श्रीगणेशाय नमः।

श्रीमद्भागवत महापुराण - २ — पृष्ठ 271–280

श्रीमद्भागवत महापुराण - २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 271–280

पृष्ठ 271

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त्वं हि ब्रह्मविदां श्रेष्ठः संस्कारान् कर्तुमर्हसि ।

बालयोरनयोर्नृणां जन्मना ब्राह्मणो गुरुः ॥६

गर्ग उवाच

यदूनामहमाचार्यः ख्यातश्च भुवि सर्वतः ।

सुतं मया संस्कृतं ते मन्यते देवकीसुतम् ॥७

कंसः पापमतिः सख्यं तव चानकदुन्दुभेः ।

देवक्या अष्टमो गर्भो न स्त्री भवितुमर्हति ॥८

इति संचिन्तयञ्छ्रुत्वा देवक्या दारिकावचः ।

अपि हन्ताऽऽगताशंकस्तर्हि तन्नोऽनयो भवेत् ॥९

नन्द उवाच

अलक्षितोऽस्मिन् रहसि मामकैरपि गोव्रजे ।

कुरु द्विजातिसंस्कारं स्वस्तिवाचनपूर्वकम् ॥१०

श्रीशुक उवाच

एवं सम्प्रार्थितो विप्रः स्वचिकीर्षितमेव तत् ।

चकार नामकरणं गूढो रहसि बालयोः ॥११

गर्ग उवाच अयं हि रोहिणीपुत्रो रमयन् सुहृदो गुणैः ।

आख्यास्यते राम इति बलाधिक्याद् बलं विदुः ।

यदूनामपृथग्भावात् संकर्षणमुशन्त्युत ॥१२

गर्गाचार्यजीने कहा—नन्दजी! मैं सब जगह यदुवंशियोंके आचार्यके रूपमें प्रसिद्ध यदि मैं तुम्हारे पुत्रके संस्कार करूँगा, तो लोग समझेंगे कि यह तो देवकीका पुत्र ॥७ ॥ कंसकी बुद्धि बुरी है, वह पाप ही सोचा करती है । वसुदेवजीके साथ तुम्हारी

बड़ी घनिष्ठ मित्रता है । जबसे देवकीकी कन्यासे उसने यह बात सुनी है कि उसको मारनेवाला और कहीं पैदा हो गया है, तबसे वह यही सोचा करता है कि देवकीके आठवें गर्भसे कन्याका जन्म नहीं होना चाहिये । यदि मैं तुम्हारे पुत्रका संस्कार कर दूँ और वह इस बालकको वसुदेवजीका लड़का समझकर मार डाले, तो हमसे बड़ा अन्याय हो जायगा ॥८ - ९ ॥ नन्दबाबाने कहा — आचार्यजी! आप चुपचाप इस एकान्त गोशालामें केवल स्वस्तिवाचन करके इस बालकका द्विजातिसमुचित नामकरण- संस्कारमात्र कर दीजिये ।

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औरोंकी कौन कहे, मेरे सगे - सम्बन्धी भी इस बातको न जानने पावें ॥१० ॥

श्रीशुकदेवजी कहते हैं – गर्गाचार्यजी तो संस्कार करना चाहते ही थे । जब नन्दबाबाने उनसे इस प्रकार प्रार्थना की, तब उन्होंने एकान्तमें छिपकर गुप्तरूपसे दोनों बालकोंका नामकरण संस्कार कर दिया ॥११ ॥

गर्गाचार्यजीने कहा- ' यह रोहिणीका पुत्र है । इसलिये इसका नाम होगा रौहिणेय । यह अपने सगे - सम्बन्धी और मित्रोंको अपने गुणोंसे अत्यन्त आनन्दित करेगा । इसलिये इसका दूसरा नाम होगा ' राम' । इसके बलकी कोई सीमा नहीं है, अतः इसका एक नाम ‘ बल ' भी है । यह यादवोंमें और तुमलोगोंमें कोई भेदभाव नहीं रखेगा और लोगोंमें फूट पड़नेपर मेल करावेगा, इसलिये इसका एक नाम ' संकर्षण' भी है ॥१२ ॥ और यह जो

