वेदः Veda

वेदः ।

श्रीमद्वासुदेव मिश्रशर्म्मा।

जिसमें समस्त शाश्वत ज्ञान निहित है (विदँ ज्ञाने॑), अथवा जिसमें समस्त सत्तावानवस्तु के विज्ञान है (वि॒दँ॒ सत्ता॑याम्), अथवा उसका विवेचना किया गया है (वि॒दँ॒ वि॒चार॑णे), अथवा जिसका विवेचना करने से हम इच्छितवस्तु को सुगमता से प्राप्त कर सकते हैँ (विदॢँ॑ ला॒भे),अथवा जिसमें जाननेयोग्य सबकुछ है (विदँ॒ चेतनाख्याननिवा॒सेषु॑), उसे वेद कहते हैँ । भरत ने कहा है कि –
न तज्ज्ञानं न तच्छिल्पं न सा विद्या न सा कला ।
नासौ योगो न तत् कर्म नाट्येऽस्मिन् यन्न दृश्यते ॥ नाट्यशास्त्र ॥१-११६ ॥
नाट्यशास्त्रको पञ्चमवेद इसीलिए कहा जाता है कि विश्व में ऐसा कोई भी ज्ञान, शिल्प, विद्या, कला, योग तथा कर्म नहीँ है, जो इस शास्त्रमें नहीँ है ।

सादि-सान्त प्रकृतिवेद, प्राकृतवेद, विश्ववेद, छन्दोवेद, वितानवेद, रसोवेद रूप में तत् तत् प्राकृतिक विशेषताओं के भेद से ऋक्-यजुष्-साम-अथर्व नामों से व्यवस्थित किया गया है । बृहज्जाबालोपनिषत् में कहा गया अग्निषोमात्मकं जगत् इसीके लिये है । ब्रह्मा-विष्णु-इन्द्र रूप हृदयात्मक सत्यप्रजापति गर्भित अग्नि-सोम का समन्वय ही विश्व का स्वरूप व्याख्या है । अग्नि ब्रह्माग्नि, देवाग्नि, भूताग्नि रूपमें त्रेधा विभक्त है । ये ही एकता-द्विता-त्रिता नामसे जाने जाते हैं । इन्हे ही आङ्गीरस आप्त्यादेवता, अग्निभ्रातरः तथा त्रेताग्नि कहा जाता है । भार्गव ब्रह्मणस्पति पवमान सोम तथा वृत्रात्मक अन्नसोम भेद से सोम का दो विभाग है । तीन अग्नि और दो सोम मिलकर 5 होते हैं । इनके पञ्चीकरण से जगत् सर्जना कि जाती है । ये ही ब्रह्मनिःश्वसित वेद है । चेतन-आख्यान-निवास का वोधक होते हुये (विदँ॒ चेतनाख्याननिवा॒सेषु॑) वही वेदशब्द विश्व का वेद है ।

सृष्टिके आरम्भ ब्रह्मके उन्मेषशक्ति से हुआ । उससमय शक्ति वायु रूपसे (यत् – योऽयं पवते) आकाश (जू) में प्रवल वेग से प्रवाहित होने लगा (so-called big bang)। इसीलिए उसका तथा उसका परवर्ती विवर्त तथा निर्माण के विज्ञान को यज्जुर्वेद कहते हैँ (अयं वाव यजुर्योऽयं पवते । एष हि यन्नेवेदं सर्वं जनयति । एत यन्तमिदमनुप्रजायते । तस्माद्वायुरेव यजुः । अयमेवाकाशो जूः यदिदमन्तरिक्षम् । एतं ह्याकाशमनु जवते । तदेतद्यजुर्वायुश्च अन्तरिक्षं च यच्च जुश्च तस्माद्यजुः – शतपथब्राह्मणम् – १०.३.५.१-२) । वही प्रथमवेद है । व्यासदेवने एक यज्जुर्वेद को चारभागमें विभक्त किया । वायु के अवान्तरविभाग एक अन्यसे धक्का खा कर मूर्च्छित हो कर मूर्त्ति बनते हैँ । प्रत्येक वस्तुपिण्ड मूर्त्ति है । उसका विज्ञान ऋग्वेद बना (ऋग्भ्यो जातां सर्वशो मूर्त्तिमाहुः सर्वा गतिर्याजुषी हैव शश्वत् । सर्वं तेजः सामरूप्यं ह शश्वत् सर्वं हेदं ब्रह्मणा हैव सृष्टम् – तैत्तीरियब्राह्मणम् ३/१२/९/३)।

