श्रीगणेशाय नमः।
श्रीमद्भागवत महापुराण - २ — पृष्ठ 831–840
श्रीमद्भागवत महापुराण - २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 831–840
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दासीनां निष्ककण्ठीनां सहस्रं दुहितृवत्सलः ॥ ५१ श्रीशुकदेवजी कहते हैं - परीक्षित्! कौरवोंका नगर डगमगा रहा था और वे अत्यन्त घबराहटमें पड़े हुए थे । जब सब - के - सब कुरुवंशी इस प्रकार भगवान् बलरामजीकी शरणमें आये और उनकी स्तुति- प्रार्थना की, तब वे प्रसन्न हो गये और ' डरो मत' ऐसा कहकर उन्हें अभयदान दिया ॥४९ ॥ परीक्षित्! दुर्योधन अपनी पुत्री लक्ष्मणासे बड़ा प्रेम करता था । उसने
-,, हुएदहेजमें साठ साठ वर्षके बारह सौ हाथी दस हजार घोड़े सूर्यके समान चमकते सोनेके छः हजार रथ और सोनेके हार पहनी हुई एक हजार दासियाँ दीं ॥ ५०-५१ ॥ यदुवंशशिरोमणि भगवान् बलरामजीने यह सब दहेज स्वीकार किया और नवदम्पति लक्ष्मणा तथा साम्बके साथ कौरवोंका अभिनन्दन स्वीकार करके द्वारकाकी यात्रा की ॥५२ ॥ अब
बलरामजी द्वारकापुरीमें पहुँचे और अपने प्रेमी तथा समाचार जाननेके लिये उत्सुक बन्धु-बान्धवोंसे मिले । उन्होंने यदुवंशियोंकी भरी सभामें अपना वह सारा चरित्र कह सुनाया, जो हस्तिनापुरमें उन्होंने कौरवोंके साथ किया था ॥ ५३ ॥ परीक्षित्! यह हस्तिनापुर आज भी
दक्षिणकी ओर ऊँचा और गंगाजीकी ओर कुछ झुका हुआ है और इस प्रकार यह भगवान् बलरामजीके पराक्रमकी सूचना दे रहा है ॥५४ ॥
प्रतिगृह्य तु तत् सर्वं भगवान् सात्वतर्षभः ।
ससुतः सस्नुषः प्रागात् सुहृद्भिरभिनन्दितः ॥ ५२
ततः प्रविष्टः स्वपुरं हलायुधः समेत्य बन्धूननुरक्तचेतसः । शशंस सर्वं यदुपुंगवानां मध्ये सभायां कुरुषु स्वचेष्टितम् ॥५३
अद्यापि च पुरं ह्येतत् सूचयद् रामविक्रमम् ।
समुन्नतं दक्षिणतो गंगायामनुदृश्यते ॥५४
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां दशमस्कन्धे उत्तरार्धे हास्तिनपुरकर्षणरूपसंकर्षणविजयो नामाष्टषष्टितमोऽध्यायः ॥ ६८ ॥
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अथैकोनसप्ततितमोऽध्यायः देवर्षि नारदजीका भगवान्की गृहचर्या देखना श्रीशुक उवाच
नरकं निहतं श्रुत्वा तथोद्वाहं च योषिताम् ।
कृष्णेनैकेन बह्वीनां तद् दिदृक्षुः स्म नारदः ॥ १
चित्रं बतैतदेकेन वपुषा युगपत् पृथक् ।
गृहेषु द्व्यष्टसाहस्रं स्त्रिय एक उदावहत् ॥२
इत्युत्सुको द्वारवतीं देवर्षिर्द्रष्टुमागमत् ।