साँवला- साँवला है, यह प्रत्येक युगमें शरीर ग्रहण करता है । पिछले युगोंमें इसने क्रमशः श्वेत, रक्त और पीत — ये तीन विभिन्न रंग स्वीकार किये थे । अबकी यह कृष्णवर्ण हुआ है । इसलिये इसका नाम ' कृष्ण ' होगा ॥ १३ ॥ नन्दजी! यह तुम्हारा पुत्र पहले कभी

वसुदेवजीके घर भी पैदा हुआ था, इसलिये इस रहस्यको जाननेवाले लोग इसे ' श्रीमान् वासुदेव ' भी कहते हैं || १४ || तुम्हारे पुत्रके और भी बहुत- से नाम हैं तथा रूप भी अनेक हैं । इसके जितने गुण हैं और जितने कर्म, उन सबके अनुसार अलग - अलग नाम पड़ जाते हैं । मैं तो उन नामोंको जानता हूँ, परन्तु संसारके साधारण लोग नहीं जानते ॥१५ ॥ यह तुमलोगोंका परम कल्याण करेगा। समस्त गोप और गौओंको यह

बहुत ही आनन्दित करेगा । इसकी सहायतासे तुमलोग बड़ी - बड़ी विपत्तियोंको बड़ी सुगमतासे पार कर लोगे ॥१६ ॥ व्रजराज! पहले युगकी बात है । एक बार पृथ्वीमें कोई

राजा नहीं रह गया था । डाकुओंने चारों ओर लूट- खसोट मचा रखी थी । तब तुम्हारे इसी पुत्रने सज्जन पुरुषोंकी रक्षा की और इससे बल पाकर उन लोगोंने लुटेरोंपर विजय प्राप्त की ॥१७॥ जो मनुष्य तुम्हारे इस साँवले - सलोने शिशुसे प्रेम करते हैं । वे बड़े

भाग्यवान् हैं । जैसे विष्णुभगवान्‌के करकमलोंकी छत्रछायामें रहनेवाले देवताओंको असुर नहीं जीत सकते, वैसे ही इससे प्रेम करनेवालोंको भीतर या बाहर किसी भी प्रकारके शत्रु नहीं जीत सकते ॥ १८ ॥ नन्दजी! चाहे जिस दृष्टिसे देखें – गुणमें, सम्पत्ति

और सौन्दर्यमें, कीर्ति और प्रभावमें तुम्हारा यह बालक साक्षात् भगवान् नारायणके समान है । तुम बड़ी सावधानी और तत्परतासे इसकी रक्षा करो ' ॥१९ ॥ इस प्रकार

नन्दबाबाको भलीभाँति समझाकर, आदेश देकर गर्गाचार्यजी अपने आश्रमको लौट गये । जनकी बात सुनकर नन्दबाबाको बड़ा ही आनन्द हुआ । उन्होंने ऐसा समझा कि मेरी सब आशा - लालसाएँ पूरी हो गयीं, मैं अब कृतकृत्य हूँ ॥२० ॥

आसन् वर्णास्त्रयो ह्यस्य गृह्णतोऽनुयुगं तनूः ।

शुक्लो रक्तस्तथा पीत इदानीं कृष्णतां गतः ॥१३

प्रागयं वसुदेवस्य क्वचिज्जातस्तवात्मजः ।

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वासुदेव इति श्रीमानभिज्ञाः सम्प्रचक्षते ॥१४

