श्रीगणेशाय नमः।
श्रीमद्भागवत महापुराण - २ — पृष्ठ 1271–1280
श्रीमद्भागवत महापुराण - २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1271–1280
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संक्षिप्तं वर्णयिष्यामि यथावदनुपूर्वशः ॥ ६
वैदिकस्तान्त्रिको मिश्र इति मे त्रिविधो मखः ।
त्रयाणामीप्सितेनैव विधिना मां समर्चयेत् ॥७
यदा स्वनिगमेनोक्तं द्विजत्वं प्राप्य पूरुषः ।
यथा यजेत मां भक्त्या श्रद्धया तन्निबोध मे ॥८
अर्चायां स्थण्डिलेऽग्नौ वा सूर्ये वाप्सु हृदि द्विजे ।
द्रव्येण भक्तियुक्तोऽर्चेत् स्वगुरुं माममायया ॥९
पुर्वं स्नानं प्रकुर्वीत धौतदन्तोऽङ्गशुद्धये ।
उभयैरपि च स्नानं मन्त्रैर्मृद्ग्रहणादिना ॥१०
सन्ध्योपास्त्यादिकर्माणि वेदेनाचोदितानि मे ।
पूजां तैः कल्पयेत् सम्यक् संकल्पः कर्मपावनीम् ॥११
भगवान् श्रीकृष्णने कहा - उद्धवजी! कर्मकाण्डका इतना विस्तार है कि उसकी कोई सीमा नहीं है; इसलिये मैं उसे थोड़ेमें ही पूर्वापर-क्रमसे विधिपूर्वक वर्णन करता हूँ ॥६॥ मेरी
पूजाकी तीन विधियाँ हैं— वैदिक, तान्त्रिक और मिश्रित । इन तीनोंमेंसे मेरे भक्तको जो भी अपने अनुकूल जान पड़े, उसी विधिसे मेरी आराधना करनी चाहिये ॥७ ॥ पहले अपने
अधिकारानुसार शास्त्रोक्त विधिसे समयपर यज्ञोपवीत - संस्कारके द्वारा संस्कृत होकर द्विजत्व प्राप्त करे, फिर श्रद्धा और भक्तिके साथ वह किस प्रकार मेरी पूजा करे, इसकी विधि तुम मुझसे सुनो ॥८ ॥ भक्तिपूर्वक निष्कपट भावसे अपने पिता एवं गुरुरूप मुझ परमात्माका
पूजाकी सामग्रियोंके द्वारा मूर्तिमें, वेदीमें, अग्निमें, सूर्यमें, जलमें, हृदयमें अथवा ब्राह्मणमें— चाहे किसीमें भी आराधना करे ॥९ ॥ उपासकको चाहिये कि प्रातःकाल दतुअन करके पहले
शरीरशुद्धिके लिये स्नान करे और फिर वैदिक और तान्त्रिक दोनों प्रकारके मन्त्रोंसे मिट्टी और भस्म आदिका लेप करके पुनः स्नान करे || १० || इसके पश्चात् वेदोक्त सन्ध्या- वन्दनादि नित्यकर्म करने चाहिये । उसके बाद मेरी आराधनाका ही सुदृढ़ संकल्प करके वैदिक और तान्त्रिक विधियोंसे कर्मबन्धनोंसे छुड़ानेवाली मेरी पूजा करे ॥ ११ ॥ मेरी मूर्ति आठ प्रकारकी
होती है— पत्थरकी, लकड़ीकी, धातुकी, मिट्टी और चन्दन आदिकी, चित्रमयी, बालुकामयी, मनोमयी और मणिमयी ॥१२ ॥ चल और अचल भेदसे दो प्रकारकी प्रतिमा ही मुझ
भगवान्का मन्दिर है । उद्धवजी! अचल प्रतिमाके पूजनमें प्रतिदिन आवाहन और विसर्जन नहीं करना चाहिये ॥१३ ॥ चल प्रतिमाके सम्बन्धमें विकल्प है । चाहे करे और चाहे न करे ।
परन्तु बालुकामयी प्रतिमामें तो आवाहन और विसर्जन प्रतिदिन करना ही चाहिये । मिट्टी और चन्दनकी तथा चित्रमयी प्रतिमाओंको स्नान न करावे, केवल मार्जन कर दे; परन्तु और
