व्याख्या · महाभारत — खण्ड ६
इन्द्र-मतंग संवाद - ब्राह्मणत्व प्राप्ति की दुर्लभता - महाभारत
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महाभारत — खण्ड ६ · अनुशासनपर्वणि · अध्याय 26–29 · पृष्ठ 372–385
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भीष्म → युधिष्ठिर · क्या अन्य वर्ण कर्मों द्वारा ब्राह्मणत्व प्राप्त कर सकते हैं?
भीष्म पितामह जब युधिष्ठिर को गंगाजी की महिमा सुना रहे थे, तब उस पावन चर्चा के बीच एक अत्यंत गंभीर प्रश्न उठा। युधिष्ठिर ने अपनी जिज्ञासा प्रकट करते हुए पूछा कि यदि कोई व्यक्ति ब्राह्मणत्व पाने की तीव्र इच्छा रखे, तो वह किस मार्ग से इस दुर्लभ अवस्था को प्राप्त कर सकता है? [अनुशासनपर्वणि · पृष्ठ 373] भीष्मजी ने उत्तर दिया कि हे तात! क्षत्रिय, वैश्य या शूद्र—इन तीनों वर्णों के लिए ब्राह्मणत्व प्राप्त करना अत्यंत कठिन है, क्योंकि यह समस्त प्राणियों के लिए सर्वोत्तम स्थान है। [अनुशासनपर्वणि · पृष्ठ 373]
श्रुत्वेतिहासं भीष्मोक्तं गङ्गायाः स्तवसंयुतम् ।
युधिष्ठिरः परां प्रीतिमगच्छद् भ्रातृभिः सह ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय ! भीष्मजीके द्वारा कहे हुए श्रीगंगाजीकी स्तुतिसे युक्त इस इतिहासको सुनकर भाइयोंसहित राजा युधिष्ठिरको बड़ी प्रसन्नता हुई ।
इस सर्वोच्च स्थान यानी ब्रह्मत्व की प्राप्ति के मार्ग कठिन हैं। भीष्मजी समझाते हैं कि कोई जीव अनेक योनियों में बार-बार जन्म लेता है और बहुत कम सौभाग्यशाली होते हैं जो ब्राह्मण योनि में जन्म लेते हैं। [अनुशासनपर्वणि · पृष्ठ 373] यदि कोई अन्य वर्ण का व्यक्ति इस उच्चतर अवस्था को पाना चाहता है, तो उसे तपस्या जैसे महान कर्मों की शरण लेनी होगी या फिर वेदों का स्वाध्याय करना होगा; क्योंकि केवल इन्हीं कठिन उपायों से उस स्थान की पात्रता सिद्ध होती है। [अनुशासनपर्वणि · पृष्ठ 373]
बह्वीस्तु संसरन् योनीर्जायमानः पुनः पुनः ।
पर्याये तात कस्मिंश्चिद् ब्राह्मणो नाम जायते ॥
तात ! बहुत - सी योनियोंमें बारंबार जन्म लेते - लेते कभी किसी समय संसारी जीव ब्राह्मणकी योनिमें जन्म लेता है ।
इसी संदर्भ में भीष्मजी एक प्राचीन कथा सुनाते हैं जिसे इन्द्र मतंग संवाद के रूप में जाना जाता है। यह वृत्तांत मतंग और एक गधिनि के बीच हुए उस कठोर संवाद का है जिसने एक व्यक्ति का जीवन बदल दिया। [अनुशासनपर्वणि · पृष्ठ 374] कथा कुछ इस प्रकार है कि एक ब्राह्मण पुत्र था जिसका नाम मतंग था। वह गुणों से संपन्न था और उसे समाज में ब्राह्मण ही माना जाता था। [अनुशासनपर्वणि · पृष्ठ 374] एक बार अपने पिता के आदेश पर वह किसी यजमान के यहाँ यज्ञ कराने जा रहा था। उसका रथ गधों द्वारा खींचा जा रहा था। मार्ग में, मतंग ने क्रोधवश एक छोटे गधे की नाक पर बार-बार चाबुक चलाया, जिससे उस निरीह पशु की नाक लहूलुहान हो गई। [अनुशासनपर्वणि · पृष्ठ 374]