याज्ञिकप्रक्रियामें (electronic interaction of atoms) पञ्च प्रकारके वस्तुधर्म (quantum number) हैं, जिन्हे आश्रयभावः, प्रयोजकभावः, स्थायीभावः, व्यञ्जकभाव तथा सञ्चारीभाव कहते हैं । आश्रयभावः (principal quantum number) ७ है । इनका प्रत्येक का ३ भाग है । उसे अहर्गण कहते हैँ । २१ अहर्गण पर्यन्त पृथ्वीलोक (प्रथति विस्तारयातीति – चरणसंचारयोग्य – nucleus or core to mantle) कहते हैँ । यह आग्नेय है । इसलिए ऋग्वेद की २१ शाखाएँ हैं। प्रत्येक वस्तुके पिण्ड से बाहर एक महिमामण्डल रहता है (radiative zone) । ३३ अहर्गण पर्यन्त द्यौलोक (electron subshells – s subshell has two electrons, p subshell has six electrons, d subshell has ten electrons and f subshell has fourteen electrons, total 32. Including nucleus, 33) रहता है । उसका विज्ञान सामवेद है । इनमें से प्रत्येक का ३० विभाग है । अतः ९९० विभाग हुआ । केन्द्रके १० विभाग को मिलाकर सामवेद का १००० शाखाएँ है । गति का विज्ञान यज्जुर्वेद है । इसका १०० विभाग (यद्द्याव॑ इन्द्र ते श॒तं श॒तं भूमी॑रु॒त स्युः । न त्वा॑ वज्रिन्त्स॒हस्रं॒ सूर्या॒ अनु॒ न जा॒तम॑ष्ट॒ रोद॑सी ॥ ऋग्वेदः ८.७०.५) यज्जुर्वेदः के १०० शाखाएँ है । मूल यज्जुर्वेद को मिलाकर यज्जुर्वेद के १०१ शाखाएँ है । अथर्ववेद रसविज्ञान (consolidation and application) है, जिसके आधाराधेयरूप त्रिवृत्-त्रिवृत् (९) शाखाएँ है । पतञ्जलि ने महाभाष्यमें इसीके विषयमें कहा है । कालक्रमे बिभिन्न गुरुओं के शिक्षा में पाठ-क्रम-विषयभेद हो गया । उससे भी अनेक शाखाएँ हो गए, जो आज प्रचलित है । यह शाखाएँ भिन्न है ।

प्रत्येक वेद के तीन विभाग है – संहिता, ब्राह्मणम्, आरण्यकम् । उपनिषद कोई स्वतन्त्र भाग नहीँ है । ईशोपनिषत् यज्जुःसंहिता का अंश है । अन्य सारे उपनिषत् किसी न किसी ब्राह्मणम् अथवा आरण्यकम् का अंश हैँ । जहाँ छन्दोबन्ध मन्त्र रहते हैँ, उसे संहिता कहते हैँ । यहाँ किसी विषय पर एक साथ कुछ लिखा नहीँ जाता । कारण उसमें पुनरावृत्ति दोष का सम्भावना रहती है । किसी विषयपर जहाँ जितना आवश्यक है, वहाँ उतना ही लिखा जाता है । आगे चलकर जहाँ उसविषय आता है, वहाँ पूर्वलिखित तथ्योंको त्यागकर जितना आवश्यक उतना ही लोखते हैँ । शेष आगे केलिए छोड दिया जाता है । अतः संहिता पुरा पढे बिना किसी विषयका ज्ञान नहीँ होता । वेदमें समस्त विषयका ज्ञान सूक्ष्मरूपसे निहित है । प्रत्येक मन्त्रके ऋषि, छन्द, देवता तथा विनियोग होता है । जो ऋषि, छन्द, और देवता के विनियोगके सम्बन्धको जाने बिना अध्यापनकरे वह पापी बन जाता है (अविदित्वा ऋषिं छन्दो दैवतं योगमेव च । योSध्यापयेद् जपेद् वापि पापीयाञ्जायते तु सः ॥ बृहद्देवता ८/१३६) ॥

