गीता में कश्मलम् का अर्थ

Basudeba Mishra

गीतामें कश्मलम् का अर्थ क्या है ।

कुतस्त्वा कश्मलमिदं विषमे समुपस्थितम्।
अनार्यजुष्टमस्वर्ग्यमकीर्तिकरमर्जुन ।। गीता 2-2।।

हे अर्जुन! इस विषम अवसर पर तुम्हे यह कश्मलम् कहाँ से प्राप्त हुई, जिसका श्रेष्ठपुरुष सेवन नहीं करते, जो स्वर्ग को देनेवाला नहीं है और कीर्त्तीकरने वाली भी नहीं है ।

शङ्कराचार्य ने कश्मलम् शब्द का अर्थ नहीं किया । आनन्दगिरिकृत शङ्करभाष्यब्याख्या में कश्मलम् शब्द का अर्थ मलिन कहा गया है । रामानुजभाष्यमें इसका अर्थ नहीं किया गया है । परन्तु वेङ्कटनाथकृत तात्पर्यचन्द्रिका में कश्मलम् शब्द का अर्थ मूर्छाकल्प, शोक कहागया है । हनुमत्कृत पैशाचभाष्यमें कश्मलम् शब्द का अर्थ मोहकलुष कहा गया है । श्री वेङ्कटनाथकृत ब्रह्मानन्दगिरी व्याख्यान में कश्मलम् शब्द का अर्थ न च श्रेयोऽनुपश्यामि (मैं कुछ अच्छा नहीं देख पा रहा हुँ) भाव कहा गया है । वल्लभाचार्यकृत तत्त्वदीपिकामें कश्मलम् शब्द का अर्थ त्रिविध विशेषणयुक्त (अनार्यजुष्टमस्वर्ग्यमकीर्तिकरम् – श्रेष्ठपुरुष जिसका सेवन नहीं करते, जो स्वर्ग को देनेवाला नहीं है और कीर्त्तीकरनेवाली भी नहीं है) मोह कहा गया है । श्रीधरस्वामी कश्मलम् शब्द का अर्थ मोहप्राप्त कहा है । बलदेवने कश्मलम् शब्द का अर्थ शिष्टनिन्दात्वान्मलिनं (दूषित होने के कारण ज्ञानीयों से तिरष्कृत) कहा है । उपरोक्त कोई भी अर्थ कश्मलम् शब्द का अर्थको पूर्रूप से इङ्गित नहीं करते ।

संस्कृत में तीन प्रकार के शब्दों का प्रयोग देखा जाता है – यौगिक (व्युत्पन्न), योगरूढ, रूढ़ (अव्युत्पन्न) ।  प्रकृति (प्रकरणात् प्रकृतिः –  जिससे शब्दों का निर्माण होता है) तथा प्रत्यय (प्रतीयतेऽर्थोऽनेनेति प्रत्यय: – जिससे अर्थ ज्ञात होता है) ईकाइओं से निष्पन्न होनेवाला शब्द को यौगिक (व्युत्पन्नः – विशेषेण उत्पन्नः – विशिष्ट संस्कार से उत्पन्न) कहते हैं । शब्दों की प्रकृति दो प्रकार के मानी जाती है – धातु (डुधा॒ञ् धारणपोष॒णयोः॑ – धीयते सर्वमस्मिन्निति – शरीरधारक वस्तु) और प्रातिपदिक (प्रतिपद्तेऽर्थोऽनेनेति प्रातिपदिकम् – धातु व प्रत्यय से भिन्न शब्द की अर्थवाली ईकाई) । क्रिया शब्द की प्रकृति धातु है तथा नाम शब्द की प्रकृति प्रातिपदिक है । प्रकृति व प्रत्यय के अर्थ जान लेने पर यौगिक शब्दों के अर्थ सहज ही ज्ञात हो जाते हैं । जैसे लिख् (लिखँ अक्षरविन्या॒से, लिखना) प्रकृति है । उसमें ण्वुल् (आयकः) प्रत्यय मिलकर लेखकः शब्द बनता है । “ण्वुल्तृचौ (अष्टाध्यायी – 3-1-133)” के अनुसार यह कर्ता अर्थ में व्यवहृत होता है । इससे लेखकः शब्द बनता है, जिसका अर्थ लिखनेवाला होता है ।