यह दृश्य देखकर उस गधे की माता, जो पुत्र-स्नेह से भरी थी, तड़प उठी। उसने अपने बेटे को सांत्वना देते हुए ऊँचे स्वर में कहा, "बेटा! शोक मत कर, तेरे ऊपर कोई ब्राह्मण नहीं, बल्कि एक चाण्डाल सवार है।" [अनुशासनपर्वणि · पृष्ठ 374] गधिनि ने आगे यह भी कहा कि ब्राह्मणों में ऐसी क्रूरता नहीं होती; वे तो सबके प्रति मैत्रीभाव रखते हैं। उसने मतंग के स्वभाव को उसकी निम्न जाति का प्रमाण बताते हुए कहा कि वह अपनी चाण्डाल योनि का ही सम्मान बढ़ा रहा है। [अनुशासनपर्वणि · पृष्ठ 374]
अयं तु पापप्रकृतिर्बाले न कुरुते दयाम् ।
स्वयोनिं मानयत्येष भावो भावं नियच्छति ॥
यह स्वभावसे ही पापात्मा है ; इसीलिये दूसरेके बच्चेपर दया नहीं करता है । यह अपने इस कुकृत्यद्वारा अपनी चाण्डाल योनिका ही सम्मान बढ़ा रहा है । जातिगत स्वभाव ही मनोभावपर नियन्त्रण करता है ।
यह सुनकर मतंग स्तब्ध रह गया। उसने रथ से उतरकर उस गधिनि से प्रश्न किया, "हे महाप्राज्ञ! तुझे कैसे ज्ञात हुआ कि मैं चाण्डाल हूँ? मेरी माता के किस कर्म से मेरा ब्राह्मणत्व नष्ट हुआ? मुझे विस्तार से बता।" [अनुशासनपर्वणि · पृष्ठ 375] तब गधिनि ने अत्यंत कड़वे शब्दों में सत्य उजागर किया कि वह एक मदमत्त ब्राह्मणी और एक शूद्र नाई की संतान है, इसी व्यभिचार के कारण उसका जन्म चाण्डाल योनि में हुआ और उसका ब्राह्मणत्व नष्ट हो गया। [अनुशासनपर्वणि · पृष्ठ 375]
ब्राह्मण्यां वृषलेन त्वं मत्तायां नापितेन ह ।
जातस्त्वमसि चाण्डालो ब्राह्मणयं तेन तेऽनशत् ॥
गदही बोली - मतंग ! तू यौवनके मदसे मतवाली हुई एक ब्राह्मणीके पेटसे शूद्रजातीय नाईद्वारा पैदा किया गया , इसीलिये तू चाण्डाल है और तेरी माताके इसी व्यभिचार कर्मसे तेरा ब्राह्मणत्व नष्ट हो गया है ।
सत्य के इस आघात ने मतंग को झकझोर दिया। वह तुरंत अपने घर लौटा और पिता से कहा, "पिताजी! यह मानवेतर योनि की गदही मुझे ब्राह्मणी के गर्भ से पैदा हुआ चाण्डाल बता रही है, इसलिए अब मैं महान तप में लग जाऊँगा।" [Page: 375-376] मतंग ने दृढ़ निश्चय किया कि वह अपनी वर्तमान स्थिति को बदलकर ब्रह्मत्व की प्राप्ति करेगा। वह एक विशाल वन में चला गया और ऐसी घोर तपस्या करने लगा कि उससे देवता भी संतप्त हो उठे। [अनुशासनपर्वणि · पृष्ठ 376]
एवमुक्त्वा स पितरं प्रतस्थे कृतनिश्चयः ।
ततो गत्वा महारण्यमतपत् सुमहतु तपः ॥
पितासे ऐसा कहकर मतंग तपस्याके लिये दृढ़ निश्चय करके घरसे निकल पड़ा और एक महान् वनमें जाकर वहाँ बड़ी भारी तपस्या करने लगा ।
उसकी तपस्या इतनी प्रखर थी कि स्वयं देवराज इन्द्र (पुरंदर) उसके सम्मुख प्रकट हुए। इन्द्र ने आश्चर्य से पूछा, "मतंग!
