श्रीगणेशाय नमः।

श्रीमद्भागवत महापुराण - २ — पृष्ठ 401–410

श्रीमद्भागवत महापुराण - २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 401–410

पृष्ठ 401

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अथैकोनविंशोऽध्यायः गौओं और गोपों को दावानलसे बचाना श्रीशुक उवाच

क्रीडासक्तेषु गोपेषु तद्गावो दूरचारिणीः ।

स्वैरं चरन्त्यो विविशुस्तृणलोभेन गह्वरम् ॥१

अजा गावो महिष्यश्च निर्विशन्त्यो वनाद् वनम् ।

इषीकाटवीं निर्विविशुः क्रन्दन्त्यो दावतर्षिताः ॥२

तेऽपश्यन्तः पशून् गोपाः कृष्णरामादयस्तदा ।

जातानुतापा न विदुर्विचिन्वन्तो गवां गतिम् ॥३

श्रीशुकदेवजी कहते हैं - परीक्षित्! उस समय जब ग्वालबाल खेल- कूदमें लग गये, तब उनकी गौएँ बेरोक - टोक चरती हुई बहुत दूर निकल गयीं और हरी - हरी घासके लोभसे एक गहन वनमें घुस गयीं ॥१ ॥ उनकी बकरियाँ, गायें और भैंसें एक वनसे दूसरे वनमें होती हुई

आगे बढ़ गयीं तथा गर्मीके तापसे व्याकुल हो गयीं । वे बेसुध - सी होकर अन्तमें डकराती हुई मुंजाटवी ( सरकंडोंके वन ) में घुस गयीं || २ || जब श्रीकृष्ण, बलराम आदि ग्वालबालोंने देखा कि हमारे पशुओंका तो कहीं पता-ठिकाना ही नहीं है, तब उन्हें अपने खेल - कूदपर बड़ा पछतावा हुआ और वे बहुत कुछ खोज- बीन करनेपर भी अपनी गौओंका पता न लगा सके ॥३ ॥

तृणैस्तत्खुरदच्छिन्नैर्गोष्पदैरंकितैर्गवाम् ।

मार्गमन्वगमन् सर्वे नष्टाजीव्या विचेतसः ॥ ४

मुंजाटव्यां भ्रष्टमार्गं क्रन्दमानं स्वगोधनम् ।

सम्प्राप्य तृषिताः श्रान्तास्ततस्ते संन्यवर्तयन् ॥५

ता आहूता भगवता मेघगम्भीरया गिरा ।

स्वनाम्नां निनदं श्रुत्वा प्रतिनेदुः प्रहर्षिताः ॥६

ततः समन्ताद् वनधूमकेतु- र्यदृच्छयाभूत् क्षयकृद् वनौकसाम् ।

समीरितः सारथिनोल्बणोल्मुकै- र्विलेलिहानः स्थिरजंगमान् महान् ॥७

पृष्ठ 402

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तमापतन्तं परितो दवाग्निं गोपाश्च गावः प्रसमीक्ष्य भीताः । ऊचुश्च कृष्णं सबलं प्रपन्ना यथा हरिं मृत्युभयार्दिता जनाः ॥८

कृष्ण कृष्ण महावीर हे रामामितविक्रम ।

दावाग्निना दह्यमानान् प्रपन्नांस्त्रातुमर्हथः ॥९

नूनं त्वद्बान्धवाः कृष्ण न चार्हन्त्यवसीदितुम् ।

वयं हि सर्वधर्मज्ञ त्वन्नाथास्त्वत्परायणाः ॥१०

श्रीशुक उवाच

वचो निशम्य कृपणं बन्धूनां भगवान् हरिः ।

निमीलयत मा भैष्ट लोचनानीत्यभाषत ॥११

गौएँ ही तो व्रजवासियोंकी जीविकाका साधन थीं । उनके न मिलनेसे वे अचेत- से हो रहे थे । अब वे गौओंके खुर और दाँतोंसे कटी हुई घास तथा पृथ्वीपर बने हुए खुरोंके चिह्नोंसे उनका पता लगाते हुए आगे बढ़े || ४ || अन्तमें उन्होंने देखा कि उनकी गौएँ मुंजाटवीमें रास्ता भूलकर डकरा रही हैं । उन्हें पाकर वे लौटानेकी चेष्टा करने लगे । उस समय वे एकदम थक गये थे और उन्हें प्यास भी बड़े जोरसे लगी हुई थी । इससे वे व्याकुल हो रहे थे ॥५ ॥ उनकी

