सौन्दर्य क्या है।

– Basudeba Mishra

सुन्दरता का भाव को सौन्दर्य कहते हैं। कथित है कि –

रूपयौवनसम्पन्ना सुन्दरीत्यभिधीयते। रूप ऒर यौवन सम्पन्न स्त्री को सुन्दरी कहते हैं।

रूप क्या है। चक्षुर्ग्राह्यं भवेद्रूपम्। द्रव्यों का उपलम्भक चक्षुग्राह्य स्पन्दन को रूप कहते हैं। कहते हैं कि –

अङ्गान्याभूषितान्येव वलयादि विभूषणैः (केनचिद्भूषणादिना)।

येन भूषितवत् भाति तद्रूपमिति कथ्यते।

किसी नारी को अलङ्कृत करने के पश्चात् अलङ्कार के साथ साथ जो कुछ अधिक अलङ्कारजैसा आकर्षक दिखता है, उसे रूप कहते हैं। किसी नारी का रूप यदि यौवन से युक्त हो, तो उसे सुन्दरी कहते हैं।

यौवन क्या है – युक्तिपूर्वक कायान्वयन करने का सामर्थ्ययुक्तता (युनो – यु मिश्रे॒णेऽभि॑श्रणे च – भावः)। षोलह वर्ष के आयु पर्यन्त बाल कहा जाता है। षोलह से सत्तर वर्ष के आयु पर्यन्त तरुण (यौवन) कहा जाता है। उससे अधिक होने से वृद्ध तथा नव्वे वर्ष से अधिक आयु होने से वर्षीयान् कहा जाता है।

आषोडशाद्भवेद्वालस्तरुणस्तत उच्यते।
वृद्धः स्यात् सप्तरेरूर्द्ध्वं वर्षीयान् नवतेः परम्।

नवयौवना के लक्षण कहा गया है कि स्तनयुग उन्नत एवं बर्द्धित होकर उनमें सामान्य दूरत्व होना, चलचञ्चल चक्षु, अतिशय स्निग्ध अधरपल्लव में स्मितहास्य, उत्फुल्लित मन एवं अकारण हास्ययुक्त (अकारणं हि हसितं यौवनादिविकारजम्)।

दरोद्भिन्नस्तनं किञ्चित् चलाक्षं मेदुरस्मितम्।
मनागभिस्फुरद्भावं नव्यं यौवनमुच्यते।

कालिदास के मतमें समस्त उपमितद्रव्यों का समूह यदि अपने अपने निर्द्दिष्ट स्थान पर विनिवेशित हो जाये, तो उस समूह से जो अङ्गी का प्रत्यय होता है, उसे सौन्दर्य कहते हैं।

सर्वोपमाद्रव्यसमुच्चयेन यथा प्रदेशं विनिवेशितेन।
सा निर्मिता विश्वसृजा प्रयत्नादेकस्थसौन्दर्यदुदृक्षयेव।

अन्यत्र भी कहा गया है –

अङ्गप्रत्यङ्गकानां यः सन्निवेशो यथोचितम्।
सुश्लिष्टः सन्धिबन्धः स्यात् तत् सौन्दर्यमुदाहृतम्।

अतः सौन्दर्य का अर्थ सुसंहत, सुश्लिष्ट, यथोचित सन्निवेशक्रम का स्वरूप ग्रहण। यह केवल नारी शरीर विशेष में सीमित नहीं है।

लहरीः महातरङ्गः – उल्लोल, कल्लोल। तरति प्लवते इति तरङ्गः (तृपँ तृप्तौ॑। स॒न्दीप॑न॒ इत्येके॑। वायुना नाद्यादिजलस्य तीर्यगूर्द्ध्व प्लवनम् – क्रमनिम्न क्रमोच्च भूम्यादि।

विश्वसृज का कलानैपुण्य से समाहित चित्त का क्रमागत हिन्दोल ही सौन्दर्यलहरी है।