व्याकरणम् ।
श्रीमद्वासुदेव मिश्रशर्म्मा।
मुखं व्याकरणं स्मृतम् – व्याकरण वेद का मुखस्थानीय है । अर्थात् पदपदार्थज्ञानशक्ति है ।
व्यक्त, व्युत्पन्न एवं सार्थक शब्द ही संस्कृतभाषाको अन्यतरीभाषासे विशेष वनाता है । शब्द तथा अर्थका सम्पूर्ण समन्वय ही वागार्थ है । कोष तथा व्याकरणके द्वारा उस शब्दभण्डारकी सृष्टि तथा चयन एवं समीचिन प्रयोग का यत्किञ्चित शक्ति आती है ।
शब्दोऽपि वाचकस्तावत् लक्षको व्यञ्जकस्तथा ।
वाच्य, लक्ष तथा व्यङ्ग्य भेदसे शब्द त्रिविध है । व्युत्पत्तिके आधार पर कुछलोग पद का रुढ, यौगिक, योगरुढ तथा यौगिकरुढ – यह चार भेद किया जाता है । परन्तु नागेश रुढ, यौगिक, योगरुढको ही मानते हैं (मञ्जूषा)। पण्डित जगन्नाथ केवलसमुदायशक्ति, केवलअवयवशक्ति, समुदायअवयवशक्ति संकर – यह मानते हैं । ॠ ॡ क् सूत्रके भाष्यमें पतञ्जलिने जाति, गुण, क्रिया, यदृच्छा रूपमें चारप्रकार शब्दप्रवृत्तिके विषयमें कहा है । इन्द्रने एक अखण्डा वाक् को प्रकृति प्रत्यय भेद से व्याकृ (हिंसित, खण्डित) किया था । तभी से इस प्रक्रिया को व्याकरण कहते हैं । कहागया है –
समुद्रवत् व्याकरणं महेश्वरे तदर्द्धकुम्भोद्धरणं बृहस्पतौ ।
तद्भागभागाच्च शतं पुरन्दरे कुशाग्रबिन्दुत् पतितं हि पाणिनौ ॥
यदि शिवजी के व्याकरण का ज्ञान को एक समुद्र के साथ तुलना किया जाय, तो बृहस्पति का ज्ञान अर्धकुम्भ मात्र होगा । इन्द्र का ज्ञान उसका शतभाग से एकभाग होगा । और पाणिनी के व्याकरण का ज्ञान कुशाग्रमात्र होगा । शिक्षाग्रन्थों तथा प्रातिशाख्य प्रत्येक पद का निर्वचन करते हैं । परन्तु पाणिनी ने ऐसा नहीं किया । विषयवस्तु का क्रम भी दोनों मे भिन्न है । यास्क के निरुक्त और निघण्टु, शान्तनव के फिट् सूत्र, व्याडि के जटापटल, वररूची के धातुपाठ – इन सबका व्यवस्थान अष्टाध्यायी से भिन्न है । उपसर्गके व्यवहार वेद और अष्टाध्यायीमें भिन्न है । वेदमें यह भिन्न रहते हैं, परन्तु अष्टाध्यायीमें यह क्रियापदसे युक्त रहते हैं । वेदमें ळ (जैसे अग्निमीळे) व्यवहार होता है । परन्तु अष्टाध्यायीमें नहीं । वेदमें पुंलिङ्ग अकारान्त शब्द – जैसे देवः – का कतृकारक रूप देवासः हो सकता है । परन्तु अष्टाध्यायीमें यह केवल देवाः होगा । उसी प्रकार वेद में करण कारक वहुवचन में देवेभिः होता है, जब कि अष्टाध्यायीमें यह देवैः होता है । ऐसे और भी वहुतसारे उदाहरण है जो दिखाता है कि वैदिक और संस्कृत भाषायें भिन्न है ।