बहूनि सन्ति नामानि रूपाणि च सुतस्य ते ।

गुणकर्मानुरूपाणि तान्यहं वेद नो जनाः ॥१५

एष वः श्रेय आधास्यद् गोपगोकुलनन्दनः ।

अनेन सर्वदुर्गाणि यूयमञ्जस्तरिष्यथ ॥ १६

पुरानेन व्रजपते साधवो दस्युपीडिताः ।

अराजके रक्ष्यमाणा जिग्युर्दस्यून् समेधिताः ॥१७

य एतस्मिन् महाभागाः प्रीतिं कुर्वन्ति मानवाः ।

नारयोऽभिभवन्त्येतान् विष्णुपक्षानिवासुराः ॥ १८

तस्मान्नन्दात्मजोऽयं ते नारायणसमो गुणैः ।

श्रिया कीर्त्यानुभावेन गोपायस्व समाहितः ॥१९

इत्यात्मानं समादिश्य गर्गे च स्वगृहं गते ।

नन्दः प्रमुदितो मेने आत्मानं पूर्णमाशिषाम् ॥२०

कालेन व्रजताल्पेन गोकुले रामकेशवौ ।

जानुभ्यां सह पाणिभ्यां रिंगमाणौ विजह्नतुः ॥ २१

तावङ्घ्रियुग्ममनुकृष्य सरीसृपन्तौ घोषप्रघोषरुचिरं व्रजकर्दमेषु । तन्नादहृष्टमनसावनुसृत्य लोकं मुग्धप्रभीतवदुपेयतुरन्ति मात्रोः ॥२२ तन्मातरौ निजसुतौ घृणया स्नुवन्त्यौ पङ्काङ्गरागरुचिरावुपगुह्य दोर्भ्याम् । दत्त्वा स्तनं प्रपिबतोः स्म मुखं निरीक्ष्य मुग्धस्मिताल्पदशनं ययतुः प्रमोदम् ॥२३ यर्ह्यङ्गनादर्शनीयकुमारलीला- वन्तर्व्रजे तदबलाः प्रगृहीतपुच्छैः ।

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वत्सैरितस्तत उभावनुकृष्यमाणौ प्रेक्षन्त्य उज्झितगृहा जहृषुर्हसन्त्यः ॥२४ शृंग्यग्निदंष्ट्रयसिजलद्विजकण्टकेभ्यः क्रीडापरावतिचलौ स्वसुतौ निषेद्धुम् । गृह्याणि कर्तुमपि यत्र न तज्जनन्यौ शेकात आपतुरलं मनसोऽनवस्थाम् ॥२५ परीक्षित्! कुछ ही दिनोंमें राम और श्याम घुटनों और हाथोंके बल बकैयाँ चल- चलकर गोकुलमें खेलने लगे ॥२१ ॥ दोनों भाई अपने नन्हे - नन्हे पाँवोंको गोकुलकी

कीचड़में घसीटते हुए चलते । उस समय उनके पाँव और कमरके घुँघरू रुनझुन बजने लगते । वह शब्द बड़ा भला मालूम पड़ता । वे दोनों स्वयं वह ध्वनि सुनकर खिल उठते । कभी- कभी वे रास्ते चलते किसी अज्ञात व्यक्तिके पीछे हो लेते । फिर जब देखते कि यह तो कोई दूसरा है, तब झक - से रह जाते और डरकर अपनी माताओं - रोहिणीजी और यशोदाजीके पास लौट आते ॥२२ ॥ माताएँ यह सब देख- देखकर स्नेहसे भर जातीं ।

उनके स्तनोंसे दूधकी धारा बहने लगती थी । जब उनके दोनों नन्हे - नन्हे - से शिशु अपने शरीरमें कीचड़का अंगराग लगाकर लौटते, तब जनकी सुन्दरता और भी बढ़ जाती थी । माताएँ उन्हें आते ही दोनों हाथोंसे गोदमें लेकर हृदयसे लगा लेतीं और स्तनपान कराने लगतीं, जब वे दूध पीने लगते और बीच- बीचमें मुसकरा मुसकराकर अपनी माताओंकी ओर देखने लगते, तब वे उनकी मन्द मन्द मुसकान, छोटी-छोटी दँतुलियाँ और भोला- भाला मुँह देखकर आनन्दके समुद्रमें डूबने- उतराने लगतीं || २३ || जब राम और श्याम दोनों कुछ और बड़े हुए, तब व्रजमें घरके बाहर ऐसी - ऐसी बाललीलाएँ करने लगे, जिन्हें गोपियाँ देखती ही रह जातीं । जब वे किसी बैठे हुए बछड़ेकी पूँछ पकड़ लेते और बछड़े डरकर इधर- उधर भागते, तब वे दोनों और भी जोरसे पूँछ पकड़ लेते और बछड़े उन्हें घसीटते हुए दौड़ने लगते। गोपियाँ अपने घरका काम- धंधा छोड़कर यही सब देखती रहतीं और हँसते - हँसते लोटपोट होकर परम आनन्दमें मग्न हो जातीं ॥ २४ ॥

