माया के स्वरूप और भेद – भाग २

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ब्रह्मरस निर्विशेष है । रस का सम्बन्ध आनन्द से है । आनन्द का स्वरूप सर्वस्वातन्त्र्य है (आनन्दशक्तिः स्वातन्त्र्यं सार्वत्रिकमुदीरितम्) । सर्वस्वतन्त्र होने से ब्रह्म ही रस है । रसनेन्द्रियग्राह्य वस्तु को ही रस कहते हैं । वह चेतन का स्वभाव है । सर्वचैतन्य होने से ब्रह्म ही रस है । शृङ्गारादि स्थायीभाव को भी रस कहते हैं । ब्रह्म ही सबकी प्रतिष्ठा होने से वह परमस्थायी है । रसोऽहमप्सु कौन्तेय (गीता 7-8) के अनुसार रस ही अप् का निचोड है । आपोमय परमेष्ठी से जगत्सृष्टि होने के कारण ब्रह्म ही रस है ।

वह रस सबमें सामान्य रूप में पाया जाता है । अतः वह सामान्य तथा निर्विशेष है । अपरिवर्त्तनीय मौलिकतत्त्व रस सबका गति-परायण-अवष्टम्भ है । शुद्ध रूप से उसके पराशक्ति बल भी निर्विशेष है । रस-बल के संसर्ग से विविध विशेष (विशेषताएं – भेद) उदित होते हैं । निर्विशेष सविशेष होता है । यह विशेष रूप कहाँ से आते हैं, कहाँ जाते हैं, यह न जानने के कारण इसे माया कहा जाता है । माया शब्द का अर्थ जिससे परिमित (परिच्छेद) कर के किसीका मान निर्धारण किया जाता है (मा॒ङ् माने॑) । स्वरूप संसर्ग के कारण रसमें स्थित बल से मात्रा और संस्था – यह दो विशेष होते हैं । बल स्वयं मित (सीमित) है । उसके सम्बन्ध से अमित (असीमित) रसमें भी मिति दिखती है । उसे ही मात्रा कहते हैं । मात्रामें रस का जो परिच्छेद रूप दिखाइ पडता है, उसे संस्था कहते हैं । इन के उद्भव में मिति (माया) साधन है । मिति वास्तवमें रसमें नहीं है । परन्तु वह रसमें प्रतीत होता है – जैसे इन्द्रजाल हो । एक धर्म अन्य धर्ममें कैसे दिखता है, वह अनिर्वचनीय है । अतः मात्रा और संस्था दोनोंको भी माया कहा जाता है ।

जिस प्रक्रियामें रस और बल संसर्ग से छन्दित हो कर मित (सीमित) होते हैं, उसे छन्द कहते हैं । इससे मात्रा और संस्था दोनों छन्दित होते हैं । अतः मात्राछन्द और संस्थाछन्द भेद से छन्द दो प्रकार के है । दिग्-देश-काल से प्रमित (सीमित) छन्दको मात्राछन्द कहते हैं । सीमित होने पर जो वृत्त (आकृति) वनता है, उसे संस्थाछन्द कहते हैं । वर्ण तथा मात्रा नियम को भी छन्द कहते हैं । वह भी सीमित करने के कारण मिति ही है । इससे निबद्ध वाक् को वृत्त कहते हैं । वही संस्था है । मिति से छन्द, छन्द से वृत्त, छन्द-वृत्त से वर्ण, वर्णवृत्त से जाति तथा व्यक्ति – इसीप्रकार उत्पत्तिक्रम चलता है । वैदिक परिभाषा में मात्रा और संस्था को ही छन्द कहा गया है (“मा च्छन्दः, प्रमा च्छन्दः, प्रतिमा च्छन्दः”, “इयं वै मा, अन्तरिक्षं प्रमा, असौ प्रतिमा” आदि) ।