व्याकरण आठ प्रकार का है – ब्राह्म, ऐन्द्र, याम्य, रौद्र, वायव्य, वारुण, सावित्र तथा वैष्णव । कौमार व्याकरण स्वल्प समयमें कथित संस्कृत शिखने के लिए है । पाणिनीकृत अष्टाध्यायी तथा दक्षिणका तोल्काप्पियम् (जो तमिल का पूर्ववर्ती है । इसके तीन भाग हैं – एझुत्ताधिकारम्, सोल्लाधिकाराम् और पोरुलाधिकारम् । प्रत्येक भाग में नौ-नौ अध्याय हैं) ऐन्द्र व्याकरण के आश्रित है ।
संस्कृतसे लेकर समस्त साधारण अथवा लौकिक (लोकेविदिता लौकिकाः) भाषा का शुद्धता उसके व्याकरणसे निर्णय किया जाता है, जैसेकि पतञ्जलि के व्याकरण महाभाष्य के आरम्भमें लिखागया है । परन्तु इसके विपरीत वैदिकव्याकरण का शुद्धता उसके वेदसम्मत होनेसे सिद्धहोता है (वेदेविदिता वैदिकाः)। अतः वैदिकव्याकरण लौकिकव्याकरणसे भिन्न होता है, जैसेकि पतञ्जलिने कहा है । उसी वैदिकभाषा को पाणिनीने छन्दस् कहा है (उदाहरण – छन्दसो यदणौ – अष्टाध्यायी ४-३-७१)। भागवत १-४-१३ में भी कहागया है कि मन्ये त्वां विषये वाचां स्नातमन्यत्र छान्दसात् ।
रक्षोहागमलघ्वसन्देहाः प्रयोजनम् । ( महाभाष्य नवा ०१ )
व्याकरण के ५ उद्देश्य हैं ।
१. वेदों की रक्षा ।
२. ऊह (तर्क) – यथा स्थान, विभक्ति-परिवर्तन, वाच्य परिवर्तन आदि ।
३. आगम – स्तुता मया वरदा वेदमाता आदि वैदिक आदेशों की पूर्ति ।
४. लघु – संक्षिप्त ढंग से शब्द-ज्ञान ।
५. असन्देह – सन्देह का निवारण, ये सभी मुख्यरूप से वैदिक साहित्य के उद्देश्यों की पूर्ति करते हैं ।
च॒त्वारि॒ शृङ्गा॒ त्रयो॑ अस्य॒ पादा॒ द्वे शी॒र्षे स॒प्त हस्ता॑सो अस्य। त्रिधा॑ ब॒द्धो वृ॑ष॒भो रो॑रवीति म॒हो दे॒वो मर्त्याँ॒ आ वि॑वेश ॥३॥ (ऋग्० ४/५८/३) ॥
चत्वारि शृङ्गाः – नाम‚ आख्यात‚ उपसर्ग‚ निपात ।
त्रयः पादाः – भूतकाल‚ वर्तमानकाल‚ भविष्यकाल ।
द्वे शीर्षे – सुप् (सु‚ औ‚ जस् आदि)‚ तिड्。(तिप्‚ तस्‚ झि आदि) ।
सप्तहस्ताः – प्रथमा‚ दि्वतीया‚ तृतीया‚ चतुर्थी‚ पंचमी‚ षष्ठी‚ सप्तमी ।
त्रिधा बद्धः – उरस्‚ कण्ठः‚ शिरस् ।
पतञ्जलि ने इस वृषभ को संस्कृत भाषा के रूप में देखा जिसके चार सीङ्ग चार प्रकार के पद – नाम (संज्ञा), आख्यात (क्रिया), उपसर्ग व निपात जैसे उसकी रक्षा करते हैं । उसके तीन पाद भूत, भविष्यत् व वर्तमान में उसको स्थित करते हैं । दो सिर उसकी जैसे दो आत्माएँ हैं – नित्य और कार्य शब्द । उसके सात हाथ सात विभक्तियाँ हैं जो उसे अर्थ ग्रहण करना रही हैं (विभक्तियाँ केवल नामपदों के लिए कही गई हैं, परन्तु उपलक्षण से क्रियापदों के लकार और उपसर्ग व निपात के