कन्हैया और बलदाऊ दोनों ही बड़े चंचल और बड़े खिलाड़ी थे । वे कहीं हरिन, गाय आदि सींगवाले पशुओंके पास दौड़ जाते, तो कहीं धधकती हुई आगसे खेलनेके लिये कूद पड़ते । कभी दाँतसे काटनेवाले कुत्तोंके पास पहुँच जाते, तो कभी आँख बचाकर तलवार उठा लेते । कभी कूएँ या गड्ढेके पास जलमें गिरते -गिरते बचते, कभी मोर आदि पक्षियोंके निकट चले जाते और कभी काँटोंकी ओर बढ़ जाते थे । माताएँ उन्हें बहुत बरजतीं, परन्तु उनकी एक न चलती । ऐसी स्थितिमें वे घरका काम- धंधा भी नहीं सँभाल पातीं । उनका चित्त बच्चोंको भयकी वस्तुओंसे बचानेकी चिन्तासे अत्यन्त चंचल रहता था ॥ २५ ॥

कालेनाल्पेन राजर्षे रामः कृष्णश्च गोकुले ।

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अधृष्टजानुभिः पद्भिर्विचक्रमतुरंजसा ॥२६ राजर्षे! कुछ ही दिनोंमें यशोदा और रोहिणीके लाड़ले लाल घुटनोंका सहारा लिये बिना अनायास ही खड़े होकर गोकुलमें चलने - फिरने लगे* || २६ || ये व्रजवासियोंके कन्हैया स्वयं भगवान् हैं, परम सुन्दर और परम मधुर! अब वे और बलराम अपनी ही उम्रके ग्वालबालोंको अपने साथ लेकर खेलनेके लिये व्रजमें निकल पड़ते और व्रजकी भाग्यवती गोपियोंको निहाल करते हुए तरह- तरहके खेल खेलते ॥२७ ॥ उनके

बचपनकी चंचलताएँ बड़ी ही अनोखी होती थीं । गोपियोंको तो वे बड़ी ही सुन्दर और मधुर लगतीं । एक दिन सब की--सब इकट्ठी होकर नन्द - बाबाके घर आयीं और यशोदा माताको सुना - सुनाकर कन्हैयाके करतूत कहने लगीं ॥ २८ ॥

ततस्तु भगवान् कृष्णो वयस्यैर्व्रजबालकैः ।

सहरामो व्रजस्त्रीणां चिक्रीडे जनयन् मुदम् ॥२७

कृष्णस्य गोप्यो रुचिरं वीक्ष्य कौमारचापलम् ।

शृण्वत्याः किल तन्मातुरिति होचुः समागताः ॥२८

वत्सान् मुंचन् क्वचिदसमये क्रोशसंजातहासः स्तेयं स्वाद्वत्त्यथ दधि पयः कल्पितैः स्तेययोगैः । मर्कान् भोक्ष्यन् विभजति स चे- न्नात्ति भाण्डं भिनत्ति द्रव्यालाभे स गृहकुपितो यात्युपक्रोश्य तोकान् ॥२९ हस्ताग्राह्ये रचयति विधिं पीठकोलूखलाद्यै- श्छिद्रं ह्यन्तर्निहितवयुनः शिक्यभाण्डेषु तद्वित् । ध्वान्तागारे धृतमणिगणं स्वांगमर्थप्रदीपं काले गोप्यो यर्हि गृहकृ- त्येषु सुव्यग्रचित्ताः ॥ ३० ' अरी यशोदा! यह तेरा कान्हा बड़ा नटखट हो गया है । गाय दुहनेका समय न होनेपर भी यह बछड़ोंको खोल देता है और हम डाँटती हैं, तो ठठा - ठठाकर हँसने लगता है । यह चोरीके बड़े - बड़े उपाय करके हमारे मीठे मीठे दही - दूध चुरा- चुराकर खा