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सबको स्नान कराना चाहिये ॥१४ ॥ प्रसिद्ध-प्रसिद्ध पदार्थोंसे प्रतिमा आदिमें मेरी पूजा की
जाती है, परन्तु जो निष्काम भक्त है, वह अनायास प्राप्त पदार्थोंसे और भावनामात्रसे ही हृदयमें मेरी पूजा कर ले ॥ १५ ॥ उद्धवजी! स्नान, वस्त्र, आभूषण आदि तो पाषाण अथवा
धातुकी प्रतिमाके पूजनमें ही उपयोगी हैं। बालुकामयी मूर्ति अथवा मिट्टीकी वेदीमें पूजा करनी हो तो उसमें मन्त्रोंके द्वारा अंग और उसके प्रधान देवताओंकी यथास्थान पूजा करनी चाहिये । तथा अग्निमें पूजा करनी हो तो घृतमिश्रित हवन सामग्रियोंसे आहुति देनी चाहिये ॥१६ ॥ सूर्यको प्रतीक मानकर की जानेवाली उपासनामें मुख्यतः अर्घ्यदान एवं
उपस्थान ही प्रिय है और जलमें तर्पण आदिसे मेरी उपासना करनी चाहिये । जब मुझे कोई भक्त हार्दिक श्रद्धासे जल भी चढ़ाता है, तब मैं उसे बड़े प्रेमसे स्वीकार करता हूँ ॥१७ ॥ यदि
कोई अभक्त मुझे बहुत- सी सामग्री निवेदन करे तो भी मैं उससे सन्तुष्ट नहीं होता । जब मैं भक्ति- श्रद्धापूर्वक समर्पित जलसे ही प्रसन्न हो जाता हूँ, तब गन्ध, पुष्प, धूप, दीप और नैवेद्य आदि वस्तुओंके समर्पणसे तो कहना ही क्या है ॥ १८ ॥
शैली दारुमयी लौही लेप्या लेख्या च सैकती ।
मनोमयी मणिमयी प्रतिमाष्टविधा स्मृता ॥१२
चलाचलेति द्विविधा प्रतिष्ठा जीवमन्दिरम् ।
उद्वासावाहने न स्तः स्थिरायामुद्धवार्चने ॥१३
अस्थिरायां विकल्पः स्यात् स्थण्डिले तु भवेद् द्वयम् ।
स्नपनं त्वविलेप्यायामन्यत्र परिमार्जनम् ॥१४
द्रव्यैः प्रसिद्धैर्मद्यागः प्रतिमादिष्वमायिनः ।
भक्तस्य च यथालब्धैर्हृदि भावेन चैव हि ॥१५
स्नानालंकरणं प्रेष्ठमर्चायामेव तूद्धव ।
स्थण्डिले तत्त्वविन्यासो वह्नावाज्यप्लुतं हविः ॥१६
सूर्ये चाभ्यर्हणं प्रेष्ठं सलिले सलिलादिभिः ।
श्रद्धयोपाहृतं प्रेष्ठं भक्तेन मम वार्यपि ॥१७
भूर्यप्यभक्तोपहृतं न मे तोषाय कल्पते ।
गन्धो धूपः सुमनसो दीपोऽन्नाद्यं च किं पुनः ॥१८
शुचिः सम्भृतसम्भारः प्राग्दर्भैः कल्पितासनः ।
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आसीनः प्रागुदग् वार्चेदर्चायामथ सम्मुखः ॥१९ उपासक पहले पूजाकी सामग्री इकट्ठी कर ले । फिर इस प्रकार कुश बिछाये कि उनके अगले भाग पूर्वकी और रहें । तदनन्तर पूर्व या उत्तरकी ओर मुँह करके पवित्रतासे उन कुशोंके आसनपर बैठ जाय । यदि प्रतिमा अचल हो तो उसके सामने ही बैठना चाहिये । इसके बाद पूजाकार्य प्रारम्भ करे ॥ १ ९ ॥ पहले विधिपूर्वक अंगन्यास और करन्यास कर ले । इसके बाद मूर्तिमें मन्त्रन्यास करे और हाथसे प्रतिमापरसे पूर्वसमर्पित सामग्री हटाकर उसे पोंछ दे । इसके बाद जलसे भरे हुए कलश और प्रोक्षणपात्र आदिकी पूजा गन्ध - पुष्प आदिसे करे ॥२० ॥ प्रोक्षणपात्रके जलसे पूजासामग्री और अपने शरीरका प्रोक्षण कर ले । तदनन्तर
