श्रीगणेशाय नमः।
सुश्रुतसंहिता हिन्दीव्याख्या - कविराज अम्बिकादत्त शास्त्री — पृष्ठ 561–570
सुश्रुतसंहिता हिन्दीव्याख्या - कविराज अम्बिकादत्त शास्त्री · चौखम्बा संस्कृत सीरिज, बनारस · पृष्ठ 561–570
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अध्यायः ३४ चिकित्सास्थानम् १३५
प्रागपीतं नरं शोध्यं पाययेतौपधं मृदु ।
ततो विज्ञातकोष्टस्य कार्य संशोधनं पुनः ॥ ४४ ॥
अविज्ञात कोष्ट वालों के लिये सशोधन में विशेषता -जिस व्यक्ति ने कभी पहले विरेचन द्रव्य का पान न किया हो, उसे मृदु औषधि पिलाकर शुद्ध करना चाहिए ।
इसके पश्चात् उसके कोष्ठ का ज्ञान होने पर सशोधन ।
करना चाहिए ॥ ४४ ॥
सुखं दृष्टफलं हृद्यमल्पमात्रं महागुणम् ।
व्यापत्स्वल्पात्ययं चापि पिवेन्नृपतिरौपधम् ॥ १५ ॥
राजा का योग्य विरेचन --पीने में सुखकर, जिसका गुण ज्ञात हो चुका हो, मन को प्रिय, अल्पमात्रा वाली, अधिक गुणशील तथा जिसमें हानिकारक दोष स्वल्प हो, ऐसी औषधि राजा को पीनी चाहिए ॥ ४५ ॥
स्नेहस्वेदावनभ्यस्य यस्तु संशोधनं पिवेत् ।
are शुकमिवानामे देहस्तस्य विशीर्यते ॥ ४६ ॥
रूक्ष का संशोधन करने में दोष - स्नेहन और स्वेदन का प्रयोग किए बिना जो मनुष्य संशोधन औषधि पीता है, उसका शरीर इस प्रकार नष्ट हो जाता है जैसे सूखी लकडी मोडने से टूट जाती है ॥ ४६ ॥
स्नेहस्वेदप्रचलिता रसैः स्निग्धैरुदीरिताः ।
दोषाः कोष्ठगता जन्तोः सुखा हर्तुं विशोधनैः ॥४७ ॥
इति सुश्रुतसंहितायां चिकित्सास्थाने वमन विरेचन-साध्योपद्रवचिकित्सितं नाम त्रयस्त्रिंशोऽध्यायः ॥ संशोधन के द्वारा सुखपूर्वक दोपों के निकलने का निर्देश - स्नेहन और स्वेदन से चलायमान तथा स्निग्ध । रसों के द्वारा प्रकुपित, कोष्ठ में पहुॅचे हुए मनुष्यों के दोष, संशोधन के द्वारा सुखपूर्वक बाहर निकाले जा सकते हैं ॥ २७ ॥
इत्यायुर्वेदतश्वसंदीपिका भाषा व्याख्यायां त्रयस्त्रिंशोऽध्यायः चतुस्त्रिंशत्तमोऽध्यायः अथातो धमनविरेचनव्यापञ्चिकित्सितं व्याख्यास्यामः ॥ यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥ २ ॥
वमन - विरेचन दोषज व्याधि - चिकित्सा का उपक्रम - इसके अनन्तर वमन, विरेचन के दोष से उत्पन्न व्याधियों की चिकित्सा विधि का वर्णन किया जा रहा है, जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने ( सुश्रुत प्रभृति शिष्यों से ) कहा ॥ १-२ ॥ वैद्यातुरनिमित्तं वमनं विरेचनं च पञ्चदशधा व्यापद्यते । तत्र वमनस्याधोगतिरूर्ध्व विरेचनस्येति पृथक्; सामान्यमुभयोः-- सावशेपौपघत्वं, जीर्णोप- । धत्वं, होनदोपापहृतत्वं, वातशूलम्, अयोगो, अति - । योगो, जीवादानम्, आध्मानं, परिकर्तिका, परिस्राव:, प्रवाहिका, हृदयोपसरणं, विबन्धः, अप्रग्रह इति ॥ ३ ॥
पन्द्रह प्रकार के वमन विरेचन व्यापदों का निर्देश - वैद्य । और आतुर के दोष से ( भेपज और परिचारक का ग्रहण भी वैद्य एवं आतुर के द्वारा होता है ) चमन तथा विरेचन के द्वारा पन्द्रह प्रकार की व्याधियाँ उत्पन्न होती हैं । इनमें वमन द्रव्य का नीचे को जाना और विरेचन का ऊपर की ओर उठना पृथक पृथक व्यापत्तियाँ है । शेष अन्य व्यापत्तियाँ दोनों में ( चमन विरेचन ) समान रूप से होती हैं: - ( जिनके नाम निम्न लिखित हैं ) १ सावशेपौपधत्व, २ जीर्णोधव, ३ हीनदोपापहृतत्व, ४ वातशूल, ५ अयोग, ६ अतियोग, ७ जीवादान, ८ आध्मान, ९ परिकर्तिका, १० परिस्राव, ११ प्रवाहिका, १२ हृदयोपसरण, ३१ विवन्ध, १४ अङ्ग प्रग्रह ॥ विमर्श -- - ऊपर निर्देश किया गया है कि वमन, विरेचन के द्वारा पन्द्रह प्रकार की व्यापत्तियाँ उत्पन्न होती है । इनमें । वमन की अधोगति तथा विरेचन की ऊर्ध्वगति दो व्यापत्तियाँ पृथक - पृथक होती है । शेप तेरह व्यापत्तियों का उल्लेख दोनों में समान रूप से होना चाहिए, जिसमें पन्द्रह व्यापत्तियों की गणना ठीक हो जाय । किन्तु उपर्युक्त गणना में चौदह व्यापत्तियाँ भाती हैं । इनमें अन्तिम अङ्ग - प्रग्रह व्यापत्ति का पाठ सुश्रुत संहिता के कई संस्करणों में प्राप्त नहीं होता तथा । हाराणचन्द्र जी भी उसे अपने पाठ में सम्मिलित नहीं करते । इस प्रकार उपर्युक्त सूची में से अङ्ग प्रग्रह को हटा देने पर उपर्युक्त गणना का सामञ्जस्य हो सकता है । चरक ने दश व्यापदों का ही नाम निर्देश किया है- ' आध्मान परिक-त्तिश्च स्रावो हृदयोर्ग्रह | जीवादान सविभ्रशस्तम्भः सोपद्रवः क्रम. 1 अयोगादतियोगाच्च दशैता व्यापदो मता ' । प्रेप्यभैषज्यवैद्यानां वैगुण्यादापदः स्मृताः ॥ ( च. सि. अ. ६ ) सावशेपपधत्व का तात्पर्य है जीर्णावशेष अर्थात् बिना जीर्ण हुई औषधि । इसका लक्षण चरक इस प्रकार है- ' मी दाहोऽङ्गसदन भ्रमो मूर्च्छा शिरोरुना । अरतिर्बलहानिश्च सावशेपोपधाकृति. । ( च.सि.भ. ६ ) तत्र बुभुक्षा पीडितस्यातितीक्ष्णाग्नेर्मृदुकोष्ठस्य चा-वतिष्ठमानं दुर्बलस्य वा गुणसामान्यभावाद्वमनमधो गच्छति, तत्रेप्सितानवाप्तिर्दो पोल्लेशश्च; तमाशु स्नेह-यित्वा भूयस्तीक्ष्णतरैर्वामयेत् ॥ ४ ॥
ana के अधोगमन - व्यापद् का निर्देश - भूख से पीडित, अत्यन्त तीक्ष्ण अग्निवाले, मृदु कोष्ठ अथवा दुर्वक मनुष्य का पाक को प्राप्त होता हुआ चमन द्रव्य, सरत्व आदि गुणों की समानता के कारण नीचे की ओर जाता है । इससे इच्छित वस्तु की प्राप्ति नहीं होती अर्थात् वमन नहीं होता तथा दोष ( कफ ) का उत्खलेश ( वृद्धि ) होता है; इस दशा में रोगी का शीघ्र स्नेहन करके पुनः तीक्ष्णतर औषध पिला कर वमन कराना चाहिए ॥ ४ ॥
अपरिशुद्धामाशयस्योत्कृिष्टश्लेष्मणः सशेपान्नस्य वाऽहृद्यमति प्रभूतं वा विरेचनं पीतमूर्ध्वं गच्छति, तत्रेप्सितानवाप्तिर्दो पोक्लेशश्चः तत्राशुद्धामाशयमुल्बण • श्लेष्माणमाशु वामयित्वा भूयस्तीक्ष्णतरैविरेचयेत्, आमान्वये त्वामवत् संविधानम्, अहृद्येऽतिप्रभूते च हृद्यं प्रमाणयुक्तं च; अत ऊर्ध्वमुत्तिष्ठत्योपधे न तृतीयं पाययेत, ततस्त्वेनं मधुघृतफाणितयुक्तैर्ले है विरेचयेत् ॥
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१३६ सुश्रुतसहिता विरेचन के ऊर्ध्वगमन व्यापद का निर्देश - जिस आतुर का आमाशय अशुद्ध हो तथा कफ का उत्क्लेश हो अथवा जिसका आहार पूर्ण रूप से न पचा हो, उसे अप्रिय या अधिक मात्रा में पिलाया गया विरेचन द्रव्य, ऊपर की ओर जाता है । इससे अभिलपित वस्तु की अप्राप्ति और दोप ( पित्त ) की वृद्धि होती है । इस स्थिति में अशुद्ध आमाशय एवं बढ़े हुए कफ वाले को शीघ्र वमन कराके पुनः तीच्णतर विरेचन देना चाहिए | आम का अनुवन्ध रहने पर लंघन, पाचन कराना चाहिए | अप्रिय तथा अधिक मात्रा की अवस्था में प्रिय और प्रमाणयुक्त औषध पिलानी चाहिए । इस क्रिया के उपरान्त भी यदि विरेचन द्रव्य ऊपर की ओर उठे तो तीसरी बार विरेचन नहीं देना चाहिए । इस दशा में मधु, घृत, और राव से युक्त भवलेह के द्वारा आतुर को विरेचन कराना चाहिए ॥ ५ ॥
दोपविग्रथितमल्पमौषधमवस्थितमूर्ध्वभागिकमधो भागिकं वा न स्रंसयति दोषान्, तत्र तृष्णा पार्श्वशूलं छर्दिर्मूर्च्छा पर्वभेदो हल्लासोऽरतिरुद्वाराविशुद्धिश्च भवति, तमुष्णाभिरद्भिराशु वामयेदूर्ध्व भागिके, अघो-भागिकेऽपि च सावशेषौपधमति प्रधावितदोपमतिबल -मसम्यग्विरिक्तलक्षणमप्येवं वामयेत् ॥ ६ ॥
