माया के स्वरूप और भेद – भाग ५

स्वायम्भूवा लोकपितामहेन उत्पादकत्वात् रजसोऽतिरेकात् ।
कालस्य योगात् नियमाबद्धेन क्षेत्रज्ञयुक्तान् कुरुते विकारान् ॥
https://thevyasa.in/2021/07/maya-4/

ब्रह्माण्ड के प्रत्येक वस्तु एक अन्य का सापेक्ष (relative) है (इयं पृथिवी सर्वेषां भूतानां मध्वस्यै पृथिव्यैसर्वाणि भूतानि मधु …. मधुब्राह्मण । everything is interconnected and interdependent) । कार्य-कारण सम्बन्ध अनादि है । प्रत्येक कार्य का कारण भिन्न है । परन्तु इन वैचित्र्य के मध्यमें एक विश्ववृत्तित्व (universal principles – fundamental laws of Nature) भी देखा जाता है । प्रत्येक कार्य का परिणाम एक निर्द्दष्ट नियमसे बद्ध है (laws of physics are same in all frames of reference) । इससे प्रमाणित हो रहा है कि सृष्टिके आरम्भ में किसी एक (Singularity) तत्त्वसे सारे वैचित्र्य सृष्ट हुए हैं । उससमय साधारण जीवों का अभाव रहने से उस अवस्था का वर्णन करना असम्भव है (यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह , न तस्य कार्यं करणं च विद्यते न तत्समश्चाभ्यधिकश्च दृश्यते, आदि) । ऋषियों ने अपने ज्ञानके द्वारा सत् (भाव) से विलक्षण उस असत् (अभाव) तत्त्वका अन्वेषण किया (सतो बन्धुमसति निरविन्दन्हृदि प्रतीष्या कवयो मनीषा – it can only be inferred from the presently available information by regressing backwards).

रस अकर्मक है । पूर्ण रसमें अपूर्ण बल सर्वतः तादात्म्य रूप से सम्बन्ध करता है । यह तादात्म्य सम्बन्ध (coexistence) से सृष्टि सम्भव नहीं है । दोनों स्वतन्त्र और परष्पर असङ्ग हैं । दोनों ही शाश्वत हैं । अतः इनका सम्बन्ध भी विशिष्ट रूपसे शाश्वत है । उनके सम्बन्धमें स्थानावरोध नहीं है । इसमें मात्रानियम भी नहीं है । जब बल सखण्ड हो कर – स्वयं परिच्छिन्न हो कर, अपने सम्बन्ध से अपरिच्छिन्न रस को परिच्छिन्न जैसा प्रतीत कराता है, तब समुद्रजल में तरङ्ग अथवा स्रोत जैसे रस भी परिच्छिन्न प्रतीत होता है । उस परिच्छिन्न – मित (मापने योग्य) भाग (अकर्म) में जब अन्य बल का सम्बन्ध होता है, तब अग्निषोमरूपी स्त्री-पुरुष भाव होता है (positive and negative charges), जिससे सृष्टि सम्भव होता है (चंद्रार्कमध्यमा शक्तिर्यत्रस्था तत्र बन्धनम्) ।

अमित रस को मित जैसा परिच्छिन्न करने के लिए मायाबल के द्वारा भेद सृष्टि कर सर्वप्रथम योषा-वृषा अथवा रयि-प्राण रूपी लिङ्ग सृष्टि किया जाता है (प्रजाकामो वै प्रजापतिः स तपोऽतप्यत, स तपस्तप्त्वा मिथुनमुत्पादयते, रयिश्च प्राणश्चेति. एतौ मे वहुधा प्रजाः करिष्यत इति प्रश्न – १-४ । अन्यत्र च – द्विधा कृतात्मनो देहमर्धेन पुरुषोऽभवत । अर्धेन नारी तस्यां स विराजमसृजत्प्रभु – मनु) । यह स्त्री-पुरुषों का वह अवयव है, जो सृष्टि के उपादान कारण है । यदि योषा सर्वात्मना वृषा के गर्भमें प्रवेश करें, तो अन्न-अन्नाद भाव का सृष्टि होता है । इस सम्बन्धसे सृष्टि नहीं होता । केवल अवयव सम्बन्धसे ही सृष्टि होता है । सोम में रहनेवाला सोमका आधारभूत प्राणविशेष ही पितर है । पिण्डरूपमें परिणत चान्द्रसोम सौरप्रकाशमें प्रकाशित हो कर भास्वर सोम होता है । अन्य ऋतरूप दिक् सोम अन्तरिक्षमें सर्वत्र व्याप्त है । अतः लिङ्ग (charge) दो प्रकारका होता है, जिसे आधुनिक विज्ञानमें वर्णशक्ति आरोपण (color charge of QCD), तथा वैद्युतिकशक्ति आरोपण (electric charge) कहते हैं ।