पाद्य, अर्प्य और आचमनके लिये तीन पात्रोंमें कलशमेंसे जल भरकर रख ले और उनमें पूजा -पद्धतिके अनुसार सामग्री डाले । ( पाद्यपात्रमें श्यामाक – साँवेके दाने, दूब, कमल, विष्णुक्रान्ता और चन्दन, तुलसीदल आदि; अर्घ्यपात्रमें गन्ध, पुष्प, अक्षत, जौ, कुश, तिल, सरसों और दूब तथा आचमनपात्रमें जायफल, लौंग आदि डाले । ) इसके बाद पूजा करनेवालेको चाहिये कि तीनों पात्रोंको क्रमशः हृदयमन्त्र, शिरोमन्त्र और शिखामन्त्रसे अभिमन्त्रित करके अन्तमें गायत्रीमन्त्रसे तीनोंको अभिमन्त्रित करे ॥२१-२२ ॥ इसके बाद प्राणायामके द्वारा प्राण वायु और भावनाओंद्वारा शरीरस्थ अग्निके शुद्ध हो जानेपर हृदयकमलमें परम सूक्ष्म और श्रेष्ठ दीपशिखाके समान मेरी जीवकलाका ध्यान करे । बड़े - बड़े सिद्ध ऋषि- मुनि ॐकारके अकार, उकार, मकार, बिन्दु और नाद –इन पाँच कलाओंके अन्तमें उसी जीवकलाका ध्यान करते हैं ॥२३ ॥ वह जीवकला आत्मस्वरूपिणी है । जब
उसके तेजसे सारा अन्तःकरण और शरीर भर जाय तब मानसिक उपचारोंसे मन- ही - मन उसकी पूजा करनी चाहिये । तदनन्तर तन्मय होकर मेरा आवाहन करे और प्रतिमा आदिमें स्थापना करे । फिर मन्त्रोंके द्वारा अंगन्यास करके उसमें मेरी पूजा करे || २४ || उद्धवजी! मेरे आसनमें धर्म आदि गुणों और विमला आदि शक्तियोंकी भावना करे । अर्थात् आसनके चारों कोनोंमें धर्म, ज्ञान, वैराग्य और ऐश्वर्यरूप चार पाये हैं; अधर्म, अज्ञान, अवैराग्य और अनैश्वर्य —ये चार चारों दिशाओंमें डंडे हैं; सत्त्व-रज- तम-रूप तीन पटरियोंकी बनी हुई पीठ है; असपर विमला, उत्कर्षिणी, ज्ञाना, क्रिया, योगा, प्रह्वी, सत्या, ईशाना और अनुग्रहा – ये नौ शक्तियाँ विराजमान हैं । उस आसनपर एक अष्टदल कमल है, उसकी कर्णिका अत्यन्त प्रकाशमान है और पीली - पीली केसरोंकी छटा निराली ही है । आसनके सम्बन्धमें ऐसी भावना करके पाद्य, आचमनीय और अर्घ्य आदि उपचार प्रस्तुत करे। तदनन्तर भोग और मोक्षकी सिद्धिके लिये वैदिक और तान्त्रिक विधिसे मेरी पूजा करे ॥२५-२६ ॥
कृतन्यासः कृतन्यासां मदर्चां पाणिना मृजेत् ।
कलशं प्रोक्षणीयं च यथावदुपसाधयेत् ॥२०
तदद्भिर्देवयजनं द्रव्याण्यात्मानमेव च ।
प्रोक्ष्य पात्राणि त्रीण्यद्भिस्तैस्तैर्द्रव्यैश्च साधयेत् ॥२१
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पाद्यार्ध्याचमनीयार्थं त्रीणि पात्राणि दैशिकः ।
हृदा शीर्ष्णाथ शिखया गायत्र्या चाभिमन्त्रयेत् ॥२२
पिण्डे वाय्वग्निसंशुद्धे हृत्पद्मस्थां परां मम ।
अण्वीं जीवकलां ध्यायेन्नादान्ते सिद्धभाविताम् ॥२३
