श्रीगणेशाय नमः।
सुश्रुतसंहिता हिन्दीव्याख्या - कविराज अम्बिकादत्त शास्त्री
Sushruta Samhita - Kaviraj Ambika Dutta Shastri · चौखम्बा संस्कृत सीरिज, बनारस · 663 पृष्ठ · 67 खण्ड
विषय सूची
- । श्रीः । - काशी - संस्कृत ग्रन्थमाला ---१५६ महर्षिणा सुश्रुतेन विरचिता सुश्रुतसंहिता ' आयुर्वेदतत्वसन्दीपिका ' हिन्दीव्याख्या - वैज्ञानिक - विमर्श -… 1–10
- प्राप्यन यदि चरकमधीते तद् ध्रुवं सुश्रुतादि- प्रणिग दितगदानां नाममात्रेऽपि बाह्य: । अथ चरकविहीनः प्रक्रियायामखिन्नः किमिव खलु करोतु व्याधितानां वराकः… 11–20
- विषयाः पृष्ठाङ्काः । प्रच्छानविधि ५३ शोणित के ठीक सवण न होने में हेतु " मदादिव्याप्त रोगियों का रक्त स्रवित नहीं होता है " " दुष्ट रक्त के न निकालने में… 21–30
- १६ विषयाः पृष्ठाङ्काः पूगफल ( सुपारी ) के गुण २०२ जावित्री, कर्पूर, जायफल, कोलक, लवन और लता कस्तूरी के गुण " प्रियाल, विभीत, कोल, आमलक, वीजपूर, शम्पाक और… 31–40
- ४ DO विषय पृष्ठाङ्क | परीक्षा ७ ९ दुग्ध किस प्रकार की दाई का दूध न पिलावे " वालक के रोग जानने का प्रकार ८० वालकों के विकारों में औषध किसको देना चाहिए? " "… 41–50
- कल्पस्थान- विषयसूची विषय पृष्टाक | पहला अध्याय अन्नपान रचाकल्प का उपक्रम १ विष से राजा की रक्षा २… 51–60
- सुश्रुतसंहिता | राणाम् | शल्याङ्गमङ्गैरपरैरुपेतं प्राप्तोऽस्मि गां भूय इहोपदेष्टुम् । २ ९ । " ' देवताओं की वृद्धावस्था, रोग तथा मृत्यु को नष्ट करने ' वाला… 61–70
- सुश्रुतसंहिता | 8 अम्मिन् शास्त्रे शखकर्मप्राधान्याच्छखकर्मैव तावत् । पूर्वमुपदेच्यामम्तत्सम्भारांञ्च । १… 71–80
- २६ सुश्रुतसहिता | उन्हें ' स्कोप ' कहते हैं जैसे Recto Boope, Cysto Scope, Auro Scope, आचूषण क्रिया में दूषित रक्त निकालने को श्रद्ध, अला तथा दूषित… 81–90
- श्रध्यायः ११ ] सूत्रस्थानम् । ३७ १०० तक गिनती करने पर एरण्डनाल जलाने वाला नीचग, १०० गिनती के पूर्व ही जलाने वाला अतिनीचग और १०० गिनती के बाद तक भी… 91–100
- सुतसंहिता, 85 तथा औदरिक भाग ले सर्व शरीर के लिये करीब छोटी मोटी में ५५ लास होती है । इन लाल कणों से ही रक्त की लालिमा छत्तीस शाखाएं निकलती है… 101–110
- सुश्रुतसंहिता । ५८ विमर्श - आंतों के अन्दर कुछ सूक्ष्म मल रहता है जो ऊर्ध्वमेषां क्षीणलक्षणं वक्ष्यामः- तत्र, वातक्षये शरीर को धारण करता है तथा राजयचमा… 111–120
- ६८ सुश्रुतसहिता | संरम्भ ( शोथ ), दाह, पाक, राग और वेदना होती है अथवा फिर फट जाता है । २० । अथास्याप्रदुष्टस्याभिवर्धनार्थमभ्यङ्गः… 121–130
- सुश्रुतसंहिता | आघात से शरीर का कोई भाग चूर्णित हो जाय, विलोडित | कवलिका ( रुई या गाज का पेट या गद्दी ) रस कर मुलायम हो जाय, टूट जाय, सन्धिच्युत हो जाय,… 131–140
- सुश्रुतसंहिता । इसके अतिरिक्त ये दोप तथा इनके स्थान पांच पांच प्रकार से विभक्त हैं । वात के भेद तथा स्थान वातव्याधि में कहेंगे… 141–150
- सुश्रुतसंहिता । ६५ विषजुष्टानां शोषिणां मधुमेहिनाम् | की हुई उचित चिकित्सा याप्य रोग से पीड़ित रोगी को कुष्ठिनां व्रणाः कृच्छ्रेण सिध्यन्ति येषां चापि ऋणे… 151–160