पुष्पितोपवनारामद्विजालिकुलनादिताम् ॥३
उत्फुल्लेन्दीवराम्भोजकह्लारकुमुदोत्पलैः ।
छुरितेषु सरस्सूच्चैः कूजितां हंससारसैः ॥४
श्रीशुकदेवजी कहते हैं - परीक्षित्! जब देवर्षि नारदने सुना कि भगवान् श्रीकृष्णने नरकासुर ( भौमासुर ) को मारकर अकेले ही हजारों राज कुमारियोंके साथ विवाह कर लिया है, तब उनके मनमें भगवान्की रहन- सहन देखनेकी बड़ी अभिलाषा हुई ॥१ ॥ वे सोचने लगे
—अहो, यह कितने आश्चर्यकी बात है कि भगवान् श्रीकृष्णने एक ही शरीरसे एक ही समय सोलह हजार महलोंमें अलग- अलग सोलह हजार राजकुमारियोंका पाणिग्रहण किया ॥ २ ॥
देवर्षि नारद इस उत्सुकतासे प्रेरित होकर भगवान्की लीला देखनेके लिये द्वारका आ पहुँचे । वहाँके उपवन और उद्यान खिले हुए रंग- बिरंगे पुष्पोंसे लदे वृक्षोंसे परिपूर्ण थे, उनपर तरह-तरहके पक्षी चहक रहे थे और भौरे गुंजार कर रहे थे || ३ || निर्मल जलसे भरे सरोवरोंमें नीले, लाल और सफेद रंगके भाँति- भाँति कमल खिले हुए थे । कुमुद ( कोईं) और नवजात
कमलोंकी मानो भीड़ ही लगी हुई थी । उनमें हंस और सारस कलरव कर रहे थे ॥ ४ ॥
द्वारकापुरीमें स्फटिकमणि और चाँदीके नौ लाख महल थे । वे फर्श आदिमें जड़ी हुई महामरकतमणि ( पन्ने ) की प्रभासे जगमगा रहे थे और उनमें सोने तथा हीरोंकी बहुत- सी सामग्रियाँ शोभायमान थीं ॥५ ॥ उसके राजपथ (बड़ी - बड़ी सड़कें ), गलियाँ, चौराहे और
बाजार बहुत ही सुन्दर सुन्दर थे । घुड़साल आदि पशुओंके रहनेके स्थान, सभा - भवन और देव- मन्दिरोंके कारण उसका सौन्दर्य और भी चमक उठा था । उसकी सड़कों, चौक, गली और दरवाजोंपर छिड़काव किया गया था । छोटी - छोटी झंडियाँ और बड़े -बड़े झंडे जगह-जगह फहरा रहे थे, जिनके कारण रास्तोंपर धूप नहीं आ पाती थी || ६ || प्रासादलक्षैर्नवभिर्जुष्टां स्फाटिकराजतैः ।
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महामरकतप्रख्यैः स्वर्णरत्नपरिच्छदैः ॥५ विभक्तरथ्यापथचत्वरापणैः शालासभाभी रुचिरां सुरालयैः । संसिक्तमार्गांगणवीथिदेहलीं १ पतत्पताकाध्वजवारितातपाम् ॥६
तस्यामन्तःपुरं श्रीमदर्चितं सर्वधिष्ण्यपैः ।
हरेः ३ स्वकौशलं यत्र त्वष्ट्रा कार्त्स्न्येन दर्शितम् ॥७
तत्र षोडशभिः सद्मसहस्रैः समलंकृतम् ।
विवेशैकतमं शौरेः पत्नीनां भवनं महत् ॥८
विष्टब्धं विद्रुमस्तम्भैर्वैदूर्यफलकोत्तमैः ।
इन्द्रनीलमयैः कुड्यैर्जगत्या॰ चाहतत्विषा ॥९