सावशेष औषध व्यापद् का वर्णन - वमन अथवा विरेचन क़ी जीर्गावशेष, दोपमिश्रित अल्प औषध, दोपों को निकालने में समर्थ नहीं होती । इससे तृष्णा, पार्श्वशूल, छर्दि ( वमन ), मूर्च्छा, पर्वभेद ( सन्धियों में पीडा ), हृल्लास ( धुकधुकी ), अरति ( कहीं मन न लगना ) और उद्गार का शुद्ध न होना, होता है । वमन की अवस्था में उस जीर्णावशेष अल्प औषध को उष्ण जल के द्वारा शीघ्र वमन कराना चाहिए और विरेचन की दशा में भी असम्यग्विरिक्त के लक्षणों से युक्त बलवान् पुरुष के बहुदोष मिश्रित जीर्णावशेष औषध को उपर्युक्त विधि से वमन के द्वारा निकालना चाहिए ॥ ६ ॥
क्रूरकोष्ठस्याति तीक्ष्णाग्नेरल्पमपधमल्पगुणं भक्तवत् पाकमुपैति, तत्र समुदीर्णा दोपा यथाकालम- वा | निर्हीयमाणा व्याधिविभ्रंशं बलविभ्रंशं चापादयन्ति, तमनल्पममन्दमौपथ च पाययेत् ॥ ७ ॥
जीप व्यापद का वर्णन - तीक्ष्ण अग्निवाले मनुष्य की सेवन की हुई अल्पमात्रा या अल्पगुण क्रूर कोठ औषधि भोजन की भाति पच जाती है । उस अवस्था चाली समय पर बाहर न निकाले गए दोप, व्याधिविभ्रंश ( कोष्ठ में आदि में क्षोभ उत्पन्न करना ) और वलविभ्रंश ( सन्धि विश्लेप आदि ) उत्पन्न कर देते हैं । इस दशा में प्रचुर और तीच्ण औषध पिलानी चाहिए ॥ ७ ॥
अस्निग्धस्विन्नेनाल्पगुण वा भेपजमुपयुक्तमल्पान् दोपान् हन्तिः तत्र वमने दोषशेषो गौरवमुत्क्लेशं हृद-याविशुद्धि व्याधिवृद्धि च करोति, तत्र तं यथायोगं दृढ बहुप्रचलितदोपं वा तृतीये दिवसेऽल्पगुणं चेति ॥ अपदोपहरण व्यापद का वर्णन - स्नेहन और स्वेदन का प्रयोग किए बिना सेवन की गई अल्प गुण वाली औषधि अल्प दोपों को ही नष्ट करती है । उस समय वमन की अवस्था में बचा हुआ दोष गौरव, ( भारीपन ) उत्क्लेश ( मिचलीआना ) हृदय की अशुद्धि और व्याधि वृद्धि करता है । इसमें योग के अनुसार ( स्नेहन - स्वेदन करके ) वमन द्रव्य पिला कर आतुर को अत्यधिक वमन कराना चाहिए । विरेचन की अवस्था में बचा हुआ दोष, गुदपरिकर्त्तन ( गुदा में चारों ओर काटने के समान पीढ़ा ), आध्मान, शिरोगौरव, वायु का अवरोध तथा रोग की वृद्धि करता है । इसमें आतुर को, पुनः स्नेहन तथा स्वेदन का प्रयोग करके, तीचग विरेचन देना चाहिए । बहुदोष या चलायमान दोषों से युक्त दृढ शरीर वाले व्यक्ति को स्नेहन, स्वेदन के अनन्तर तीसरे दिन अल्प गुण वाली औषधि सेवन करानी चाहिए ॥ ८ ॥
स्निग्धस्विन्नेन रुक्षौषधमुपयुक्तत्रह्मचारिणा वा वायुं कोपयति, तत्र वायुः प्रकुपितः पार्श्वपृष्ठश्रोणिम-न्यामर्मशूलं मूर्च्छा भ्रम मदं संज्ञानाशं च करोति, तं वातशूलमित्याचक्षते; तमभ्यन्य धान्यस्वेदेन स्वेद-यित्वा यष्टीमधुकविपकेन तैलेनानुवासयेत् ॥ ६ ॥
चातशूल व्यापद का वर्णन - स्नेहन, स्वेदन के बिना ब्रह्मचर्यं रहित अवस्था में सेवन की गई रूक्ष औषध वायु को कुपित करती है । उस समय प्रकुपित हुआ वायु, पार्श्व, पृष्ठ, श्रोणि ( कटि ) मन्याप्रदेश और मर्म ( हृदय ) में पीड़ा तथा मूर्च्छा, भ्रम, मद और संज्ञानाश कर देता है । इस दशा को बात शूल कहते हैं । इसमें स्नेह की मालिश करके तथा मापादि शमी धान्यों के द्वारा स्वेदन देकर, मुलेठी के क्वाथ से सिद्ध तैल के द्वारा अनुवासन बस्ति लगानी चाहिए ॥ स्नेहस्वेदाभ्यामविभावितशरीरेणाल्पमौषधमल्पगुणं वा पीतमूर्ध्व मधो वा नाभ्येति दोषांश्चोत्क्लेश्य तैः सह बलक्षयमापादयति, तत्राध्मानं हृदयग्रहस्तृष्णा मूर्च्छा दाहश्च भवति, तमुयोगमित्याचक्षते, तमाशु वामये-न्मदनफललवणाम्बुभिर्वि रेचयेत्तीक्ष्णतरैः कषायैश्च । दुर्वान्तस्य तु समुक्लिष्टा दोषा व्याप्य शरीरं कण्डूश्व-यथुकुष्ठ पिडकाज्वराङ्गमर्दनिस्तोदनानि कुर्वन्ति, तत-स्वानशेषान्महौषधेनापहरेत् । अस्निग्धस्विन्नस्य दुर्विरि तस्याधोनाभेः स्तन्धपूर्णोदरता शूलं वातपुरीषखङ्गः कण्डूमण्डलप्रादुर्भावो वा भवति, तमास्थाप्य पुनः संस्नेह्य विरेचयेत्तीक्ष्णेन । नातिप्रवर्तमाने तिष्ठति वा दुष्टसंशोधने तत्सन्तेजनार्थमुष्णोदकं पाययेत् पाणि-तापैश्च पार्श्वोदरमुपस्वेदयेत्, ततः प्रवर्तन्ते दोषाः । अनुप्रवृत्ते चाल्पदोपे जीर्णौषधं बहुदोषमहःशेषं बलं पाययित्वा वामयेद् दृढतरं, विरेचने तु गुदपरिकर्तन- चावेच्य भूयो मात्रां विदध्यात् । अप्रवृत्तदोषं दशरात्रा-माध्मान शिरोगौरवमनिःसरणं वा वायोर्व्याधिवृद्धिं दूर्ध्वमुपसंस्कृतदेहं स्नेहस्वेदाभ्यां भूयः शोधयेत् । करोति, तमुपपाद्य भूय ' स्नेहस्वेदाभ्यां विरेचयेद् दृढतरं च | दुर्वि रेच्यमास्थाप्य पुनः संस्नेह्य विरेचयेत् । ह्रीभय-| लोभवेंगाघातशीलाः प्रायशः खियो राजसमीपस्था
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श्रमाः ३८ ] चिकित्सास्थानम् -वणिजः श्रोत्रियञ्च भवन्ति तस्मादेते दुर्विरेच्या त्यान एक ताननिन्निग्वान् स्वेदोपपन्नाम् शोचन ॥ १० ॥
वन - विरेचन के अयोग का वर्ग - इन और स्वेदन में रहिन शरीर वाले व्यक्ति को निाई गई मात्रा या अन्न वाली और िया मार्ग में ( वमन-विरेचन ) प्रत नहीं होती और दोपों को शित कर उनके साथ बलन्जय उत्पन्न कर देती है । इससे ध्यान, हृदयग्रह, और होता है । इस अवस्था को योग कहते हैं । इस दशा में ( वन का योग होने पर ) मैनफन्ट और मिश्रित शीघ्र मन बनाना चाहिए नया ( किंचन के योग में नितीश कपायों से विरेचन कराना चाहिए । सी भांति न होने पर गित हुए दीप, शरीर में व्याष्ट होकर गया, ( सुई चुभने के समान पीडा ) उत्पन्न कर देते हैं । रवि की बड़ी मात्रा पिला कर इनका मूल नाम करना चाहिए । स्टेन और स्वेन से रहिन, दुर्विग्डि मदृन्य कु गभि के नीचे स्तब्धता, तनाव, शूल, अपान वायु एवं मन्द्र का अवरोध तथा कन्ह और की उत्पत्ति होती है, अस्थान ट्रैकर ( नियम्नि ) पुन. केंद्र में न करके कयों के द्वारा विरेचन air चाहिए । विरेचन का वेग नी मांनि न होने पर विनय के दूषित होने पर उसे उत्तेजित करने के लिए उष्ण जन्छ विलाना चाहिए और seas को कृष्ण करके पार्श्व तथा वरपर सेक करना चाहिए, इसमें दोषों को प्रवृत्ति ( विरेचन ) होती है । दोषों की प्रवृत्ति । अन्य मात्रा में होने पर, औषधि की जीवस्या, दोष बाहुल्य, दिवस का अवमान, डागरिक इन्ति एवं पुरुष के बन्द की परीक्षा कर पुन पथि की मात्रा पानी चाहिए । दोषों की प्रवृत्ति न होने पर दूध दिन के उपरान्त, स्नेहन, वेद के द्वारा शुद्ध व्यक्ति का पुनः ( वमन-विरेचन के द्वारा ) संशोधन करना चाहिए । कठिनाई से विरेचन होने बन्ने व्यक्ति को प्रथम स्थापन ( निहन्ति ) देवर तया स्नेह बन्ति का प्रयोग करके, विरेचन कराना चाहिए । लजा, भय और लोभ से उपस्थित मल, सूत्र के वेगों को रोकने वाली शायः स्त्रियों, राजा के समीप रहने वाले व्यक्ति व्यापारी तया बेदुरावी हुआ करते हैं, इस कारण ये ढंग दुर्विरेच्य होते हैं, क्योंकि इनमें वायु की प्रबलना
बहती है । अतः नन्ही मांनि नेहन - स्वेदन करके इनका ।
ओवर करना चाहिए ॥ १० ॥