तुम मानवीय भोगों का त्याग कर यह कठिन तप क्यों कर रहे हो?" [अनुशासनपर्वणि · पृष्ठ 376] मतंग ने स्पष्ट शब्दों में कहा, "मैंने ब्राह्मणत्व प्राप्त करने की इच्छा से यह तप प्रारंभ किया है और उसे पाकर ही मैं यहाँ से जाऊँगा।" [अनुशासनपर्वणि · पृष्ठ 376] इन्द्र ने उसकी बात सुनी, परंतु स्वर में एक चेतावनी थी। उन्होंने कहा कि जिसे तुम माँग रहे हो वह विप्रत्व तुम्हारे लिए अत्यंत दुर्लभ है; क्योंकि जो पुण्यात्मा नहीं हैं या जिनका अंतःकरण शुद्ध नहीं है, उनके लिए यह असंभव है।
ब्राह्मण्यं कामयानोऽहमिदमारब्धवांस्तपः ।
गच्छेयं तदवाप्येह वर एष वृतो मया ॥
मतंगने कहा — मैंने ब्राह्मणत्व प्राप्त करनेकी इच्छासे यह तपस्या प्रारम्भ की है । उसे पा करके ही यहाँसे जाऊँ , मैं यही वर चाहता हूँ ।
इन्द्र की चेतावनी सुनकर मतंग का हृदय विचलित होने के बजाय और भी दृढ़ हो गया। उन्होंने अपनी आँखें मूँद लीं और संयमपूर्वक एक कठिन व्रत का संकल्प लिया। वह तपस्या में इतने लीन हो गए कि सौ वर्षों तक एक पैर पर अडिग खड़े रहे [अनुशासनपर्वणि · पृष्ठ 378]। उनकी इस जिद्द को देखकर महायशस्वी इन्द्र पुनः उनके सम्मुख प्रकट हुए, परंतु उनके स्वर में अभी भी वही कठोरता थी। उन्होंने मतंग को समझाते हुए कहा, "तात! ब्राह्मणत्व अत्यंत दुर्लभ है। इसे माँगने पर भी तुम प्राप्त नहीं कर सकोगे। बेटा! दुःसाहस न करो, क्योंकि तुम्हारे लिए यह धर्म का मार्ग नहीं है। इस उत्तम स्थान की अभिलाषा करते-करते तुम शीघ्र ही काल के गाल में समा जाओगे" [अनुशासनपर्वणि · पृष्ठ 378]।
देवतासुरमर्त्येषु यत् पवित्रं परं स्मृतम् ।
चण्डालयोनौ जातेन न तत् प्राप्यं कथंचन ॥
‘ देवताओं , असुरों और मनुष्योंमें भी जो परम पवित्र माना गया है उस ब्राह्मणत्वको चाण्डालयोनिमें उत्पन्न हुआ मनुष्य किसी तरह नहीं पा सकता '
इन्द्र ने मतंग को उस दुर्गम यात्रा का बोध कराते हुए बताया कि जिसे वह इतनी सहजता से माँग रहे हैं, वह वास्तव में सर्वभूतों में श्रेष्ठता है, जिसे 'ब्राह्मणत्व' कहा जाता है [अनुशासनपर्वणि · पृष्ठ 377]। उन्होंने चेतावनी दी कि देवताओं, असुरों और मनुष्यों में जो परम पवित्र माना गया है, उसे चाण्डाल योनि में जन्मा मनुष्य किसी भी रीति से प्राप्त नहीं कर सकता [अनुशासनपर्वणि · पृष्ठ 377]। इन्द्र ने आगे स्पष्ट किया कि जब कोई प्राणी पशु-पक्षी की योनि छोड़कर मनुष्य रूप में आता है, तो वह सर्वप्रथम 'पुल्कस' या चाण्डाल के रूप में ही जन्म लेता है, जिसमें कोई संशय नहीं है [अनुशासनपर्वणि · पृष्ठ 378]।