वितानैर्निर्मितैस्त्वष्ट्रा मुक्तादामविलम्बिभिः ।
दान्तैरासनपर्यंकैर्मण्युत्तमपरिष्कृतैः ॥१०
दासीभिर्निष्ककण्ठीभिः सुवासोभिरलंकृतम् ।
पुम्भिः सकञ्चुकोष्णीषसुवस्त्रमणिकुण्डलैः ५ ॥११
उसी द्वारकानगरीमें भगवान् श्रीकृष्णका बहुत ही सुन्दर अन्तःपुर था । बड़े -बड़े लोकपाल उसकी पूजा- प्रशंसा किया करते थे । उसका निर्माण करनेमें विश्वकर्माने अपना सारा कला-कौशल, सारी कारीगरी लगा दी थी ॥७ ॥ उस अन्तःपुर ( रनिवास) में भगवान्की रानियोंके
सोलह हजारसे अधिक महल शोभायमान थे, उनमेंसे एक बड़े भवनमें देवर्षि नारदजीने प्रवेश किया ॥८ ॥ उस महलमें मूँगोंके खम्भे, वैदूर्यके उत्तम उत्तम छज्जे तथा इन्द्रनीलमणिकी
दीवारें जगमगा रही थीं और वहाँकी गचें भी ऐसी इन्द्र- नीलमणियोंसे बनी हुई थीं, जिनकी चमक किसी प्रकार कम नहीं होती ॥९ ॥ विश्वकर्माने बहुत से ऐसे चंदोवे बना रखे थे, जिनमें
मोतीकी लड़ियोंकी झालरें लटक रही थीं । हाथी - दाँतके बने हुए आसन और पलँग थे, जिनमें श्रेष्ठ- श्रेष्ठ मणि जड़ी हुई थी || १० || बहुत- सी दासियाँ गलेमें सोनेका हार पहने और सुन्दर वस्त्रोंसे सुसज्जित होकर तथा बहुत- से सेवक भी जामा-पगड़ी और सुन्दर- सुन्दर वस्त्र पहने तथा जड़ाऊ कुण्डल धारण किये अपने- अपने काममें व्यस्त थे और महलकी शोभा बढ़ा रहे थे ॥११ ॥ अनेकों रत्न- प्रदीप अपनी जगमगाहटसे उसका अन्धकार दूर कर रहे थे । अगरकी
धूप देनेके कारण झरोखोंसे धूआँ निकल रहा था । उसे देखकर रंग - बिरंगे मणिमय छज्जोंपर
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बैठे हुए मोर बादलोंके भ्रमसे कूक- कूककर नाचने लगते ॥१२ ॥ देवर्षि नारदजीने देखा कि
भगवान् श्रीकृष्ण उस महलकी स्वामिनी रुक्मिणीजीके साथ बैठे हुए हैं और वे अपने हाथों भगवान्को सोनेकी डाँड़ीवाले चँवरसे हवा कर रही हैं । यद्यपि उस महलमें रुक्मिणीजीके समान ही गुण, रूप, अवस्था और वेष - भूषावाली सहस्रों दासियाँ भी हर समय विद्यमान रहती थीं ॥१३ ॥
रत्नप्रदीपनिकरद्युतिभिर्निरस्त- ध्वान्तं विचित्रवलभीषु शिखण्डिनोऽङ्ग ।
नृत्यन्ति यत्र विहितागुरुधूपमक्षै- निर्यान्तमीक्ष्य घनबुद्धय उन्नदन्तः ॥१२
तस्मिन् समानगुणरूपवयस्सुवेष- दासीसहस्रयुतयानुसवं गृहिण्या ।
विप्रो ददर्श चमरव्यजनेन रुक्म- दण्डेन सात्वतपतिं परिवीजयन्त्या ॥ १३
तं सन्निरीक्ष्य भगवान् सहसोत्थितः श्री- पर्यङ्कतः सकलधर्मभृतां वरिष्ठः ।