प्रकृति-प्रत्यय से निष्पन्न कुछ शब्द ऐसे होते है, जो लोक में सर्वसामान्य नहीं है, परन्तु किसी विशेष अर्थ के साथ रूढ़ (प्रकृतिप्रत्ययार्थमनपेक्ष शाब्दवोधजनकः शब्दः – रुः॒अँ बीजज॒न्मनि॑ प्रादुर्भा॒वे च॑ – प्रकृति-प्रत्यय से अप्रभावित विशेष अर्थ को जन्म देनेवाला शब्द) हो जाते हैं । उदाहरण के लिए, पङ्कज शब्द का सामान्य अर्थ पङ्क में उत्पन्न होने वाला है । परन्तु लोक में पङ्कज शब्द का अर्थ केवल कमल है – पङ्क में उत्पन्न अन्य वस्तु नहीं । इसे योगरूढ कहते हैं । तृतीय विभाग है रूढ़ (अव्युत्पन्न) – शब्द जिसमें प्रकृति-प्रत्यय का विभाजन नहीं किया जा सकता । उदाहरण के लिए, पलाशः, स्थाली, गवाक्ष आदि संज्ञा शब्द देखिए । ऐसे अव्युत्पन्न शब्दों का कोष को उणादि कोष कहते है, जिसका प्रयोग विशेष क्षेत्र में होता है । जो शब्द प्रकृति-प्रत्यय के विभाग के द्वारा अष्टध्यायी सूत्रों से सहज सिद्ध नहीं होते, ऐसे शब्दों के अर्थावबोध के लिये  पाणिनिने उणादि सूत्रों का प्रणयन किया है । उणादि कोष में 5 पाद में 752 सूत्र हैं । कश्मलम् शब्द अव्युत्पन्न होने से उसका अर्थ विशेष रूप से करना होगा ।

शब्द व्युत्पादन में भ्रान्ति तथा विप्रतिपत्ति का निराकरण के लिए पाणिनि ने अष्टाध्यायी में अव्युत्पन्नपक्ष के लिए “अर्थवदधातुरप्रत्ययः प्रातिपदिकम्” (अष्टाध्यायी – 1-2-45), तथा व्युत्पन्नपक्ष के लिए “कृत्तद्धितसमासाश्च” (अष्टाध्यायी – 1-2-46) – यह दो सूत्र लिखा है । (अष्टाध्यायी – 6-4-11) “अप्तृन्तृच्स्वसृनप्तृनेष्टृत्वष्टृक्षत्तृहोतृपोतृप्रशास्तॄणाम्” सूत्र में तृनन्त एवं तृप्रत्ययान्त शब्दों की उपधा (अन्तिम अक्षर से पूर्व अक्षर) को दीर्घ सर्वनामस्थान के परे कहा गया है (सम्बोधनैकवचनस्य सुँ-प्रत्यये परे अयं दीर्घादेशः न भवति) । परन्तु यह उणादिकोष में “नप्तृनेष्ट्र (उणादिकोषः – 2-65)” सूत्र से निपातित तॄन् या तृप्रत्ययान्त शब्दों = पितरौ मातरौ इत्यादि में नहीं होता, क्योंकि अव्युत्पन्न पक्ष में उणादि के तृन्तृच् प्रत्ययों का ग्रहण नहीं है । अतः इस पक्ष में उपरोक्त “अप्तृन्तृच्” सूत्र में पठित शब्दों का ग्रहण विध्यर्थ है । “अप्तृन्तृच्स्व” – इस सूत्र में पठित उणादि के तृन्तृप्रत्ययान्त शब्द दीर्घ होगा तथा अन्य में उणादि के तृनन्त एवं तृप्रत्ययान्त शब्दों में दीर्घ नहीं होगा । इसलिए “पितरौ”, “मातरौ” में दीर्घ नहीं होता । “रै, ग्लौ, नौ, गो” इत्यादि एजन्त शब्दों की “कृन्मेजन्तः” (अष्टाध्यायी – 1-1-39) सूत्र से अव्ययसंज्ञा एवं “अव्ययादाप्सुपः” (अष्टाध्यायी – 2-4-82) से इन के पश्चात् सुप् प्रत्यय का लुक् नहीं होता । इसका समाधान उणादिकोष के अध्ययन से ही होगा ।

कृष्ण भगवान् के प्रथम वाक्यमें कहेगये कश्मलम् शब्दका प्रकृतअर्थ जानने केलिए हमें उनके उपदेशका प्रथम तथा अन्तिम श्लोकका रहस्य जानना होगा ।

अशोच्यानन्वशोचस्त्वं प्रज्ञावादांश्च भाषसे।
गतासूनगतासूंश्च नानुशोचन्ति पण्डिताः।।2-11।।

तुम शोक न करनेयोग्य विषयपर अनुशोक कर रहे हो । और विद्वानों जैसा भाषण भी करते हो । जो गत हो गए तथा यो गत नहीं हुए, दोनों के विषयमें विद्वान अनुशोक नहीं करते ।

सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।
अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः।।18-66।।

सर्व धर्म का आश्रय त्याग कर के एक मेरे ही शरणमें आ जाओ । मैं तुम्हे सब पापों से मुक्त कर दुँगा । शोक न करो ।