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जाता है । केवल अपने ही खाता तो भी एक बात थी, यह तो सारा दही - दूध वानरोंको बाँट देता है और जब वे भी पेट भर जानेपर नहीं खा पाते, तब यह हमारे माटोंको ही फोड़ डालता है । यदि घरमें कोई वस्तु इसे नहीं मिलती तो यह घर और घरवालोंपर बहुत खीझता है और हमारे बच्चोंको रुलाकर भाग जाता है ॥ २९ ॥ जब हम दही- दूधको छीकोंपर रख देती हैं और इसके छोटे-छोटे हाथ वहाँतक नहीं पहुँच पाते, तब

यह बड़े - बड़े उपाय रचता है । कहीं दो - चार पीढ़ोंको एकके ऊपर एक रख देता है । कहीं ऊखलपर चढ़ जाता है तो कहीं ऊखलपर पीढ़ा रख देता है, ( कभी - कभी तो अपने किसी साथीके कंधेपर ही चढ़ जाता है । ) जब इतनेपर भी काम नहीं चलता, तब यह नीचेसे ही उन बर्तनोंमें छेद कर देता है । इसे इस बातकी पक्की पहचान रहती है कि किस छीकेपर किस बर्तनमें क्या रखा है । और ऐसे ढंगसे छेद करना जानता है कि किसीको पतातक न चले । जब हम अपनी वस्तुओंको बहुत अँधेरेमें छिपा देती हैं, तब नन्दरानी! तुमने जो इसे बहुत- से मणिमय आभूषण पहना रखे हैं, उनके प्रकाशसे अपने - आप ही सब कुछ देख लेता है । इसके शरीरमें भी ऐसी ज्योति है कि जिससे इसे सब कुछ दीख जाता है । यह इतना चालाक है कि कब कौन कहाँ रहता है, इसका पता रखता है और जब हम सब घरके काम- धंधोंमें उलझी रहती हैं, तब यह अपना काम बना लेता है ॥३० ॥ ऐसा करके भी ढिठाईकी बातें करता है — उलटे हमें ही चोर

बनाता और अपने घरका मालिक बन जाता है । इतना ही नहीं, यह हमारे लिपे - पुते स्वच्छ घरोंमें मूत्र आदि भी कर देता है। तनिक देखो तो इसकी ओर, वहाँ तो चोरीके अनेकों उपाय करके काम बनाता है और यहाँ मालूम हो रहा है मानो पत्थरकी मूर्ति खड़ी हो! वाह रे भोले - भाले साधु! ' इस प्रकार गोपियाँ कहती जातीं और श्रीकृष्णके भीत - चकित नेत्रोंसे युक्त मुखकमलको देखती जातीं । उनकी यह दशा देखकर नन्दरानी यशोदाजी उनके मनका भाव ताड़ लेतीं और उनके हृदयमें स्नेह और आनन्दकी बाढ़ आ जाती । वे इस प्रकार हँसने लगतीं कि अपने लाड़ले कन्हैयाको इस बातका उलाहना भी न दे पातीं, डाँटनेकी बाततक नहीं सोच पातीं * ॥३१ ॥

एवं धाष्टर्यान्युशति कुरुते मेहनादीनि वास्तौ स्तेयोपायैर्विरचितकृतिः सुप्रतीको यथा ss स्ते । इत्थं स्त्रीभिः सभयनयन- श्रीमुखालोकिनीभि- र्व्याख्यातार्था प्रहसितमुखी न ह्युपालब्धुमैच्छत् ॥३१ एकदा क्रीडमानास्ते रामाद्या गोपदारकाः

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कृष्णो मृदं भक्षितवानिति मात्रे न्यवेदयन् ॥३२

सा गृहीत्वा करे कृष्णमुपालभ्य हितैषिणी ।

यशोदा भयसम्भ्रान्तप्रेक्षणाक्षमभाषत ॥ ३३

कस्मान्मृदमदान्तात्मन् भवान् भक्षितवान् रहः ।

वदन्ति तावका ह्येते कुमारास्तेऽग्रजोऽप्ययम् ॥३४

एक दिन बलराम आदि ग्वालबाल श्रीकृष्णके साथ खेल रहे थे । उन लोगोंने मा यशोदाके पास आकर कहा-'मा! कन्हैयाने मिट्टी खायी है' * ॥३२ ॥ हितैषिणी