आनम्य पादयुगलं शिरसा किरीट- जुष्टेन साञ्जलिरवीविशदासने स्वे ॥१४
तस्यावनिज्य चरणौ तदपः स्वमूर्ध्ना बिभ्रज्जगद्गुरुतरोऽपि सतां पतिर्हि । ब्रह्मण्यदेव इति यद्गुणनाम युक्तं तस्यैव यच्चरणशौचमशेषतीर्थम् ॥१५ सम्पूज्य देवऋषिवर्यमृषिः पुराणो नारायणो नरसखो विधिनोदितेन । वाण्याभिभाष्य मितयामृतमिष्टया तं प्राह प्रभो भगवते करवाम हे किम् ॥१६ नारद उवाच नैवाद्भुतं त्वयि विभोऽखिललोकनाथे मैत्री जनेषु सकलेषु दमः खलानाम् । निःश्रेयसाय हि जगत्स्थितिरक्षणाभ्यां स्वैरावतार उरुगाय विदाम सुष्ठु ॥१७
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नारदजीको देखते ही समस्त धार्मिकोंके मुकुट मणि भगवान् श्रीकृष्ण रुक्मिणीजीके पलँगसे सहसा उठ खड़े हुए । उन्होंने देवर्षि नारदके युगलचरणोंमें मुकुटयुक्त सिरसे प्रणाम किया और हाथ जोड़कर उन्हें अपने आसनपर बैठाया ॥१४ ॥ परीक्षित्! इसमें सन्देह नहीं
कि भगवान् श्रीकृष्ण चराचर जगत्के परम गुरु हैं और उनके चरणोंका धोवन गंगाजल सारे जगत्को पवित्र करनेवाला है । फिर भी वे परमभक्तवत्सल और संतोंके परम आदर्श, उनके स्वामी हैं । उनका एक असाधारण नाम ब्रह्मण्यदेव भी है । वे ब्राह्मणोंको ही अपना आराध्यदेव मानते हैं । उनका यह नाम उनके गुणके अनुरूप एवं उचित ही है । तभी तो भगवान् श्रीकृष्णने स्वयं ही नारदजीके पाँव पखारे और उनका चरणामृत अपने सिरपर धारण किया ॥ १५ ॥
नरशिरोमणि नरके सखा सर्वदर्शी पुराणपुरुष भगवान् नारायणने शास्त्रोक्त विधिसे देवर्षिशिरोमणि भगवान् नारदकी पूजा की । इसके बाद अमृतसे भी मीठे किन्तु भोड़े शब्दोंमें उनका स्वागत - सत्कार किया और फिर कहा–' प्रभो! आप तो स्वयं समग्र ज्ञान, वैराग्य, धर्म,
यश, श्री और ऐश्वर्यसे पूर्ण हैं । आपकी हम क्या सेवा करें '? ॥१६ ॥
देवर्षि नारदने कहा— भगवन्! आप समस्त लोकोंके एकमात्र स्वामी हैं । आपके लिये यह कोई नयी बात नहीं है कि आप अपने भक्तजनोंसे प्रेम करते हैं और दुष्टोंको दण्ड देते हैं । परमयशस्वी प्रभो! आपने जगत्की स्थिति और रक्षाके द्वारा समस्त जीवोंका कल्याण करनेके लिये स्वेच्छासेसौभाग्यकीअवतार बातग्रहणहै कियाकि आजहै । मुझेभगवन्आपके! यह चरणकमलोंकेबात हम भलीभाँतिदर्शन जानतेहैं । हैंआपके॥१७ ये॥ चरणकमलयह बड़े सम्पूर्ण जनताको परम साम्य, मोक्ष देनेमें समर्थ हैं । जिनके ज्ञानकीहुए कोई सीमा ही नहीं है, वे ब्रह्मा, शंकर आदि सदा- सर्वदा अपने हृदयमें उनका चिन्तन करते रहते हैं । वास्तवमें वे श्रीचरण ही संसाररूप कूएँमें गिरे हुए लोगोंको बाहर निकलनेके लिये अवलम्बन हैं । आप ऐसी कृपा कीजिये कि आपके उन चरणकमलोंकी स्मृति सर्वदा बनी रहे और मैं चाहे जहाँ जैसे रहूँ, उनके ध्यानमें तन्मय रहूँ ॥१८ ॥