यह दशा देखकर भगवान् श्रीकृष्ण अपनी मेघके समान गम्भीर वाणीसे नाम ले - लेकर गौओंको पुकारने लगे । गौएँ अपने नामकी ध्वनि सुनकर बहुत हर्षित हुईं । वे भी उत्तरमें हुंकारने और रँभाने लगीं ॥ ६ ॥

परीक्षित्! इस प्रकार भगवान् उन गायोंको पुकार ही रहे थे कि उस वनमें सब ओर अकस्मात् दावाग्नि लग गयी, जो वनवासी जीवोंका काल ही होती है । साथ ही बड़े जोरकी आँधी भी चलकर उस अग्निके बढ़नेमें सहायता देने लगी । इससे सब ओर फैली हुई वह प्रचण्ड अग्नि अपनी भयंकर लपटोंसे समस्त चराचर जीवोंको भस्मसात् करने लगी ॥७ ॥

जब ग्वालों और गौओंने देखा कि दावानल चारों ओरसे हमारी ही ओर बढ़ता आ रहा है, तब वे अत्यन्त भयभीत हो गये । और मृत्युके भयसे डरे हुए जीव जिस प्रकार भगवान्की शरणमें आते हैं, वैसे ही वे श्रीकृष्ण और बलरामजीके शरणापन्न होकर उन्हें पुकारते हुए बोले I ॥८ ॥ ' महावीर श्रीकृष्ण! प्यारे श्रीकृष्ण! परम बलशाली बलराम! हम तुम्हारे शरणागत

हैं । देखो, इस समय हम दावानलसे जलना ही चाहते हैं । तुम दोनों हमें इससे बचाओ || ९ || श्रीकृष्ण! जिनके तुम्हीं भाई- बन्धु और सब कुछ हो, उन्हें तो किसी प्रकारका कष्ट नहीं होना चाहिये । सब धर्मोंके ज्ञाता श्यामसुन्दर! तुम्हीं हमारे एकमात्र रक्षक एवं स्वामी हो; हमें केवल तुम्हारा ही भरोसा है ' ॥१० ॥

श्रीशुकदेवजी कहते हैं - अपने सखा ग्वालबालोंके ये दीनतासे भरे वचन सुनकर

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भगवान् श्रीकृष्णने कहा -' डरो मत, तुम अपनी आँखें बंद कर लो' ॥११ ॥ भगवान्की

आज्ञा सुनकर उन ग्वालबालोंने कहा ' बहुत अच्छा ' और अपनी आँखें मूँद लीं । तब योगेश्वर भगवान् श्रीकृष्णने उस भयंकर आगको अपने मुँहसे पी लिया* और इस प्रकार उन्हें उस घोर संकटसे छुड़ा दिया ॥१२ ॥ इसके बाद जब ग्वालबालोंने अपनी- अपनी आँखें खोलकर देखा

तब अपनेको भाण्डीर वटके पास पाया । इस प्रकार अपने - आपको और गौओंको दावानलसे बचा देख वे ग्वालबाल बहुत ही विस्मित हुए || १३ || श्रीकृष्णकी इस योगसिद्धि तथा योगमायाके प्रभावको एवं दावा- नलसे अपनी रक्षाको देखकर उन्होंने यही समझा कि श्रीकृष्ण कोई देवता हैं ॥१४ ॥

