षट्त्रिंशत्तत्त्वानि विश्वम्। (पर्शुरामकल्पसूत्रम्)।
यह विश्व छत्तिश तत्त्वों का समाहार है। यह तत्त्व क्या हैं?
आप्रलयं यत्तिष्ठति सर्वेषां भोगदायी भूतानाम्।
तत्तत्त्वमिति प्रोक्तं न शरीरघटादि तत्त्वमतः। सूतसंहिता।
जो प्रलयपर्यन्त अपने स्वरूप में रहता हुआ प्राणीयों का भोगदायी होता है (भोग का साधन और उपादान बनता है), उसे ही तत्त्व कहते हैं। शरीर, घट आदि नश्वर वस्तु को तत्त्व नहीं कहते। यह छत्तिश तत्त्व क्या हैं? इस में सांख्य के प्रकृति से लेकर महाभूत पर्यन्त 24 तत्त्व हैं। सांख्य का पुरुष का बारह भेद कर के बारहवाँ तत्त्व को जीव कहते हैं। शरीर को पुरण करने से भी उसे पुरुष कहते हैं।
कारणानां गुणानां तु साम्यं प्रकृतिरुच्यते।
तद्भिन्नः पुरुषः प्रोक्तः पूर्णः संक्षिप्तशक्तिकः।
चिदानन्दस्तथेच्छा च ज्ञानं तद्वत् क्रियाऽपि च।
परिपूर्णाश्शक्तयस्तु सङ्कोचात्तु कलादिकाः।
परिपूर्णाश्शक्तयस्तु सङ्कोचात्तु कलादिकाः।
सर्वकर्त्तृत्वरूपा वै क्रियाशक्तिः कलाऽभवत्।
किञ्चित् कर्त्तृत्वरूपेण ज्ञानं सर्वज्ञता तथा।
बुद्धिस्तत्प्रतिबिम्बानां वस्तुनामेव बोधकः।
सङ्कोचनात्तु विद्याख्या सैवाविद्यति गीयते। (परमानन्दतन्त्रे)
सत्त्व, रज, तम – यह त्रिगुण सदा एक दुसरे को अपमर्दन (दवाने) का प्रयास करते रहते हैं। इन का साम्यावस्था (जब इन सब का बल समान हो) को प्रकृति कहते हैं। असमान रहने को (जब एक अन्य को दबाकर रखे, तब जो स्वरूप बनता है, उस नूतन सृष्टि को) ही विकृति कहते हैं। वही विकृति विश्व के उपादान वनते हैं। प्रकृति को छोड कर जो अन्य तत्त्व है, उसे पुरुष कहते हैं। इसका बारह भेद में से जो बारहवाँ जीव नामक पुरुष है, वह पूर्ण होने पर भी सङ्कुचित शक्तिविशिष्ट होता है।
- परमात्मा का ज्ञान सर्वज्ञता है। वही जीवात्मा में सङ्कुचित शक्तिविशिष्ट हो कर विद्या तथा उसका अवशिष्ट अंश अविद्या बन जाता है (जगदहमेवेत्याकारिका या सदाशिवसम्बन्धिनी वृत्तिः सा विद्या पदवाच्या पञ्चमं तत्त्वम् – रत्नत्रयपरीक्षा)।
- माया षष्ठ तत्त्व है। यह अविद्या (बल अथवा कर्म) है। अविद्या के 15 कलायें है – माया, जाया, धारा, आपः, हृदयं, भूतिः, यज्ञः, सूत्रं, सत्यं, यक्षं, अभ्वं, मोहः, वयः, वयोनाधः, वयुनम्। विद्या के साथ यह 16 बलकोश माने जाते हैं। कला भेद से अविद्याके असंख्य भेद हो जाते है। एक एवं अपरिछिन्न विद्याके सम्बन्धसे एकत्व तथा अविद्याके अनेक परिछिन्न सम्बन्धों से अनेकत्व सर्वत्र देखा जाता है (हमारे ज्ञान के वस्तु – जिस के विषयमें हमारा ज्ञान होता है – जैसे की यह मनुष्य है, यह पत्थर है, यह आकाश है, आदि, वह अविद्या के हेतु असंख्य है। परन्तु उन सबके विषयमें हमारा जो “(मैं जानता हुँ कि) यह है” इस प्रकार का ज्ञान रूपी विद्या एकरूप है)। उस विद्याके द्वारा स्मृतिपूर्वक (पूर्व अनुभूत विषयोंका स्मरण कर) वर्तमान काल में घटित होने वाला घटना अथवा वस्तुका तूलना कर “यह वैसा ही है”, इस प्रकार का निश्चय को व्यावहारिक ज्ञान कहते हैं।