दृष्टं तवाङ्घ्रियुगलं जनतापवर्गं ब्रह्मादिभिर्हृदि विचिन्त्यमगाधबोधैः । संसारकूपपतितोत्तरणावलम्बं ध्यायंश्चराम्यनुगृहाण यथा स्मृतिः स्यात् ॥१८
ततोऽन्यदाविशद् गेहं कृष्णपत्न्याः स नारदः ।
योगेश्वरेश्वरस्याङ्ग योगमायाविवित्सया ॥१९
दीव्यन्तमक्षैस्तत्रापि प्रियया चोद्धवेन च ।
पूजितः परया भक्त्या प्रत्युत्थानासनादिभिः ॥२०
पृष्टश्चाविदुषेवासौ कदाऽऽयातो भवानिति ।
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क्रियते किं नु पूर्णानामपूर्णैरस्मदादिभिः ॥ २१
अथापि ब्रूहि नो ब्रह्मन् जन्मैतच्छोभनं कुरु ।
स तु विस्मित उत्थाय तूष्णीमन्यदगाद् गृहम् ॥२२
तत्राप्यचष्ट गोविन्दं लालयन्तं सुताञ्छिशून् ।
ततोऽन्यस्मिन् गृहेऽपश्यन्मज्जनाय कृतोद्यमम् ॥२३
परीक्षित्! इसके बाद देवर्षि नारदजी योगेश्वरोंके भी ईश्वर भगवान् श्रीकृष्णकी योगमायाका सहस्य जाननेके लिये उनकी दूसरी पत्नीके महलमें गये ॥१९ ॥ वहाँ उन्होंने
देखा कि भगवान् श्रीकृष्ण अपनी प्राणप्रिया और उद्धवजीके साथ चौसर खेल रहे हैं । वहाँ भी भगवान्ने खड़े होकर उनका स्वागत किया, आसनपर बैठाया और विविध सामग्रियोंद्वारा बड़ी भक्तिसे उनकी अर्चा- पूजा की ॥२० ॥ इसके बाद भगवान्ने नापदजीसे अनजानकी
तरह पूछा — ‘ आप यहाँ कब पधारे! आप तो परिपूर्ण आत्माराम – आप्तकाम हैं और हमलोग हैं अपूर्ण । ऐसी अवस्थामें भला हम आपकी क्या सेवा कर सकते हैं ॥२१ ॥ फिर भी
ब्रह्मस्वरूप नारदजी! आप कुछ- न- कुछ आज्ञा अवश्य कीजिये और हमें सेवाका अवसर देकर हमारा जन्म सफल कीजिये । ' नारदजी यह सब देख- सुनकर चकित और विस्मित हो रहे थे । वे वहाँसे उठकर चुपचाप दूसरे महलमें चले गये ॥ २२ ॥ उस महलमें भी देवर्षि
नारदने देखा कि भगवान् श्रीकृष्ण अपने नन्हे - नन्हे बच्चोंको दुलार रहे हैं । वहाँसे फिर दूसरे महलमें गये तो क्या देखते हैं कि भगवान् श्रीकृष्ण स्नानकी तैयारी कर रहे हैं ॥२३ ॥ (इसी
प्रकार देवर्षि नारदने विभिन्न महलोंमें भगवान्को भिन्न- भिन्न कार्य करते देखा । ) कहीं वे यज्ञ-कुण्डोंमें हवन कर रहे हैं तो कहीं पंचमहायज्ञोंसे देवता आदिकी आराधना कर रहे हैं । कहीं ब्राह्मणोंको भोजन करा रहे हैं, तो कहीं यज्ञका अवशेष स्वयं भोजन कर रहे हैं ॥२४ ॥ कहीं