अर्थ स्पष्ट है, परन्तु जो कोई नहीं कहता, गीता का उपदेश “अनुशोक” की अयथार्तता से आरम्भ हो कर “शोक (शुचँ शोके॑) न करो” पर समाप्त होता है । अर्थात् गीता का उपदेश अनुशोक त्याग कर अशोकयुक्त होने के विषयमें है । शोक का अर्थ है चित्तवैकल्य । वेकल्य विगतकल – चित्त का कलाहीन – स्वभावहीन भाव । इन्द्रियों का कार्य है विषयो को ग्रहण करना । परन्तु जब कुछ अत्यन्त त्याग का अवसर उपस्थित होता है, यथा इष्टवियोगानुतिन्तनम् – किसी अपने का वियोग का समाचार जनित चिन्ता – तब चित्त विकलित हो जाता है । उसीको शोक कहते हैँ ।

अनु शब्द पश्चादर्थे, सादृश्ये, वीप्सायां, लक्षणे, इत्थ भूताख्याने, भागे, आयामे, हीने, सहार्थे, सन्निधाने अर्थ में व्यवहार किया जाता है । यहाँ प्रकरण के अनुरोध से केवल प्रथम दो का व्यवहार हो सकता है । इनमें से अनु शब्द का पश्चादर्थे करने से करने अनुशोक का अर्थ होगा जिसके पश्चात् शोक होता है अर्थात शोक का कारण । यह अर्थ समीचीन नहीं लगता । अन्य अर्थ सादृश्ये करने से अनुशोक का अर्थ होगा, जो शोक का कारण नहीं है, परन्तु जिसके साथ कारण का समानता है ।

युद्ध में प्राणहानी अवश्यम्भावी है । जहाँ आत्मीयजन के साथ युद्ध हो रहा हो, वहाँ इष्टवियोग – आत्मीयजनों का मृत्यु होगा ही । वह शोक का कारण होगा । परन्तु अभीतक युद्ध आरम्भ ही नहीं हुआ । यदि युद्ध के आरम्भ में ही अर्जुनका मृत्यु हो जाए, तो उसको इष्टवियोगजनित दुःख होगा ही नहीं । ऐसे परिस्थिति में एक काल्पनिक स्थिति को वास्तविक स्थिति के सदृश मानकर उसकेलिए शोक करना अनुशोक है । जो नहीं हुआ, वह अनिश्चित है । अपने पौरुष से हम भविष्यत को बदल सकते हैँ । भविष्यत कितना बदलेगा, वह हमारे सामर्थ्य पर निर्भर करता है । परन्तु अनिश्चित भविष्यत के लिए शोक करना मूर्खता है । वही अनुशोक है । उसीका निराकरण का उपाय गीता का उपदेश है । इसीलिए भगवान कहते हैं, हे अर्जुन । इस विषम अवसर पर तुम्हे यह कश्मलम् कहाँ से प्राप्त हुई, जिसका श्रेष्ठपुरुष सेवन नहीं करते, जो स्वर्ग को देनेवाला नहीं है और कीर्त्तीकरनेवाली भी नहीं है ।

आत्मीयों में साधारणतया प्रेम रहता है । यहाँ आपस में युद्ध की स्थिति है । पाण्डव धर्म के पक्ष में है । कौरव अधर्म के पक्ष में है । पाण्डवों के पक्ष में सात अक्षौहिणी सेना है । कौरवों के पक्ष में ग्यारह अक्षौहिणी सेना है । इस विषम अवसर पर अर्जुन जैसे धीर वीर से अपेक्षा रहती है कि वह विचारपूर्वक स्थितप्रज्ञ हो कर धर्म के निश्चित मार्गपर गति करे । यही श्रेष्ठपुरुषों से सेवन करनेवाला, स्वर्ग को देनेवाला और कीर्त्तीकरनेवाली है । उसके लिए –

तानि सर्वाणि संयम्य युक्त आसीत मत्पर: ।
वशे हि यस्येन्द्रियाणि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ॥गीता 2-61॥

समस्त इन्द्रियों को संयमित कर – वश में ले कर प्रज्ञा में प्रतिष्ठित होना चाहिए । परन्तु अर्जुन इन्द्रियों को वश में नहीं कर पा रहा है । अनेक दुश्चिन्तायें उसके मन को क्षोभित कर रहा हैं । जो उपस्थित नहीं होने से शोक का कारण नहीं है, परन्तु जिसके साथ कल्पित शोक का समानता है, इसप्रकार के अनुशोक उदय होनेका मूलकारण अस्थिर मन में मोह द्वारा कल्पित आशङ्कायें है ।

कश्मलम् शब्द कश् (कशँ॒ गतिशास॒नयोः॑) + कल (कलँ गतौ॑ स॒ङ्ख्याने॑ च) के योग से बनता है । कुटिकशिकौतिभ्यो मुट् च (उणादिकोषः -1-109) नियम से मुट् होता है ।  बिना मुट् प्रत्यय के कश + कल धातु से कश्मलम् शब्द नहीं बनेगा । मुट् आक्षेप क्षेत्र में व्यवहार होता है (आक्षेपप्रमर्दनयोः) । अतः कश्मलम् शब्द का अर्थ अस्थिर मन में मोह द्वारा कल्पित आशङ्काओं से उदित अनुशोक का आक्षेप है ।