श्रीगणेशाय नमः।
श्रीमद्भागवत महापुराण - २ — पृष्ठ 891–900
श्रीमद्भागवत महापुराण - २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 891–900
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तारे परम हितैषी भगवान् श्रीकृष्णके साथ मयदानवकी बनायी सभामें स्वर्णसिंहासनपर देवराज इन्द्रके समान विराजमान थे । उनकी भोग- सामग्री, उनकी राज्यलक्ष्मी ब्रह्माजीके ऐश्वर्यके समान थी । वंदीजन उनकी स्तुति कर रहे थे ॥३४-३५ ॥ उसी समय अभिमानी दुर्योधन अपने दुःशासन आदि भाइयोंके साथ वहाँ आया । उसके सिरपर मुकुट, गलेमें माला और हाथमें तलवार थी । परीक्षित्! वह क्रोधवश द्वारपालों और सेवकोंको झिड़क रहा था ॥३६ ॥ उस सभामें मय दानवने ऐसी माया फैला रखी थी कि दुर्योधनने उससे मोहित हो
स्थलको जल समझकर अपने वस्त्र समेट लिये और जलको स्थल समझकर वह उसमें गिर पड़ा ॥३७ ॥ उसको गिरते देखकर भीमसेन, राजरानियाँ तथा दूसरे नरपति हँसने लगे ।
यद्यपि युधिष्ठिर उन्हें ऐसा करनेसे रोक रहे थे, परन्तु प्यारे परीक्षित्! उन्हें इशारेसे श्रीकृष्णका अनुमोदन प्राप्त हो चुका था ॥ ३८ ॥ इससे दुर्योधन लज्जित हो गया, उसका रोम - रोम
क्रोधसे जलने लगा । अब वह अपना मुँह लटकाकर चुपचाप सभाभवनसे निकलकर हस्तिनापुर चला गया । इस घटनाको देखकर सत्पुरुषोंमें हाहाकार मच गया और धर्मराज युधिष्ठिरका मन भी कुछ खिन्न -सा हो गया । परीक्षित्! यह सब होनेपर भी भगवान् श्रीकृष्ण चुप थे । उनकी इच्छा थी कि किसी प्रकार पृथ्वीका भार उतर जाय; और सच पूछो तो उन्हींकी दृष्टिसे दुर्योधनको वह भ्रम हुआ था ॥ ३ ९ ॥ परीक्षित्! तुमने मुझसे यह पूछा था कि उस महान् राजसूय - यज्ञमें दुर्योधनको डाह क्यों हुआ? जलन क्यों हुई? सो वह सब मैंने तुम्हें बतला दिया ॥ ४० ॥
जहास भीमस्तं दृष्ट्वा स्त्रियो नृपतयोऽपरे ।
निवार्यमाणा अप्यंग राज्ञा कृष्णानुमोदिताः ॥३८
स व्रीडितोऽवाग्वदनो रुषा ज्वलन् निष्क्रम्य तूष्णीं प्रययौ गजाह्वयम् । हाहेति शब्दः सुमहानभूत् सता- मजातशत्रुर्विमना इवाभवत् । बभूव तूष्णीं भगवान् भुवो भरं समुज्जिहीर्षुर्भ्रमति स्म यद्दृशा ॥३९
एतत्तेऽभिहितं राजन् यत् पृष्टोऽहमिह त्वया ।
सुयोधनस्य दौरात्म्यं राजसूये महाक्रतौ ॥४०
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां दशमस्कन्धे उत्तरार्धे दुर्योधनमानभंगो नाम पञ्चसप्ततितमोऽध्यायः ॥७५ ॥
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अथ षट्सप्ततितमोऽध्यायः शाल्वके साथ यादवोंका युद्ध श्रीशुक उवाच अथान्यदपि कृष्णस्य शृणु कर्माद्भुतं नृप क्रीडानरशरीरस्य यथा सौभपतिर्हतः ॥ १
शिशुपालसखः शाल्वो रुक्मिण्युद्वाह आगतः ।
यदुभिर्निर्जितः संख्ये जरासन्धादयस्तथा ॥२
शाल्वः प्रतिज्ञामकरोत् शृण्वतां सर्वभूभुजाम् ।
अयादवीं क्ष्मां करिष्ये पौरुषं मम पश्यत ॥३