- १०८ सुश्रुतसहिता । अस्थि आदि से बने पदार्थों में शल्यत्व का अधिकार है उन में भी विशेषतया हिंसार्थं प्रयुक्त होने के कारण लोह के पदार्थों में शल्य शब्द… 161–170
- सुश्रुतसंहिता ११६ दूतैरनिष्ट्टैत्तुल्यानामशस्तं दर्शनं नृणाम् । कृलत्यतिलकार्पासतुपपाषाणभस्मनाम् । ३८ । पात्रं नेष्टं तथाऽङ्गारतैलमपूरितम्… 171–180
- १२८ ' सुश्रुतसंहिता । अवाङ्मुखस्तून्मुखो वा क्षीणमांसबलो नरः । जागरिष्णुरसन्देहमुन्मादेन विनश्यति । २५ । जो अपना मुख नीचे को या ऊपर को रखता हो तथा… 181–190
- १३८ सुश्रुतसहिता । वातिक शोथ में स्निग्ध, अम्ल और लवण युक्त तथा कुछ कुछ गरम लेप लगाना चाहिये । पैत्तिक शोफ में दुग्ध के साथ पीसा हुआ तथा शीत लेप लगाना… 191–200
- १४८ सुश्रुतसंहिता । विरेचनार्थं अधिक प्रयोग होता है । पत्र का तो कचित् प्रयोग है । कोशातकी सप्तला शङ्खिनी देवदाली कारवेल्लिका । चेत्युभयतोभागहराणि… 201–210
- १५८ सुश्रुतसहिता । का विश्लेषक, शरीर का छेदक, शिथिलताजनक, उष्ण, सर्व रसों का विरोधी, मलमूत्रादि मार्गों का विशोधक है तथा सम्पूर्ण शरीर के अवयवों में… 211–220
- श्रध्यायः ४५ ] सूत्रस्थानम् । १६६ उसे पीने के कार्य में नहीं ग्रहण करना चाहिये । किन्तु आश्विन मास में बरसने वाला सामुद्र जल भी गाड्न के समान दोष-रहित… 221–230
- श्रध्यायः ४५ ] सूत्रस्थानम् । १७६ निम्बातसीक्कुसुम्भमूलकजीमूतकवृक्षककृतवेधना- । कम्पिल्लकहस्तिकर्णपृथ्वीका… 231–240
- अध्याय 1 सूत्रस्थानम् । १८६ चारून मल को बांधने घारे, तिफ, कपाय, पित्तनाशक, पाक में तथा फनाक होते है । १८-१९ । विस्तरेणानुदिष्ट शालिवर्गो हिताहितः… 241–250
- श्रध्यायः ४६ ] सूत्रस्थानम् । १६६ लवलं दीपनं हृद्यं मातुलुङ्गमुदाहृतम् । त्वक् तिक्ता दुर्जरा तस्य वातक्रिमिकफापहा । १४६… 251–260
- अध्यायः ४६ ] सूत्रस्थानम् । २०६ पोषणार्थं पोषण पदार्थों को जमा करती हैं जिससे ये कन्द बड़े तथा मनुष्यों के पोषण के लिये भी उपयोगी होते हैं… 261–270
- श्रध्याय ४६ ] सूत्रस्थानम् । ३१६ जन्तवो ये तु तेषां हि चिन्तेयं परिकीर्त्यते । ४४६ । बलिनः खरभच्या ये ये च दीप्ताग्नयो नराः… 271–280
- श्रध्यायः १ ] निदानस्थानम् | २२ विमर्शः - ऊर्ध्वशब्देन नाभ्युर. कण्ठादीना भाषितगीतादावा-दिशब्देन प्रयलादीना च परिग्रह… 281–290
- श्रध्यायः ३ ] निदानस्थानम् । २३६ लालिमा होती है एवं कफ से सिग्धता तथा वायु से तीव्र परुपता भी होती है । २१-२२ । विमर्शः तेन तोदपारुष्यं पित्तादसितवत्यता… 291–300
- श्रध्यायः ५ ] निदानस्थानम् । २४६ प्रन्थियां फूट कर चण चन जाती हैं । अंगुलियां, मुस, कर्ण, नासा में होने से वे गलते जाते हैं… 301–310
- श्रध्यायः ८ ] निदानस्थानम् । २५६ स्त्री - सम्भोग, तांगा, रथ आदि यान तथा ऊंट, अश्व आदि वाहन पर सवारी, मार्ग में चलना, पांव के फिसलने से गिर पढना, ऊंचे से… 311–320
- २७२ सुश्रुतसहिता । भेट होते हैं । ( १ ) सामान्य ( Simple ) या सौम्य जिनके कारण मृत्यु होने का भय नहीं रहता है… 321–330