तिर्यग्योनिगतः सर्वो मानुष्यं यदि गच्छति ।
स जायते पुल्कसो वा चण्डालो वाप्यसंशयः ॥
' पशु - पक्षीकी योनिमें पड़े हुए सभी प्राणी यदि कभी मनुष्ययोनिमें जाते हैं तो पहले पुल्कस या चाण्डालके रूपमें जन्म लेते हैं — इसमें संशय नहीं है ।
इन्द्र ने इस कठिन सोपान-क्रम का विवरण देते हुए कहा कि पुल्कस एक पापयोनि पुरुष है और वह सुदीर्घकाल तक इसी योनि के चक्र में फँसा रहता है [अनुशासनपर्वणि · पृष्ठ 379]। उसके बाद, जब तीस गुना समय व्यतीत होता है, तब जाकर वह 'वैश्यता' को प्राप्त करता है, परंतु वहाँ भी वह चिरकाल तक भटकता रहता है [अनुशासनपर्वणि · पृष्ठ 379]। इसके पश्चात, एक हजार वर्षों (दशशते काल) के लंबे अंतराल के बाद वह 'शूद्रता' की योनि में प्रवेश करता है और वहाँ भी अनेक जन्मों तक चक्कर लगाता रहता है [अनुशासनपर्वणि · पृष्ठ 379]।
तमुवाच ततः शक्रः पुनरेव महायशाः ।
ब्राह्मण्यं दुर्लभं तात प्रार्थयानो न लप्स्यसे ॥
तब महायशस्वी इन्द्रने पुनः आकर उससे कहा – ' तात ! ब्राह्मणत्व दुर्लभ है । उसे माँगनेपर भी पा न सकोगे ।
कथा आगे बढ़ी तो इन्द्र ने बताया कि इस संघर्षपूर्ण यात्रा में साठ गुना समय बीतने पर वह 'राजन्' (क्षत्रिय) की योनि में आता है [अनुशासनपर्वणि · पृष्ठ 379]। फिर पुनः साठ गुना काल व्यतीत होने के बाद वह 'ब्रह्मबन्धुता' को प्राप्त करता है, जहाँ वह लंबे समय तक परिवर्तित होता रहता है [अनुशासनपर्वणि · पृष्ठ 379]। इसके पश्चात दो सौ (द्विशते) वर्षों का समय बीतने पर वह 'काण्डपृष्ठता' की अवस्था में पहुँचता है और वहाँ भी चिरकाल तक निवास करता है [अनुशासनपर्वणि · पृष्ठ 379]।
मतङ्ग परमं स्थानं प्रार्थयन् विनशिष्यसि ।
मा कृथाः साहसं पुत्र नैष धर्मपथस्तव ॥
मतंग ! तुम इस उत्तम स्थानको माँगते - माँगते मर जाओगे । बेटा ! दुःसाहस न करो । तुम्हारे लिये यह धर्मका मार्ग नहीं है ।
इन्द्र ने मतंग को उस अंतिम कठिन मार्ग से अवगत कराते हुए कहा कि तीन सौ (त्रिशते) वर्षों के बाद वह 'जपता' बनता है, जो केवल गायत्री-मात्र का जप करने वाला ब्राह्मण होता है [अनुशासनपर्वणि · पृष्ठ 379]। अंततः, जब चार सौ (चतुःशते) वर्षों का समय और व्यतीत हो जाता है, तब वह 'श्रोत्रिय' यानी वेदवेत्ता ब्राह्मण के कुल में जन्म लेता है [अनुशासनपर्वणि · पृष्ठ 379]। इन्द्र ने स्पष्ट किया कि यदि कोई अधम द्विज शोक, हर्ष, राग-द्वेष, अतिमान और अतिवाद जैसे शत्रुओं को जीत ले तो सद्गति पाता है, अन्यथा ताड़ के वृक्ष से गिरने वाले फल की भाँति नीचे गिर जाता है [अनुशासनपर्वणि · पृष्ठ 380]।