श्रीशुकदेवजी कहते हैं - परीक्षित्! अब मनुष्यकी- सी लीला करनेवाले भगवान् श्रीकृष्णका एक और भी अद्भुत चरित्र सुनो । इसमें यह बताया जायगा कि सौभनामक विमानका अधिपति शाल्व किस प्रकार भगवान्के हाथसे मारा गया || १ || शाल्व शिशुपालका सखा था और रुक्मिणीके विवाहके अवसरपर बारातमें शिशुपालकी ओरसे आया हुआ था । उस समय यदुवंशियोंने युद्धमें जरासन्ध आदिके साथ- साथ शाल्वको भी जीत लिया था ॥२ ॥ उस दिन सब राजाओंके सामने शाल्वने यह प्रतिज्ञा की थी कि ' मैं
पृथ्वीसे यदुवंशियोंको मिटाकर छोडूंगा, सब लोग मेरा बल - पौरुष देखना ' ॥३ ॥
इति मूढः प्रतिज्ञाय देवं पशुपतिं प्रभुम् ।
आराधयामास नृप पांसुमुष्टिं सकृद् ग्रसन् ॥४
संवत्सरान्ते भगवानाशुतोष उमापतिः ।
वरेणच्छन्दयामास शाल्वं शरणमागतम् ॥५
देवासुरमनुष्याणां गन्धर्वोरगरक्षसाम् ।
अभेद्यं कामगं वव्रे स यानं वृष्णिभीषणम् ॥६
तथेति गिरिशादिष्टो मयः परपुरंजयः ।
पुरं निर्माय शाल्वाय प्रादात्सौभमयस्मयम् ॥७
स लब्ध्वा कामगं यानं तमोधाम दुरासदम् ।
ययौ द्वारवतीं शाल्वो वैरं वृष्णिकृतं स्मरन् ॥८
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निरुद्धय सेनया शाल्वो महत्या भरतर्षभ ।
पुरीं बभंजोपवनान्युद्यानानि च सर्वशः ॥९
सगोपुराणि द्वाराणि प्रासादाट्टालतोलिकाः ।
विहारान् स विमानाग्र्यान्निपेतुः शस्त्रवृष्टयः ॥१०
शिला द्रुमाश्चाशनयः सर्पा आसारशर्कराः ।
प्रचण्डश्चक्रवातोऽभूद् रजसाऽऽच्छादिता दिशः ॥ ११
इत्यर्द्यमाना सौभेन कृष्णस्य नगरी भृशम् ।
नाभ्यपद्यत शं राजंस्त्रिपुरेण यथा मही ॥१२
परीक्षित्! मूढ़ शाल्वने इस प्रकार प्रतिज्ञा करके देवाधिदेव भगवान् पशुपतिकी आराधना प्रारम्भ की । वह उन दिनों दिनमें केवल एक बार मुट्ठीभर राख फाँक लिया करता था ॥४ ॥
यों तो पार्वतीपति भगवान् शंकर आशुतोष हैं, औढरदानी हैं, फिर भी वे शाल्वका घोर संकल्प जानकर एक वर्षके बाद प्रसन्न हुए । उन्होंने अपने शरणागत शाल्वसे वर माँगनेके लिये कहा ॥५ ॥ उस समय शाल्वने यह वर माँगा कि ' मुझे आप एक ऐसा विमान दीजिये
जो देवता, असुर, मनुष्य, गन्धर्व, नाग और राक्षसोंसे तोड़ा न जा सके; जहाँ इच्छा हो, वहीं चला जाय और यदुवंशियोंके लिये अत्यन्त भयंकर हो' || ६ || भगवान् शंकरने कह दिया ' तथास्तु! ' इसके बाद उनकी आज्ञासे विपक्षियोंके नगर जीतनेवाले मय दानवने लोहेका सौभनामक विमान बनाया और शाल्वको दे दिया || ७ || वह विमान क्या था एक नगर ही था । वह इतना अन्धकारमय था कि उसे देखना या पकड़ना अत्यन्त कठिन था । चलानेवाला उसे जहाँ ले जाना चाहता, वहीं वह उसके इच्छा करते ही चला जाता था । शाल्वने वह विमान प्राप्त करके द्वारकापर चढ़ाई कर दी, क्योंकि वह वृष्णिवंशी यादवोंद्वारा किये हुए वैरको सदा स्मरण रखता था ॥८ ॥