स्निग्वस्त्रिन्नस्यातिमात्रमतिमृदुकोष्टस्य वाऽतिती वित्तमवमतियोगं कुर्यात् । तत्र वमना-नियोगे पित्तानिवृत्तिविमानको चलवान भवति तं घृतेनास्यावगाह्य शीतासु शर्करामधु मिरुपचरेद्ययास्वं विरेचनावियोगे त्यातिप्र-वृत्तित्तरकालं च सुरतस्य तत्रापि वत्तविन्सो बात | कोप वा भवति तमदिशीताम्बुभिः परिषिच्या- । गाझ वा शीतैस्तण्डुलाम्बुभिर्नघुमिवैश्छईयेत्; । १६ २० त्रि पिच्छावस्ति चास्मै दद्यात, श्रीरसर्पिया चैनमनुवास-। येत, प्रियवादि चास्मै तण्डुलाम्बुना पातुं प्रयच्छेत्, श्रीररसयोवान्यतरेण भोजयेत् ॥ ११ ॥
अतियोग व्यापद का वर्णन - अत्यधिक स्नेहन, स्वेदन से युक्त, अथवा अन्यन्त मृदु कोष्ट वाले पुरुष को अत्यन्त तीचग या अधिक मात्रा में दी गई औपवि अनियोग उत्पन्न कर । देती है । वमन का अतियोग होने पर पित्त की अधिक प्रवृत्ति; बल का ह्रास और वायु का प्रल प्रकोप होता है । इसमें वृत की साहिश कर शीतल जल से स्नान कराना चाहिए और दोषों के अनुसार शर्करा और मधु मिश्रित छेदों के द्वारा उपचार । करना चाहिए । विरेचन का अनियोग होने पर प्रथम कफ की अत्यधिक प्रवृत्ति और इसके बाद रक्तमिश्रित कफ का । आगमन होता है । इस दशा में भी बलका हाम और बात का प्रकोप होता है । रोगी को अत्यन्त शीतल जल से स्नान व जल में गोना लगवाना चाहिए और मिश्रित | शीन तलाक के द्वारा चमन कराना चाहिए | इसे विच्छावनि ( पिच्छिल द्रव्यों से युक्त ) देनी चाहिए । दूव युक्त वी से अनुवासन बन्ति लगानी चाहिए और | नालों के साथ प्रिय आदि राय के उदय पीने के लिए | देना चाहिए तथा दूब या मांसरस में से किसी पुत्र के साथ भोजन कराना चाहिए ॥ ११ ॥
तस्मिन्नेव वमनानियोगे प्रवृद्धे शोणितं ष्टोत छर्दयति वा तत्र जिह्वानिःसरणमपसरणमणोर्व्या-वृत्तिर्हेनुसंहननं तृष्णा हिका ज्वरो वैसत्यमित्युपद्रवा भवन्तिः तमासृक्चन्दनोशीराखनलाजचूर्णः सशर्करो-दकमन्यं पाययेन, फलरसैर्वा सवृतोद्रशर्करैः शुङ्गा-मित्र बटादीनां पेयां सिद्धां सभां वचप्राहिभिर्वा, | पयसा जाङ्गलरसेन वा भोजयेत, अतिसुतशोणित-विवानेनोपचरेन्: जिह्वामतिसर्पितां कटुकलत्रणचूर्ण-प्रवृष्टयं तिलद्राक्षाप्रतिप्तां वाऽन्तः पीडयेत्, अन्तः प्रविष्टायामन्तमन्ये तन्य पुरस्तात् स्वादयेयुः व्यावृत्ते चाक्षिणी घृताभ्यक् पीडयेन, हनुसंहनने वातश्लेष्म-हरं नवं खेां विव्यात, तृष्णादिषु च यथास्वं प्रतिकुर्वीत विसले वेणुवीणागीत स्वनं श्रावयेत् ॥ १२ ॥
चमन के अनियोग का वर्ग - हमी अतियोग की अवस्था में वसन का अनियोग होने पर रोगी रक्त थूकता है अथवा रक्त का वमन करता है । इसमें जिह्वा का बाहर निकलना, अन्दर की ओर मुड़ जाना, आंखों का फैट जाना, जबड़े का बन्द होना, तृष्णा, हिका, वर और संज्ञानाश आदि उपद्रव उत्पन्न हो जाते हैं । इस दशा में बकरी का रक्त, चन्दन, खश, मौवीरान और धान के लावे के चूर्ण का शर्करा एवं जल के द्वारा मन्थ बना कर पिलाना चाहिए । घृत, मधु और डार्करा मिश्रित पलों के रस या वट आदि वृनी की कॉपी से या मल बांधने वाले ( कूटज आदि ) द्रव्यों के द्वारा सिद्ध मधु मिली हुई पेया पिलानी चाहिए । दूव अथवा जांगब्जीवों के मांमरम् के साथ भोजन कराना चाहिए अधिक रक्तसाव को रोकने वाली विधि के अनुसार उपचार करना चाहिए । नबिक
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१३८ सुश्रुतसंहिता बाहर निकली हुई जिह्वा मं त्रिकटु ( सौंठ, मरिच, पिप्पल ) और लवण रगड़ कर या तिल और द्राक्षा का लेप करके अन्दर दवाना चाहिए | अन्दर घुसी हुई जिह्वा को बाहर निकालने के लिए दूसरे व्यक्ति को उस रोगी के सम्मुख खट्टे फलों का स्वाद लेना चाहिए । नेत्रों के फैल जाने पर घृत की मालिश करके दवाना चाहिए । जवडे के बैठ जाने पर वातहर नस्य और स्वेद का प्रयोग करना चाहिए । तृष्णा आदि में यथायोग्य उपचार करना चाहिए तथा संज्ञानादा होने पर वांसुरी, वीणा एव सगीत की ध्वनि सुनानी चाहिए ॥ विरेचनातियोगे च सचन्द्रकं सलिलमधः स्रवति, ततो मांसधावनप्रकाशमुत्तरकालं जीवशोणितं च, ततो गुदनिःसरणं वेपथुर्वमनातियोगोपद्रवाश्चास्य भवन्ति; तमपि निःस्रुतशोणितविधानेनोपचरेत् निःसर्पितगुदस्य गुदमभ्यव्य परिस्वेद्यान्तः पीडयेत, क्षुद्ररोगचिकित्सितं वा वीक्षेत, वेपथौ वातव्याधिवि-धानं कुर्वीत, जिह्नानिःसरणादिपूक्तः प्रतीकार, अतिप्र-वृत्ते वा जीवशोणिते काश्मरी फलवदरीदूर्वोशीरैः शृतेन पयसा घृतमण्डाञ्जनयुक्तेन सुशीतेनास्थापयेत, न्यग्रोधादिकपायेक्षुरसघृतशोणितसंसृष्टैश्चैनं बस्तिभि-रुपाचरेत्, शोणितष्ठीवने रक्तपित्तरक्तातीसार क्रिया-श्चास्य विदध्यात्, न्यग्रोधादि चास्य विदध्यात् पान. भोजनेपु ॥ १३ ॥
विरेचन के अतियोग का वर्णन- विरेचन का अतियोग होने पर मोरपंख की चन्द्रिका के तुल्य जल बाहर निक्लता है । इसके अनन्तर मांस के धोवन के समान नीव शोणित ( शरीरेन्द्रियसश्वात्म - संयोगाश्रय रक्त ) आता है, फिर गुदभ्रश, कम्प और चमन के अतियोग वाले उपद्रव उत्पन्न होते है । इसकी चिकित्सा भी अधिक रक्तस्राव को रोकने वाली विधि के द्वारा करनी चाहिए । गुदभ्रंश होने पर गुदा में स्नेह का अभ्यङ्ग तथा स्वेदन करके अन्दर की ओर दबाना चाहिए । कम्प में वातव्याधि चिकित्सा विधि का प्रयोग करना चाहिए । जिह्नानि सरण की चिकित्सा विधि ऊपर बतलाई गई है । जीव शोणित का स्राव अधिक होने पर गम्भारी के फल, बेर, दूब और खस के द्वारा सिद्ध दूध में घी का मण्ड और सौवीराञ्जन मिला कर, शीतल करके, आस्थापन वस्ति का प्रयोग करना चाहिए । । न्यग्रोधाद्विगण के क्वाथ में गन्ने का रस, घृत और रक्त ( बकरी । का रक्त ) मिलाकर बस्तियों के द्वारा उपचार करना चाहिए । थूक के साथ रक्त निकलने पर रक्तपित्त और रक्तातिसार की भाति चिकित्सा करनी चाहिए तथा पान और भोजन में न्यग्रोधादिगण के द्रव्यों का प्रयोग करना चाहिए ॥ १३ ॥
जीवशोणितरक्तपित्तयोश्च जिज्ञासार्थं तस्मिन् पिचुं प्लोतं वा क्षिपेत्, यद्युष्णोदकप्रक्षालितमपि वत्रं रञ्जयति तज्जीवशोणितमत्रगन्तव्यं, सभकं च शुने दद्याच्छकुसमिश्रं वा, स यद्युपभुञ्जीत तज्जीवशोणित-मवगन्तव्यम्, अन्यथा रक्तपितमिति ॥ १४ ॥
जीवशोणित और रक्त - पित्त परीक्षा - जीवशोणित ( शुद्ध ) रक्त ) और रक्तपित्त की परीक्षा के लिए निकले हुए रक्त में रई या वस्त्र भिगोना चाहिए । यदि उष्ण जल से धोने पर भी वस्त्र का रंग साफ न हो तो उसे जीवशोणित समझना चाहिए । भोजन या सत्तू में उस रक्त को मिला कर कुत्ते को | देना चाहिए, यदि कुत्ता उसे सा ले तो जीवशोणित समझना चाहिए अन्यथा उसे रक्तपित्त जानना चाहिए ॥ १४ ॥
सशेपान्नेन बहुदोपेण रुचेणानिलप्राय कोप्टे नानु-ष्णमस्निग्धं वा पीतमौपघमाध्मापयति, तत्रानिल. मूत्रपुरीषसङ्गः समुन्नद्धोदरता पार्श्वभङ्गो गुडबस्तिनि-स्तोदनं भक्तारुचिश्च भवति, तं चाध्मानमित्याचक्षते; तमुपस्वेद्यानाहवतिदीपनवस्ति क्रियाभिरुपचरेत् ॥ १५ ॥
आध्मान व्यापद् का वर्णन - अन्न का समुचित परिपाक न होने वाले, बहुतोष युक्त, रुक्ष, एव वातप्रधान कोष्ट मनुष्य को स्नेहरहित शीतल औषधि पीने से आध्मान होता है । इसमें अपान वायु और मलमूत्र का अवरोध, पेट का फूलना, पार्श्वपीडा, गुढा और बत्ति में सुई चुभाने की सी वेदना तथा । भोजन से अरुचि हो जाती है । इस अवस्था को आध्मान कहते है । इसमें स्वेदन करके आनाहवर्ति ( मूत्रादि अनुलोमन क्रिया ), दीपन, लघन आदि क्रिया तथा वस्ति के द्वारा उपचार करना चाहिए ॥ १५ ॥