अव्ययीभाव का भी यहां ग्रहण कर लेना चाहिए) । तीन प्रकार से जो वह बद्ध कहा गया है, वे शब्दोच्चारण के स्थान हैं – छाती, कण्ठ व सिर । मनुष्य के शरीर में इन स्थानों से ही शब्द का उच्चारण होता है, जैसे वह इन स्थानों से बन्धा हो । वृषभ इसलिए कहा गया है, क्योंकि वह (ज्ञान, और उससे सुख की) वर्षा करता है । चिल्लाना इसलिए क्योंकि शब्द ध्वन्यात्मक है । यह महान प्रकाशक देव मरणधर्मा मनुष्यों में प्रवेश करता है । जिससे हमारा इस महान् देव से साम्य हो, इसलिए व्याकरण पढ़ना चाहिए ।
एकमात्रो भवेद् ह्रस्व: द्विमात्रो दीर्घ उच्यते ।
त्रिमात्रश्च प्लुतो ज्ञेयो व्यञ्जनम् चार्धमात्रकम् ।
स्वयं राजन्ते इति स्वर: – इस परिभाषा के अनुसार दीर्घ उच्चारण के समय जो स्वयं अपने स्वरूपमें रहता है – विकृत नहीं होता, (जैसै अ ऽ ऽ …), उसे स्वर कहते हैं । इनके समुदाय को अच् (प्रत्याहार) कहते हैँ । मुख्यतः यह तेरह है – अ । आ । इ । ई । उ । ऊ । ऋ । ॠ । ऌ । ए । ऐ । ओ । औ ॥ संस्कृत में ९ प्लुत स्वर भी होते हैं । ॡ भी एक स्वर है । परन्तु इसका व्यवहार सीमित है । अं और अः स्वर नहीं हैं । यह स्वराश्रित (स्वर – जैसै अ – के आश्रय में रहनेवाला) अथवा स्वरादि (स्वर जिसके आदि में हो – जैसे कविं – अनुस्वार के आदि में इ है, वेदः – विसर्ग के आगे अ है) होते हैँ । इनके उच्चारणकाल एकमात्रा (साधारण श्वास लेने का समय) होता है । जिन शब्दों के अन्त में स्वर (अच्) होता है, वह शब्द अजन्त (अच् + अन्त) शब्द कहलाता है ।
अष्टौ स्थानांनि वर्णानामुरः कण्ठः शिरस्तथा ॥ जिह्वामूलं च दन्ताश्च नासिकोष्ठौ च तालु च ॥ १३ ॥
संस्कृत वर्णमाला में उच्चारण स्थान और प्रयत्न का बहुत महत्व है । उच्चारण स्थान को अष्टधा विभाजित किया गया है – उर, कण्ठ, शिर, जिह्वामूल, दन्त, नासिका, ओष्ठ, तालु ।
अकुहविसर्जनीयानां कण्ठः – अ, आ, कवर्ग और विसर्ग का कण्ठ-स्थान है । अतः ये कण्ठ्य हैं।
इचुयशानां तालु – इ, ई, चवर्ग, य और श का तालु-स्थान है । ये तालव्य हैं ।
ऋटुरषाणां मूर्धा – ऋ, ऋ, टवर्ग, र और ष का मूर्धा-स्थान है । ये मूर्धन्य हैं।
लुतुलसानां दन्ता – लु, ल, तवर्ग, ल और स का दन्त-स्थान है । ये दन्त्य हैं
उपूपध्मानीयानाम् औष्ठी – उ, ऊ, पवर्ग उपध्मानीय अर्थात् प, फ का ओष्ठ-स्थान हैं। ये ओष्ठ्य हैं।
ञमङणनानां नासिका च – ञ, म, ङ, ण और न का नासिका स्थान है । अतः ये अनुनासिक वर्ण हैं।
एदैतो:कण्ठ-तालु – ए और ऐ का कण्ठ-तालु स्थान है।