परीक्षित्! शाल्वने अपनी बहुत बड़ी सेनासे द्वारकाको चारों ओरसे घेर लिया और फिर उसके फल- फूलसे लदे हुए उपवन और उद्यानोंको उजाड़ने और नगरद्वारों, फाटकों, राजमहलों, अटारियों, दीवारों और नागरिकोंके मनोविनोदके स्थानोंको नष्ट- भ्रष्ट करने लगा । उस श्रेष्ठ विमानसे शस्त्रोंकी झड़ी लग गयी || ९-१० ॥ बड़ी- बड़ी चट्टानें, वृक्ष, वज्र, सर्प और ओले बरसने लगे । बड़े जोरका बवंडर उठ खड़ा हुआ । चारों ओर धूल- ही- धूल छा गयी ॥११ ॥ परीक्षित्! प्राचीन कालमें जैसे त्रिपुरासुरने सारी पृथ्वीको पीड़ित कर रखा था,
वैसे ही शाल्वके विमानने द्वारकापुरीको अत्यन्त पीड़ित कर दिया । वहाँके नर- नारियोंको कहीं एक क्षणके लिये भी शान्ति न मिलती थी ॥१२ ॥
प्रद्युम्नो भगवान् वीक्ष्य बाध्यमाना निजाः प्रजाः ।
मा भैष्टेत्यभ्यधाद् वीरो रथारूढो महायशाः ॥ १३
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सात्यकिश्चारुदेष्णश्च साम्बोऽक्रूरः सहानुजः ।
हार्दिक्यो भानुविन्दश्च गदश्च शुकसारणौ ॥१४
अपरे च महेष्वासा रथयूथपयूथपाः ।
निर्ययुर्दंशिता गुप्ता रथेभाश्वपदातिभिः ॥१५
ततः प्रववृते युद्धं शाल्वानां यदुभिः सह ।
यथासुराणां विबुधैस्तुमुलं लोमहर्षणम् ॥१६
ताश्च सौभपतेर्माया दिव्यास्त्रै रुक्मिणीसुतः ।
क्षणेन नाशयामास नैशं तम इवोष्णगुः ॥ १७
विव्याध पंचविंशत्या स्वर्णपुंखैरयोमुखैः ।
शाल्वस्य ध्वजिनीपालं शरैः सन्नतपर्वभिः ॥१८
शतेनाताडयच्छाल्वमेकैकेनास्य सैनिकान् ।
दशभिर्दशभिर्नेतॄन् वाहनानि त्रिभिस्त्रिभिः ॥ १ ९
तदद्भुतं महत् कर्म प्रद्युम्नस्य महात्मनः ।
दृष्ट्वा तं पूजयामासुः सर्वे स्वपरसैनिकाः ॥२०
बहुरूपैकरूपं तद् दृश्यते न च दृश्यते ।
मायामयं मयकृतं दुर्विभाव्यं परैरभूत् ॥२१
क्वचिद् भूमौ क्वचिद् व्योम्नि गिरिमूर्ध्नि जले क्वचित् ।
अलातचक्रवद् भ्राम्यत् सौभं तद् दुरवस्थितम् ॥२२
परमयशस्वी वीर भगवान् प्रद्युम्नने देखा-हमारी प्रजाको बड़ा कष्ट हो रहा है, तब उन्होंने रथपर सवार होकर सबको ढाढ़स बँधाया और कहा कि ' डरो मत' ॥१३ ॥ उनके
पीछे - पीछे सात्यकि, चारुदेष्ण, साम्ब, भाइयोंके साथ अक्रूर, कृतवर्मा, भानुविन्द, गद, शुक, सारण आदि बहुत - से वीर बड़े- बड़े धनुष धारण करके निकले । ये सब- के - सब महारथी थे । सबने कवच पहन रखे थे और सबकी रक्षाके लिये बहुत - से रथ, हाथी, घोड़े तथा पैदल सेना साथ- साथ चल रही थी ॥१४-१५ ॥ इसके बाद प्राचीन कालमें जैसे देवताओंके साथ असुरोंका घमासान युद्ध हुआ था वैसे ही शाल्वके सैनिकों और यदुवंशियोंका युद्ध होने लगा । उसे देखकर लोगोंके रोंगटे खड़े हो जाते थे ॥ १६ ॥ प्रद्युम्नजीने अपने दिव्य अस्त्रोंसे
क्षणभरमें ही सौभपति शाल्वकी सारी माया काट डाली; ठीक वैसे ही जैसे सूर्य अपनी प्रखर
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किरणोंसे रात्रिका अन्धकार मिटा देते हैं ॥ १७ ॥ प्रद्युम्नजीके बाणोंमें सोनेके पंख एवं लोहेके