तयाऽऽत्मभूतया पिण्डे व्याप्ते सम्पूज्य तन्मयः ।
आवाह्यार्चादिषु स्थाप्य न्यस्तांगं मां प्रपूजयेत् ॥२४
पाद्योपस्पर्शार्हणादीनुपचारान् प्रकल्पयेत् ।
धर्मादिभिश्च नवभिः कल्पयित्वा ss सनं मम ॥ २५
पद्ममष्टदलं तत्र कर्णिकाकेसरोज्ज्वलम् ।
उभाभ्यां वेदतन्त्राभ्यां मह्यं तूभयसिद्धये ॥२६
सुदर्शनं पाञ्जजन्यं गदासीषुधनुर्हलान् ।
मुसलं कौस्तुभं मालां श्रीवत्सं चानुपूजयेत् ॥२७
नन्दं सुनन्दं गरुडं प्रचण्डं चण्डमेव च ।
महाबलं बलं चैव कुमुदं कुमुदेक्षणम् ॥२८
दुर्गां विनायकं व्यासं विष्वक्सेनं गुरून् सुरान् ।
स्वे स्वे स्थाने त्वभिमुखान् पूजयेत् प्रोक्षणादिभिः ॥२९
चन्दनोशीरकर्पूरकुंकुमागुरुवासितैः ।
सलिलैः स्नापयेन्मन्त्रैर्नित्यदा विभवे सति ॥३०
स्वर्णघर्मानुवाकेन महापुरुषविद्यया ।
पौरुषेणापि सूक्तेन सामभी राजनादिभिः ॥ ३१
वस्त्रोपवीताभरणपत्रसग्गन्धलेपनैः ।
अलंकुर्वीत सप्रेम मद्भक्तो मां यथोचितम् ॥३२
पाद्यमाचमनीयं च गन्धं सुमनसोऽक्षतान् ।
धूपदीपोपहार्याणि दद्यान्मे श्रद्धयार्चकः ॥ ३३
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गुडपायससर्पींषि शष्कुल्यापुपमोदकान् ।
संयावदधिसूपांश्च नैवेद्यं सति कल्पयेत् ॥३४
अभ्यंगोन्मर्दनादर्शदन्तधावाभिषेचनम् ।
अन्नाद्यगीतनृत्यादि' पर्वणि स्युरुतान्वहम् ॥३५
सुदर्शनचक्र, पाञ्चजन्य शंख, कौमोदकी गदा, खड्ग, बाण, धनुष, हल, मूसल— इन आठ आयुधोंकी पूजा आठ दिशाओंमें करे और कौस्तुभमणि, वैजयन्तीमाला तथा श्रीवत्सचिह्नकी वक्षःस्थलपर यथास्थान पूजा करे || २७ || नन्द, सुनन्द, प्रचण्ड, चण्ड, महाबल, बल, कुमुद और कुमुदेक्षण- इन आठ पार्षदोंकी आठ दिशाओंमें; गरुड़की सामने; दुर्गा, विनायक, व्यास और विष्वक्सेनकी चारों कोनोंमें स्थापना करके पूजन करे । बायीं ओर गुरुकी और यथाक्रम पूर्वादि दिशाओंमें इन्द्रादि आठ लोकपालोंकी स्थापना करके प्रोक्षण, अर्घ्यदान आदि क्रमसे उनकी पूजा करनी चाहिये ॥२८-२९ ॥ प्रिय उद्धव! यदि सामर्थ्य हो तो प्रतिदिन चन्दन, खस, कपूर, केसर और अरगजा आदि सुगन्धित वस्तुओंद्वारा सुवासित जलसे मुझे स्नान कराये और उस समय ' सुवर्ण घर्म ' इत्यादि स्वर्णघर्मानुवाक ' जितं ते पुण्डरीकाक्ष ' इत्यादि महापुरुषविद्या, ' सहस्रशीर्षा पुरुषः ' इत्यादि पुरुषसूक्त और ' इन्द्रं नरो नेमधिता हवन्त ' इत्यादि मन्त्रोक्त राजनादि साम-गायनका पाठ भी करता रहे ॥३०-३१ ॥ मेरा भक्त वस्त्र, यज्ञोपवीत, आभूषण, पत्र, माला, गन्ध और चन्दनादिसे प्रेमपूर्वक यथावत् मेरा शृंगार करे ॥ ३२ ॥ उपासक श्रद्धाके साथ मुझे
पाद्य, आचमन, चन्दन, पुष्प, अक्षत, धूप, दीप आदि सामग्रियाँ समर्पित करे ॥ ३३ ॥ यदि हो