ऋषि शब्द के चार अर्थ है – असद्रूप ऋषि, रोचनालक्षण ऋषि (नक्षत्ररूप, जैसे सप्तर्षि), द्रष्टारूप ऋषि, तथा वक्तारूप ऋषि । शतपथब्राह्मणम् ६-१-१-१ के अनुसार “असद वा इदमग्र आसीत् तदाहुः किं तद् असदासीत् ऋषयो वा व तेऽग्रेऽसदासीत । तदाहुः के ते ऋषयः इति प्राणा वा ऋषयः” । अर्थात् सृष्टि के आरम्भ से सब कुछ अव्यक्त था (वस्तुरहित था । केवल शक्ति ही थी, जो वस्तुके बिना प्रकाशित नहीँ हो सकती थी) । वह अव्यक्त, जो परिस्पन्दात्मक प्राणस्वरूप थे, वे ही ऋषि थे । उनको ऋषि क्यों कहा जाता है ? कारण वह अपने श्रम (कर्म) से तथा तप (द्वन्दसहन) से सबकुछ निर्माण किया (श्रमेण तपसा अरिषन्त तस्मात ऋषयः। Interplay of the primordial energy on the universal base called RASA – रसो वै सः and with itself created everything) 1 धर्म अतीन्द्रिय है । उसका जिन्होंने साक्षात्कार किया, उन्होने ही ऋषि बने (साक्षात्कृतधर्माण: ऋषयो बभूवु:) । भिन्न भिन्न ऋषियों के भिन्न भिन्न लक्षण है । प्राणमात्रा ही छन्द है । एक प्रकार के प्राणों के विभिन्न मात्रा में संग्रह को ऋषि तथा बिभिन्न प्राणों के एकत्र समावेश को विभिन्न प्रकार के देवता कहते हैँ ।

वसिष्ठ ऋषिरिति । प्राणो वै वसिष्ठ ऋषिर्यद्वै नु श्रेष्ठस्तेन वसिष्ठोऽथो यद्वस्तृतमो वसति तेनो एव वसिष्ठः प्रजापतिगृहीतया त्वयेति प्रजापतिसृष्टया त्वयेत्येतत्प्राणं गृह्णामि प्रजाभ्य इति प्राणं पुरस्तात्प्रापादयत नानोपदधाति ये नाना कामाः प्राणे तांस्तद्दधाति सकृत्सादयत्येकं तत्प्राणं करोत्यथ यन्नाना सादयेत्प्राणं ह विच्छिन्द्यात्सैषा त्रिवृदिष्टका यजुः सादनं सूददोहास्तत्त्रिवृत्त्रिवृदग्निर्यावानग्निर्यावत्यस्य मात्रा तावत्तत्कृत्वोपदधाति – शतपथब्राह्मणम् – ८.१.१.६ । अर्थात प्राण ही वसिष्ठ ऋषि हैं कारण वही सबमें श्रेष्ठ है । और बहुत व्यापक होकर रहता है, इसलिए भी वह वसिष्ठ है ।