ओदौतो: कण्ठोष्ठम् – ओ और औ का कण्ठ- -ओष्ठ्य स्थान है ।
वर्णो के उच्चारण करने में लगनेवाली प्रयास को प्रयत्न कहते हैं । यह आभ्यान्तर-बाह्य भेद से दो प्रकार का होता है ।
वर्णो के उच्चारण के पूर्व मुख के भीतर जो प्रयास होता है, उसे आभ्यान्तर प्रयत्न कहते हैँ । यह पांच प्रकार का होता है –
१. स्पृष्ट – स्पृष्टं प्रयत्नं स्पर्शानाम् । इस में जिह्वा, तालु-मूर्धा-दन्त आदि उच्चारण स्थानों को स्पर्श करती हैं । क से म पर्यन्त इनको स्पर्श वर्ण कहते हैं ।
२. ईषत् स्पृष्ट – ईषत्स्पृष्टम् अन्तःस्थानम् । इस प्रयत्न में जिह्वा उच्चारण स्थान को इषत् स्पर्श करती है, जैसे य् व् र् ल् (यण् प्रत्याहार) अन्तस्थ वर्ण ।
३. विवृत – विवृतं स्वराणाम् । विवृत उच्चारण स्वर वर्णों का है, जिस में मुख को विवृत करना पड़ता है ।
४. ईषत् विवृत – ईषत् विवृतम् उष्मणाम् । ऊष्म वर्ण श् ष् स् ह् (शल् प्रत्याहार) जिसमें जिह्वा को ईषत् विवृत करना पड़ता है ।
५. संवृत – ह्रस्वस्य अवर्णस्य प्रयोगे संवृतम् । संवृत में वायु का मार्ग बन्द रहता है । उच्चारणावस्था में ह्स्व अ का प्रयत्न संवृत होता है ।
बाह्य प्रत्यन – मुख जब वर्ण बाहर निकलने लगते हैं उस समय उच्चारण की जो चेष्टा होती है, उसे बाह्य चेष्टा कहते हैं । बाह्य प्रत्यन ८ प्रकार के होते हैं ।
१. विवार, २. संवार, ३.श्वास, ४. नाद, ५. घोष, ६. अघोष, ७. अल्पप्राण, ८. महाप्राण । ९. उदात्त, १०. अनुदात्त, ११. स्वरित भी इसी वर्ग में हैं ।
कम्पन के आधार पर वर्ण द्विधाविभक्त होते है – घोष वर्ण, अघोष वर्ण । घोष वर्णों का उच्चारण करने पर नाद अधिक होती है । अघोषमें इसके विपरीत । समस्त स्वर वर्ण घोष होते हैं ।
विवार-श्वास-अघोष । खरो विवारा: श्वास अघोषश्च । ख्, फ्, छ्, ठ् थ् च्,ट्, त् क् प् श् ष् स् (खर् प्रत्याहार) के अन्तर्गत आने वाले वर्णो का बाह्य प्रयत्न विवार श्वास तथा अघोष होते हैं ।
संवारः-नाद-घोष । हशः संवारा नादा घोषश्च । ह्, य्, व्, र् ल्, ञ्, म्, ङ् न् झ् भ घ ढ ध ज ब ग ड द् (हस् प्रत्याहार) के अन्र्तगत आने वाले वर्णो का बाह्य प्रयत्न संवार नाद घोष होते हैं ।
अल्पप्राण – वर्गांणां प्रथमा तृतीया पंचमा यणश्च अल्पप्राणाः । जिस वर्ण का उच्चाण करने के लिए अल्प वायु की आवश्यकता होती है – जैसे स्पर्शवर्णों के प्रथम , द्वितीय, तृतीय वर्ण तथा यण् प्रत्याहार के वर्ण (य व र ल) – यह १९ व्यंजन वर्णो का बाह्य प्रयत्न को अल्पप्राण कहते हैं ।