सके तो गुड़, खीर, घृत, पूड़ी, पूए, लड्डू, हलुआ, दही और दाल आदि विविध व्यंजनोंका नैवेद्य लगावे ॥३४ ॥ भगवान्के विग्रहको दतुअन कराये, उबटन लगाये, पञ्चामृत आदिसे
स्नान कराये, सुगन्धित पदार्थोंका लेप करे, दर्पण दिखाये, भोग लगाये और शक्ति हो तो प्रतिदिन अथवा पर्वोंके अवसरपर नाचने - गाने आदिका भी प्रबन्ध करे ॥३५ ॥
विधिना विहिते कुण्डे मेखलागर्तवेदिभिः ।
अग्निमाधाय परितः समूहेत् पाणिनोदितम् ॥ ३६
परिस्तीर्याथ पर्युक्षेदन्वाधाय यथाविधि ।
प्रोक्षण्याऽऽसाद्य' द्रव्याणि प्रोक्ष्याग्नौ भावयेत माम् ॥३७
तप्तजाम्बूनदप्रख्यं शंखचक्रगदाम्बुजैः ।
लसच्चतुर्भुजं शान्तं पद्मकिंजल्कवाससम् ॥३८
स्फुरत्किरीटकटककटिसूत्रवरांगदम् ।
श्रीवत्सवक्षसं भ्राजत्कौस्तुभं वनमालिनम् ॥३९
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ध्यायन्नभ्यर्च्य दारूणि हविषाभिघृतानि च ।
प्रास्याज्यभागावाघारौ दत्त्वा चाज्यप्लुतं हविः ॥४०
जुहुयान्मूलमन्त्रेण षोडशर्चावदानतः ।
धर्मादिभ्यो यथान्यायं मन्त्रैः स्विष्टकृतं बुधः ॥४१
अभ्यर्च्याथ नमस्कृत्य पार्षदेभ्यो बलिं हरेत् ।
मूलमन्त्रं जपेद् ब्रह्म स्मरन्नारायणात्मकम् ॥४२
उद्धवजी! तदनन्तर पूजाके बाद शस्त्रोक्त विधिसे बने हुए कुण्डमें अग्निकी स्थापना करे । वह कुण्ड मेखला, गर्त और वेदीसे शोभायमान हो । उसमें हाथकी हवासे अग्नि प्रज्वलित करके उसका परिसमूहन करे, अर्थात् उसे एकत्र कर दे || ३६ || वेदीके चारों ओर कुशकण्डिका करके अर्थात् चारों ओर बीस - बीस कुश बिछाकर मन्त्र पढ़ता हुआ उनपर जल छिड़के । इसके बाद विधिपूर्वक समिधाओंका आधानरूप अन्वाधान कर्म करके अग्निके उत्तर भागमें होमोपयोगी सामग्री रखे और प्रोक्षणीपात्रके जलसे प्रोक्षण करे । तदनन्तर अग्निमें मेरा इस प्रकार ध्यान करे ॥ ३७ ॥ ' मेरी मूर्ति तपाये हुए सोनेके समान दम - दम दमक
रही है । रोम - रोमसे शान्तिकी वर्षा हो रही है । लंबी और विशाल चार भुजाएँ शोभायमान हैं । उनमें शंख, चक्र, गदा, पद्म विराजमान हैं । कमलकी केसरके समान पीला - पीला वस्त्र फहरा रहा है ॥३८ ॥ सिरपर मुकुट, कलाइयोंमें कंगन, कमरमें करधनी और बाँहोंमें बाजूबंद
झिलमिला रहे हैं । वक्षःस्थलपर श्रीवत्सका चिह्न है। गलेमें कौस्तुभमणि जगमगा रही है । घुटनोंतक वनमाला लटक रही है ' ॥ ३ ९ ॥ अग्निमें मेरी इस मूर्तिका ध्यान करके पूजा करनी चाहिये । इसके बाद सूखी समिधाओंको घृतमें डुबोकर आहुति दे और आज्यभाग और आघार नामक दो - दो आहुतियोंसे और भी हवन करे । तदनन्तर घीसे भिगोकर अन्य हवन-सामग्रियोंसे आहुति दे ॥ ४० ॥ इसके बाद अपने इष्टमन्त्रसे अथवा 'ॐ नमो नारायणाय '