यशोदाने श्रीकृष्णका हाथ पकड़ लिया ॥ उस समय श्रीकृष्णकी आँखें डरके मारे नाच रही थीं † । यशोदा मैयाने डाँटकर कहा- ॥ ३३ ॥ ' क्यों रे नटखट! तू बहुत ढीठ हो

गया है । तूने अकेलेमें छिपकर मिट्टी क्यों खायी? देख तो तेरे दलके तेरे सखा क्या कह रहे हैं! तेरे बड़े भैया बलदाऊ भी तो उन्हींकी ओरसे गवाही दे रहे हैं ' ॥३४ ॥

श्रीकृष्ण उवाच

नाहं भक्षितवानम्ब सर्वे मिथ्याभिशंसिनः ।

यदि सत्यगिरस्तर्हि समक्षं पश्य मे मुखम् ॥३५

यद्येवं तर्हि व्यादेहीत्युक्तः स भगवान् हरिः ।

व्यादत्ताव्याहतैश्वर्यः क्रीडामनुजबालकः ॥३६

सा तत्र ददृशे विश्वं जगत् स्थास्नु च खं दिशः ।

साद्रिद्वीपाब्धिभूगोलं सवाय्वग्नीन्दुतारकम् ॥३७

ज्योतिश्चक्रं जलं तेजो नभस्वान् वियदेव च ।

वैकारिकाणीन्द्रियाणि मनो मात्रा गुणास्त्रयः ॥३८

एतद् विचित्रं सह जीवकाल- स्वभावकर्माशयलिंगभेदम् । सुनोस्तनौ वीक्ष्य विदारितास्य व्रजं सहात्मानमवाप शंकाम् ॥३९ किं स्वप्न एतदुत देवमाया किंवा मदीयो त बुद्धिमोहः । अभो अमुष्यैव ममार्भकस्य यः कश्चनौत्पत्तिक आत्मयोगः ॥४० अथो यथावन्न वितर्कगोचरं चेतोमनःकर्मवचोभिरंजसा ।

पृष्ठ 278

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यदाश्रयं येन यतः प्रतीयते सुदुर्विभाव्यं प्रणतास्मि तत्पदम् ॥४१ भगवान् श्रीकृष्णने कहा -'मा! मैंने मिट्टी नहीं खायी । ये सब झूठ बक रहे हैं । यदि तुम इन्हींकी बात सच मानती हो तो मेरा मुँह तुम्हारे सामने ही है, तुम अपनी आँखोंसे देख लो ॥३५ ॥ यशोदाजीने कहा- ' अच्छी बात । यदि ऐसा है, तो मुँह

खोल । ' माताके ऐसा कहनेपर भगवान् श्रीकृष्णने अपना मुँह खोल दिया* । परीक्षित्! भगवान् श्रीकृष्णका ऐश्वर्य अनन्त है । वे केवल लीलाके लिये ही मनुष्यके बालक बने हुए हैं ॥३६ ॥

यशोदाजीने देखा कि उनके मुँहमें चर- अचर सम्पूर्ण जगत् विद्यमान है । आकाश ( वह शून्य जिसमें किसीकी गति नहीं ), दिशाएँ, पहाड़, द्वीप और समुद्रोंके सहित सारी पृथ्वी, बहनेवाली वायु, वैद्युत, अग्नि, चन्द्रमा और तारोंके साथ सम्पूर्ण ज्योतिर्मण्डल, जल, तेज, पवन, वियत् (प्राणियोंके चलने - फिरनेका आकाश ), वैकारिक अहंकारके कार्य देवता, मन- इन्द्रिय, पंचतन्मात्राएँ और तीनों गुण श्रीकृष्णके मुखमें दीख पड़े ॥३७-३८ ॥ परीक्षित्! जीव, काल, स्वभाव, कर्म, उनकी वासना और शरीर आदिके द्वारा विभिन्न रूपोंमें दीखनेवाला यह सारा विचित्र संसार, सम्पूर्ण व्रज और अपने - आपको भी यशोदाजीने श्रीकृष्णके नन्हेसे खुले हुए मुखमें देखा । वे बड़ी शंकामें पड़ गयीं ॥३९ ॥ वे सोचने लगीं कि ' यह कोई स्वप्न है या भगवान्‌की माया? कहीं मेरी

