पुराणों में कहीं दश या नौ सर्गों में सृष्टि का वर्णन किया गया है। श्रीमद्भागवतम् के तृतीय स्कन्ध के आधार पर यहाँ दशविध सर्ग विज्ञान उद्घाटित किया गया है।
नारायण की प्रेरणा से अव्यक्त मूलप्रकृति में गुणवैषम्य।
द्रव्य-ज्ञान-क्रिया का उदय।
तन्मात्रा – द्रव्यशक्तिमान।
तामसिक अहङ्कार से उत्पन्न पञ्च तन्मात्रा – शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध।
ज्ञान-क्रियात्मक।
राजसिक अहङ्कार से उत्पन्न ५ ज्ञानेन्द्रियाँ और ५ कर्मेन्द्रियाँ।
सात्त्विक वा वैकारिक अहंकार से उत्पन्न इन्द्रियाधिष्ठाता देवताओं और मन की सृष्टि।
अविद्याप्रधान सृष्टि।
तामिस्र, अन्धतामिस्र, तम, मोह और महामोह।
मुख्य स्थावरों की संज्ञा है। वनस्पति, ओषधि, लता, त्वक्सार, वीरुध और द्रुम।
यह प्रायः अन्तःस्पर्श सक्षम और इनके शरीर में सञ्चार नीचे (जड़) से ऊपर (पत्तों) की ओर होता है।
इनमें से प्रत्येक में कोई विशेष गुण रहता है।
काल के ज्ञान से रहित हैं।
तमोगुण की अधिकता के कारण मात्र भोजन, मैथुन और निद्रा आदि का सेवन करते हैं।
सूङ्घने मात्र से इन्हें वस्तुओं का ज्ञान हो जाता है।
विचारशक्ति या दूरदर्शिता इनमें नहीं होती।
गौ, बकरा, भैंसा, कृष्णमृग, सूकर, नीलगाय, रुरु नाम का मृग, भेड़ और ऊण्ट
गधा, घोड़ा, खच्चर, गौरमृग, शरफ और चमरी
कुकुर, गीदड़, भेड़िया, बाघ, बिलाव, खरगोश, साही, सिंह, कपि (बन्दर), हाथी, कूर्म (कछुआ), गोधा (गोह) और मकर (मगरमच्छ) आदि।
कङ्क (बगुला), बटेर, बाज, भास, भल्लुक, मोर, हंस, सारस, चकवा, कौआ और उल्लू आदि।
एक ही प्रकार की।
आहार का प्रवाह ऊपर (मुख) से नीचे की ओर होता है।
मनुष्य रजोगुणप्रधान, कर्मपरायण और दुःखरूप विषयों में ही सुख खोजने वाले होते हैं।
सनतकुमार ४