परीक्षित्! सायंकाल होनेपर बलरामजीके साथ भगवान् श्रीकृष्णने गौएँ लौटायीं और वंशी बजाते हुए उनके पीछे - पीछे व्रजकी यात्रा की । उस समय ग्वालबाल उनकी स्तुति करते आ रहे थे ॥१५ ॥ इधर व्रजमें गोपियोंको श्रीकृष्णके बिना एक-एक क्षण सौ - सौ युगके

समान हो रहा था । जब भगवान् श्रीकृष्ण लौटे तब उनका दर्शन करके वे परमानन्दमें मग्न हो गयीं ॥१६ ॥

तथेति मीलिताक्षेषु भगवानग्निमुल्बणम् ।

पीत्वा मुखेन तान् कृच्छ्राद् योगाधीशो व्यमोचयत् ॥१२

ततश्च तेऽक्षीण्युन्मील्य पुनर्भाण्डीरमापिताः ।

निशाम्य विस्मिता आसन्नात्मानं गाश्च मोचिताः ॥१३

कृष्णस्य योगवीर्यं तद् योगमायानुभावितम् ।

दावाग्नेरात्मनः क्षेमं वीक्ष्य ते मेनिरेऽमरम् ॥१४

गाः सन्निवर्त्य सायाह्ने सहरामो जनार्दनः ।

वेणुं विरणयन् गोष्ठमगाद् गोपैरभिष्टुतः ॥ १५

गोपीनां परमानन्द आसीद् गोविन्ददर्शने ।

क्षणं युगशतमिव यासां येन विनाभवत् ॥१६

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां दशमस्कन्धे पूर्वार्धे दावाग्निपानं नामैकोनविंशोऽध्यायः ॥१९ ॥

पृष्ठ 404

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पृष्ठ 405

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अथ विंशोऽध्यायः वर्षा और शरद्ऋतुका वर्णन श्रीशुक उवाच

तयस्तदद्भुतं कर्म दावाग्नेर्मोक्षमात्मनः ।

गोपाः स्त्रीभ्यः समाचख्युः प्रलम्बवधमेव च ॥१

श्रीशुकदेवजी कहते हैं - परीक्षित्! ग्वालबालोंने घर पहुँचकर अपनी मा, बहिन आदि स्त्रियोंसे श्रीकृष्ण और बलरामने जो कुछ अद्भुत कर्म किये थे - दावानलसे उनको बचाना, प्रलम्बको मारना इत्यादि— सबका वर्णन किया ॥१ ॥

गोपवृद्धाश्च गोप्यश्च तदुपाकर्ण्य विस्मिताः ।

मेनिरे देवप्रवरौ कृष्णरामौ व्रजं गतौ ॥२

ततः प्रावर्तत प्रावृट् सर्वसत्त्वसमुद्भवा ।

विद्योतमानपरिधिर्विस्फूर्जितनभस्तला ॥ ३

सान्द्रनीलाम्बुदैर्व्योम सविद्युत्स्तनयित्नुभिः ।

अस्पष्टज्योतिराच्छन्नं ब्रह्मेव सगुणं बभौ ॥४

अष्टौ मासान् निपीतं यद् भूम्याश्चोदमयं वसु ।

स्वगोभिर्मोक्तुमारेभे पर्जन्यः काल आगते ॥५

तडित्वन्तो महामेघाश्चण्डश्वसनवेपिताः ।

प्रीणनं जीवनं ह्यस्य मुमुचुः करुणा इव ॥६

तपःकृशा देवमीढा आसीद् वर्षीयसी मही ।

यथैव काम्यतपसस्तनुः सम्प्राप्य तत्फलम् ॥७

निशामुखेषु खद्योतास्तमसा भान्ति न ग्रहाः ।

यथा पापेन पाखण्डा न हि वेदाः कलौ युगे ॥८

श्रुत्वा पर्जन्यनिनदं मण्डूका व्यसृजन् गिरः ।

तूष्णीं शयानाः प्राग् यद्वद् ब्राह्मणा नियमात्यये ॥९

पृष्ठ 406

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बड़े- बड़े बूढ़े गोप और गोपियाँ भी राम और श्यामकी अलौकिक लीलाएँ सुनकर् विस्मित हो गयीं । वे सब ऐसा मानने लगे कि ' श्रीकृष्ण और बलरामके वेषमें कोई बहुत बड़े देवता ही व्रजमें पधारे हैं ' ॥ २ ॥

