिस पक्षमें भगवान् श्रीहरि हैं, उधर ही विजय, लक्ष्मी और सारे गुण निवास करते हैं ॥२० ॥

देवराज! भगवान् संकर्षणके आज्ञानुसार मैं अपने मनको उनके चरणकमलोंमें लीन कर दूँगा । तेरे वज्रका वेग मुझे नहीं, मेरे विषय - भोगरूप फंदेको काट डालेगा और मैं शरीर त्यागकर मुनिजनोचित गति प्राप्त करूँगा || २१ || जो पुरुष भगवान्से अनन्यप्रेम करते हैं-उनके निजजन हैं — उन्हें वे स्वर्ग, पृथ्वी अथवा रसातलकी सम्पत्तियाँ नहीं देते । क्योंकि उनसे परमानन्दकी उपलब्धि तो होती ही नहीं; उलटे द्वेष, उद्वेग, अभिमान, मानसिक पीड़ा, कलह, दुःख और परिश्रम ही हात लगते हैं ॥२२ ॥

त्रैवर्गिकायासविघातमस्मत्-पतिर्विधत्ते पुरुषस्य शक्र । ततोऽनुमेयो भगवत्प्रसादो यो दुर्लभो s किञ्चनगोचरोऽन्यैः ॥ २३ अहं हरे तव पादैकमूल-दासानुदासो भवितास्मि भूयः । मनः स्मरेतासुपतेर्गुणांस्ते गृणीत वाक् कर्म करोतु कायः ॥२४ न नाकपृष्ठं न च पारमेष्ठ्यं न सार्वभौमं न रसाधिपत्यम् । न योगसिद्धीरपुनर्भवं वा समंजस त्वा विरहय्य काङ्क्षे ॥२५ अजातपक्षा इव मातरं खगाः स्तन्यं यथा वत्सतराः क्षुधार्ताः ।

पृष्ठ 1200

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प्रियं प्रियेव व्युषितं विषण्णा मनोऽरविन्दाक्ष दिदृक्षते त्वाम् ॥२६ ममोत्तमश्लोकजनेषु सख्यं

संसारचक्रे भ्रमतः स्वकर्मभिः ।

त्वन्माययाऽऽत्मात्मजदारगेहे-ष्वासक्तचित्तस्य न नाथ भूयात् ॥२७

इन्द्र! हमारे स्वामी अपने भक्तके अर्थ, धर्म एवं कामसम्बन्धी प्रयासको व्यर्थ कर दिया करते हैं और सच पूछो तो इसीसे भगवान्‌की कृपाका अनुमान होता है । क्योंकि उनका ऐसा कृपा - प्रसाद अकिंचन भक्तोंके लिये ही अनुभवगम्य है, दूसरोंके लिये तो अत्यन्त दुर्लभ ही ॥२३ ॥

( भगवान्‌को प्रत्यक्ष अनुभव करते हुए वृत्रासुरने प्रार्थना की — ) ' प्रभो! आप मुझपर ऐसी कृपा कीजिये कि अनन्यभावसे आपके चरणकमलोंके आश्रित सेवकोंकी सेवा करनेका अवसर मुझे अगले जन्ममें भी प्राप्त हो । प्राणवल्लभ! मेरा मन आपके मंगलमय गुणोंका स्मरण करता रहे, मेरी वाणी उन्हींका गान करे और शरीर आपकी सेवामें ही संलग्न रहे ॥२४ ॥

सर्वसौभाग्यनिधे! मैं आपको छोड़कर स्वर्ग, ब्रह्मलोक, भूमण्डलका साम्राज्य, रसातलका एकच्छत्र राज्य, योगकी सिद्धियाँ - यहाँतक कि मोक्ष भी नहीं चाहता ॥२५ ॥

जैसे पक्षियोंके पंखहीन बच्चे अपनी माँकी बाट जोहते रहते हैं, जैसे भूखे बछड़े अपनी माँका दूध पीनेके लिये आतुर रहते हैं और जैसे वियोगिनी पत्नी अपने प्रवासी प्रियतमसे मिलनेके लिये उत्कण्ठित रहती है— वैसे ही कमलनयन! मेरा मन आपके दर्शनके लिये छटपटा रहा है ॥२६ ॥

प्रभो! मैं मुक्ति नहीं चाहता । मेरे कर्मोंके फलस्वरूप मुझे बार - बार जन्म - मृत्युके चक्करमें भटकना पड़े, इसकी परवा नहीं । परन्तु मैं जहाँ - जहाँ जाऊँ, जिस - जिस योनिमें जन्मूँ, वहाँ - वहाँ भगवान्‌के प्यारे भक्तजनोंसे मेरी प्रेम - मैत्री बनी रहे । स्वामिन्! मैं केवल यही चाहता हूँ कि जो लोग आपकी मायासे देह - गेह और स्त्री- पुत्र आदिमें आसक्त हो रहे हैं, उनके साथ मेरा कभी किसी प्रकारका भी सम्बन्ध न हो ' ॥२७ ॥

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां षष्ठस्कन्धे वृत्रस्येन्द्रोपदेशो नामैकादशोऽध्यायः ॥११ ॥