विद्या आत्मा का स्वाभाविक गुण है। अविद्या आगन्तु है (जैसे शरीर का रोग)। अतः आत्मा से भिन्नाभिन्न है (जैसे शरीर में रोग कभी रहता है, कभी नहीं रहता)। उसी के द्वारा आत्मा में क्लेश, कर्म, विपाक, आशय उत्पन्न होते हैं। अपरिछिन्न (अखण्ड) विद्या, परिछिन्न (सखण्ड) अविद्या के सम्पर्क में आकर खण्ड खण्ड प्रतीत होती है, जैसे एक ही सूर्य काच के विभिन्न टुकडे से प्रतिफलित होता हुआ अनेक दिखता है। उस प्रत्येक खण्ड को मन कहते हैं (मानँ॒ स्त॒म्भे)। उसीके द्वारा गुणसाम्य अथवा साधर्म्य के कारण जीवमें बोध उत्पन्न होता है (म॒नँ॒ ज्ञाने॑, मनुँ॒ अव॒बोध॑ने)। विद्या पर अविद्या का यह प्रथम प्रभाव है।
उस सत्त्व रूपी मन पर जब रजोगुण के प्रभाव से अविद्या का पुनराय आघात होता है, तो प्रकाशवान् मन अप्रकाश हो जाता है (जैसे स्थिर जल में प्रतिविम्बित चन्द्रमा, जल को ताडित करने से, पूर्व स्पष्ट रूप से नहीं दिखता)। प्रकाशमय शान्त मन अशान्त हो कर क्षोभित हो जाता है। इस भिन्न स्वभाव वाले (प्राग्गमनवान्) मन को प्राण कहते हैं (प्र + अन + अच्, करणे घञ् वा, अनँ॒ प्राण॑ने)। क्षोभित होने से यह सदा चल रहता है। उसी के प्रभाव से मन सदा चञ्चल रहता है। विषस्य विषमौषधम् (विष विष को काटता है) नियम से इस प्राण का आयाम अर्थात दीर्घता (वृद्धि) के द्वारा (प्रणायाम के द्वारा) मन का वशीकरण होता है। इसीलिए सृष्टि और प्रलय जिसका प्राण और अपान स्वरूप है, उस ब्रह्मा पद वाच्य महत्तत्त्व को दीर्घतम प्राणायाम करने के कारण मन भी कहते हैं। बृहत्तम प्राणायाम करने के कारण ब्रह्मा (बृहिँर् वृद्धौ॑) भी कहते हैं। नाभि शरीर का केन्द्र होने से – सब कुछ उससे बद्ध होने से (णः॒अँ॑ बन्ध॑ने), बह्मा को विष्णु के नाभि कमल से विकाश (पुष्पँ वि॒कस॑ने) होना कहा गया है।
प्राण पर जब अविद्याका पुनराय आघात होता है, तो तमोगुणका प्रभाव देखनेको मिलता है। वहाँ ठहराव कि स्थिति आ जाती है। दो विरुद्ध प्राण परष्परका अपमर्दन (दवाते) करते हुये मूर्च्छित (मुर्छाँ मोहनसमुच्छ्रा॒ययोः॑ – वेगाघातादभिघातात्) हो जाते हैं। कुर्वद् रूप (क्रियाशील) प्राण सर्वथा अकर्मण्य हो जाता है। मूर्च्छित हो जाने से उसे मूर्ति कहते हैं। तब उसे वाक् कहा जाता हैं।
न सोऽस्ति प्रत्ययो लोके यः शब्दानुगमादृते।
अनुविद्धं इव ज्ञानं सर्वं शब्देन भासते ॥ वाक्यपदीयम् 1 -131 ॥
संसार में ऐसा कोइ भी प्रत्यय (प्रमा अथवा ज्ञान) नहीं है, जो शब्द का अनुगमन (उपसर्पण – येन रूपेण तावत्पदार्थग्रहः तदेव रूपं तावत्पदार्थानुगमकं तस्य क्रिया) को आदृत (कृतादर, अर्चित) नहीं करता हो। शब्द के द्वारा ही एक द्रव्य से वने हुए पदार्थों में परष्पर भेद किया जाता है। विना शब्द के हम मन में चिन्ता भी नहीं कर सकते। अतः उस मूर्ति को भी हम शब्द के द्वारा प्रकाश करते हैं। पाणिनी ने दिखाया है कि संवृत् अ कार से ही सम्पूर्ण वाङ्मय वनता है। ॐ में अ विन्दु का वोध कराता है। उ कार उसका विकाश है। म कार उसका सीमा निर्द्धारण करता है। कारण अ कार उच्चारण