माया के स्वरूप और भेद – भाग १

माया विभेदबुद्धिर्निजांशभूतेषु निखिलभूतेषु ।
नित्यं तस्य निरङ्कुशविभवं वेलेव वारिधिं रुन्धे ।
स तया परिमितमूर्त्तिः सङ्कुचितसमस्तशक्तिरेष पुमान् ।
रविरिव सन्ध्यारक्तः संहृतरश्मिः स्वभासनेऽप्यपटुः ।

माया विभेदबुद्धि की जननी है । जैसे समुद्र तरङ्गें कभी एक अन्य से तथा कभी वेलाभूमि से स्पर्द्धा करते हुए रुन्धित (आवरित – रु॒धिँ॑र् आ॒वर॑णे) करते हैं, जिससे वह परिमित (सीमित) हो जाते हैं तथा भिन्न प्रतीत होते हैं, उसीप्रकार माया सबका शक्ति सङ्कुचित करते हुए वस्तुस्वरूप को उसीप्रकार आच्छादित कर भ्रमदृष्टि सृष्टि करता है, जिसप्रकार अस्त समय में जैसे सूर्य अपना रश्मि को संहृत कर अन्धकार को जन्म देते हैं । माया ब्रह्म का शक्ति होने से सर्वप्रथम ब्रह्म का स्वरूप जानना चाहिए ।

रसो वै सः – इस तैत्तिरीय श्रुति में कहा गया है कि असत् – अप्रकट – अव्यक्त – प्रकृति से व्यक्तप्रकृति प्रकट हुआ, जिसे स्वयं को प्रकट करने के कारण सुकृत कहते हैं । उस सुकृत को सबसे बृहत होने के कारण (बृहँऽ [वृहँऽ] वृद्धौ॑), अथवा प्रथम सृष्टि उद्यमकारी होने के कारण (बृहूँ उ॒द्यम॑ने), अथवा सबका बृंहण – विस्तार करने के कारण (बृहिँऽ [वृहिँऽ] भा॒षार्थः॑), अथवा सबको धारण (भृ॒ञ् भर॑णे) और पोषण (डुभृ॒ञ् धारणपोष॒णयोः॑) करने के कारण ब्रह्म कहते हैं । उसका स्वरुप रसमय है । उसके पराशक्ति को बल कहते हैँ । यह दोनों अविनाभावी – एक अन्य से भिन्न नहीं रहते हैं । अतः यहाँ अद्वैत का विरोध नहीँ है । रस और बल एक ही तत्त्व के दो अन्तर्निहित धर्म है । बलोपेत रस धर्मी है ।

मूल रूपसे यह रस और बल दोनों निर्धर्मक हैं । मौलिक धर्ममें सत्तासिद्ध धर्म का निरोध माना जाता है (सामान्यविशेषेषु सामान्यविशेषाभावात्तत् एव ज्ञानम् – कणादसूत्रम् 8-1-5) । न ही उसमें अनेक भातिसिद्ध (जो वास्तव में है नहीं, परन्तु हम उसे व्यवहार करते हैं जैसे कि वह है – जैसे कि काल) धर्म ही उदय होते हैं । परात्पर और अव्ययमें श्रुतिसिद्ध धर्म भातिसिद्ध है । अक्षर तथा क्षर में वह सत्तासिद्ध तथा भातिसिद्ध – दोनों है ।

बल् धातु वेष्टन कर धारणपोषण करने के अर्थ में व्यवहार किया जाता है (बलँ प्राण॑ने धान्यावरो॒धे च॑ । दधातीति धान्यम् – डुधा॒ञ् धारणपोष॒णयोः॑ धा + दधातेर्यन् नुट् च) । बल किसे वेष्टन करता है ? रस को । रस क्या है ? ब्रह्म, जो सबको सृष्टि कर सबमें प्रविष्ट है (तत्सृष्ट्वा तदेवानुप्राविशत् – तैत्तिरीयोपनिषद् 2-6), वही अपने अशनाया के कारण सबका आस्वादन और स्नेहन (पिण्डीकरण) करता है । अतः उसे रस कहते हैं (रसँ आस्वादनस्नेह॒नयोः॑) । बल के क्षय तथा उदय के समय बलाश्रय रस तटस्थ रहता है – बल के आधारभूत रस का क्षय अथवा उदय नहीं होता । अतः यह दो तत्त्व हैं । परन्तु रस में प्रबुद्ध बल का स्वरूप रस से भिन्न होता है । उसीप्रकार बल से युक्त रस का स्वरूप रस से भिन्न होता है । अन्वाहित (परस्पर मिले हुए) हों अथवा व्यतिरिक्त (परस्पर भिन्न) हों – दोनों अवस्था में उनकी सब प्रकार से विपरीत वृत्ति होती है ।