इसके बाद वर्षा ऋतुका शुभागमन हुआ । इस ऋतु में सभी प्रकारके प्राणियोंकी बढ़ती हो जाती है । उस समय सूर्य और चन्द्रमापर बार- बार प्रकाशमय मण्डल बैठने लगे । बादल, वायु, चमक, कड़क आदिसे आकाश क्षुब्ध-सा दीखने लगा ॥३ ॥ आकाशमें नीले और घने बादल

घिर आते, बिजली कौंधने लगती, बार- बार गड़गड़ाहट सुनायी पड़ती; सूर्य, चन्द्रमा और तारे ढके रहते । इससे आकाशकी ऐसी शोभा होती, जैसे ब्रह्मस्वरूप होनेपर भी गुणोंसे ढक जानेपर जीवकी होती है || ४ || सूर्यने राजाकी तरह पृथ्वीरूप प्रजासे आठ महीनेतक जलका कर ग्रहण किया था, अब समय आनेपर वे अपनी किरण - करोंसे फिर उसे बाँटने लगे ॥ ५ ॥

जैसे दयालु पुरुष जब देखते हैं कि प्रजा बहुत पीड़ित हो रही है, तब वे दयापरवश होकर अपने जीवन-प्राणतक निछावर कर देते हैं— वैसे ही बिजलीकी चमकसे शोभायमान घनघोर बादल तेज हवाकी प्रेरणासे प्राणियोंके कल्याणके लिये अपने जीवनस्वरूप जलको बरसाने लगे || ६ || जेठ- आषाढ़की गर्मीसे पृथ्वी सूख गयी थी । अब वर्षाके जलसे सिंचकर वह फिर हरी-भरी हो गयी – जैसे सकामभावसे तपस्या करते समय पहले तो शरीर दुर्बल हो जाता है, परन्तु जब उसका फल मिलता है तब हृष्ट-पुष्ट हो जाता है || ७ || वर्षाके सायंकालमें बादलोंसे घना अँधेरा छा जानेपर ग्रह और तारोंका प्रकाश तो नहीं दिखलायी पड़ता, परन्तु जुगनू चमकने लगते हैं- जैसे कलियुगमें पापकी प्रबलता हो जानेसे पाखण्ड मतोंका प्रचार हो जाता है और वैदिक सम्प्रदाय लुप्त हो जाते हैं | ICII जो मेंढक पहले चुपचाप सो रहे थे, आदेशा-अब वे बादलोंकी गरज सुनकर टर्र- टर्र करने लगे - जैसे नित्य - नियमसे- निवृत्त होनेपर, गुरुके -नुसारन ब्रह्मचारी लोग वेदपाठ करने लगते हैं ॥९ ॥ छोटी छोटी नदियाँ जो जेठ- आषाढ़में बिलकुल सूखनेको आ गयी थीं, वे अब उमड़ -घुमड़कर अपने घेरेसे बाहर बहने

लगीं — जैसे अजितेन्द्रिय पुरुषके शरीर और धन सम्पत्तियोंका कुमार्गमें उपयोग होने लगता है ॥ १० ॥ पृथ्वीपर कहीं - कहीं हरी -हरी घासकी हरियाली थी, तो कहीं - कहीं बीरबहूटियोंकी

लालिमा और कहीं - कहीं बरसाती छत्तों ( सफेद कुकुरमुत्तों) के कारण वह सफेद मालूम देती थी । इस प्रकार उसकी ऐसी शोभा हो रही थी, मानो किसी राजाकी रंग- बिरंगी सेना हो ॥११ ॥ सब खेत अनाजोंसे भरे- पूरे लहलहा रहे थे। उन्हें देखकर किसान तो मारे