इस अष्टाक्षर मन्त्रसे तथा पुरुषसूक्तके सोलह मन्त्रोंसे हवन करे । बुद्धिमान् पुरुषको चाहिये कि धर्मादि देवताओंके लिये भी विधिपूर्वक मन्त्रोंसे हवन करे और स्विष्टकृत् आहुति भी दे ॥४१ ॥
इस प्रकार अग्निमें अन्तर्यामीरूपसे स्थित भगवान्की पूजा करके उन्हें नमस्कार करे और नन्द- सुनन्द आदि पार्षदोंको आठों दिशाओंमें हवनकर्मींग बलि दे । तदनन्तर प्रतिमाके सम्मुख बैठकर परब्रह्मस्वरूप भगवान् नारायणका स्मरण करे और भगवत्स्वरूप मूलमन्त्र ‘ ॐ नमो नारायणाय ' का जप करे ॥ ४२ ॥ इसके बाद भगवान्को आचमन करावे और
उनका प्रसाद विष्वक्सेनको निवेदन करे । इसके पश्चात् अपने इष्टदेवकी सेवामें सुगन्धित ताम्बूल आदि मुखवास उपस्थित करे तथा पुष्पाञ्जलि समर्पित करे ॥ ४३ ॥ मेरी लीलाओंको
गावे, उनका वर्णन करे और मेरी ही लीलाओंका अभिनय करे । यह सब करते समय प्रेमोन्मत्त होकर नाचने लगे । मेरी लीला - कथाएँ स्वयं सुने और दूसरोंको सुनावे । कुछ समयतक संसार और उसके रगड़ों- झगड़ोंको भूलकर मुझमें ही तन्मय हो जाय ॥ ४४ ॥ प्राचीन ऋषियोंके
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द्वारा अथवा प्राकृत भक्तोंके द्वारा बनाये हुए छोटे - बड़े स्तव और स्तोत्रोंसे मेरी स्तुति करके प्रार्थना करे — ' भगवन्! आप मुझपर प्रसन्न हों । मुझे अपने कृपाप्रसादसे सराबोर कर दें । ' तदनन्तर दण्डवत् प्रणाम करे || ४५ || अपना सिर मेरे चरणोंपर रख दे और अपने दोनों हाथोंसे - दायेंसे दाहिना और बायेंसे बायाँ चरण पकड़कर कहे— ' भगवन्! इस संसार-सागरमें मैं डूब रहा हूँ । मृत्युरूप मगर मेरा पीछा कर रहा है । मैं डरकर आपकी शरणमें आया हूँ । प्रभो! आप मेरी रक्षा कीजिये ' ॥ ४६ || इस प्रकार स्तुति करके मुझे समर्पित की हुई माला आदरके साथ अपने सिरपर रखे और उसे मेरा दिया हुआ प्रसाद समझे । यदि विसर्जन करना हो तो ऐसी भावना करनी चाहिये कि प्रतिमामेंसे एक दिव्य ज्योति निकली है और वह मेरी हृदयस्थ ज्योतिमें लीन हो गयी है । बस, यही विसर्जन है || ४७ || उद्धवजी! प्रतिमा आदिमें जब जहाँ श्रद्धा हो तब, तहाँ मेरी पूजा करनी चाहिये, क्योंकि मैं सर्वात्मा हूँ और समस्त प्राणियोंमें तथा अपने हृदयमें भी स्थित हूँ ॥ ४८ ॥
दत्त्वाऽऽचमनमुच्छेषं विष्वक्सेनाय कल्पयेत् ।
मुखवासं सुरभिमत् ताम्बूलाद्यमथार्हयेत् ॥४३
उपगायन् गृणन् नृत्यन् कर्माण्यभिनयन् मम ।
मत्कथाः श्रावयञ्छृण्वन् मुहूर्तं क्षणिको भवेत् ॥४४
स्तवैरुच्चावचैः स्तोत्रैः पौराणैः प्राकृतैरपि ।
स्तुत्वा प्रसीद भगवन्निति वन्देत दण्डवत् ॥४५
शिरो मत्पादयोः कृत्वा बाहुभ्यां च परस्परम् ।
प्रपन्नं पाहि मामीश भीतं मृत्युग्रहार्णवात् ॥४६
इति शेषां मया दत्तां शिरस्याधाय सादरम् ।
उद्वासयेच्चेदुद्वास्यं ज्योतिर्ज्योतिषि तत् पुनः ॥४७