फल लगे हुए थे । उनकी गाँठें जान नहीं पड़ती थीं । उन्होंने ऐसे ही पचीस बाणोंसे शाल्वके सेनापतिको घायल कर दिया ॥१८ ॥ परममनस्वी प्रद्युम्नजीने सेनापतिके साथ ही शाल्वको
भी सौ बाण मारे, फिर प्रत्येक सैनिकको एक- एक और सारथियोंको दस- दस तथा वाहनोंको तीन - तीन बाणोंसे घायल किया ॥ १ ९ ॥ महामना प्रद्युम्नजीके इस अद्भुत और महान् कर्मको देखकर अपने एवं पराये - सभी सैनिक उनकी प्रशंसा करने लगे ॥२० ॥
परीक्षित्! मय दानवका बनाया हुआ शाल्वका वह विमान अत्यन्त मायामय था । वह इतना विचित्र था कि कभी अनेक रूपोंमें दीखता तो कभी एक रूपमें, कभी दीखता तो कभी न भी दीखता । यदुवंशियोंको इस बातका पता ही न चलता कि वह इस समय कहाँ है ॥२१ ॥
वह कभी पृथ्वीपर आ जाता तो कभी आकाशमें उड़ने लगता । कभी पहाड़की चोटीपर चढ़ जाता तो कभी जलमें तैरने लगता । वह अलातचक्रके समान- मानो कोई दुमुँही लुकारियोंकी बनेठी भाँज रहा हो — घूमता रहता था, एक क्षणके लिये भी कहीं ठहरता न था ॥ २२ ॥
शाल्व अपने विमान और सैनिकोंके साथ जहाँ-जहाँ दिखायी पड़ता, वहीं - वहीं यदुवंशी सेनापति बाणोंकी झड़ी लगा देते थे || २३ || उनके बाण सूर्य और अग्निके समान जलते हुए तथा विषैले साँपकी तरह असह्य होते थे । उनसे शाल्वका नगराकार विमान और सेना अत्यन्त पीड़ित हो गयी, यहाँतक कि यदुवंशियोंके बाणोंसे शाल्व स्वयं मूर्च्छित हो गया ॥२४ ॥
यत्र यत्रोपलक्ष्येत ससौभः सहसैनिकः ।
शाल्वस्ततस्ततोऽमुंचन् शरान् सात्वतयूथपाः ॥२३
शरैरग्न्यर्कसंस्पर्शेराशीविषदुरासदैः ।
पीड्यमानपुरानीकः शाल्वोऽमुह्यत् परेरितैः ॥२४
शाल्वानीकपशस्त्रौघैर्वृष्णिवीरा भृशार्दिताः ।
न तत्यजू रणं स्वं स्वं लोकद्वयजिगीषवः१ ॥ २५
शाल्वामात्यो द्युमान् नाम प्रद्युम्नं प्राक्प्रपीडितः ।
आसाद्य गदया मौर्व्या व्याहत्य व्यनदद् बली ॥२६
प्रद्युम्नं गदया शीर्णवक्षःस्थलमरिन्दमम् ।
अपोवाह रणात् सूतो धर्मविद् दारुकात्मजः ॥२७
लब्धसंज्ञो मुहूर्तेन कार्ष्णिः सारथिमब्रवीत् ।
अहो असाध्विदं सूत यद् रणान्मेऽपसर्पणम् ॥२८
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न यदूनां कुले जातः श्रूयते रणविच्युतः ।
विना मत् क्लीवचित्तेन सूतेन प्राप्तकिल्बिषात् ॥२९
किं नु वक्ष्येऽभिसंगम्य पितरौ रामकेशवौ ।
युद्धात् सम्यगपक्रान्तः पृष्टस्तत्रात्मनः क्षमम् ॥३०
व्यक्तं मे कथयिष्यन्ति हसन्त्यो भ्रातृजामयः ।
क्लैब्यं कथं कथं वीर तवान्यैः कथ्यतां मृधे ॥३१
परीक्षित्! शाल्वके सेनापतियोंने भी यदुवंशियोंपर खूब शस्त्रोंकी वर्षा कर रखी थी, इससे वे अत्यन्त पीड़ित थे; परन्तु उन्होंने अपना- अपना मोर्चा छोड़ा नहीं । वे सोचते थे कि मरेंगे तो परलोक बनेगा और जीतेंगे तो विजयकी प्राप्ति होगी ॥ २५ ॥ परीक्षित्! शाल्वके मन्त्रीका