आनन्दके फूले न समाते थे, परन्तु सब कुछ प्रारब्धके अधीन है - यह बात न जाननेवाले धनियोंके चित्तमें बड़ी जलन हो रही थी कि अब हम इन्हें अपने पंजेमें कैसे रख सकेंगे ॥१२ ॥ नये बरसाती जलके सेवन से सभी जलचर और थलचर प्राणियोंकी सुन्दरता

बढ़ गयी थी, जैसे भगवान्‌की सेवा करनेसे बाहर और भीतरके दोनों ही रूप सुघड़ हो जाते हैं ॥१३ ॥ वर्षा ऋतुमें हवाके झोकोंसे समुद्र एक तो यों ही उत्ताल तरंगोंसे युक्त हो रहा था,

अब नदियोंके संयोगसे वह और भी क्षुब्ध हो उठा- ठीक वैसे ही जैसे वासनायुक्त योगीका चित्त विषयोंका सम्पर्क होनेपर कामनाओंके उभारसे भर जाता है ॥१४ ॥ मूसलधार वर्षाकी

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चोट खाते रहनेपर भी पर्वतोंको कोई व्यथा नहीं होती थी - जैसे दुःखोंकी भरमार होनेपर भी उन पुरुषोंको किसी प्रकारकी व्यथा नहीं होती, जिन्होंने अपना चित्त भगवान्को ही समर्पित कर रखा है ॥१५ ॥ जो मार्ग कभी साफ नहीं किये जाते थे, वे घाससे ढक गये और उनको

पहचानना कठिन हो गया — जैसे जब द्विजाति वेदोंका अभ्यास नहीं करते, तब कालक्रमसे वे उन्हें भूल जाते हैं ॥१६ ॥ यद्यपि बादल बड़े लोकोपकारी हैं, फिर भी बिजलियाँ उनमें स्थिर

नहीं रहतीं —ठीक वैसे ही, जैसे चपल अनुरागवाली कामिनी स्त्रियाँ गुणी पुरुषोंके पास भी स्थिरभावसे नहीं रहतीं ॥१७ ॥ आकाश मेघोंके गर्जन- तर्जनसे भर रहा था । उसमें निर्गुण

( बिना डोरीके ) इन्द्रधनुषकी वैसी ही शोभा हुई, जैसी सत्त्व-रज आदि गुणोंके क्षोभसे होनेवाले विश्वके बखेड़ेमें निर्गुण ब्रह्मकी ॥ १८ ॥ यद्यपि चन्द्रमाकी उज्ज्वल चाँदनीसे

बादलोंका पता चलता था, फिर भी उन बादलोंने ही चन्द्रमाको ढककर शोभाहीन भी बना दिया था—ठीक वैसे ही, जैसे पुरुषके आभाससे आभासित होनेवाला अहंकार ही उसे ढककर प्रकाशित नहीं होने देता ॥ १ ९ ॥ बादलोंके शुभागमनसे मोरोंका रोम- रोम खिल रहा था, वे अपनी कुहक और नृत्यके द्वारा आनन्दोत्सव मना रहे थे — ठीक वैसे ही, जैसे गृहस्थीके जंजालमें फँसे हुए लोग, जो अधिकतर तीनों तापोंसे जलते और घबराते रहते हैं, भगवान्के भक्तोंके शुभागमनसे आनन्द- मग्न हो जाते हैं ॥२० ॥ जो वृक्ष जेठ - आषाढ़में सूख

गये थे, वे अब अपनी जड़ोंसे जल पीकर पत्ते, फूल तथा डालियोंसे खूब सज - धज गये— जैसे सकामभावसे तपस्या करनेवाले पहले तो दुर्बल हो जाते हैं, परन्तु कामना पूरी होनेपर मोटे - तगड़े हो जाते हैं ॥ २१ ॥ परीक्षित्! तालाबोंके तट, काँटे - कीचड़ और जलके बहावके