- सुश्रुतसंहिता । २८२ प्रदेश में उत्पन्न, अल्पपीड़ा वाले स्थिर ( कठिन ) शोथ को पापाणगर्दभ जानो । १३ । विमर्श - पापाणवत काठिन्यात्पापाणगर्दनः… 331–340
- २६२ सुश्रुतसहिता । के दोनों टुकडों के बीच में अन्तराल दिखाई देता है किन्तु भग्न भाग के अन्तराविष्ट होने पर यह अन्तराल नहीं दिखाई देता है इसका भी ध्यान रख… 341–350
- प्रकाशक- चौखम्बा संस्कृत सीरीज आफिस, वाराणसी. मुद्रक - विद्याविलास प्रेस, वाराणसी. संवत् २०१७ ( पुनर्मुद्रणादिका सर्वेऽधिकारा प्रकाशकाधीना. ) Chowkhamba… 351–360
- १० सुश्रुतसहिता होते । व्याधि के स्वभाव के कारण ऐसा होता है । आर्त्तव क्षय के लक्षण ' यथोचित कालादर्शनमल्पता वा योनिवेदना च ' ऐसे है… 361–370
- २० सुश्रुतसहिता तृतीयोऽध्यायः " अथातो गर्भावक्रान्ति शारीरं व्याख्यास्यामः । तथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः । १… 371–380
- ३० सुश्रुतसंहिता स्नायुओं से ढके हुए और जरायु ( झिल्ली ) से व्याप्त तथा कफ से वेष्टित भागों को कलाभाग कहते है । ६-७… 381–390
- प्रायः / -1 ] शारीरस्थानम?? वानस्पत्य सुख के लक्षण एक ही जगह पर रहने की इन्छा करना, केवल बाहार में नामानि धर्म और इसे रहित होना ये वानस्पत्य सत्त्व ल है… 391–400
- अध्यायः ६ ] शारीरस्थानम् ५१ मर्मके विभागों की संख्या - मांसमर्म ११, शिरामर्म, ४१, स्नायु मर्म २७, अस्थिमर्म ८, और सन्धिमर्म २०; इस प्रकार कुल १०७ मर्म है… 401–410
- श्रध्यायः ७ ] शारीरस्थानम् ६१ निर्देश किया गया है । वह उन उन दोपों की अधिकता के कारण समझना चाहिये… 411–420
- अध्याय ८ ] शारीरस्थानम् ७१ गयी के मत में रूपरसादि पञ्चक चक्षु, जिह्वा इत्यादि इन्द्रिय - पञ्चकको पाच धमनियां लगाती हैं… 421–430
- श्रध्यायः १० ] शारीरस्थानम् ८१ गुदपाक के लिये पेट में लेने के लिये गुलाबजल में घोट रसान की शुद्धि करने के पश्चात् उसका प्रयोग करना चाहिये… 431–440
- अध्याय चिकित्सास्थानम् के उष्णा मे परिषेक करना चाहिए । जल सिंचन से जिस प्रकार अनि शान्त होती है उसी प्रकार परिपेक से दोपानि का सहसा शमन होता है । १७-१८… 441–450
- अध्यायः २ चिकित्सास्थानम् १५ अत्यन्त वेदना उत्पन्न करता है । इसमें स्नेहपान तथा सेक शाखासु पतितांस्तिर्यक् प्रहारान् विवृतान् ( कोष्णस्नेहसेक ) उपयुक्त… 451–460
- २६ सुश्रुतसंहिता मुपदिशन्ति वातरोगिपु; अणुभ्यस्तै लद्रव्येभ्यो निष्पा-द्यत इत्यगुतैलम् । २८ । तिल पेरने वाले कोल्हू की लकड़ियों को एकत्रित कर, चिरकाल तक… 461–470
- IIII सुश्रुतसहिता आधा पल को मात्रा में सेवन और स्नेह का पाचन होने पर उपर्युक्त आहार करे । इसमें अधिक लाभ की प्राप्ति होती है… 471–480
- १८ सुश्रुतसहिता कृत्यैकस्थं तत्रपिष्टः प्रलेपो दद्रपूतो मृलका बीजयुक्तः । १२ । लाल, चूक, सरसों, श्रीनिकेत ( विरोजा ), हल्दी, मोठ, मरिच, पिप्पल, चड के बीज… 481–490
- ५८ सुश्रुतसहिता उष्ट्राश्वतरखरपुरीपचूर्णानि चास्मै दद्यादर्शनेपु हिडुसैन्धवयुकैर्यूपैः सार्पपैश्च रागैर्भोजयेत्; अविरु-द्धानि चास्मै… 491–500