ब्रह्म रस अमृत, पूर्ण, अखणड, शान्त, शिव, शास्वत, रूपमय, अनादि, अनन्त, असङ्ग, अव्यय, निर्गुण, निष्कल, एक एवं अक्रिय है । वह जगत की नित्यप्रतिष्ठा है – सबका आधार है । जगत् समष्टि रूप से कभी नाश नहीं होता । वह सर्वबीज तथा सर्वविकास है । उसका स्वरूप अस्त्, नास्ति, सत्ता और विनाश है । वह विभु होने से अखण्ड तथा निष्क्रिय है । वह सब कर्मों का आधार है । उसका नाश, क्षय, बृद्धि, विकार आदि नहीं होता । न वह बद्ध है न मुक्त है । वह उपर, नीचे, बाह्य, अभ्यन्तर सर्वत्र सम रहता है । वह सदा सत् रहता है । इसलिए उस सत् में स्थित कर्म को भी सद् कहाजाता है । असत् कर्म कैसे सत्ता प्राप्तकरता है, यह जाना नहीं जा सकता । इसीलिए माया की सत्ता को अनिर्वचनीय कहा जाता है ।

बल क्षुब्ध, क्षणिक, प्रदेशयुक्त, घोर, मित, शून्य, अनेक, अल्पवत्, प्रतिक्षण अपूर्ण, स्वलक्षण, क्रियात्मक, भूरिकल (अकल का प्रतिलोम), तथा महागुण है । क्षुब्ध दुःखयोनि है । पृथक् सत्ता न होने के कारण किसी देशकाल में सत्तारहित होने से शून्य है । जो हो कर नष्ट हो जाता है, उसे कर्म कहते हैं (भूतभावोद्भवकरो विसर्गः कर्मसंज्ञितः – गीता 8-3) । प्रत्येक क्षणिक कार्य विलक्षण होते हैं । एक का दृष्टान्त अन्य में मिलना असम्भव होने से कर्म को स्वलक्षण कहा जाता है । क्रिया दो प्रकार के होते हैं । एक देशत्यागरूपा (स्थानान्तर गति) दैशिक क्रिया है । अन्य परिणामरूपा कालिक क्रिया है । क्रिया ही धारावाहिक हो कर गुणरूपता को प्राप्तकरती है । इसलिए वह सर्वगुणरूप महागुण है – गुणों का आश्रय है ।

ब्रह्म रस अकर्म रूप अमृत है । क्रिया का आश्रय होते हुए भी कभी उसकी नास्ति नहीं होती है । क्रिया परिच्छिन्न वस्तु में कम्प (स्थानच्युतितिरश्चीनो विततो रश्मिरेषाम् – wave) सृष्टि करती है । विभु में अवयव के अभाव होने से उसमें स्थानच्युति नहीं हो सकती । अव्यय होने से उसमें परिणाम नहीं होता । इसलिए वहाँ कोइ भी क्रियाविशेष जात नहीं हो सकती । वहाँ क्रिया भी स्वयं शान्त हो जाती है । बल नित्य मरणधर्मा कर्म रूप मृत्यु है । कर्म के द्वारा पूर्व स्थिति के बन्धन से मुक्ति (मुच्यति) होता है । इसलिए उसे मृत्यु कहते है । बल स्वयं मरता है तथा अपने सम्बन्ध से अन्य को मारता भी है । यह बल की दृष्टनष्टरूपता है ।

अमृत को पवित्र तथा मृत्यु को पाप्मा कहते हैं । एकान्ततः बल के तारतम्य ही सबको पवित्र भी करता है और कालुष्य भी । वह पाप्मा को पवित्र करने से पवित्र है तथा कलुषित करने से कालुष्य भी है । एकान्ततः वह न सत् है न असत् है । वह जगत् को न प्रसन्नता देनेवाला है न कल्मश । सत् असत् रूप से असत्व के साथ योग को ही कालुष्य कहते हैं । बल अपने बन्ध सम्बन्ध से विशेषरूप से भावोदयन रूप विकार को प्राप्त होता है, उसका विज्ञान को आवृत करता है, तथा अमृत को आवरित कर लेता है । इसलिए उसे पाप्मा तथा कालुष्य कहते हैं । यह जगत् दोनों से ही उत्पन्न हुआ है । इसलिए यहाँ प्रसाद (पवित्रता) तथा कल्मश (पाप्मा) दोनों ही प्रतीत होते हैं ।

(क्रमशः)

https://thevyasa.in/2021/07/maya-2/