नाम था द्युमान्, जिसे पहले प्रद्युम्नजीने पचीस बाण मारे थे । वह बहुत बली था । उसने झपटकर प्रद्युम्नजीपर अपनी फौलादी गदासे बड़े जोरसे प्रहार किया और ' मार लिया, मार लिया ' कहकर गरजने लगा ॥ २६॥ परीक्षित्! गदाकी चोटसे शत्रुदमन प्रद्युम्नजीका
वक्षःस्थल फट- सा गया । दारुकका पुत्र उनका रथ हाँक रहा था । वह सारथिधर्मके अनुसार उन्हें रणभूमिसे हटा ले गया ॥ २७ ॥ दो घड़ीमें प्रद्युम्नजीकी मूर्च्छा टूटी । तब उन्होंने सारथिसे
कहा — ' सारथे! तूने यह बहुत बुरा किया। हाय, हाय! तू मुझे रणभूमिसे हटा लाया? ॥२८ ॥
सूत! हमने ऐसा कभी नहीं सुना कि हमारे वंशका कोई भी वीर कभी रणभूमि छोड़कर अलग हट गया हो! यह कलंकका टीका तो केवल मेरे ही सिर लगा । सचमुच सूत! तू कायर है, नपुंसक है ॥२९ ॥ बतला तो सही, अब मैं अपने ताऊ बलरामजी और पिता श्रीकृष्णके
सामने जाकर क्या कहूँगा? अब तो सब लोग यही कहेंगे न, कि मैं युद्धसे भग गया? उनके पूछनेपर मैं अपने अनुरूप क्या उत्तर दे सकूँगा' ॥ ३० ॥ मेरी भाभियाँ हँसती हुई मुझसे
साफ- साफ पूछेंगी कि ‘ कहो, वीर! तुम नपुंसक कैसे हो गये? दूसरोंने युद्धमें तुम्हें नीचा कैसे दिखा दिया? ' ‘ सूत! अवश्य ही तुमने मुझे रणभूमिसे भगाकर अक्षम्य अपराध किया है! ' ॥३१ ॥
सारथिरुवाच
धर्मं विजानताऽऽयुष्मन् कृतमेतन्मया विभो ।
सूतः कृच्छ्रगतं रक्षेद् रथिनं सारथिं रथी ॥३२
एतद् विदित्वा तु भवान् मयापोवाहितो रणात् ।
उपसृष्टः परेणेति मूर्च्छितो गदया हतः ॥३३
सारथीने कहा — आयुष्मन्! मैंने जो कुछ किया है, सारथीका धर्म समझकर ही किया है । मेरे समर्थ स्वामी! युद्धका ऐसा धर्म है कि संकट पड़नेपर सारथी रथीकी रक्षा कर ले और रथी सारथीकी ॥३२ ॥ इस धर्मको समझते हुए ही मैंने आपको रणभूमिसे हटाया है । शत्रुने
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आपपर गदाका प्रहार किया था, जिससे आप मूर्च्छित हो गये थे, बड़े संकटमें थे; इसीसे मुझे ऐसा करना पड़ा || ३३ || इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां दशमस्कन्धे उत्तरार्धे शाल्वयुद्धे षट्सप्ततितमोऽध्यायः ॥७६ ॥
१. त्रय ० । २. गुर्व्या । ३. प्तकल्मषात् ।
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अथ सप्तसप्ततितमोऽध्यायः शाल्व - उद्धार श्रीशुक उवाच
स तूपस्पृश्य सलिलं दंशितो धृतकार्मुकः ।
नय मां द्युमतः पार्श्वं वीरस्येत्याह सारथिम् ॥१
विधमन्तं स्वसैन्यानि द्युमन्तं रुक्मिणीसुतः ।
प्रतिहत्य प्रत्यविध्यन्नाराचैरष्टभिः स्मयन् ॥२
चतुर्भिश्चतुरो वाहान् सूतमेकेन चाहनत् ।
द्वाभ्यां धनुश्च केतुं च शरेणान्येन वै शिरः ॥३
गदसात्यकिसाम्बाद्या जघ्नुः सौभपतेर्बलम् ।
पेतुः समुद्रे सौभेयाः सर्वे संछिन्नकन्धराः ॥४
एवं यदूनां शाल्वानां निघ्नतामितरेतरम् ।