क्षामेणातिमृदुकोप्टेन मन्दाग्निना रूक्षेण वाऽति-तीक्ष्णोष्णातिलवणमतिरूनं वा पीतमौपथं पित्तानिलो प्रदूय परिकर्तिकामापादयति, तत्र गुदनाभिमेद्र बस्ति-शिरःसु सदाहं परिकर्तनमनिलसङ्गो वायुविष्टम्भो भक्तारुचिश्च भवति, तत्र पिच्छावस्तिर्यष्टीमधुककृष्ण-| तिलकल्कमधुघृतयुक्त, शीताम्बुपरिपिक्कं चैनं पयसा भुक्तवन्तं घृतमण्डेन यष्टीमधुकसिद्धेन तैलेन वाऽनु-वासयेत् ॥ १६ ॥
परिकर्त्तिका व्यापद् का वर्णन - क्षीण वलकाय, अतिमृदु कोष्ट, मन्दाग्नि से युक्त, रूक्ष पुरुष के अत्यन्त तीक्ष्ण, उष्ण अथवा अधिक लवणमिश्रित अति रूक्ष औषधि पीने से पित्त और वायु प्रकुपित होकर परिकर्तिका उत्पन्न कर देते हैं । इसमें गुदा, नाभि, मेढ, वस्ति और शिर में दाह के साथ कैंची से काटने के समान वेदना, अपान वायु का अवरोध, वायु की चिगुणता और भोजन में अरुचि हो जाती है । इसमें मधु, घृतं युक्त मुलेठी और काले तिल के क्ल्क के साथ पिच्छावस्ति का प्रयोग करना चाहिए और रोगी को शीतल जल से स्नान तथा दूध के साथ भोजन दे कर, घृतमण्ड अथवा मुलेठी के द्वारा सिद्ध तेल से अनुवासन वस्ति का प्रयोग करना चाहिए ॥ १६ ॥
क्रूरकोष्ठस्यातिप्रभूतदोपस्य मृद्वौपधमवचारितं समुत्किश्य दोषान्न निःशेपानपहरति, ततस्ते दोपाः परिस्रावमापादयन्ति तत्र दौर्बल्योदरविष्टम्भारुचिगा-त्रसदनानि भवन्ति, सवेदनौ चास्य पित्तश्लेष्माणौ | परिस्रवतः तं परिस्रावमित्याचक्षते; तमजकर्णघवति-निशपलाशबलाकपायैर्मधुसंयुक्तैरास्थापयेत्, उपशान्त-दोपं स्निग्धं च भूयः संशोधयेत् ॥ १७ ॥
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श्रध्यायः ३४ ] चिकित्सास्थानम् १३६ परिस्राव व्यापद का वर्णन - बहु दोषयुक्त क्रूर कोष्ट वाले मनुष्य के मृदु औषधि सेवन करने पर, वह दोषों को उत्क्लेशित कर सम्पूर्ण रूप से बाहर नहीं निकाल पाती, जिससे वे दोप परिस्राव उत्पन्न कर देते है । इसमें दुर्बलता, उदर में वायु वैगुण्य, भोजन में अरुचि और अंगों में पीड़ा होती है, वेदना के साथ पित्त और श्लेप्मा निकलता है, इस अवस्था को परिस्राव कहते हैं । इस दशा में अनकर्ण, धव, तिनिश ( स्यन्दन ), पलाश और बला ( खरेंटी ) के मधु युक्त क्वाथ के द्वारा आस्थापन वस्ति का प्रयोग करना चाहिए तथा परिस्राव के शान्त होने पर रोगी का स्नेहन करके पुनः सशोधन देना चाहिये ॥ १७ ॥
अतिरूतेऽतिस्निग्धे वा भेपजमवचारितमप्राप्तं वातवर्च उदीरयति वेगाघातेन वा तदा प्रवाहिका भवतिः नत्र सवातं सदाहं सशूलं गुरु पिच्छिलं श्वेतं कृष्णं सरक्तं वा भृशं प्रवाहमाणः कफमुपविशतिः तां परिस्रावविधानेनोपचरेत् ॥ १८ ॥
प्रवाहिका व्यापद् का वर्णन - - अतिरूद्ध या अति स्निग्ध पुरुष में प्रयुक्त औषधि, बात और मल के अप्राप्त वेगों को प्रवर्तित कर भथवा वेगों का अवरोध करके; प्रवाहिका उत्पन्न करती है । अर्थात् अत्यन्त रूक्ष पुरुष को औषधि देने पर जब वायु और मल के अप्राप्त वेग ही प्रवर्तित होते हैं तब प्रवाहिका होती है तथा अत्यन्त स्निग्ध पुरुष को जब भोपधि दी जाती है तब वेगों के अवरुद्ध होने के कारण प्रवाहिका होती है । इसमें वातसहित, दाह और शूल से युक्त, गुरु, पिच्छल, श्वेत, कृष्ण या रक्तमिश्रित बहुत अधिक कफ प्रवाहण करने पर ( मल त्याग के समय किनछने पर ) निकलता है । इसका उपचार, परिस्राव चिकित्सा विधि की भांति करना चाहिये ॥ १८ ॥
यस्तूर्ध्वमधो वा भेषजवेगं प्रवृत्तमज्ञत्वाद्विनिहन्ति तस्योपसरणं हृदि कुर्वन्ति दोपाः, तत्र प्रधानमर्मस-न्वापाद्वेदनाभिरत्यथं पीड्यमानो दन्तान् किटकिटायते, उद्गताक्षो जिह्वां खादति, प्रताम्यत्यचेताश्च भवति, तं परिवर्जयन्ति मूर्खाः; तमभ्यज्य धान्यस्वेदेन स्वेदयेत् । यष्टिमधुकसिद्धेन च तैलेनानुवासयेत्, शिरोविरेचनं चास्मै तीक्ष्णं विद्ध्यात्, ततो यष्टिमधुकमिश्रेण तण्डु-लाम्बुना छर्दयेत्, यथादोषोच्छ्रायेण चैनं बस्तिभिरु-पाचरेत् ॥ १६ ॥
ध के प्रवृत्तवेग को रोकने से उत्पन्न भवस्था का वर्णन - जो व्यक्ति अज्ञानवश ऊपर या नीचे की ओर प्रवृत्त औषध - वेग को रोकता है, उसके ( प्रकुपित हुए ) दोप हृदय में प्रवेश करते हैं । इस अवस्था में प्रधान मर्म ( हृदय ) के सन्तप्त होने से अत्यधिक वेदना से पीडित पुरुष दाँत क्टकटाता है, ऑंखे ऊपर उठ जाती हैं, जीभ काटता है, मूर्च्छित होता है और अन्त में सज्ञारहित हो । जाता है । मूर्ख लोग इसकी चिकित्सा ( मृतक समझ कर ) । नही करते । इसमें रोगी का अभ्यङ्ग करके धान्यस्वेद से स्वेदन करना चाहिये, मुलेठी से सिद्ध तेल के द्वारा अनुवासन देना चाहिए और तीक्ष्ण शिरोविरेचन का प्रयोग करना चाहिए । फिर मुलेठी मिले हुए तण्डुलोदक के द्वारा वमन कराना चाहिए तथा दोपों के प्रकोप के अनुसार बस्तियों से इसकी चिकित्सा करनी चाहिये ॥ १ ९ ॥ यस्तूर्ध्वमधो वा प्रवृत्तदोषः शीतागारमुदकमनिल-मन्यद्वा सेवेत, तस्य दोषाः स्रोतःस्वनीयमाना घनी-भावमापन्ना वातमूत्रशकृदुद्वमापाद्य विबध्यन्ते, तस्या-टोपो दाहो ज्वरो वेदनाश्च तीव्रा भवन्ति; तमाशु वामयित्वा प्राप्तकालां क्रियां कुर्वीत; अभागे Part-भागदोषहरद्रव्यं सैन्धवाम्लुमूत्रसंसृष्टं विरेचनाय पाययेत्, | आस्थापनमनुवासनं च यथादोषं विदध्यात्, यथादोष-माहारक्रमं च; उभयतोभागे तूपद्रवविशेषान् यथास्वं । प्रतिकुर्वीत ॥ २० ॥
चिबन्धव्यापद् का वर्णन -- ऊर्ध्व या अधोमार्ग से प्रवृत्त दोपों की स्थिति में जो पुरुष शीतलगृह, जल, वायु या अन्य शीतल वस्तुओं का सेवन करता है, उसके दोप स्रोतों में रुककर, घनत्व ( ठोस ) दशा को प्राप्त होते हुए वायु, मूत्र और मल को रोककर विवन्ध उत्पन्न कर देते है । इसमें रोगी को दाह, ज्वर और तीव्र वेदना होती है, उसे शीघ्र वमन देकर अवस्था के अनुसार उपचार करना चाहिए । विरेचन की अवस्था में अधोभाग के दोषों को दूर करने वाले द्रव्यों को सेन्धानमक, काञ्जी तथा गोमूत्र में मिलाकर विरेचन के लिए पिलाना चाहिए, आस्थापन तथा भनुवासन वस्ति का प्रयोग दोपों के अनुसार करना चाहिये, दोपों के अनुकूल आहार सेवन कराना चाहिए तथा दोनों भागों की प्रवृत्ति अवस्था में उपद्रव विशेष का प्रतिकार, दोपों के अनुसार करना चाहिए ॥ २० ॥
या तु विरेचने गुदपरिकर्तिका तद्वमने कण्ठक्षणनं, यधः परिस्रवणं स ऊर्ध्वभागे श्लेष्मप्रसेकः, या त्वधः प्रवाहिका सा तूर्ध्वं शुष्कोद्वारा इति ॥ २१ ॥
कतिपय वसन - विरेचन व्यापदों के अन्तर का निर्देश --विरेचन में जिस प्रकार गुदपरिकर्तिका होती है उसी प्रकार वमन में कण्ठक्षणन ( कण्ठ में जलन ) होता है, विरेचन में जो परिस्राव है वमन में वही कफप्रसेक है तथा विरेचन में जिसे प्रवाहिका कहते है वही चमन में शुष्क उद्धार कहलाता है ॥
भवति चात्र-यास्त्वेता व्यापदः प्रोक्ता दश पञ्च च तत्त्वतः ।
एता विरेकातियोग दुर्योगायोगजाः स्मृताः ॥२२ ॥