करने के समय कण्ठ से वायु निर्गत हो कर सीधा ओष्ठ के रास्ते निकल जाता है। ओष्ठ उन्मुक्त रहता है। उ कार उच्चारण करने के समय ओष्ठ सङ्कुचित रहता है। यह अपरिछेद्य (असीम) को परिछेद्य (ससीम) वनाता है। यह सृष्टि का प्रतीक है। म कार उच्चारण करने के समय ओष्ठ बन्द हो कर पुनः खोलता है। यह अवसान एवं पुनः सृजन का प्रतीक है। यही सृष्टि-विकाश (स्थिति)-संहार का प्रतीक वन कर महाकाल का स्वरूप को दर्शाता है। यहाँ म कार को छोड दिजीए। विकाश से नूतन सृष्टि क्रम को यदि अवरोह क्रम (उल्टा) कर दिया जाए, तो अ-उ के वदले उ-अ का क्रम बनेगा। उ-अ मिलकर व वनता है (इसलिये विष्णु के लिए अ उ म् – ॐ और शिव के लिए उ अ म् – वम् वोलते हैं)। आ कार बहुलता का प्रतीक है। अतः वा अवरोह क्रम का वाहुल्य अर्थात चलितक्रम का प्रतीक है। अ कार उच्चारण करने के समय कण्ठ को यदि सङ्कुचित कर दिया जाय तो वह क कार वन जाता है। अतः क कार सीमित वस्तु का प्रतीक है। अवरोह क्रम को सीमित करने से ही वस्तु का पिण्ड अथवा मूर्ति वनती है। अतः समस्त मूर्ति (वस्तु) वाक् कहलाते हैं। अविद्या के प्रभाव से एक ही मन के मन-प्राण-वाक् – यह तीन रूप हो गये।
इन तीन मन-प्राण-वाक् के प्रभाव से अविद्या के भी तीन रूप हो जाते हैं। मन के संसर्ग से अविद्या काम वन जाता है। प्राण के संसर्ग से अविद्या कर्म वन जाता है। वाक् के संसर्ग से अविद्या शुक्र अथवा क्लेश वन जाता है। विद्या और अविद्या दोनों आत्मा के स्वरूप होने पर भी उनके आपेक्षिक परिमाण में अन्तर हो सकता है। जहाँ विद्या अविद्या से वहुत अधिक होता है, उसे ईश्वर (परमशिव-शक्ति-सदाशिव के पश्चात् चतुर्थ तत्त्व) अथवा परमात्मा कहते हैं (इदं जगदीति केवलं भेदविषयिणी या वृत्तिः तद्वान् ईश्वर पदवाच्यः तुरीयं तत्त्वम् – रत्नत्रयपरीक्षा)। परन्तु यदि अविद्या विद्या से वहुत अधिक होता है, तो विद्या अनेक भाग से खण्डित हुआ सा दिखता है। उस खण्डित युग्म को जीवात्मा कहते हैं।
जीवात्मा में अविद्या का भाग अधिक होने से भोग की इच्छा अधिक होता है। कारण संक्षिप्तशक्तिक होने से पूर्णता के लिए अपने वाह्य वस्तु को लेने का चेष्टा करता है। वही भोगेच्छा है। काम-कर्म-शुक्र(क्लेश) केवल जीवात्मा में रहता है। परन्तु परमात्मा में विद्या का भाग (अतएव पूर्णता) अधिक होने से वह उदार स्वभाव से अपने शक्ति का विस्तार कर सृष्टि की इच्छा करता है। इससे उसमें सृष्टि के अनुकूल तीन अन्य भाव का उन्मेष होता है। विद्या के वाक् भाग से मन का संसर्ग से काम-कर्म-शुक्र के अनुरूप तीन रूप हो जाते हैं। मन के सम्बन्ध से इच्छा, प्राण के सम्बन्ध से तप और इन दोनों के आत्मा के वाक् भाग के सम्बन्ध से श्रम वनता है। वाक् का शान्ति भङ्ग हो कर नूतन रूप धारण करने के लिए जो क्षोभ होता है, उसे श्रम कहते हैं। इच्छा-तप-श्रम – इन तीनों के विना कोइ भी सृष्टि नहीं होती। यह छह मन-प्राण-वाक्-काम-कर्म-शुक्र(क्लेश) आत्मा के स्वरूप से छिन्न नहीं हो सकते। तो फिर मुक्ति क्या है?
(क्रमशः)