महाप्राण – वर्गाणां द्वितीयचतुर्थौ शलश्च महाप्राणाः । जिस वर्ण का उच्चाण करने के लिए अधिक वायु की आवश्यकता होती है – जैसे स्पर्शवर्णों उसे महा के द्वितीय-चतुर्थवर्ण तथा शल् प्रत्याहार के वर्ण (श ष स ह) – यह १४ व्यंजन वर्णो का बाह्य प्रयत्न को महाप्राण कहते हैं ।
उदात्त अनुदात्त और स्वरित प्रयत्न केवल स्वरों के होते हैं ।
उदात्त – उच्चैरुदातः – मुख के भीतर जो कण्ठ तालु आदि उच्चारण स्थान के ऊर्ध्व भाग से उच्चारण किए जाने वाले स्वर ।
अनुदात्त – नीचैरनुदातः – कण्ठ तालु आदि उच्चारण स्थान के निम्न भाग से उच्चारण किए जाने वाले स्वर ।
स्वरित – समाहारः स्वरितः – उदात्त और अनुदात्त का समाहार ।
अर्थवोधक अक्षर को व्यञ्जन कहते हैं – व्यज्यते वर्णान्तरसंयोगेन द्योत्यते ध्वनिविशेषो येन तद् विज्ञानम् व्यञ्जनम् । यह स्वराश्रित होते हैं – स्वर जैसा स्वतंत्र रूप से उच्चारित नहीं होते – जैसे क् अ ऽ ऽ … । इनके उच्चारणकाल अर्द्धमात्रा (साधारण श्वास लेने का समय का आधा) होता है । अतः इसमें अपना ध्वनि नहीँ, स्वर की ध्वनि सुनाई देती है । इनके समुदाय को हल् कहते हैं । जैसा कि –
स्पर्शवर्ण – कवर्ग, चवर्ग, टवर्ग, तवर्ग और पवर्ग के २५ वर्ण स्पर्श वर्ण हैं । (कादयोमावसानाः स्पर्शा:)।
घोषवर्ण – पाँचों वर्गों के तृतीय, चतुर्थ और पञ्चम वर्ण तथा य्, र्, ल्, व् और ह् घोषवर्ण हैं ।
अघोषवर्ण – सभी वर्गों के प्रथम और द्वितीय वर्ण तथा श्, ष्, स् को अघोषवर्ण कहते हैं ।
अल्पप्राण – सभी वर्गों के प्रथम, तृतीय और पंचम वर्ण तथा य, र, ल, व्, अल्पप्राण हैं ।
महाप्राण – सभी वर्गों के द्वितीय और चतुर्थ वर्ण तथा श्, ष्, स्, ह, महाप्राण हैं ।
अन्त:स्थ – य, र, ल, व् को अन्तःस्थ वर्ण कहते हैं ।
उष्मवर्ण – श्, ष, स्, ह उष्म वर्ण हैं ।
अयोगवाह – अनुस्वार और विसर्ग को अयोगवाह कहते हैं ।
कृदन्त प्रत्यय – जो किसी शब्द के अन्त में युक्त होकर उस शब्द के अर्थ में परिवर्तन कर देते हैं, उस शब्दांश को प्रत्यय कहते हैं । धातु के अन्त में प्रयुक्त होने वाले प्रत्ययों को कृत प्रत्यय कहते हैं और उनके संयोग से बने शब्द को कृदन्त कहते हैं ।
तद्धित प्रत्यय – प्रातिपदिक के अन्त में प्रयुक्त होने वाले प्रत्ययों को तद्धित प्रत्यय कहते हैं और उनके संयोग से बने शब्द को तद्धितान्त कहते हैं ।