अर्चादिषु यदा यत्र श्रद्धा मां तत्र चार्चयेत् ।
सर्वभूतेष्वात्मनि च सर्वात्माहमवस्थितः ॥४८
एवं क्रियायोगपथैः पुमान् वैदिकतान्त्रिकैः ।
अर्चन्नुभयतः सिद्धिं मत्तो विन्दत्यभीप्सिताम् ॥४९
मदर्चां सम्प्रतिष्ठाप्य मन्दिरं कारयेद् दृढम् ।
पुष्पोद्यानानि रम्याणि पूजायात्रोत्सवाश्रितान् ॥ ५०
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उद्धवजी! जो मनुष्य इस प्रकार वैदिक, तान्त्रिक क्रियायोगके द्वारा मेरी पूजा करता है वह इस लोक और परलोकमें मुझसे अभीष्ट सिद्धि प्राप्त करता है ॥ ४९ ॥ यदि शक्ति हो तो
उपासक सुन्दर और सुदृढ़ मन्दिर बनवाये और उसमें मेरी प्रतिमा स्थापित करे । सुन्दर- सुन्दर फूलोंके बगीचे लगवा दे; नित्यकी पूजा, पर्वकी यात्रा और बड़े - बड़े उत्सवोंकी व्यवस्था कर दे ॥५० ॥ जो मनुष्य पर्वोंके उत्सव और प्रतिदिनकी पूजा लगातार चलनेके लिये खेत,
बाजार, नगर अथवा गाँव मेरे नामपर समर्पित कर देते हैं, उन्हें मेरे समान ऐश्वर्यकी प्राप्ति होती है ॥५१ ॥ मेरी मूर्तिकी प्रतिष्ठा करनेसे पृथ्वीका एकच्छत्र राज्य, मन्दिर- निर्माणसे
त्रिलोकीका राज्य, पूजा आदिकी व्यवस्था करनेसे ब्रह्मलोक और तीनोंके द्वारा मेरी समानता प्राप्त होती है ॥५२ ॥ जो निष्काम भाव से मेरी पूजा करता है, उसे मेरा भक्तियोग प्राप्त हो
जाता है और उस निरपेक्ष भक्तियोगके द्वारा वह स्वयं मुझे प्राप्त कर लेता है ॥५३ ॥ जो
अपनी दी हुई या दूसरोंकी दी हुई देवता और ब्राह्मणकी जीविका हरण कर लेता है, वह करोड़ों वर्षोंतक विष्ठाका कीड़ा होता है ॥ ५४ ॥ जो लोग ऐसे कामोंमें सहायता, प्रेरणा
अथवा अनुमोदन करते हैं, वे भी मरनेके बाद प्राप्त करनेवालेके समान ही फलके भागीदार होते हैं । यदि उनका हाथ अधिक रहा तो फल भी उन्हें अधिक ही मिलता है ॥५५ ॥
पूजादीनां प्रवाहार्थं महापर्वस्वथान्वहम् ।
क्षेत्रापणपुरग्रामान् दत्त्वा मत्सार्ष्टितामियात् ॥ ५१
प्रतिष्ठया सार्वभौमं सद्मना भुवनत्रयम् ।
पूजादिना ब्रह्मलोकं त्रिभिर्मत्साम्यतामियात् ॥५२
मामेव नैरपेक्ष्येण भक्तियोगेन' विन्दति ।
भक्तियोगं स लभते एवं यः पूजयेत माम् ॥५३
यः स्वदत्तां परैर्दत्तां हरेत सुरविप्रयोः ।
वृत्तिं स जायते विड्भुग् वर्षाणामयुतायुतम् ॥५४
कर्तुश्च सारथेर्हेतोरनुमोदितुरेव च ।
कर्मणां भागिनः प्रेत्य भूयो भूयसि तत् फलम् ॥५५
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायामेकादशस्कन्धे सप्तविंशोऽध्यायः ॥२७ ॥
१. अन्नादि गीतनृत्यादि मत्पर्वणि यथार्हतः ।
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१. प्रोक्ष्याद्भिराज्यद्रव्याणि प्रोक्ष्याग्नावावहेत माम् । १. क्रियायोगेन ।