भरद्वाज ऋषिरिति । मनो वै भरद्वाज ऋषिरन्नं वाजो यो वै मनो बिभर्ति सोऽन्नं वाजं भरति तस्मान्मनो भरद्वाज ऋषिः प्रजापतिगृहीतया त्वयेति प्रजापतिसृष्टया त्वयेत्येतन्मनो गृह्णामि प्रजाभ्य इति मनो दक्षिणतः प्रापादयत नानोपदधाति ये नाना कामा मनसि तांस्तद्दधाति सकृत्सादयत्येकं तन्मनः करोत्यथ यन्नाना सादयेन्मनो ह विच्छिन्द्यात्सैषा त्रिवृदिष्टका तस्योक्तो बन्धुः । शतपथब्राह्मणम् – ८.१.१.९ । अर्थात मन ही भरद्वाज ऋषि है अन्न का नाम वाज है और अन्न से ही मन परिपुष्ट होता है । अतः वही भरद्वाज कहलाती है ।

जमदग्निर्ऋषिरिति । चक्षुर्वै जमदग्निर्ऋषिर्यदेनेन जगत्पश्यत्यथो मनुते तस्माच्चक्षुर्जमदग्निर्ऋषिः प्रजापतिगृहीतया त्वयेति प्रजापतिसृष्टया त्वयेत्येतच्चक्षुर्गृह्णामि प्रजाभ्य इति चक्षुः पश्चात्प्रापादयत नानोपदधाति ये नाना कामाश्चक्षुषि तांस्तद्दधाति सकृत्सादयत्येकं तच्चक्षुः करोत्यथ यन्नाना सादयेच्चक्षुर्ह विच्छिन्द्यात्सैषा त्रिवृदिष्टका तस्योक्तो बन्धुः । शतपथब्राह्मणम् – ८.१.२.३ । चक्षु जमकान ही दग्नि ऋषि है । जगमत् अर्थात् जगत् को जिससे जाना जाए, उस शब्द से ग लोप होकर जमत् शब्द बनता है । जगत् को जिससे जाना जाए, वह जमत् चक्षु है । वही जमत् अग्नि भी है । अतः वह जमदग्नि है ।

विश्वामित्र ऋषिरिति । श्रोत्रं वै विश्वामित्र ऋषिर्यदेनेन सर्वतः शृणोत्यथो यदस्मै सर्वतो मित्रं भवति तस्माच्छ्रोत्रं विश्वामित्र ऋषिः प्रजापतिगृहीतया त्वयेति प्रजापतिसृष्टया त्वयेत्येतच्छ्रोत्रं गृह्णामि प्रजाभ्य इति श्रोत्रमुत्तरतः प्रापादयत नानोपदधाति ये नाना कामाः श्रोत्रे तांस्तद्दधाति सकृत्सादयत्येकं तच्छ्रोत्रं करोत्यथ यन्नाना सादयेच्छ्रोत्रं ह विच्छिन्द्यात्सैषा त्रिवृदिष्टका तस्योक्तो बन्धुः । शतपथब्राह्मणम् – ८.१.२.६ । आदि । कान ही विश्वामित्र ऋषि है । कान से ही वह सब कुछ सुना जाता है, जो हमें प्रिय है । हम उसी को मित्र बनाते हैँ ।

शक्ति ही विश्व का सञ्चालक है । यह प्रत्येक पदार्थ को कुछ विशिष्ट नियम से छन्दित कर रखा है । उसे वैदिकछन्द कहते हैँ । यह लौकिकछन्द से भिन्न है । जिस दृश्यमान विषयके सम्बन्धमें कहा गया है, वह उस मन्त्रके देवता है (अर्थमिच्छन्नृषिर्देंवं यं यमाहायमस्त्विति । प्राधान्येन स्तुवन्भक्त्या मन्त्रस्तद्देव एव सः)। अर्थात जिस पदार्थ की कामना से ऋषि जिस देवता की स्तुति करने पर अर्थापतित्व को चाहता हुआ स्तुति करता है, वह मन्त्र उस देवता वाला हो जाता है (यत्कामऋषिः: यस्या देवतायामार्थशपत्यममच्छन् स्तुवतां प्रयुङ्क्क्ते तद् दैवताः स मत्रों भवति – निरुक्त) ।