संस्कृत में लट् , लिट् , लुट् , लृट् , लेट् , लोट् , लङ् , लिङ् , लुङ् , लृङ् – ये दस लकार होते हैं । यह दस प्रत्यय हैं जो धातुओं में जोड़े जाते हैं । सभी प्रत्ययों के प्रारम्भ में ‘ल’ है इसलिए इन्हें ‘लकार’ कहते हैं । इन में से आरम्भ के छः लकारों के अन्त में ‘ट्’ है- लट् लिट् लुट् आदि इसलिए यह टित् लकार भी कहे जाते हैं । उसीप्रकार अन्त के चार लकार ङित् कहे जाते हैं । इनका प्रयोग विभिन्न कालों की क्रिया दर्शित करने के लिए किया जाता है ।
लट् वर्तमाने लेट् वेदे भूते लुङ् लङ् लिटस्तथा । विध्याशिषोर्लिङ् लोटौ च लुट् लृट् लृङ् च भविष्यति ॥
(१) लट् लकार (वर्तमान काल) के लिए ।
(२) लिट् लकार (अनद्यतन परोक्ष भूतकाल जो अपने साथ न घटित होकर किसी इतिहास का विषय हो, उस) के लिए ।
(३) लुट् लकार (अनद्यतन भविष्यत् काल, जो आज का दिन नहीँ, भविष्य के लिए हो, उस) के लिए ।
(४) लृट् लकार (सामान्य भविष्यत् काल, जो आने वाले किसी भी समय में हो, उस) के लिए ।
(५) लेट् लकार (यह लकार केवल वेद में कालातीत ईश्वर) के लिए ।
(६) लोट् लकार (यह लकार आज्ञा, अनुमति, प्रशंसा, प्रार्थना आदि) के लिए ।
(७) लङ् लकार (अनद्यतन भूत काल – आज का दिन छोड़ कर किसी अन्य दिन) के लिए ।
(८) लिङ् लकार = इसमें दो प्रकार के लकार होते हैं –
(क) आशीर्लिङ् (किसी को आशीर्वाद देने) के लिए ।
(ख) विधिलिङ् (किसी को विधि बताने) के लिए ।
(९) लुङ् लकार (सामान्य भूत काल) के लिए ।
(१०) लृङ् लकार (ऐसा भूत काल जिसका प्रभाव वर्तमान पर्यन्त हो, उस) के लिए ।
वचन – संस्कृत में तीन वचन होते हैं- एकवचन, द्विवचन तथा बहुवचन । संख्या में एक होने पर एकवचन का, दो होने पर द्विवचन का तथा दो से अधिक होने पर बहुवचन का प्रयोग किया जाता है ।
लिंङ्ग – पुंलिंङ्ग, स्त्रीलिंङ्ग, नपुंसकलिंङ्ग ।
पुरुष तीन ही है –
प्रथम पुरुष (third person) – स:, सा, कुमारः, रामः, गोविन्दः
मध्यम पुरुष (second person) – त्वम्, युवाम्, युयम्
उत्तम पुरुष (First person) – अहं, आवाम्, वयम्
कारक नाम – वाक्य के भीतर उपस्थित चिह्न, जैसे –
कर्ता – ने ।
कर्म – को ।
करण – से, द्वारा ।
सम्प्रदान – के लिये ।
अपादान – से, भिन्न ।
सम्बन्ध – का के की रा, रे, री, ना, ने, नी
अधिकरण – मे, पे, पर ।
सम्बोधन – हे, अरे ।
समास पूर्व पद को उत्तर पद से जोडने के प्रक्रिया हैं । उसके विपरीत प्रक्रिया को विग्रह कहते हैं । समास के छह भेद है – १) द्वन्द्व, २) तत्पुरुष, ३) कर्मधारय, ४) बहुव्रीहि, ५) अव्ययीभाव, ६) द्विगु ।
व्याकरणशास्त्र के पञ्च अङ्ग हैं – सूत्रपाठ, धातुपाठ, गणपाठ, उणादिपाठ तथा लिंगानुशासनम् ।