युद्धं त्रिणवरात्रं तदभूत्तुमुलमुल्बणम् ॥५
इन्द्रप्रस्थं गतः कृष्ण आहूतो धर्मसूनुना ।
राजसूयेऽथ निर्वृत्ते शिशुपाले च संस्थिते ॥ ६
श्रीशुकदेवजी कहते हैं - परीक्षित्! अब प्रद्युम्नजीने हाथ- मुँह धोकर, कवच पहन धनुष धारण किया और सारथीसे कहा कि ' मुझे वीर घुमान्के पास फिरसे ले चलो' ॥१ ॥ उस
समय द्युमान् यादवसेनाको तहस- नहस कर रहा था । प्रद्युम्नजीने उसके पास पहुँचकर उसे ऐसा करनेसे रोक दिया और मुसकराकर आठ बाण मारे ॥२ ॥
चार बाणोंसे उसके चार थोड़े और एक- एक बाणसे सारथी, धनुष, ध्वजा और उसका सिर काट डाला ॥३ ॥ इधर गद, सात्यकि, साम्ब आदि यदुवंशी वीर भी शाल्वकी सेनाका
संहार करने लगे । सौभ विमानपर चढ़े हुए सैनिकोंकी गरदनें कट जातीं और वे समुद्रमें गिर पड़ते ॥४ ॥
इस प्रकार यदुवंशी और शाल्वके सैनिक एक- दूसरेपर प्रहार करते रहे । बड़ा ही घमासान और भयंकर युद्ध हुआ और वह लगातार सत्ताईस दिनोंतक चलता रहा ॥५ ॥
उन दिनों भगवान् श्रीकृष्ण धर्मराज युधिष्ठिरके बुलानेसे इन्द्रप्रस्थ गये हुए थे । राजसूय यज्ञ हो चुका था और शिशुपालकी भी मृत्यु हो गयी थी ॥ ६ ॥
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कुरुवृद्धाननुज्ञाप्य मुनींश्च ससुतां पृथाम् निमित्तान्यतिघोराणि पश्यन् द्वारवतीं ययौ ॥७
आह चाहमिहायात आर्यमिश्राभिसंगतः ।
राजन्याश्चैद्यपक्षीया नूनं हन्युः पुरीं मम ॥ ८
वीक्ष्य तत् कदनं स्वानां निरूप्य पुररक्षणम् ।
सौभं च शाल्वराजं च दारुकं प्राह केशवः ॥९
रथं प्रापय मे सूत शाल्वस्यान्तिकमाशु वै ।
सम्भ्रमस्ते न कर्तव्यो मायावी सौभराडयम् ॥१०
इत्युक्तश्चोदयामास रथमास्थाय दारुकः ।
विशन्तं ददृशुः सर्वे स्वे परे चारुणानुजम् ॥११
शाल्वश्च कृष्णमालोक्य हतप्रायबलेश्वरः ।
प्राहरत् कृष्णसूताय शक्तिं भीमरवां मृधे ॥१२
तामापतन्तीं नभसि महोल्कामिव रंहसा ।
भासयन्तीं दिशः शौरिः सायकैः शतधाच्छिनत् ॥१३
तं च षोडशभिर्विद्ध्वा बाणैः सौभं च खे भ्रमत् ।
अविध्यच्छरसन्दोहैः खं सूर्य इव रश्मिभिः ॥ १४
शाल्वः शौरेस्तु दोः सव्यं सशार्ङ्गं शार्ङ्गधन्वनः ।
बिभेद न्यपतद्धस्तात् शार्ङ्गमासीत्तदद्भुतम् ॥ १५
हाहाकारो महानासीद् भूतानां तत्र पश्यताम् ।
विनद्य सौभराडुच्चैरिदमाह जनार्दनम् ॥१६
वहाँ भगवान् श्रीकृष्णने देखा कि बड़े भयंकर अपशकुन हो रहे हैं । तब उन्होंने कुरुवंशके बड़े - बूढ़ों, ऋषि- मुनियों, कुन्ती और पाण्डवोंसे अनुमति लेकर द्वारकाके लिये प्रस्थान
किया ॥७ ॥ वे मन- ही- मन कहने लगे कि ' मैं पूज्य भाई बलरामजीके साथ यहाँ चला आया ।
अब शिशुपालके पक्षपाती क्षत्रिय अवश्य ही द्वारकापर आक्रमण कर रहे होंगे' ॥८ ॥
भगवान् श्रीकृष्णने द्वारकामें पहुँचकर देखा कि सचमुच यादवोंपर बड़ी विपत्ति आयी है । तब उन्होंने बलरामजीको नगरकी रक्षाके लिये नियुक्त कर दिया और सौभपति शाल्वको देखकर