कारण प्रायः अशान्त ही रहते थे, परन्तु सारस एक क्षणके लिये भी उन्हें नहीं छोड़ते थे— जैसे अशुद्ध हृदयवाले विषयी पुरुष काम- धंधोंकी झंझटसे कभी छुटकारा नहीं पाते, फिर भी घरोंमें ही पड़े रहते हैं ॥२२ ॥ वर्षा ऋतुमें इन्द्रकी प्रेरणासे मूसलधार वर्षा होती है, इससे

नदियोंके बाँध और खेतोंकी मेड़ें टूट- फूट जाती हैं- जैसे कलियुगमें पाखण्डियोंके तरह-तरहके मिथ्या मतवादोंसे वैदिक मार्गकी मर्यादा ढीली पड़ जाती है ॥ २३ ॥ वायुकी प्रेरणासे

घने बादल प्राणियोंके लिये अमृतमय जलकी वर्षा करने लगते हैं- जैसे ब्राह्मणोंकी प्रेरणासे धनी लोग समय- समयपर दानके द्वारा प्रजाकी अभिलाषाएँ पूर्ण करते हैं ॥२४ ॥

आसन्नुत्पथवाहिन्यः क्षुद्रनद्योऽनुशुष्यतीः' ।

पुंसो यथास्वतन्त्रस्य देहद्रविणसम्पदः ॥ १०

हरिता हरिभिः शष्पैरिन्द्रगोपैश्च लोहिता ।

उच्छिलीन्ध्रकृतच्छाया नृणां श्रीरिव भूरभूत् ॥११

क्षेत्राणि सस्यसम्पद्भिः कर्षकाणां मुदं ददुः ।

धनिनामुपतापं च दैवाधीनमजानताम् ॥१२

पृष्ठ 408

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जलस्थलौकसः सर्वे नववारिनिषेवया ।

अबिभ्रद् रुचिरं रूपं यथा हरिनिषेवया ॥१३

सरिद्भिः संगतः सिन्धुश्चुक्षुभे श्वसनोर्मिमान् ।

अपक्वयोगिनश्चित्तं कामाक्तं गुणयुग् यथा ॥१४

गिरयो वर्षधाराभिर्हन्यमाना न विव्यथुः ।

अभिभूयमाना व्यसनैर्यथाधोक्षजचेतसः ॥ १५

मार्गा बभूवुः सन्दिग्धास्तृणैश्छन्ना ह्यसंस्कृताः ।

नाभ्यस्यमानाः श्रुतयो द्विजैः कालहता इव ॥ १६

लोकबन्धुषु मेघेषु विद्युतश्चलसौहृदाः ।

स्थैर्यं न चक्रुः कामिन्यः पुरुषेषु गुणिष्विव ॥ १७

धनुर्वियति माहेन्द्रं निर्गुणं च गुणिन्यभात् ।

व्यक्ते गुणव्यतिकरेऽगुणवान् पुरुषो यथा ॥१८

न रराजोडुपश्छन्नः स्वज्योत्स्नाराजितैर्घनैः ।

अहंमत्या भासितया स्वभासा पुरुषो यथा ॥ १ ९

मेघागमोत्सवा हृष्टाः प्रत्यनन्दञ्छिखण्डिनः ।

गृहेषु तप्ता निर्विण्णा यथाच्युतजनागमे ॥ २०

पीत्वापः पादपाः पद्भिरासन्नानात्ममूर्तयः ।

प्राक् क्षामास्तपसा श्रान्ता यथा कामानुसेवया ॥२१

सरस्स्वशान्तरोधस्सु न्यूषुरंगापि सारसाः ।

गृहेष्वशान्तकृत्येषु ग्राम्या इव दुराशयाः ॥ २२

जलौघैर्निरभिद्यन्त सेतवो वर्षतीश्वरे ।

पाखण्डिनामसद्वादैर्वेदमार्गाः कलौ यथा ॥२३

व्यमुंचन् वायुभिर्नुन्ना भूतेभ्योऽथामृतं घनाः ।

यथाऽऽशिषो विश्पतयः काले काले द्विजेरिताः ॥२४

पृष्ठ 409

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एवं वनं तद् वर्षिष्ठं पक्वखर्जूरजम्बुमत् ।