इति सुश्रुतसंहितायां चिकित्सास्थाने वमनविरेचन-व्यापचिकित्सितं नाम चतुखिशोऽध्यायः || ३४ || पूर्वोक्त व्यापदों का हेतु - जैसे कि: - तवतः ( परमार्थ रूप से ) जिन पन्द्रह प्रकार की व्यापदों का वर्णन किया गया है, वे विरेचन तथा वमन के अतियोग, मिथ्यायोग, एव हीन योग के कारण उत्पन्न होती हैं ॥ २२ ॥
इत्यायुर्वेदतत्त्व संदीपिका भाषाव्याख्यायां चतुस्त्रिंशत्तमोऽध्यायः ॥
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१४० सुतसंहिता पञ्चत्रिंशत्तमोऽध्यायः उदर, योनिशूल, शर्करा शूल, वृद्धि, उपदंश, आनाह, अथातो नेत्रबस्तिप्रमाणप्रविभागचिकित्सितं व्याख्या- मूत्रकृच्छ्र, गुल्म, वातशोणित, वात - मूत्र- मल का अवरोध, स्यामः ॥ १ ॥ उदावर्त, शुक्र आर्तव स्तन्यनाश, हृदय, हनुमन्याग्रह,
शर्करा, अश्मरी तथा मूढगर्भ प्रभृति रोगों में किया जाता है । यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥ २ ॥ भवतिचात्र-नेत्रवस्ति के प्रमाण, विभाग तथा चिकित्सा का उपक्रम-इसके अनन्तर यन्त्रबस्ति इनका प्रमाण तथा विभाग एवं
इनके द्वारा की जानेवाली व्याधि- प्रतिकार पद्धति का वर्णन किया जा रहा है, जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने ( सुश्रुत प्रभृति शिष्यों से ) कहा ॥ १-२ ॥ विमर्शः- नेत्र यन्त्रम् ( स्नेहदान साधननलिका ) । वस्तिरेणा -दीनां मूत्राधारः ( वस्तिर्नामिचर्मविशेषो मूत्रास्थानम् ) तदाधेय द्रव्यमपि, तयो. प्रमाण प्रविभागश्च, स एव चिकित्सित व्याधे प्रतीकारो यस्मिन् तत् । तत्र स्नेहादीनां कर्मणां बस्तिकर्म प्रधानतममाहु-राचार्याः । कस्मात्? अनेककर्मकरत्वाद्वस्ते; इह खलु बस्तिर्नानाविधद्रव्यसंयोगाद्दोपाणां संशोधनसंशमन-संग्रहणानि करोति, क्षीणशुक्रं वाजीकरोति, कृशं वृंह-यति, स्थूलं कर्शयति, चक्षुः प्रीणयति, वलीपलित-महन्ति, वयः स्थापयति ॥ ३ ॥
वस्ति की प्रशसा – आचार्य लोग स्नेहन आदि कमों में वस्तिकर्म को मुख्यतम मानते है । क्योंकि वस्ति अनेक कार्यों को सिद्ध करती है । नाना प्रकार के द्रव्यों के संयोग से वस्ति दोषों का सशोधन, संशमन और संग्रहण करती है, क्षीण शुक्र पुरुष को बाजी अर्थात् शुक्रवान् बनाती है, कृश को पुष्ट करती है, स्थूल को दुर्बल करती है, नेत्रों को शक्ति देती है, वली- पलित रोगों का नाश करती है और आयु को बढ़ाती है ॥ ३ ॥
शरीरोपचय वर्णं बलमारोग्यमायुषः ।
कुरुते परिवृद्धि च बस्तिः सम्यगुपासित ॥ ४ ॥
भली भांति सेवन की गई ' वस्ति शरीर की पुष्टि, वर्ण, वल, आरोग्य और आयुष्य की वृद्धि करती है ॥ ४ ॥
विमर्श: - चिकित्सा में चरक ने वस्ति के महत्व को निम्नलिखित शब्दों मे व्यक्त किया है - शाखागता कोष्ठगताश्च रोगा मर्मार्व्वसर्वावयव गताश्च । ये सन्ति तेषा न तु कश्चिदन्यो वायो ' पर जन्मनि हेतुरस्ति । विण्मूत्रपित्तादिमलाशयानां विक्षेप -सघानकर • स यस्मात् । तस्यातिवृद्धस्य शमाय नान्यद् वस्तेर्विना भेषजमस्ति किश्चित् । तस्माश्चिकित्सार्द्धमिति ब्रुवन्ति सर्वा चिकित्सा मपि बस्तिमेके ॥ ( च ० कल्प ० अ ० १ ) तथा ज्वरातीसारतिमिरप्रतिश्यायशिरोरोगाधिम-न्थादिताक्षेपकपक्षाघातैकाङ्गसर्वाङ्ग रोगाध्मानोदरयोनि शूलशर्कराशूलवृद्ध्युपदशानामूत्रकृच्छ्रगुल्मवातशोणि-तथातमूत्रपुरीपोदावतेशुक्रार्तवस्तन्यनाशहद्धनुमन्याग्रह -शर्कराश्मरीमूढगर्भप्रभृतिषु वस्ति साध्य रोग - यस्ति चात्यर्थमुपयुज्यते ॥ ५ ॥
अतिसार, तिमिर, प्रतिश्याय, शिरोरोग का विशेष प्रयोग ज्वर आक्षेपक, पक्षाघात, एकाङ्गवात, अधिमन्थ, अर्दित, , सर्वाङ्गवात, आध्मान,
बस्तिर्वाते च पित्ते च कफे रक्ते च शस्यते ।
संसर्गे सन्निपाते च बस्तिरेव हितः सदा ॥ ६ ॥
जैसे कि वात, पित्त कफ, रक्त, दोपों के संसर्ग ( प्रकोप ) तथा सन्निपात ( त्रिदोषज संसर्ग ) में वस्ति प्रयोग ही सर्वदा हितकर होता है ॥ ६ ॥
तत्र सांवत्सरिकाष्टद्विरष्टवर्पाणां पडष्टदशाङ्गुलप्रमा णानि कनिष्ठिकानामिकामध्यमाङ्गुलिपरिणाहान्यग्रेऽ-यलयलार्ध तृतीयाङ्गुलसन्निविष्टकर्णिकानि कङ्क-श्येन बर्हिण पक्षनाडी तुल्यप्रवेशानि मुद्गमाषकलायमात्र-स्रोतांसि विदध्यान्नेत्राणि | तेपु चास्थापनद्रव्यप्रमाण-मातुरहस्तसंमितेन प्रसृतेन संमितौ प्रसृतौ द्वौ चत्वारो-| ऽष्टौ च विधेयाः ॥ ७ ॥
वस्ति नेत्र का प्रमाण - एक, आठ तथा सोलह वर्ष की आयु के लिए क्रमशः है, आठ और दश अंगुल लम्बी, कनिष्ठिका, अनामिका और मध्यमा अंगुलि के समान मोटी अग्रभाग में डेढ अंगुल, दो अंगुल और साढे तीन अंगुल दूरी पर कर्णिकासहित तथा मूल में कंक, श्येन ( बाज ) और मोर के पत्र की नाडी की भांति प्रवेश द्वार वाली एव मूग, उडद और मटर प्रमाण अग्र छिद्र युक्त नेत्रों का निर्माण करना चाहिये । उनमें क्रमशः आतुर की हस्त प्रमाण अञ्जलि से दो, चार और भाठ भञ्जलि आस्थापन द्रव्य की मात्रा रखनी चाहिए ॥ ७ ॥
विमर्श:: - -- तत्र सावत्सरिकाष्टद्विरष्टवर्षाणामित्यत्र यथासख्य-व्याख्यानेन सावत्सरिकवालस्य निरूहयन्त्र पडगुलप्रमाणम्, तत्कनिष्ठिका परिणाहम्, अग्रेऽध्यर्द्धाङ्गुलसन्निविष्टकणिक, कङ्कपक्ष नाडीतुल्यप्रवेश मूले, मुद्गवा हिस्रोतश्चाग्रे विदध्यात् । छत्राकारा गुदेऽधिकान्त प्रदेशरोधिनी कर्णिका कथ्यते । कङ्क वक्रचक्षु. कृष्णवर्णं प्रसिद्ध एव । अष्टवर्षस्य पुनरष्टाङ्गुलप्रमाण, तदनामिका-परिणाहम्, अग्रे ढयङ्गुलसन्निविष्टकर्णिक, श्येनपक्षनाडीतुल्य-प्रवेश मूले, मापवाहिस्त्रोतश्चाभे विदध्यात् । द्विरष्टवर्षस्य पोटशवर्षं -स्येत्यर्थः । किम्भूत यन्त्रम्, दशाङ्गुलप्रमाण, तन्मध्याङ्गुलिपरिणाह, अद्भुतृतीयाङ्गुलसन्निविष्टकणिकम् । वर्दिणो मयूर, तत्पक्षनाडी-प्रवेश मूले, कलायवा हिस्रोतश्चाग्रे विदध्यात् । तेष्विति सावत्सरि काष्टद्विरष्टवर्षेषु बालेषु यथासख्यमातुरहस्तेन द्वौ चत्वारोऽष्टौ च प्रसृता विधेयाः । प्रसृतोऽत्र कुञ्चिताङ्गुलि ' पाणि, ननु पलद्वय-मिति गयदासाचार्य । जेज्जटाचार्यंस्तु आतुरहस्तग्रहण मध्यमपुरुष-हस्तोपलक्षणम्, तेन तत् प्रसृतेन पलद्वयप्रमितेनेति ब्याख्यानयति । ( ढल्हण )
वर्षान्तरेपु नेत्राणां बस्तिमानस्य चैव हि ।
वयोबलशरीराणि समीक्ष्योत्कर्पयेद्विधिम् ॥ ८ ॥
बीच के वर्षों में ( उपर्युक्त आयु के अतिरिक्त ) नेन्नों का
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श्रध्यायः ३५ ] चिकित्सास्थानम् १४१ प्रमाण तथा वस्ति द्रव्य की मात्रा वय, वल और शरीर की भली भाँति परीक्षा करके बढ़ा लेनी चाहिए ॥ ८ ॥
पञ्चविंशतेरुध्वं द्वादशाङ्गुलं, मूलेऽङ्गुष्ठोदरपरीणा-हम्, अग्रे कनिष्ठिकोदरपरीणाहम्, अग्रे ग्यङ्गुलसन्नि-विष्टकर्णिक, गृध्रपक्षनाडीतुल्यप्रवेशं, कोलास्थिमात्र -च्छिद्र, किन्नकायमात्रच्छिद्रमित्येके; सर्वाणि मूले वस्तिनिबन्धनार्थं द्विकर्णिकानि । आस्थापनद्रव्यप्रमाणं तु बिहितं द्वादशप्रसृताः । सप्ततेस्तूर्ध्वं नेत्रप्रमाणमेतदेव, द्रव्यप्रमाणं तु द्विरवर्णवत् ॥ १ ॥