मा छन्दः, तत्पृथिवी, अन्निर्देवता ॥ १ ॥ प्रमा छन्दः, तदन्तरिक्षम्, वातो देवता ॥ २ ॥ प्रतिमा छन्दः, तद् द्यौः, सूर्यो देवता ॥ ३ ॥ अस्त्रीवि छन्दः, तद्दिशः, सोमो देवता ॥ ४ ॥ विराट् छन्दः, तद्वाक्, वरुणो देवता ॥ ५ ॥ गायत्री छन्दः, तदजा, बृहस्पतिर्देवता ।। ६ ।। त्रिष्टुप् छन्दः, तद्धिरण्यम्, इन्द्रो देवता ॥ ७ ॥ जगती छन्दः, तद्यौः, प्रजापतिर्देवता ॥ ८ ॥ अनुष्टुप् छन्दः, तद्वायुः, मित्र देवता ।। ९ ।। उष्णिहा छन्दः, तच्चक्षुः, पूषा देवता ॥ १० ॥ पङ्किश्छन्दः, तत्कृषिः, पर्जन्यो देवता ॥ ११ ॥ बृहती छन्दः, तदश्वः, परमेष्ठी देवता ॥ १२ ॥' आपस्तम्बश्रौतसूत्र (१६ । २८ । १) ॥

कृति का अर्थ उत्पत्ति है । जात्याकृति और व्यक्तिकृति वर्णछन्द हैं (मा॒ङ् माने॒ शब्दे॑ च) । इससे वर्णवृत्त वनता है । जिसका मित (मायाकृत) वर्णरूप दिखाइ देता है (मिति से मित हो कर जो स्वरूप वनता है), उसे पिपर्ति (पूरयति बलं यः) – बल को मित कर भरण करने से, अथवा सबका अग्रगामी होने से (पुरति अग्रे गच्छतीति), अथवा सीमित पुर में शयन करने से (पुर्षु शेते य) पुरुष कहा जाता है (शयानो याति सर्वतः – कठ 1-2-21) । शयानो सुषुप्तावस्था । उसमें इन्द्रिय सम्पर्क विच्छिन्न होने से विषय सम्पर्क भी विच्छिन्न होता है । तव उस अविच्छिन्न तत्त्व का विषय संपृक्ति नहीं रहने से दिवि च भुवि च अव्याहत गति होता है । शयानो स्वप्न भी हो सकता है । उसमें विषयव्यापार नहीं होता । परन्तु मन का व्यापार होता है । यह जाग्रत और सुषुप्ति का सान्ध्यावस्था । उसमें भी नूतनसृष्टि होता है (सन्ध्ये सृष्टिराह ही – ब्रह्मसूत्रम् – ३-२-१) । द्वादशतत्त्वयुक्त उस पुरुषका जगत् से भेद करनेवाली षष्ठ तत्त्वको माया कहाजाता है (इदं जगदित्याकारिका ईश्वरनिष्ठा भेदविषयिणी वृत्तिः मायापदवाच्या षष्ठं तत्त्वम्) । यह सामान्य अथवा साधारण माया है । इसके दोभेद महामाया और योगमाया हैं ।

रस-बल की समष्टि अहम् नामक सजातीय-विजातीय-स्वगत भेदशून्य एकमेवाद्वितीयं (छान्दोग्य ६-२-१) अद्वैतब्रह्म है । सत्तासिद्ध रसतत्त्व के आधार में प्रतिष्ठित भातिसिद्ध परिवर्तनशील, क्षणभावापन्न – अतः प्रतिक्षण विलक्षणशील असंख्य बल तत्व का आधारभूत बलकोश का संख्या १६ है । इनमें प्रथम बल माया ही है ।

ब्रह्म ह वा इदमग्र आसीत् । ...... तदभ्यश्राम्यदभ्यतपत् । तस्य श्रान्तस्य तप्तस्य सन्तप्तस्य ललाटे स्नेहो यदार्द्द्रमाजायत । ..... सर्वेभ्यो रोमगर्त्तेभ्यः पृथक् स्वेदधाराः प्रास्यन्दन्त । ..... तद्यदब्रवीदाभिर्वा अहमिदं सर्वं धारयिष्यामि यदिदं किञ्चेति तस्मात् धारा अभवंस्तद् धाराणां धारात्वं यच्चासु ध्रियते । तद्यदब्रवीदाभिर्वा अहमिदं सर्वं जनयिष्यामि यदिदं किञ्चेति तस्माज्जाया अभवंस्तज्जायानां जायात्वम् । .....तद्यदब्रवीदाभिर्वा अहमिदं सर्वमाप्स्यामि यदिदं किञ्चेति तस्मादापा अभवंस्तदपामप्त्वम् । .....