सन्ध्या कर रहे हैं, तो कहीं मौन होकर गायत्रीका जप कर रहे हैं । कहीं हाथोंमें ढाल- तलवार लेकर उनको चलानेके पैतरे बदल रहे हैं || २५ || कहीं घोड़े, हाथी अथवा रथपर सवार होकर श्रीकृष्ण विचरण कर रहे हैं । कहीं पलंगपर सो रहे हैं, तो कहीं वंदीजन उनकी स्तुति कर रहे हैं || २६ || किसी महलमें उद्धव आदि मन्त्रियोंके साथ किसी गम्भीर विषयपर परामर्श कर रहे हैं, तो कहीं उत्तमोत्तम वारांगनाओंसे घिरकर जलक्रीडा कर रहे हैं || २७ || कहीं श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको वस्त्राभूषणसे सुसज्जित गौओंका दान कर रहे हैं, तो कहीं मंगलमय इतिहास-पुराणोंका श्रवण कर रहे हैं ॥ २८ ॥ कहीं किसी पत्नीके महलमें अपनी प्राणप्रियाके साथ
हास्य - विनोदकी बातें करके हँस रहे हैं । तो कहीं धर्मका सेवन कर रहे हैं । कहीं अर्थका सेवन कर रहे हैं – धन - संग्रह और धनवृद्धिके कार्य में लगे हुए हैं, तो कहीं धर्मानुकूल गृहस्थोचित विषयोंका उपभोग कर रहे हैं ॥ २९ ॥ कहीं एकान्तमें बैठकर प्रकृतिसे अतीत पुराण- पुरुषका
ध्यान कर रहे हैं, तो कहीं गुरुजनोंको इच्छित भोग- सामग्री समर्पित करके उनकी सेवा- शुश्रूषा कर रहे हैं || ३० ||
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जुह्वन्तं च वितानाग्नीन् यजन्तं पञ्चभिर्मखैः ।
भोजयन्तं द्विजान् क्वापि भुञ्जानमवशेषितम् ॥२४
क्वापि सन्ध्यामुपासीनं जपन्तं ब्रह्म वाग्यतम् ।
एकत्र चासिचर्मभ्यां चरन्तमसिवर्त्मसु ॥२५
अश्वैर्गजैः रथैः क्वापि विचरन्तं गदाग्रजम् ।
क्वचिच्छयानं पर्यंके स्तूयमानं च वन्दिभिः ॥२६
मन्त्रयन्तं च कस्मिंश्चिन्मन्त्रिभिश्चोद्धवादिभिः ।
जलक्रीडारतं क्वापि वारमुख्याबलावृतम् ॥२७
कुत्रचिद् द्विजमुख्येभ्यो ददतं गाः स्वलंकृताः ।
इतिहासपुराणानि शृण्वन्तं मंगलानि च ॥२८
हसन्तं हास्यकथया कदाचित् प्रियया गृहे ।
क्वापि धर्मं सेवमानमर्थकामौ च कुत्रचित् ॥२९
ध्यायन्तमेकमासीनं पुरुषं प्रकृतेः परम् ।
शुश्रूषन्तं गुरून् क्वापि कामैर्भोगैः सपर्यया ॥ ३०
कुर्वन्तं विग्रहं कैश्चित् सन्धिं चान्यत्र केशवम् ।
कुत्रापि सह रामेण चिन्तयन्तं सतां शिवम् ॥३१
पुत्राणां दुहितृणां च काले विध्युपयापनम् ।
दारैर्वरैस्तत्सदृशैः कल्पयन्तं विभूतिभिः ॥ ३२