यह वर्णशक्ति आरोपण (color charge) का सिद्धान्त क्या है ? अणु (atom) का गठन दो पदार्थों का समन्वय से हुआ है – नभ्यस्थ (nucleons, which are also called baryons, जो भावप्रत्यय – directly perceptible – नहीं होते, परन्तु उपायप्रत्यय – indirectly inferred होते हैं), और सर्वस्थ (leptons) । नभ्यस्थ (nucleons) दो प्रकार के होते हैं – देवाः (protons) और असुराः (neutrons), जो उपायप्रत्यय हैं । इन दोनों नभ्यस्थ कणों को जब भग्न किया गया, तो बहुत सारे पदार्थ मिले जिसे वर्गीकरण करने के लिए बौद्धधर्म का अष्टांग मार्ग पद्धति (eight-fold way) अपनाया गया । अन्त में पता चला कि नभ्यस्थ (nucleons) वस्तुओंका गठन कुछ भग्नांश लिङ्ग (fractional charge) वाले पदार्थ से हुआ है, जिसे परिमाण्डल्य (quark) कहा जाने लगा । यह परिमाण्डल्य अनिरुक्त है – जिसे सामान्य अवस्था में अलग से जाना नहीं जा सकता, तथा अणिमा है – जिससे सूक्ष्मतम कुछ हो नहीं सकता । इसलिए इसे बद्ध (permanently confined) कहते हैं । जो परिवारभूत परिग्रह है (develops into a family), उसे निरुक्त कहते हैं । इनका अपर भाग प्रकृतिलयाः (not separately perceptible or perpetually confined) है । अनिरुक्त-प्रकृतिलयाः से ही महिमायुक्त -निरुक्त का उत्पत्ति होता है । इसके स्थान (पृथ्वी, अन्तरीक्ष, द्यौ) भेद से तीन विभाग है, जो वसु-रुद्र-आदित्य से सम्बन्धित हैं । आधुनिक विज्ञानमें इन तीनोंको लिङ्गशक्ति (सामर्थ्य सर्वभावानां – charge) के भेद से up/down, charm/strange, top/bottom quark family कहाजाता है ।

आधुनिकविज्ञानमें इन परिमाण्डल्योंका लिङ्गशक्ति (charge) +२/३ और -१/३ मानाजाता है । परन्तु वैदिकविज्ञानमें इनका लिङ्गशक्ति (+)७/११ और (-) ४/११ मानाजाता है । व्यावहारिक प्रयोगमें वैदिकविज्ञान ही सठीक प्रमाणित होता है । परन्तु आधुनिक विज्ञानमें इसके सम्बन्धित परीक्षण को गुप्त रखा जाता है तथा दबाया जाता है । न्युट्रन के लिङ्गशक्ति को शून्य प्रमाणित करने के लिए यह मिथ्याप्रयास किया जा रहा है । परन्तु न्युट्रन का लिङ्गशक्ति शून्य नहीं है । यह प्रमाणित होनेपर आधुनिक विज्ञानके बहुतसारे सिद्धान्त (जैसे binding energy, exchange force) भूल प्रमाणित हो जायेंगे । इसीलिए ऐसा मिथ्याप्रयास किया जा रहा है । इस विषय पर कोई भी वैज्ञानिक अनेक प्रयास के पश्चात् भी आजतक वैदिक मत को भूल प्रमाणित नहीं कर सकें हैं ।

सर्वस्थ प्रकृतिलयाः हैं । यह भूमा हैं – समुद्र जैसे सर्वव्याप्त हैं । इसके भी स्थानभेद से तीन विभाग है, जिसे समुद्रअर्णव-नभस्वान-सरस्वान कहा जाता है । आधुनिक विज्ञानमें इन तीनोंको electron-muon-tau कहते हैं । यहाँ Electron केलिए समुद्रअर्णव (electron sea) शब्दका व्यवहार कियाजाता है । वर्णशक्ति आरोपण (color charge) को जानने के लिए वैदिकविज्ञान के शरणमें जाना पडेगा । आधुनिक विज्ञानमें लोहित-सबुज-नील (red-green-blue) नामक तीन वर्णशक्ति आरोपण (color charge) कहा जाता है, जो सर्वथा अवैज्ञानिक यदृच्छा नामकरण है ।

अजामेकां लोहितशुक्लकृष्णां बह्वीः प्रजाः सृजमानां सरूपाः। 
अजो ह्येको जुषमाणोऽनुशेते जहात्येनां भुक्तभोगामजोऽन्यः।। (श्वेताश्वेतर उपनिषत् ४-५)