उपरोक्त क्रम से माया, धारा, आपः, जाया, हृदयं, भूतिः, यज्ञः, सूत्रं, सत्यं, यक्षं, अभ्वं, मोहः, वयः, वयोनाधः, वयुनं, – यह बल प्रधान – रस गौणात्मक पञ्चदश अविद्या तथा षोडशतम विद्या नामक रस प्रधान – बल गौण बलकोश का सृष्टि होता है । सत्तासिद्ध अमृतरसलक्षण मूलप्रतिष्ठा के उपर प्रतिष्ठित भातिसिद्ध बलों का परष्पर सम्बन्धतारतम्य ही पञ्चपर्वा प्रकृति के द्वारा अनुप्राणित गुणभूतात्मक क्षरब्रह्मलक्षण विश्वसृट् (ब्रह्मा-विष्णु-इन्द्र-अग्नि-सोम), अणुभूतात्मक पञ्चीकृत क्षरलक्षण पञ्चजन (प्राण-आप-वाक्-अन्नाद-अन्न), रेणुभूतात्मक पञ्च-पञ्चीकृत क्षरलक्षण पुरञ्जन (वेद-लोक-प्रजा-भूत-पशु), तथा भूत-भूतात्मक पञ्च-पञ्च-पञ्चीकृत क्षरलक्षण पुर (स्वयम्भू-परमेष्ठी-सूर्य-पृथिवी-चन्द्रमा) – इस चतुर्धा क्रम से परिणत हो कर अन्ततोगत्वा सर्वथा निरूढा यौगिकावस्थामें आकर सर्वात्मक पञ्चमहाभूतमें विश्रान्ति होता है । इन सब प्रक्रमों से, प्रक्रमसमष्टि रूप अभिक्रमों से, तथा अभिक्रमसमष्टि रूप बलव्यूह से रसाधारमें प्रतिष्ठित बलों का सम्बन्धके तारतम्यों का साम्राज्य है । इसीलिए इस बलतत्त्व को सबका मूलाधारभित्ति कहा जाता है । कहा गया है –

बलं वाव विज्ञानाद्भूयः । बलमित्युपास्व । 
नायमात्मा बलहीनेन लभ्यः ।
बलं सत्यादोजीयः । आदि ।

इन बलों का ३ मूल विभाग और २१ अवान्तर विभाग है ।

१) स्थिरधर्म प्रयोजक बल – भार, आयतनं, स्थानविरोध, विभाज्यता, सान्तरत्वं, संगठनं, स्थितिस्थापकता, चापनं, जडत्वं, अविनश्वरत्वम् ।
२) अस्थिरधर्म प्रयोजक बल – शैत्यम्, आकुञ्चनं, कठिनत्वं, वर्णरूपं, क्षणभङ्गुरत्वं, घनत्वं, द्रवत्वं, विरलत्वम् ।
३) सव्यपेक्षधर्म प्रयोजक बल – नोदना बलं, केन्द्रापगबलम्, आकर्षणबलम् ।

इनका भी नाना अवान्तर विभाग है । यथा नोदना बल के अवान्तर विभाग – पूर्वदेशत्याग-उत्तरदेशसंयोगात्मक गतिबल, बलयोनि-बलमात्रानुबन्धी बलोपनिषद् बल, सम-विषम-वेग-भावानुबन्धी समदिग् बल, सरल-बक्रादिभावानुबन्धी नानादिग् बल, प्रतिदिग्बलद्वयघातात्मिकास्थिति-नानाबलघातपरिवृत्ति-आदि निबन्धन प्रतिदिग्बल आदि ।

(क्रमशः)

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