प्रस्थापनोपानयनैरपत्यानां महोत्सवान् ।
वीक्ष्य योगेश्वरेशस्य येषां लोका विसिस्मिरे ॥३३
देवर्षि नारदने देखा कि भगवान् श्रीकृष्ण किसीके साथ युद्धकी बात कर रहे हैं, तो किसीके साथ सन्धिकी । कहीं भगवान् बलरामजीके साथ बैठकर सत्पुरुषोंके कल्याणके बारेमें विचार कर रहे हैं ॥ ३१ ॥ कहीं उचित समयपर पुत्र और कन्याओंका उनके सदृश पत्नी
और वरोंके साथ बड़ी धूमधामसे विधिवत् विवाह कर रहे हैं ॥ ३२ ॥ कहीं घरसे कन्याओंको
विदा कर रहे हैं, तो कहीं बुलानेकी तैयारीमें लगे हुए हैं । योगेश्वरेश्वर भगवान् श्रीकृष्णके इन विराट् उत्सवोंको देखकर सभी लोग विस्मित –चकित हो जाते थे || ३३ || कहीं बड़े- बड़े
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यज्ञोंके द्वारा समस्त देवताओंका यजन-पूजन और कहीं कूएँ, बगीचे तथा मठ आदि बनवाकर इष्टापूर्त धर्मका आचरण कर रहे हैं ॥ ३४ ॥ कहीं श्रेष्ठ यादवोंसे घिरे हुए सिन्धुदेशीय
घोड़ेपर चढ़कर मृगया कर रहे हैं, इस प्रकार यज्ञके लिये मेध्य पशुओंका संग्रह कर रहे हैं || ३५ || और कहीं प्रजामें तथा अन्तःपुरके महलोंमें वेष बदलकर छिपे रूपसे सबका अभिप्राय जाननेके लिये विचरण कर रहे हैं । क्यों न हो, भगवान् योगेश्वर जो हैं ॥३६ ॥
यजन्तं सकलान् देवान् क्वापि क्रतुभिरूर्जितैः ।
पूर्तयन्तं क्वचिद् धर्मं कूपाराममठादिभिः ॥ ३४
चरन्तं मृगयां क्वापि हयमारुह्य सैन्धवम् ।
घ्नन्तं ततः पशून् मेध्यान् परीतं यदुपुंगवैः ॥३५
अव्यक्तलिंगं प्रकृतिष्वन्तःपुरगृहादिषु ।
क्वचिच्चरन्तं योगेशं तत्तद्भावबुभुत्सया ॥३६
अथोवाच हृषीकेशं नारदः प्रहसन्निव ।
योगमायोदयं वीक्ष्य मानुषीमीयुषो गतिम् ॥३७
विदाम योगमायास्ते दुर्दर्शा अपि मायिनाम् ।
योगेश्वरात्मन् निर्भाता भवत्पादनिषेवया ॥३८
अनुजानीहि मां देव लोकांस्ते यशसाऽऽप्लुतान् ।
पर्यटामि तवोद्गायन् लीलां भुवनपावनीम् ॥३९
श्रीभगवानुवाच
ब्रह्मन् धर्मस्य वक्ताहं कर्ता तदनुमोदिता ।
तच्छिक्षयँल्लोकमिममास्थितः पुत्र मा खिदः ॥४०
श्रीशुक उवाच
इत्याचरन्तं सद्धर्मान् पावनान् गृहमेधिनाम् ।
तमेव सर्वगेहेषु सन्तमेकं ददर्श ह ॥४१
कृष्णस्यानन्तवीर्यस्य योगमायामहोदयम् ।
मुहुर्दृष्ट्वा ऋषिरभूद् विस्मितो जातकौतुकः ॥४२
परीक्षित्! इस प्रकार मनुष्यकी- सी लीला करते हुए हृषीकेश भगवान् श्रीकृष्णकी योगमायाका वैभव देखकर देवर्षि नारदजीने मुसकराते हुए उनसे कहा- ॥ ३७॥ ‘ योगेश्वर!