बुद्धिमें ही तो कोई भ्रम नहीं हो गया है? सम्भव है, मेरे इस बालकमें ही कोई जन्मजात योगसिद्धि हो ॥४० ॥ 'जो चित्त, मन, कर्म और वाणीके द्वारा ठीक- ठीक तथा

सुगमतासे अनुमानके विषय नहीं होते, यह सारा विश्व जिनके आश्रित है, जो इसके प्रेरक हैं और जिनकी सत्तासे ही इसकी प्रतीति होती है, जिनका स्वरूप सर्वथा अचिन्त्य है — उन प्रभुको मैं प्रणाम करती हूँ || ४१ || यह मैं हूँ और ये मेरे पति तथा यह मेरा लड़का है, साथ ही मैं व्रजराजकी समस्त सम्पत्तियोंकी स्वामिनी धर्मपत्नी हूँ; ये गोपियाँ, गोप और गोधन मेरे अधीन हैं - जिनकी मायासे मुझे इस प्रकारकी कुमति घेरे हुए है, वे भगवान् ही मेरे एकमात्र आश्रय हैं - मैं उन्हींकी शरणमें हूँ' ॥४२ ॥ जब इस

प्रकार यशोदा माता श्रीकृष्णका तत्त्व समझ गयीं, तब सर्वशक्तिमान् सर्वव्यापक प्रभुने अपनी पुत्रस्नेहमयी वैष्णवी योगमायाका उनके हृदयमें संचार कर दिया ॥४३ ॥

यशोदाजीको तुरंत वह घटना भूल गयी । उन्होंने अपने दुलारे लालको गोदमें उठा लिया । जैसे पहले उनके हृदयमें प्रेमका समुद्र उमड़ता रहता था, वैसे ही फिर उमड़ने लगा ॥४४ ॥ सारे वेद, उपनिषद्, सांख्य, योग और भक्तजन जिनके माहात्म्यका गीत

गाते - गाते अघाते नहीं— उन्हीं भगवान्‌को यशोदाजी अपना पुत्र मानती थीं ॥ ४५ ॥

अहं ममासौ पतिरेष मे सुतो व्रजेश्वरस्याखिलवित्तपा सती । गोप्यश्च गोपाः सहगोधनाश्च मे

पृष्ठ 279

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यन्माययेत्थं कुमतिः स मे गतिः ॥४२

इत्थं विदिततत्त्वायां गोपिकायां स ईश्वरः ।

वैष्णवीं व्यतनोन्मायां पुत्रस्नेहमयीं विभुः ॥ ४३

सद्योनष्टस्मृतिर्गोपी साऽऽरोप्यारोहमात्मजम् ।

प्रवृद्धस्नेहकलिलहृदयाऽऽसीद् यथा पुरा ॥४४

त्रय्या चोपनिषद्भिश्च सांख्ययोगैश्च सात्वतैः ।

उपगीयमानमाहात्म्यं हरिं सामन्यतात्मजम् ॥४५

राजोवाच

नन्दः किमकरोद् ब्रह्मन् श्रेय एवं महोदयम् ।

यशोदा च महाभागा पपौ यस्याः स्तनं हरिः ॥४६

पितरौ नान्वविन्देतां कृष्णोदारार्भकेहितम् ।

गायन्त्यद्यापि कवयो यल्लोकशमलापहम् ॥४७

श्रीशुक उवाच

द्रोणो वसूनां प्रवरो धरया सह भार्यया ।

करिष्यमाण आदेशान् ब्रह्मणस्तमुवाच ह ॥४८

जातयोर्नी महादेवे भुवि विश्वेश्वरे हरौ ।

भक्तिः स्यात् परमा लोके ययाञ्जो दुर्गतिं तरेत् ॥४९

राजा परीक्षित्ने पूछा- भगवन्! नन्दबाबाने ऐसा कौन-सा बहुत बड़ा मंगलमय साधन किया था? और परमभाग्यवती यशोदाजीने भी ऐसी कौन - सी तपस्या की थी, जिसके कारण स्वयं भगवान्ने अपने श्रीमुखसे उनका स्तनपान किया ॥४६ ॥ भगवान्