गोगोपालैर्वृतो रन्तुं सबलः प्राविशद्धरिः ॥२५

वर्षा ऋतुमें वृन्दावन इसी प्रकार शोभायमान और पके हुए खजूर तथा जामुनोंसे भर रहा था । उसी वनमें विहार करनेके लिये श्याम और बलरामने ग्वालबाल और गौओंके साथ प्रवेश किया ॥२५ ॥

धेनवो मन्दगामिन्य ऊधोभारेण भूयसा ।

युर्भगवताऽऽहूता द्रुतं प्रीत्या स्नुतस्तनीः ॥ २६

वनौकसः प्रमुदिता वनराजीर्मधुच्युतः ।

जलधारा गिरेर्नादानासन्ना ददृशे गुहाः ॥ २७

क्वचिद् वनस्पतिक्रोडे गुहायां चाभिवर्षति ।

निर्विश्य भगवान् रेमे कन्दमूलफलाशनः ॥२८

दध्योदनं समानीतं शिलायां सलिलान्तिके ।

सम्भोजनीयैर्बुभुजे गोपैः संकर्षणान्वितः ॥२९

शाद्वलोपरि संविश्य चर्वतो मीलितेक्षणान् ।

तृप्तान् वृषान् वत्सतरान् गाश्च स्वोधोभरश्रमाः ॥३०

प्रावृश्रियं च तां वीक्ष्य सर्वभूतमुदावहाम् ।

भगवान् पूजयांचक्रे आत्मशक्त्युपबृंहिताम् ॥ ३१

एवं निवसतोस्तस्मिन् रामकेशवयोर्व्रजे ।

शरत् समभवद् व्यभ्रा स्वच्छाम्ब्वपरुषानिला ॥३२

शरदा नीरजोत्पत्त्या नीराणि प्रकृतिं ययुः ।

भ्रष्टानामिव चेतांसि पुनर्योगनिषेवया ॥ ३३

व्योम्नोऽब्दं भूतशाबल्यं भुवः पंकमपां मलम् ।

शरज्जहाराश्रमिणां कृष्णे भक्तिर्यथाशुभम् ॥३४

गौएँ अपने थनोंके भारी भारके कारण बहुत ही धीरे- धीरे चल रही थीं । जब भगवान् श्रीकृष्ण उनका नाम लेकर पुकारते, तब वे प्रेमपरवश होकर जल्दी -जल्दी दौड़ने लगतीं । उस समय उनके थनोंसे दूधकी धारा गिरती जाती थी || २६ || भगवान्ने देखा कि वनवासी भील

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और भीलनियाँ आनन्दमग्न हैं। वृक्षोंकी पंक्तियाँ मधुधारा उँडेल रही हैं । पर्वतोंसे झर- झर करते हुए झरने झर रहे हैं । उनकी आवाज बड़ी सुरीली जान पड़ती है और साथ ही वर्षा होनेपर छिपनेके लिये बहुत सी गुफाएँ भी हैं || २७ || जब वर्षा होने लगती तब श्रीकृष्ण कभी किसी वृक्षकी गोदमें या खोड़रमें जा छिपते । कभी - कभी किसी गुफामें ही जा बैठते और कभी कन्द - मूल- फल खाकर ग्वालबालोंके साथ खेलते रहते ॥२८ ॥ कभी जलके पास