पच्चीस वर्ष से ऊपर की आयु के लिए बारह अङ्गुल लम्बी, मूल में अंगुष्ठोदर प्रमाण मोटी, अग्रभाग में कनिष्ठि-कोदर प्रमाण मोटी तथा अग्रभाग में तीन अंगुल दूरी पर कर्णिका सहित, गृद्धपक्षी को नाडी के समान मूल में प्रवेश द्वार वाली, बेर की गुठली के तुल्य अग्रभाग में छिद्र से युक्त, किन्हीं आचायों के मत से फूले हुए मटर के तुल्य अग्रभाग में छिद्रयुक्त एवं सभी नेत्रों के वस्ति को बाँधने के लिए दो कर्णिका होनी चाहिए । इनमें आस्थापन द्रव्य चारह प्रसृत ( अञ्जलि ) होना चाहिए । सत्तर वर्ष से ऊपर की आयु में नेत्र का प्रमाण इतना ही होना चाहिए पर द्रव्य प्रमाण सोलह वर्ष की आयु के तुल्य होना चाहिए ॥ ९ ॥
मृदुर्वस्तिः प्रयोक्तव्यो विशेपाद्वालवृद्धयोः ।
तयोस्तीक्ष्णः प्रयुक्तस्तु वस्तिर्हि स्याद् बलायुपी ॥ १० ॥
चालक और वृद्धों को बस्ति में विशेषता - चालक और वृद्ध के लिए विशेषरूप से मृदु बस्ति का प्रयोग करना चाहिए क्योंकि इस अवस्था में तीग वस्ति का प्रयोग बल और आयुष्य को नष्ट करता है ॥ १० ॥
( व्रणनेत्रमष्टाङ्गुलं मुद्गवाहिस्रोतः; व्रणमवेक्ष्य यथास्वं स्नेहकपाये विदधीत ॥ ११ ॥ )
त्रण नेत्र के लक्षण —त्रण नेत्र की लंबाई आठ भगुरू और स्रोत मूंग की आकृति का होना चाहिए तथा ऋण की परीक्षा करके दोषों के अनुसार स्नेह एवं कृपायों का प्रयोग करना चाहिए ॥ ११ ॥
तत्र नेत्राणि सुत्रर्णरजतताम्रायोरीतिदन्तशृङ्गमणि -तरुसारमयानि श्लक्ष्णानि दृढानि गोपुच्छाकृतीन्यू जूनि गुटिकामुखानि च ॥ १२ ॥
वस्तिनेत्र के निर्माण द्रव्यों और आकृतियों का निर्देश -नेत्र सुवर्ण, रजत, ताम्र, लौह, पित्तल, दन्त, श्रृंग, स्फटिक और वृक्ष के सार भाग से निर्मित तथा चिकने, हद, गौ की पूँछ की आकृतिवाले, सीधे और गोलमुख से युक्त होने चाहिए ॥ १२ ॥
वस्तयश्च बन्ध्या मृढ़वो नातिबहला दृढाः प्रमाण वन्तो गोमहिषवराहा जोरभ्राणाम् ॥ १३ ॥
वस्ति के निर्माण द्रव्य - वस्तियों का निर्माण बन्ध्या गौ, भैंस, सुअर, बकरी और भेंड़ की बस्तियों के द्वारा करना चाहिए, जो कोमल हों, बहुत मोटी न हों तथा दृढ और प्रमाण युक्त हों ॥ १३ ॥
नेत्रालाभे हिता नाडी नलवंशास्थिसंभवा ।
वस्त्यलाभे हितं चर्म सूक्ष्मं वा तान्तवं घनम् ॥ १४ ॥
नेत्र के अभाव में नरसल, बाँस या अस्थि की बनी हुई नली हितकर होती है और वस्ति के अभाव में पतला चमड़ा अथवा गाढ़ा वस्त्र उपयोगी होता है ॥ १४ ॥
वस्ति निरुपदिग्ध तु शुद्धं सुपरिमार्जितम् ।
मृद्वनुद्धतहीनं च मुहुः स्नेहविमर्दितम् ॥ १५ ॥
नेत्रमूले प्रतिष्ठाप्य न्युब्जं तु विवृताननम् ।
बद्ध्वा लोहेन तप्तेन चर्म स्रोतसि निर्दहेत् ॥१६ ॥
वस्ति निर्माण की प्रक्रिया -मांस रक्त आदि से रहित, शुद्ध ( कपायरक्षित ), भली - भाँति स्वच्छ की हुई, कोमल, न तो बडी और न छोटी, अनेक बार स्नेह से मर्दित, फैले हुए मुखवाली अधोमुखी वस्ति को नेत्र के मूल में जोढकर | बाँधना चाहिए और तप्त लोह शलाका से उस वस्ति धर्म के छिद्र को जला देना चाहिए ॥ १५-१६ ॥
परिवर्त्य ततो बस्ति बद्ध्वा गुमं निधापयेत् ।
आस्थापनं च तैल च यथावत्तेन दापयेत् ॥ १७ ॥
वस्ति को फिर उलट कर तथा बाँधकर सुरक्षित स्थान । में रखना चाहिए और इसके द्वारा विधिपूर्वक आस्थापन ( निरूह ) एवं तैल बस्तियों का प्रयोग करना चाहिए ॥१७ ॥
तत्र द्विविधो वस्तिः -- नैरूहिकः, स्नैहिकश्च । आस्थापनं, निरूह इत्यनर्थान्तरं तस्य विकल्पो माधु-| तैलिकः तस्य पर्यायशब्दो यापनो युक्तरथः, सिद्धबस्ति-रिति । स दोपनिर्हरणाच्छरीरनीरोहणाद्वा निरूहः, | वयःस्थापनादायुः स्थापनाद्वा आस्थापनम् । माधुतैलिक-विधानं च निरूहोपक्रमचिकित्सिते वक्ष्यामः । यथा-प्रमाणगुणविहितः स्नेहवस्तिविकल्पोऽनुवासनः पादाव ( प ) कृष्ट: । अनुवसन्नपि न दुष्यत्यनुदिवसं वा दीयत इत्यनुवासनः । तस्यापि विकल्पोऽर्धार्धमात्रावकृष्टोऽ-परिहार्यो मात्रावस्तिरिति ॥ १८ ॥
वस्ति के भेद - वस्ति दो प्रकार की होती है- ( १ ) नैहिक और ( २ ) स्नैहिक । आस्थापन और निरूह एकार्थवाचक शब्द हैं । माधुर्तलिक और यापन, युक्तरथ तथा सिद्धवस्ति इसके पर्यायवाचक शब्द है । दोषों को निकालने अथवा शरीर का रोहण ( वृद्धि ) करने के कारण इसे निरूह कहते है तथा वय ( वल? ) । या आयु को स्थिर रखने से यह भास्थापन कहलाती है । माधुतैलिक वस्ति का विधान निरुहक्रम चिकित्सित अध्याय में किया जा रहा है । अपने प्रमाण और गुण के अनुसार कथित, आस्थापन से चतुर्थांश मात्रा वाली अनुवासन बस्ति, स्नेह वस्ति का भेद है । शरीर में रुकी रहने पर भी जो दूषित नहीं होती अथवा प्रतिदिन जिसका प्रयोग किया जाय उसे अनुवासन कहते है । इस अनुवासन | वस्ति का भेद मात्रा वस्ति है, जो डेढपल प्रमाण मात्रा वाली तथा निरुपद्रव होती है ॥ १८ ॥
विमर्श -यस्य यत् प्रमाण यो यो गुणस्ताभ्यां विहितः लेह-वस्त्याख्योऽनुवासनस इत्यर्थः । यथावच इत्यादि वक्ष्यमाण-
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१४२ सुश्रुतसंहिता वाक्यदर्शनात् आस्थापनस्य पादैस्त्रिभिरवकृष्टो होन ' पादावकृष्टः । अयमर्थ - नावत्सरिकादि कालापेक्ष यत् प्रकुनादि चतुर्विंशतिपलाव सान निरूहप्रमाण तच्चतुर्थीशेन कर्षमारभ्य पट्पलानि यावदनुवास नस्य प्रमाणमिति । तस्याप्यनुवासनस्य पट्पलप्रमाणस्यार्द्धार्द्धमात्रा वकृष्ट ' पादावशिष्टोऽध्यर्द्धपलमात्र इत्यर्थ । ( डल्हण ) निरूहः शोधनो लेखी स्नैहिको बृंहणो मतः ।
निरूहशोधितान्मार्गान् सम्यक् स्रेहोऽनुगच्छति ।
अपेतसर्वदोषासु नाडीष्विव वहन्जलम् ॥१६ ॥
सर्वदोषहरश्चासौ शरीरस्य च जीवनः ।
तस्माद्विशुद्धदेहस्य स्नेहवस्तिर्विधीयते ॥२० ॥ ।
विशुद्ध ढेह में ही स्नेहवस्ति विधान का निर्देश -निरुहवस्ति शोधन और लेखन करती है तथा स्नैहिक वस्ति बृंहण होती है । निरूहवस्ति से शुद्ध हुए मार्गों में स्नेह भली - भाँति उसी प्रकार पहुँचता है जिस प्रकार सर्वविध दोषरहित ( कूड़े, करक्ट या अन्य बाधा से रहित ) नाली में जल पहुँचता है । वस्तियाँ ( निरूह और अनुवासन ) सम्पूर्ण दोपों को दूर करने वाली तथा शरीर के लिए प्राण होती है, अतः शुद्ध शरीर वाले व्यक्ति के लिए ही स्नेहवस्ति का विधान करना चाहिए ॥१ ९ -२० ॥ तत्रोन्मादभयशोकपिपासारोच काजीर्णार्श पाण्डुरो गभ्रममदमूर्च्छाच्छर्दिकुष्टमेहोदरस्थौल्यश्वासकासक • ण्ठशोपशोफोपसृष्टक्षतक्षीणचतुखिमासगर्भिणी दुर्बला-ग्न्यसहा बालवृद्धौ च वातरोगाहते क्षीणा नानुवास्या नास्थापयितव्याः ॥ २१ ॥
वस्ति कर्म के अयोग्य मनुष्य - उन्माद, भय, शोक, पिपासा, अरोचक, अजीर्ण, अर्श, पाण्डुरोग, भ्रम, मद, मूर्च्छा, छर्टि, कुष्ठ, मेह, उदर, स्थौल्य, श्वास, कास, कण्ठशोष, शोथ तथा उर.क्षत से युक्त कृश, सात मास की गर्भिणी, दुर्बल अग्नि वाले, असहिष्णु बालक, वृद्ध एवं वातरोग के अतिरिक्त अन्य कारणों से क्षीण पुरुषों को, अनुवासन और निरूहण बस्तियाँ नहीं देनी चाहिए ॥
उदरी च प्रमेही च कुष्ठी स्थूलश्च मानवः ।
अवश्यं स्थापनीयास्ते नानुवास्याः कथञ्चन ॥ २२ ॥
रोग विशेष में केवल स्थापन का निर्देश - उदर, प्रमेह और कुष्ठ से पीडित तथा स्थूल मनुष्य को अनुवासन वस्ति अवश्य देनी चाहिए किन्तु इनके लिए निरूह वस्ति का प्रयोग कभी नहीं करना चाहिए ॥ २२ ॥
असाध्यता विकाराणां स्यादेपामनुवासनात् ।
असाध्यत्वेऽपि भूयिष्ठं गात्राणां सदनं भवेत् ॥२३ ॥