श्रीकृष्णकी वे बाल लीलाएँ, जो वे अपने ऐश्वर्य और महत्ता आदिको छिपाकर ग्वालबालोंमें करते हैं, इतनी पवित्र हैं कि उनका श्रवण -कीर्तन करनेवाले लोगोंके भी सारे पाप-ताप शान्त हो जाते हैं । त्रिकालदर्शी ज्ञानी पुरुष आज भी उनका गान करते रहते हैं । वे ही लीलाएँ उनके जन्मदाता माता-पिता देवकी-वसुदेवजीको तो देखनेतकको न मिलीं और नन्द-यशोदा उनका अपार सुख लूट रहे हैं । इसका क्या कारण है? ॥४७ ॥

श्रीशुकदेवजीने कहा - परीक्षित्! नन्दबाबा पूर्वजन्ममें एक श्रेष्ठ वसु थे । उनका नाम था द्रोण और उनकी पत्नीका नाम था धरा । उन्होंने ब्रह्माजीके आदेशोंका पालन

पृष्ठ 280

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करनेकी इच्छासे उनसे कहा– || ४८ || 'भगवन्! जब हम पृथ्वीपर जन्म लें, तब जगदीश्वर भगवान् श्रीकृष्णमें हमारी अनन्य प्रेममयी भक्ति हो -जिस भक्तिके द्वारा संसारमें लोग अनायास ही दुर्गतियोंको पार कर जाते हैं ' ॥ ४ ९ ॥ ब्रह्माजीने कहा -' ऐसा ही होगा । ' वे ही परमयशस्वी भगवन्मय द्रोण व्रजमें पैदा हुए और उनका नाम हुआ नन्द । और वे ही धरा इस जन्ममें यशोदाके नामसे उनकी पत्नी हुईं ॥५० ॥

परीक्षित्! अब इस जन्ममें जन्म- मृत्युके चक्रसे छुड़ानेवाले भगवान् उनके पुत्र हुए और समस्त गोप - गोपियोंकी अपेक्षा इन पति-पत्नी नन्द और यशोदाजीका उनके प्रति अत्यन्त प्रेम हुआ ॥५१ ॥ ब्रह्माजीकी बात सत्य करनेके लिये भगवान् श्रीकृष्ण

बलरामजीके साथ व्रजमें रहकर समस्त व्रजवासियोंको अपनी बाल लीलासे आनन्दित करने लगे ॥५२ ॥

अस्त्वित्युक्तः स भगवान् व्रजे द्रोणो महायशाः ।

जज्ञे नन्द इति ख्यातो यशोदा सा धराभवत् ॥५०

ततो भक्तिर्भगवति पुत्रीभूते जनार्दने ।

दम्पत्योर्नितरामासीद् गोपगोपीषु भारत ॥ ५१

कृष्णो ब्रह्मण आदेशं सत्यं कर्तुं व्रजे विभुः ।

सहरामो वसंश्चक्रे तेषां प्रीतिं स्वलीलया ॥ ५२

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां दशमस्कन्धे पूर्वार्धे विश्वरूपदर्शनेऽष्टमोऽध्यायः ॥८ ॥

* जब श्यामसुन्दर घुटनोंका सहारा लिये बिना चलने लगे, तब वे अपने घरमें अनेकों प्रकारकीशून्येकौतुकमयीचोरयतःलीला करनेस्वयंलगे- निजगृहे हैयंगवीनं मणिस्तम्भे स्वप्रतिबिम्बमीक्षितवतस्तेनैव सार्द्धं भिया । भ्रातर्मा वद मातरं मम समो भागस्तवापीहितो भुङ्क्ष्वेत्यालपतो हरेः कलवचो मात्रा रहः श्रूयते ॥ एक दिन साँवरे- सलोने व्रजराजकुमार श्रीकन्हैयालालजी अपने सूने घरमें स्वयं ही माखन चुरा रहे थे । उनकी दृष्टि मणिके खम्भेमें पड़े हुए अपने प्रतिविम्बपर पड़ी । अब तो वे डर गये । अपने प्रतिविम्बसे बोले – ' अरे भैया! मेरी मैयासे कहियो मत । तेरा भाग