- ६८ सुश्रुतसंहिता गर्भ के निकलने में कठिनाई हो तो ' च्यावन ( गर्भ गिरानेवाले ) मन्त्रों ' को सुनाना चाहिए । उन मन्त्रों का कथन किया जाता है । ५… 501–510
- ६० सुश्रुतसंहिता द्रव्यों के क्वाथ, दूध तथा काञ्जी से सिद्धन्दातपाक त्रिवृत्स्नेह अल्पावशिष्टे कृमिभक्षिते च ( घृत, तैल, वसा ) पिलावे । ३१… 511–520
- II सुश्रुतसंहिता प्रवेश करना चाहिये और अधोवायु निकलने के लिए, मध्य में छेद वाली, चमड़े की गोफणा बन्धन ( T. Bandage ) से पट्टी बाँधनी चाहिये तथा धीरे -… 521–530
- १०४ सुश्रुतसहिता न चालकर्णनासास्रोतोदशनाक्षिविवराण्यभिकु ष्णीयात्, न वीजयेत् केशमुखनखवखगात्राणि, न गात्रनखवक्रत्रादित्रं कुर्यात्, न… 531–540
- श्रध्यायः २८ ] चिकित्सास्थानम् ११५ सर्पिरोदन इत्याहारः एवमुपयुञ्जानो ब्रह्मवर्चसी । श्रुतनिगादी भवति वर्षशतमायुरवाप्नोति… 541–550
- श्रध्यायः ३१ ] चिकित्सास्थानम् १२५ पानाभ्यवहारयोर्मृदुः, नस्याभ्यङ्गयोर्मध्यमः, बस्ति-कर्णपूरणयोस्तु खर इति । ११… 551–560
- अध्यायः ३४ चिकित्सास्थानम् १३५ प्रागपीतं नरं शोध्यं पाययेतौपधं मृदु । ततो विज्ञातकोष्टस्य कार्य संशोधनं पुनः । ४४… 561–570
- श्रध्यायः ३६ चिकित्सास्थानम् १४५ रूक्ष वस्ति तथा रूक्ष में स्निग्ध वस्ति का प्रयोग करना चाहिये । अतिपीडितवद्दोषान् विद्धि चाप्यवशीर्षके… 571–580
- अध्यायः ३८ ] चिकित्सास्थानम् १५५ वस्ति क्रिया के जानने वाले वैद्य को प्रयोजन के अनुसार इस विधि से दूसरी, तीसरी अथवा चौथी वस्ति का प्रयोग करना चाहिए । ६… 581–590
- श्रध्यायः ४० 3 चिकित्सास्थानम् १६५ स्रोतो मूलेऽङ्गुष्ठपरिणाहं धूमवर्तिप्रवेशस्रोतोऽङ्गुला । न्यष्टचत्वारिशत् प्रायोगिके, द्वात्रिंशत् स्नेहने, चतुर्वि… 591–600
- श्रध्यायः १ ] कल्पस्थानम् प्राणनाशके हेतु ' विषकन्या ' का प्रयोग भी किया करता था जैसा कि भारतीय इतिहास का एक अत्यन्त ज्वलन्त उदाहरण हमारे सामने है कि किस… 601–610
- Stepper: 9 ] कल्पस्थानम् १३ in water, but it should not be used except in cases of poisoning by phosphorus 7. One tenth grain of apomorphine hydrochloride… 611–620
- श्रध्यायः २ ] कल्पस्थानम् २३ रोगी की ११. स्वचा की आर्द्रता १२. मुख श्वेत १२. चमन अवस्था विप का अनुमान १. अहिफेन २. वरसनाभ १. मद्य ४. नीलाञ्जन ५. तम्बाकू… 621–630
- प्यायः ४ ] कल्पस्थानम् प्रहर में मण्डली सर्प और दिन के समय में दवकर सर्प घूमते हैं । । ३०-३१ । विमर्शः - चरककार ने भी लिखा है कि- विशेषाद्र्कड कमम्लोष्ण… 631–640
- अध्याय: ५ ] कल्पस्थानम् ४७ सरक्तं चर्म मांसं वा निक्षिपेचास्य मूर्धनि । ४ । चर्मवृक्षकषायं वा कल्कं वा कुशलो भिषक्… 641–650
- श्रध्यायः ८ 1 कल्पस्थानम् ६१ ' आवर्तकस्तथोरभ्रः सारिकामुखवैदलौ । शराव कुर्दोऽभीराजिः रुपचित्रशीर्षकः । ६ । शतबाहुच यश्चापि रक्तराजिश्व कीर्तितः… 651–660
- श्रध्याय ८ ] कल्पस्थानम ३ वाली पिप्पली का ग्रहण करना चाहिये, किन्तु यह पाठ कुछ सन्दिग्ध सा ही प्रतीत होता है… 661–663