अनुवासन प्रयोग से इनमें हानि - इन रोगों से पीड़ित
मनुष्यों को अनुवासन देने से व्याधियाँ असाध्य हो जाती ।
हैं, असाध्य अवस्था में भी अंगों में पीड़ा अधिक होती है ॥२३ ॥
पक्काशये तथा श्रोण्यां नाभ्यधस्ताच्च सर्वत. ।
सम्यक्प्रणिहितो बस्ति ' स्थानेष्वेतेषु तिष्ठति ॥ २४ ॥
वस्ति द्वारा सर्वांगगत दोषों के हरण का निर्देश-मटी - भाँति प्रयुक्त बस्ति पकाशय, कटिप्रदेश और नामि के अधोभाग में चारों ओर टहरती है ॥ २४ ॥
पकाशयाद्वस्तिवीर्यं खैर्देहमनुसर्पति 1 वृक्षमूले निषिक्तानामपां वीर्यमिव द्रुमम् ॥ २७ ॥
पक्वाशय से वस्ति का वीर्य ( प्रभाव ) स्रोतों के द्वारा सम्पूर्ण शरीर में उसी प्रकार फैल जाता है, जिस प्रकार वृक्ष की जड़ में सींचे गए जल की शक्ति सम्पूर्ण वृक्ष में फैल जाती है ॥ २५ ॥
स चापि सहसा वस्तिः केवलः समलोऽपि वा ।
प्रत्येति वीर्यं त्वनिलैरपानाद्यैर्विनीयते ॥२६ ॥
वह वस्ति भी केवल या मल के साथ सहसा बाहर निकल आती है किन्तु उसकी शक्ति अपान, उदान और व्यान आदि के द्वारा सम्पूर्ण शरीर में पहुँच जाती है ॥ २६ ॥
वीर्येण बस्तिरादत्ते दोपानापादमस्तकात् ( न् ) ।
पक्काशयस्थोऽम्बरगो भूमेरर्को रसानिव ॥ २७ ॥
पक्वाशयस्थ वस्ति अपनी शक्ति से शिर से पैर तक के सम्पूर्ण दोषों को उसी प्रकार ग्रहण करती है जिस प्रकार आकाश में रहने वाला सूर्य भूमि से रसों को खींचता है ॥२७ ॥
कटीपृष्ठको स्थान् वीर्येणालोड्य संचयान् ।
उत्खातमूलान् हरति दोषाणां साधुयोजितः ॥ २८ ॥
भली भाँति प्रयुक्त वस्ति अपनी शक्ति से कटि, पृष्ठ और कोष्ठ में संचित दोषों को हिलाकर जड सहित उखाड " कर दूर करती है ॥ २८ ॥
दोषत्रयस्य यस्माच्च प्रकोपे वायुरीश्वरः ।
तस्मात्तस्यातिवृद्धस्य शरीरमभिनिन्नतः ॥२६ ॥
वायोर्विषहते वेगे नान्या वस्तेर्ऋते क्रिया ।
पवनाविद्धतोयस्य वेला वेगमिवोदधेः ॥ ३० ॥
वात प्रकोप के प्रशमन में वस्ति की प्रधानता- - चूँकि तीनों दोपों को प्रकुपित करने में स्वामी वायु होता है, इसलिए शरीर को हानि पहुँचाने वाले, अत्यधिक बढ़े हुए उस वायु के वेग को विशेषरूप से सहन करने में बस्ति, अन्य क्रियाओं की अपेक्षा, उसी प्रकार समर्थ होती हैं जिस प्रकार पवन के द्वारा प्रताडित जल के वेग को समुद्र का कूल ( किनारा ) सहन करता है ॥ २ ९ -३० ॥
शरीरोपचयं वर्ण बलमारोग्यमायुषः ।
कुरुते परिवृद्धि च बस्तिः सम्यगुपासितः ॥३१ ॥
भली भाँति सेवन की गई बस्ति शरीर की पुष्टि, वर्ण, वल, आरोग्य और आयुष्य की वृद्धि करती है ॥ ३१ ॥
अत ऊर्ध्व व्यापदो वक्ष्यामः । तत्र नेत्र विचलितं, विवर्तितं पार्श्वावपीडितम्, अत्युत्क्षिप्तम्, अवसन्नं, तिर्यक्प्रक्षिप्तमिति षट् प्रणिधानदोषाः कर्कशम्, अवनतं, अणुभिन्नं, सन्निकृष्टविप्रकृष्टकणिकं, सूक्ष्मातिच्छिद्रम्, अतिदीर्घम्, अतिह्रस्वम्, अखि मदित्येकादश नेत्रदोषाः; बहलता, अल्पता, सच्छिद्रता, प्रस्तीर्णता, दुर्बद्धतेति पञ्च वस्तिदोषाः, अतिपीडितता, शिथिलपीडितता, भूयो भूयोऽवपीडनं, कालातिक्रम इति यत्वारः पीडनदोषा '; आमता, हीनता, अतिमात्रता, अतिशीतता, अत्युष्णता, अतितीक्ष्णता, अतिमृदुता,
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श्रध्यायः ३५-३६ ] चिकित्सास्थानम् १४३ अतिस्निग्धता, अति रूक्षता, अतिसान्द्रता, अतिद्रवता, इत्येकादश द्रव्यदोपाः; अवाक्शीपच्छीर्षन्युजोत्तान-सङ्कुचितदेहस्थित दक्षिणपार्श्वशायिनः प्रदानमिति सप्त शय्यादोपाः एवमेताञ्चतुश्चत्वारिंशव्यापदो वैद्यनिमित्ताः आतुरनिमित्ताः पञ्चदश आतुरोपद्रवचिकित्सिते वच्यन्ते स्नेहस्त्वष्टभिः कारणैः प्रतिहतो न प्रत्यागच्छति त्रिभिर्दोषैः, अशनाभिभूतः, मलव्यामिश्रः, दूरानुप्रविष्ट, ( २ ) आध्मान ( ३ ) परिकर्तिका ( ४ ) परिस्राव ( ५ ) प्रवाहिका ( ६ ) हृदयोपसरण ( ७ ) अङ्ग प्रग्रह अतियोग और ( ९ ) जीवादान ये नौ व्यापद वैद्य के द्वारा उत्पन्न होते हैं ॥ ३२ ॥
भवति चात्र-पट्सप्ततिः समासेन व्यापदः परिकीर्तिताः ।
तासां वक्ष्यामि विज्ञानं सिद्धिं च तदनन्तरम् ॥ ३३ ॥
अस्विन्नरय, अनुष्णः, अल्पम्भुक्तवतः, अल्पश्चेति । इति श्रीसुश्रुतसंहितायां चिकित्सास्थाने नेत्रवस्तिप्रमा-वैद्यातुरनिमित्ता भवन्ति । अयोगस्तूभयोः, आध्मानं, परिकर्तिका, परिस्रावः, प्रवाहिका, हृदयोपसरणम्, अप्रग्रहः, प्रतियोगः, जीवादानमिति नव व्यापदो वैद्यनिमित्ता भवन्ति ॥ ३२ ॥
यति की व्यापत्तियों का निर्देश - इसके अनन्तर वस्ति के दोषों का वर्णन किया जा रहा है । ( १ ) नेत्र का विशेष हिलना ( २ ) प्रविष्ट होते ही मुड जाना ( ३ ) दक्षिण और वाम पार्श्वो का दबना ( ४ ) अत्यधिक ऊपर उठना ( ५ ) नीचे को दवना और ( ६ ) तिरछा प्रविष्ट करना ये है दोष वस्ति - प्रयोग के है | ( 1 ) बहुत मोटा ( २ ) खुरदरा ( ३ ) नीचे को झुका होना ( ४ ) परमाणुओं का भिन्न होना, ( ५ ) समीप कर्णिका युक्त ( ६ ) दूर कर्णिका युक्त ( ७ ) errete छोटे for वाला ( ८ ) बहुत बडे छिद्र वाला ( ९ ) बहुत लम्बा ( १० ) बहुत छोटा और ( ११ ) किनारे से युक्त वे ग्यारह नेत्र के दोष हैं । ( १ ) मांस सहित होना, ( २ ) छोटी होना, ( ३ ) छिद्र युक्त होना, ( ४ ) स्नायु जाल से युक्त होना और ( ५ ) भली - भाँति न बाँधने वाली । होना ये पाँच यस्ति के दोष हैं । ( १ ) अधिक दचना ( २ ) कम दवना ( ३ ) बार बार दवना और ( ४ ) पीड़न का का अतिक्रमण करना ये चार वस्ति को दबाने के दोष हैं । ( १ ) अपक्क स्नेह, ( २ ) अल्प होना, ( ३ ) अधिक होना, ( ४ ) अत्यन्त शीतल होना, ( ५ ) अत्यधिक उष्ण होना, ( ६ ) अत्यन्त तीचग होना, ( ७ ) अत्यन्त मृदु होना, ( 2 ) अत्यन्त स्निग्ध होना, ( ९ ) अत्यन्त रूक्ष होना, ( १० ) अत्यधिक गाढ़ा होना, और ( ११ ) अत्यधिक द्रव होना ये ग्यारह द्रव्य के दोष है । ( १ ) शिर नीचे रखना ( २ ) शिर ऊँचा रखना, ( ३ ) पेट के बल लिटाना, ( ४ ) चित्त लिटाना, ( ५ ) शरीर सिकोड़ कर रखना, ( ६ ) बैठे रहना और ( ७ ) दाहिने पसवाडे से सोये हुए को वस्ति देना, ये सात शय्या दोष हैं । उपर्युक्त ये चौवालीस दोष चिकित्सक के द्वारा उत्पन्न होते है । आतुर के द्वारा उत्पन्न होनेवाले पन्द्रह प्रकार के उपद्रवों का वर्णन आतुरोपद्रव चिकित्सित अध्याय में किया जा रहा है । आठ कारणों के द्वारा रुका हुआ स्नेह पुन ' वापस नहीं आता । ( १ ) तीनों दोषों के कारण ( २ ) भोजन के द्वारा दवाये जाने से ( ३ ) मल के मिश्रण से ( ४ ) दूर प्रविष्ट हो जाने से ( ५ ) स्वेदन के बिना प्रयुक्त होने से । ( ६ ) शीतल होने से ( ७ ) आहार नहीं करने से तथा ( ८ ) अल्प आहार करने से । ये दोष वैद्य और आतुर दोनों के द्वारा उत्पन्न होते हैं । ( १ ) दोनों वस्तियों का अयोग प्रविभाग चिकित्सितं नाम पञ्चत्रिंशोऽध्यायः ॥ ३५ ॥
जैसे कि -- सक्षेप से छिहत्तर व्यापदों का वर्णन किया गया है, प्रथम इनका लक्षण तदनन्तर उनकी चिकित्सा का वर्णन किया जा रहा है ॥ ३३ ॥
इत्यायुर्वेदतत्वसंदीपिका भाषाव्याख्यायां पञ्चत्रिंशत्तमोऽध्यायः ॥ -000500-पत्रिंशत्तमोऽध्यायः अथातो नेत्रवस्तिव्यापञ्चिकित्सितं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥ २ ॥