ही किसी चट्टानपर बैठ जाते और बलरामजी तथा ग्वालबालोंके साथ मिलकर घरसे लाया हुआ दही - भात, दाल- शाक आदिके साथ खाते ॥ २ ९ ॥ वर्षा ऋतुमें बैल, बछड़े और थनोंके भारी भारसे थकी हुई गौएँ थोड़ी ही देरमें भरपेट घास चर लेतीं और हरी - हरी घासपर बैठकर ही आँख मूँदकर जुगाली करती रहतीं । वर्षा ऋतुकी सुन्दरता अपार थी । वह सभी प्राणियोंको सुख पहुँचा रही थी । इसमें सन्देह नहीं कि वह ऋतु, गाय, बैल, बछड़े — सब - के - सब भगवान्की लीलाके ही विलास थे। फिर भी उन्हें देखकर भगवान् बहुत प्रसन्न होते और बार-बार उनकी प्रशंसा करते ॥३०-३१ ॥ इस प्रकार श्याम और बलराम बड़े आनन्दसे व्रजमें निवास कर रहे थे । इसी समय वर्षा बीतनेपर शरद् ऋतु आ गयी । अब आकाशमें बादल नहीं रहे, जल निर्मल हो गया, वायु बड़ी धीमी गतिसे चलने लगी ॥ ३२ ॥ शरद् ऋतुमें कमलोंकी उत्पत्तिसे जलाशयोंके जलने अपनी

सहज स्वच्छता प्राप्त कर ली- ठीक वैसे ही, जैसे योगभ्रष्ट पुरुषोंका चित्त फिरसे योगका सेवन करनेसे निर्मल हो जाता है ॥३३ ॥ शरद् ऋतुने आकाशके बादल, वर्षा - कालके बढ़े हुए

जीव, पृथ्वीकी कीचड़ और जलके मटमैलेपनको नष्ट कर दिया- जैसे भगवान्की भक्ति ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यासियोंके सब प्रकारके कष्टों और अशुभोंका झटपट नाश कर देती है ॥३४ ॥ बादल अपने सर्वस्व जलका दान करके उज्ज्वल कान्तिसे सुशोभित

होने लगे – ठीक वैसे ही, जैसे लोक- परलोक, स्त्री- पुत्र और धन- सम्पत्तिसम्बन्धी चिन्ता और कामनाओंका परित्याग कर देनेपर संसारके बन्धनसे छूटे हुए परम शान्त संन्यासी शोभायमान होते हैं ॥ ३५ || अब पर्वतोंसे कहीं - कहीं झरने झरते थे और कहीं - कहीं वे अपने कल्याणकारी जलको नहीं भी बहाते थे— जैसे ज्ञानी पुरुष समयपर अपने अमृतमय ज्ञानका दान किसी अधिकारीको कर देते हैं और किसी -किसीको नहीं भी करते ॥३६ ॥ छोटे - छोटे

गड्ढों में भरे हुए जलके जलचर यह नहीं जानते कि इस गड्ढेका जल दिन - पर- दिन सूखता जा रहा है — जैसे कुटुम्बके भरण- पोषणमें भूले हुए मूढ़ यह नहीं जानते कि हमारी आयु क्षण-क्षण क्षीण हो रही है ॥ ३७ ॥ थोड़े जलमें रहनेवाले प्राणियोंको शरत्कालीन सूर्यकी प्रखर

किरणोंसे बड़ी पीड़ा होने लगी–जैसे अपनी इन्द्रियोंके वशमें रहनेवाले कृपण एवं दरिद्र कुटुम्बीको तरह- तरहके ताप सताते ही रहते हैं ॥ ३८ ॥ पृथ्वी धीरे - धीरे अपना कीचड़ छोड़ने

लगी और घास - पात धीरे- धीरे अपनी कचाई छोड़ने लगे- ठीक वैसे ही, जैसे विवेकसम्पन्न साधक धीरे - धीरे शरीर आदि अनात्म पदार्थोंमेंसे ' यह मैं हूँ और यह मेरा है ' यह अहंता और ममता छोड़ देते हैं ॥३९ ॥ शरद् ऋतुमें समुद्रका जल स्थिर, गम्भीर और शान्त हो गया—

जैसे मनके निःसंकल्प हो जानेपर आत्माराम पुरुष कर्मकाण्डका झमेला छोड़कर शान्त हो जाता है ॥४० ॥ किसान खेतोंकी मेड़ मजबूत करके जलका बहना रोकने लगे — जैसे