वेदों के विषय ।

स्तुतिः प्रशंसा निन्दा च संशयः परिदेवना । स्पृहाशीः कत्थना याञ्चा प्रश्नः प्रैषः प्रवह्लिका ।। ३५।।
नियोगश्चानुयोगश्च श्लाघा विलपितं च यत् । आचिख्यासाथ संलापः पवित्राख्यानमेव च ।। ३६ ।।

वेद में स्तुति, प्रशंसा, निन्दा, संशय, परिदेवना (अनुशोचने कृतस्य कर्मणोऽनुचितत्वधियानुतापे विलापे च), स्पृहा, आशीष, दम्भ, याचना, प्रश्न, प्रैष (क्लेश, मर्द्दन), प्रवल्हिका (प्रहेलिका), नियोग, अनुयोग, श्लाघा (प्रशंसा कथन), विलाप, वृतान्तकथन, वार्त्तालाप, पवित्र आख्यान, आदि है ।

जहाँ यज्ञप्रक्रिया का हेतु, निर्वचन, निन्दा, प्रशंसा, संशयो तथा विधान आदि किया गया है, उसे ब्राह्मणम् कहते हैँ । जहाँ मन्त्रों का वैज्ञानिक आलोचना तथा व्यवहार किया गया है, उसे आरण्यक तथा जहाँ आत्मसम्बन्धि चर्चा है, उसे उपनिषत् कहते हैँ । व्यावहारिक दृष्टि से मूर्ती (वस्तु) के व्यवहारज्ञान अर्थशास्त्र है । गति का व्यवहारज्ञान धनुर्वेद है । विस्तार का व्यवहारज्ञान गन्धर्ववेद है । रस का व्यवहारज्ञान आयुर्वेद है ।

वेद में स्तुति है । स्तुति वह है जिसमें किसी का नाम (classification and nomenclature), रूप (physical characteristics). कर्म (chemical characteristics) तथा बान्धव (interactive potential) के विषयमें चर्चा की गयी हो (स्तुतिस्तु नाम्ना रूपेण कर्मणा बान्धवेन च) । किसी कर्म से जो फलप्राप्ति होता है, उसे आशिष कहते हैं (स्वर्गायुर्धनपुत्राद्यैर् अर्थैराशीस्तु कथ्यते)। शब्दके द्वारा उच्चरित होने पर जिस द्रव्य का प्रतीति होता है, उसप्रकार अक्षरयुक्त प्रतीति को नाम कहते हैँ (शब्देनोच्चारितेनेह येन द्रव्यं प्रतीयते । तदक्षरविधौ युक्तं नामेत्याहुर्मनीषिणः)। नौ प्रकारके विचार से नामकरण किया जाता है । वह है – निवास, कर्म, रूप, मङ्गल, वाक्य, आशिष. यदृच्छा, उपवसन, तथा विशिष्ट व्यक्तित्व । यास्क, गार्ग्य तथा रथीतर चार प्रकारके विचार से नामकरण करते हैँ – आशिष.अर्थवैरूप्य, वाक्य तथा कर्म । शौनक केवल कर्म का ही विचार करते हैं, कारण अन्य सबका कर्ममें ही अन्तर्भाव हो जाता है।

(सर्वाण्येतानि नामानि कर्मतस्त्वाह शौनकः । आशी रूपं च वाच्यं च सर्वं भवति कर्मतः। प्रजाः कर्म समुत्था हि कर्मतः सत्त्वसङ्गतिः। क्वचित्संजायते सच्च निवासात्तत् प्रजायते । यादृच्छिकं तु नामाभिधीयते यत्र कुत्र चित् । औपम्यादपि तद् विद्याद् भावस्यैवेह कस्यचित् । नाकर्मकोऽस्ति भावो हि न नामास्ति निरर्थकम् । नान्यत्र भावन्नामानि तस्मात् सर्वाणि कर्मत)।