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अथाष्टाविंशोऽध्यायः परमार्थनिरूपण श्रीभगवानुवाच
परस्वभावकर्माणि न प्रशंसेन्न गर्हयेत् ।
विश्वमेकात्मकं पश्यन् प्रकृत्या पुरुषेण च ॥१
परस्वभावकर्माणि यः प्रशंसति निन्दति ।
स आशु भ्रश्यते स्वार्थादसत्यभिनिवेशतः ॥२
भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं - उद्धवजी! यद्यपि व्यवहारमें पुरुष और प्रकृति— द्रष्टा और दृश्यके भेदसे दो प्रकारका जगत् जान पड़ता है, तथापि परमार्थ- दृष्टिसे देखनेपर यह सब एक अधिष्ठान- स्वरूप ही है; इसलिये किसीके शान्त, घोर और मूढ़ स्वभाव तथा उनके अनुसार कर्मोंकी न स्तुति करनी चाहिये और न निन्दा । सर्वदा अद्वैत - दृष्टि रखनी चाहिये ॥१ ॥ जो पुरुष दूसरोंके स्वभाव और उनके कर्मोंकी प्रशंसा अथवा निन्दा करते हैं, वे
शीघ्र ही अपने यथार्थ परमार्थ-साधनसे च्युत हो जाते हैं; क्योंकि साधन तो द्वैतके अभिनिवेशका — उसके प्रति सत्यत्व - बुद्धिका निषेध करता है और प्रशंसा तथा निन्दा उसकी सत्यताके भ्रमको और भी दृढ़ करती हैं || २ || उद्धवजी! सभी इन्द्रियाँ राजस अहंकारके कार्य हैं । जब वे निद्रित हो जाती हैं तब शरीरका अभिमानी जीव चेतनाशून्य हो जाता है; अर्थात् उसे बाहरी शरीरकी स्मृति नहीं रहती । उस समय यदि मन बच रहा, तब तो वह सपनेके झूठे दृश्योंमें भटकने लगता है और वह भी लीन हो गया, तब तो जीव मृत्युके समान गाढ़ निद्रा — सुषुप्तिमें लीन हो जाता है । वैसे ही जब जीव अपने अद्वितीय आत्मस्वरूपको भूलकर नाना वस्तुओंका दर्शन करने लगता है तब वह स्वप्नके समान झूठे दृश्योंमें फँस जाता है; अथवा मृत्युके समान अज्ञानमें लीन हो जाता है || ३ || उद्धवजी! जब द्वैत नामकी कोई वस्तु ही नहीं है, तब उसमें अमुक वस्तु भली है और अमुक बुरी, अथवा इतनी भली और इतनी बुरी है — यह प्रश्न ही नहीं उठ सकता । विश्वकी सभी वस्तुएँ वाणीसे कही जा सकती हैं अथवा मनसे सोची जा सकती हैं; इसलिये दृश्य एवं अनित्य होनेके कारण उनका मिथ्यात्व तो स्पष्ट ही है ॥४ ॥ परछाईं, प्रतिध्वनि और सीपी आदिमें चाँदी आदिके आभास यद्यपि हैं
तो सर्वथा मिथ्या, परन्तु उनके द्वारा मनुष्यके हृदयमें भय- कम्प आदिका संचार हो जाता है । वैसे ही देहादि सभी वस्तुएँ हैं तो सर्वथा मिथ्या ही, परन्तु जबतक ज्ञानके द्वारा इनकी असत्यताका बोध नहीं हो जाता, इनकी आत्यन्तिक निवृत्ति नहीं हो जाती, तबतक ये भी अज्ञानियोंको भयभीत करती रहती हैं ॥ ५ ॥ उद्धवजी! जो कुछ प्रत्यक्ष या परोक्ष वस्तु है,
वह आत्मा ही है । वही सर्वशक्तिमान् भी है । जो कुछ विश्व सृष्टि प्रतीत हो रही है, इसका वह निमित्त- कारण तो है ही, उपादान-कारण भी है । अर्थात् वही विश्व बनता है और वही बनाता