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आत्मदेव! आपकी योग- माया ब्रह्माजी आदि बड़े- बड़े मायावियोंके लिये भी अगम्य है । परन्तु हम आपकी योगमायाका रहस्य जानते हैं; क्योंकि आपके चरणकमलोंकी सेवा करनेसे वह स्वयं ही हमारे सामने प्रकट हो गयी है || ३८ || देवताओंके भी आराध्यदेव भगवन्! चौदहों भुवन आपके सुयशसे परिपूर्ण हो रहे हैं । अब मुझे आज्ञा दीजिये कि मैं आपकी त्रिभुवन-पावनी लीलाका गान करता हुआ उन लोकोंमें विचरण करूँ' ॥३९ ॥
भगवान् श्रीकृष्णने कहा- देवर्षि नारदजी! मैं ही धर्मका उपदेशक, पालन करनेवाला और उसका अनुष्ठान करनेवालोंका अनुमोदनकर्ता भी हूँ । इसलिये संसारको धर्मकी शिक्षा देनेके उद्देश्यसे ही मैं इस प्रकार धर्मका आचरण करता हूँ। मेरे प्यारे पुत्र! तुम मेरी यह योगमाया देखकर मोहित मत होना ॥ ४० ॥
श्रीशुकदेवजी कहते हैं - इस प्रकार भगवान् श्रीकृष्ण गृहस्थोंको पवित्र करनेवाले श्रेष्ठ धर्मोंका आचरण कर रहे थे । यद्यपि वे एक ही हैं, फिर भी देवर्षि नारदजीने उनको उनकी प्रत्येक पत्नीके महलमें अलग- अलग देखा ॥४१ ॥
भगवान् श्रीकृष्णकी शक्ति अनन्त है । उनकी योगमायाका परम ऐश्वर्य बार - बार देखकर देवर्षि नारदके विस्मय और कौतूहलकी सीमा न रही ॥ ४२ ॥ द्वारकामें भगवान् श्रीकृष्ण
गृहस्थकी भाँति ऐसा आचरण करते थे, मानो धर्म, अर्थ और कामरूप पुरुषार्थोंमें उनकी बड़ी श्रद्धा हो । उन्होंने देवर्षि नारदका बहुत सम्मान किया । वे अत्यन्त प्रसन्न होकर भगवान्का स्मरण करते हुए वहाँसे चले गये ॥४३ ॥ राजन्! भगवान् नारायण सारे जगत्के कल्याणके
लिये अपनी अचिन्त्य महाशक्ति योगमायाको स्वीकार करते हैं और इस प्रकार मनुष्योंकी - सी लीला करते हैं । द्वारकापुरीमें सोलह हजारसे भी अधिक पत्नियाँ अपनी सलज्ज एवं प्रेमभरी चितवन तथा मन्द- मन्द मुसकानसे उनकी सेवा करती थीं और वे उनके साथ विहार करते थे ॥४४ ॥ भगवान् श्रीकृष्णने जो लीलाएँ की हैं, उन्हें दूसरा कोई नहीं कर सकता । परीक्षित्!
वे विश्वकी उत्पत्ति, स्थिति और प्रलयके परम कारण हैं । जो उनकी लीलाओंका गान, श्रवण और गान- श्रवण करनेवालोंका अनुमोदन करता है, उसे मोक्षके मार्गस्वरूप भगवान् श्रीकृष्णके चरणोंमें परम प्रेममयी भक्ति प्राप्त हो जाती है ॥४५ ॥
इत्यर्थकामधर्मेषु कृष्णेन श्रद्धितात्मना ।
सम्यक् सभाजितः प्रीतस्तमेवानुस्मरन् ययौ ॥ ४३
एवं मनुष्यपदवीमनुवर्तमानो नारायणोऽखिलभवाय गृहीतशक्तिः । रेमेऽङ्ग षोडशसहस्रवरांगनानां सव्रीडसौहृदनिरीक्षणहासजुष्टः ॥४४ यानीह विश्वविलयोद्भववृत्तिहेतुः कर्माण्यनन्यविषयाणि हरिश्चकार ।
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यस्त्वंग गायति शृणोत्यनुमोदते वा भक्तिर्भवेद् भगवति ह्यपवर्गमार्गे ॥४५ इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां दशमस्कन्धे उत्तरार्धे कृष्णगार्हस्थ्यदर्शनं नामैकोनसप्ततितमोऽध्यायः ॥६९ ॥
'... १. थिशोभां । २. प्रा प्रतिमें वारितातपाम् ॥ इस श्लोकके बाद‘ उत्फुल्लेन्दीवराम्भोजकह्लारकुमुदोत्पलैः । छुरितेषु सरस्सूच्चैः कूजितां हंससारसैः ॥ पुष्पितोपवनारामद्विजालिकुलनादिताम् । ' इस डेढ़ श्लोकका पाठ है, इसके पहले नहीं । ३. सर्वविस्मापकं यत्नात्त्वष्ट्रा कार्त्स्न्येन निर्मितम्। ४. जलैर्मरकतोत्तमैः । ५. षैः सुवासोमणि ० ।