लोहित-शुक्ल-कृष्ण वर्णा तीनवर्णों से युक्त एक अजा (अजन्मा – eternal) प्रकृति (Nature) रज-सत्त्व-तम तीनों गुणों का साम्यावस्था (singularity) है । यह अजा (that which is not created – eternal) प्रकृति, एका (without similars) है । इस अजा का सेवन करता हुआ – शुक्ल-लोहित-कृष्णवर्णा अजा का अनुसरण करता हुआ – कोई अज अजन्मापुरुष (Consciousness, which includes information) – उसमें अपना प्रयोजन सिद्धकर (जोषयति, जोषत्यन्यगुणं – जोषते सेवते – जुषीँ॒ प्रीतिसेव॒नयोः॑ – अथवा जुषँ परि॒तर्क॑ने, परि॒तर्प॑ण॒ इत्य॒न्ये) वहाँ से आगे बढजाता है (जहाति ओँहा॒ङ् गतौ॑) अथवा उसको त्याग (ओँहा॒क् त्या॒गे) देता है । इस त्रिगुणवती एका अजा ने अनेक सरूप (रूपयुक्त – with form, perceptible) प्रजा – सन्तान (अवयव-अवयवी-प्रवाह – creation) – उत्पन्न किए है (महत्तत्त्व, अहङ्कार, पञ्चतन्मात्र, षोड़श विकार ही अजा रूपी प्रकृति के सन्तानें हैं) । ये सब सन्तानें सत्त्व-रज-तममय प्रकाश-प्रवृत्ति-नियम गुण वाले हैं (having characteristics of information, energy and mass respectively) । इनमें सत्त्व लघु एवं प्रकाशक है । रज उपष्टम्भक (अबरोधक – ष्टभिँ॒ऽ प्रतिब॒न्धे, स्त॒म्भुँऽ रोध॑न॒) एवं चल है । तम गुरु एवं आवरक है । प्रकृति के त्रिगुण ही सबके कारण है । गुणसाम्य को प्रकृति कहते हैं (कारणानां गुणानां तु साम्यं प्रकृतिरुच्यते) । यह गुण अपने कार्य को सम्पन्न करने के लिए परस्पर में – 

  • अपने से इतर दो गुणों को अभिभूत कर (ढक) देते हैं (अन्योऽन्याभिभाववृत्तिः) । 
  • अपने से इतर दो गुणों का आश्रय लेते हैं (अन्योऽन्याश्रयवृत्तिः) ।
  • अपने से इतर दो गुणों को निर्बल बनाकर ही अपने कार्य जनन कर पाते हैं (अन्योऽन्यजननवृत्तिः) ।
  • अपने से इतर दो गुणों के साथ मिलकर ही अपने कार्य जनन कर पाते हैं (अन्योऽन्यमिथुनवृत्तिः) ।

इन तत्त्वों को लोहित-शुक्ल-कृष्ण वर्णा क्यों कहा गया तथा इस क्रमसे क्यों रखागया ? रजोगुण को ही लोहित कहा गया है, कारण सृष्टिमें रज ही प्रवर्तक होने से आदि है । यहीं से सृष्टिप्रक्रिया का आरोहण – आरम्भ होने से यह लोहित है (रुह्यते इति रुः॒अँ बीजज॒न्मनि॑ प्रादुर्भा॒वे च॑, रुहेरश्च लो वा – उणादि ३-९४, रस्य लत्वम्) । आवरण के हट जाने से शुद्ध सत्त्वगुण का उदय होता है, जिसे दर्शनशुद्धता के कारण (ईँशुचिँ॑र् पूतीभा॒वे) शुक्ल कहते हैं । तमगुण सबको आवरित कर देने के कारण प्रकाशावरण अन्धकार को जन्मदेता है, जो कृष्णवर्ण होता है ।

पुरुषसूक्त के मत में पादोऽस्य विश्वा भूतानि त्रिपादस्यामृतं दिविनिर्गुण, निर्विशेष ब्रह्म से लेकर केवल शक्तियों के विकाश के जो सीमा है, वह गूढोत्मा नाम से ब्रह्म का प्रथम एकपाद है । सृष्टि हो कर भी, जिसमें इन्द्रियग्रहण योग्यता नहीं होती, वह ब्रह्म का द्वितीयपाद है । आगे चलकर इन्हीं का स्थूलरूप प्रज्ञा और प्राण बनते हैं । शरीर में प्रज्ञा के द्वारा ज्ञान तथा प्राण के द्वारा क्रिया सर्वदा सञ्चालित होते रहते हैं । यह शक्तियों का ही विजृम्भण है (विकसन), कारण बिना आधार के शक्तियाँ नहीं रह सकती । उस समय द्वयं वा इदं न तृतीयमस्ति – गूढोत्मा तथा आवरण – यही दो होते हैं । यह सूक्ष्मभाग शेप (गुप्तस्थान) जैसे वेष्टित (आवरित) रहता है । इसीलिये उसे शिपिविष्ट कहते हैं । शक्तियों का भूतों का सम्मिश्रणसे त्रिवृत्करण रूपी यज्ञ ब्रह्म का तृतीयपाद है । स्थूलता आ जाने पर वर्तमानस्थिति रूप विराट् ब्रह्म का चतुर्थपाद है (चतुष्टयं वा ईदं सर्वम्) ।

(क्रमशः)