नेत्रवस्ति व्यापचिकित्सा का उपक्रम - इसके अनन्तर नेत्र और वस्ति के दोष से उत्पन्न होने वाली व्यापदों की चिकित्सा का वर्णन किया जा रहा है, जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने ( सुश्रुत प्रभृति शिष्यों से ) कहा ॥ १-२ ॥
अथ नेत्रे विचलिते तथा चैव विवर्तिते ।
गुदे क्षतं रुजा वा स्यात्तत्र सद्य क्षतक्रियाः ॥३ ॥
नेत्र प्रणिधान व्यापद् का वर्णन एवं उसकी चिकित्सा--वस्ति प्रयोग के समय नेत्र के हिलने तथा अन्दर प्रविष्ट होकर मुड जाने से गुदा में क्षत या वेदना होती है, उसमें सद्यःक्षत क्रिया विधि का प्रयोग करना चाहिए ॥ ३ ॥
अत्युत्क्षिप्ते वसन्ने च नेत्रे पायौ भवेद्रुजा ।
fafarart पित्तन्नः कार्यः स्नेहैश्च सेचनम् ॥ ४ ॥
नेत्र के अधिक ऊपर उठे होने तथा नीचे दबे होने के कारण गुदा में पीडा होती है, इसमें पित्तनाशक क्रियाविधि का प्रयोग तथा स्नेह से परिपेक करना चाहिए ॥ ४ ॥
तिर्यक्प्रणिहिते नेत्रे तथा पार्श्ववपीडिते ।
मुखस्यावरणाद्वस्तिर्न सम्यक् प्रतिपद्यते ।
ऋजु नेत्रं विधेयं स्यात्तत्र सम्यग्विजानता ॥ ५ ॥
नेत्र तिरछा प्रविष्ट होने तथा उभय पार्श्व के दबने से नेत्र-मुख के अवरुद्ध हो जाने के कारण, वस्ति का प्रयोग भली भांति नहीं होता । इसलिये कुशल चिकित्सक को नेत्र का प्रयोग सीधा करना चाहिये ॥ ५ ॥
अतिस्थूले कर्कशे च नेत्रेऽस्त्रिमति घर्षणात् ।
गुदे भवेत् क्षतं रुक् च साधनं तस्य पूर्ववत् ॥६ ॥
व्याप का वर्णन और उसकी चिकित्सा - बहुत
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१४४ सुश्रुतसंहिता मोटे और खुरदरे तथा किनारेदार नेत्र के प्रयोग से गुदा में रगड लगने के कारण व्रण एवं वेदना हो जाती है, इसकी
चिकित्सा पूर्ववत् सद्यःक्षत चिकित्साविधि के अनुसार ।
करनी चाहिये ॥ ६ ॥
आसन्नकर्णिके नेत्रे भिन्नेऽणौ वाऽप्यपार्थकः ।
अवसेको भवेद्वस्तेस्तस्माद्दोषान् विवर्जयेत् ॥७ ॥
नेत्रमूल में कर्णिका के अत्यन्त समीप रहने तथा परमाणुओं के भिन्न रहने पर वस्तिदान व्यर्थं होता है क्योंकि वस्ति में से द्रव्य चूता है, इसलिए इन दोषों से युक्त वस्ति का परित्याग करना चाहिए ॥ ७ ॥
प्रकृष्टकर्णिके रक्तं गुदमर्मपीडनात् ।
क्षरत्यत्रापि पित्तघ्नो विधिर्वस्तिश्च पिच्छिलः ॥ ८ ॥ ।
कर्णिका के नेत्रमूल में दूर ( तीन अड्डुल से ऊपर चार अड्डुल की दूरी पर ) स्थित होने पर गुदाम के पीडित होने से रक्तस्राव होता है, इसमें भी पित्तनाशक क्रिया विधि तथा पिच्छावस्ति का प्रयोग करना चाहिए ॥ ८ ॥
स्वे वस्रोतसि च क्लेशो वस्तिश्च पूर्ववत् ।
प्रत्यागच्छस्तत ' कुर्याद्रोगान् बस्तिविघातजान् ॥ ६ ॥
प्रमाणहीन एव सूक्ष्म छिद्र वाले नेत्र के प्रयोग से क्लेश । होता है तथा पूर्ववत् वस्ति व्यर्थं होती है, एवं बस्ति के
वापस लौटने के कारण बस्ति को पीडित करने वाले ( मूत्रा- ।
घात, मूत्रकृच्छू आदि ) रोगों की उत्पत्ति होती है ॥ ९ ॥
दीर्घे महास्रोतसि च ज्ञेयमत्यवपीडवत् ।
प्रस्तीर्णे बहले चापि वस्तौ दुर्बद्धदोषवत् ॥ १०॥ ।
वस्तिदप व्यापद् का वर्णन और उसकी चिकित्सा - बहुत लम्बे और वहुत बडे छिद्र वाले नेत्र का प्रयोग करने से यस्ति को अत्यधिक दवाने वाले दोपों की भांति लक्षण होते हैं । वस्ति के स्नायुजाल से युक्त तथा अधिक मोटी होने पर कठिनाई से बँधने वाले दोष होते है ॥ १० ॥
बस्तावल्पेऽल्पता वाऽपि द्रव्यस्याल्पा गुणा मताः ।
दुर्वद्धे चाभिन्ने च विज्ञेयं भिन्ननेत्रवत् ॥११ ॥
बस्ति के छोटी होने पर उसमें अल्प द्रव्य आता है, इससे
गुण में भी कमी रहती है और दुर्वद एवं अणुभिन्न ( फटी ।
रहने पर ) होने से भिन्न नेत्र के समान लक्षण होते हैं ॥११ ॥
अतिप्रपीडितो वस्तिः प्रयात्यामाशय तत. ।
वातेरितो नासिकाभ्यां मुखतो वा प्रपद्यते ॥ १२ ॥
तत्र तूर्णं गलापीडं कुर्याञ्चाप्यवधूननम् ।
शिरः कायविरेकौ च तीच्णौ सेकांश्च शीतलान् ॥१३ ॥
बस्तिपीडन टोप व्यापद् का वर्णन और उसकी चिकित्सा -अधिक दबाव देकर प्रयोग की गई वस्ति आमाशय में पहुँचती है और वहाँ वायु से प्रेरित होकर नासिका या मुख से बाहर निकलती है । इस अवस्था में रोगी के गले को शीघ्र दवाना और केश आदि को पकडकर हिलाना चाहिए । तथा तीच्ग शिरोविरेचन और कायविरेचन एवं शीतल परिपेक करना चाहिये ॥ १२-१३ ॥
शनैः प्रपीडितो बस्तिः पक्काधानं न गच्छति ।
न च सपादयत्यर्थं तस्माद्युक्तं प्रपीडयेत् ॥ १४ ॥ ।
धीरे से दवाई गई बस्ति पक्वाशय में नहीं पहुँचती जिससे कार्य का सम्पादन नहीं होता, इसलिए वस्ति को उचित रूप से दवाना चाहिए ॥ १४ ॥
भूयो भूयोऽवपीडेन वायुरन्तः प्रपीड्यते ।
तेनाध्मानं रुजश्वमा यथास्वं तत्र बस्तयः ॥ १५ ॥
बार बार वस्ति को दबाने से उदर का वायु देवता है । उससे आध्मान और उग्र पीड़ा होती है, इस दशा में जिसके लिए जो वस्ति उपयोगी हो उसका प्रयोग करना चाहिये ॥
कालातिक्रमणात् क्लेशो व्याधिश्वाभिप्रवर्धते ।
तत्र व्याधिबलन्नं तु भूयो बस्ति निधापयेत् ॥ १६ ॥
स्तिका ( द्भुत और विलम्वित रूप से वस्ति प्रदान की क्रिया ) का अतिक्रमण होने पर क्लेश और व्याधि ( अनुलोम व्याधि ) की उत्पत्ति होती है, इस अवस्था में व्याधि के बल को नाश करने वाली वस्ति का पुनः प्रयोग करना चाहिए ॥ १६ ॥
गुदोपदेहशोकौ तु स्नेहोऽपकः करोति हि ।
तत्र संशोधनो बस्तिहितं चापि विरेचनम् ॥ १७ ॥
वस्ति द्रव्यदोष व्यापद् का वर्णन और उसकी चिकित्सा-अपक स्नेह ( आमतैल ) द्रव्य का वस्ति में प्रयोग करने पर गुदा में लेप और शोथ हो जाता है, इसमें सशोधन वस्ति और विरेचन हितकर होता है ॥ १७ ॥
हीनमात्रावुभौ बस्ती नातिकार्यकरौ मतौ ।
अतिमात्रौ तथाऽऽनाहलमातीसारकारकौ ॥ १८ ॥
हीन मात्रा में प्रयुक्त दोनों वस्तियाँ ( स्नेह वस्ति, निरूह बस्ति ) विशेष कार्य सम्पादन नहीं करतीं तथा अधिक मात्रा में प्रयुक्त होने पर आनाह, कुम और अतिसार उत्पन्न कर देती हैं ॥ १८ ॥
मूर्च्छा दाहमतीसारं पित्तं चात्युष्णतीक्ष्णकौ ।
मृदुतावुभौ वातविबन्धाध्मानकारकौ ॥१६ ॥
अति उष्ण और तीक्ष्ण वस्तियाँ मूर्च्छा, दाह और अतिसार को उत्पन्न तथा पित्त को प्रकुपित करती हैं, एव मृदु और शीतल वस्तियाँ वात विवन्ध ( वायु की रुकावट ) और आध्मान कारक होती हैं ॥ १ ९ ॥
तत्र हीनादिपु हितः प्रत्यनीकः क्रियाविधिः ।
गुदवस्त्युपदेहं तु कुर्यात् सान्द्रो निरूहणः ॥ २० ॥
प्रवाहिकां वा जनयेत्तनुरल्पगुणावहः ।
तत्र सान्द्रे तनु बस्ति तनौ सान्द्रं च दापयेत् ॥२१ ॥
वस्ति के हीन आदि दोषों में हेतु विपरीत क्रिया हितकर होती है । सान्द्र ( गाढ़ा ) निरूहण द्रव्य गुदा और वस्ति में उपलेप कर देता है और पतला द्रव्य अल्प गुण वाला एव प्रवाहिकोत्पादक होता है । इसमें सान्द्रबस्ति के दोष में तनुवस्ति और तनुबस्ति के दोष में सान्द्रवस्ति का प्रयोग करना चाहिये ॥ २०-२१ ॥
स्निग्धोऽतिजाट्यकृद्रूक्षः स्तम्भाध्मानकृदुच्यते ।
वस्ति रुक्षमतिस्निग्धे स्निग्धं रूते च दापयेत् ॥ २२ ॥
स्निग्ध वस्ति अतिशय क्लेदकारी तथा रूक्ष, स्तम्भ और आध्मान कारक होती है, अति स्निग्ध वस्तिजन्य दोष में