तांश्चेज्जयति शत्रून् स तदा प्राप्नोति सद्गतिम् ।
अथ ते वै जयन्त्येनं तालाग्रादिव पात्यते ॥
यदि वह इन शत्रुओंको जीत लेता है तो सद्गतिको प्राप्त होता है और यदि वे शत्रु ही उसे जीत लेते हैं तो ताड़के वृक्षके ऊपरसे गिरनेवाले फलकी भाँति वह नीचे गिरा दिया जाता है ।
इन्द्र की इन बातों ने मतंग को गहरे शोक में डुबो दिया। वे गया जाकर अंगूठे के बल पर सौ वर्षों तक खड़े रहे और फिर अपनी तपस्या को चरम पर ले जाते हुए एक हजार वर्षों तक एक पैर पर ध्यानमग्न रहे [अनुशासनपर्वणि · पृष्ठ 381]।
जब यह समय पूर्ण होने को आया, तब वृत्रासुर के शत्रु इन्द्र पुनः आए और अपनी वही बात दोहराई कि चाण्डाल योनि में जन्मे व्यक्ति के लिए ब्राह्मणत्व असंभव है [अनुशासनपर्वणि · पृष्ठ 381]। मतंग ने अत्यंत व्याकुल होकर प्रश्न किया, "देवराज!
मैंने ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए एक हजार वर्षों तक तप किया है, फिर मुझे यह पद कैसे नहीं मिल सकता?" [अनुशासनपर्वणि · पृष्ठ 381]।
इन्द्र ने मतंग की ओर देखा और अत्यंत स्पष्ट शब्दों में कहा, "मतंग! इस जन्म में तुम्हारे लिए ब्राह्मणत्व की प्राप्ति असंभव दिखायी देती है। यह पद अत्यंत दुर्लभ है और काम-क्रोध जैसे लुटेरों से घिरा हुआ है" [अनुशासनपर्वणि · पृष्ठ 382]। इन्द्र ने आगे समझाया कि ब्राह्मणत्व वह सर्वोत्तम स्थान है जिसे क्षत्रिय, वैश्य या शूद्र द्वारा प्राप्त करना अत्यंत कठिन है। उन्होंने बताया कि जो ब्राह्मण अपनी तपस्या के प्रभाव से कुछ चाहता है, वह उसे प्राप्त कर लेता है; वास्तव में ब्राह्मण समस्त प्राणियों में सर्वश्रेष्ठ और सबको योगक्षेम प्रदान करने वाला होता है [अनुशासनपर्वणि · पृष्ठ 382]।
पूजयन् सुखमाप्नोति दुःखमाप्नोत्यपूजयन् ।
ब्राह्मणः सर्वभूतानां योगक्षेमसमर्पिता ॥
जो ब्राह्मणका आदर करता है वह सुख पाता है , और जो अनादर करता है वह दुःख पाता है । ब्राह्मण समस्त प्राणियोंको योगक्षेमकी प्राप्ति करानेवाला है ।
इन्द्र ने मतंग को चेताया कि वे इस दुष्प्राप्य पद का आग्रह छोड़कर कोई दूसरा वर मांगें। उन्होंने तर्क दिया कि जो व्यक्ति दुर्लभ धन पाकर भी उसके महत्त्व को नहीं समझता, वह पापियों में भी अधम है; ठीक वैसे ही ब्राह्मणत्व को पाकर भी उसका पालन न करना घोर दुःख की बात है [अनुशासनपर्वणि · पृष्ठ 383]। यह सुनकर मतंग व्यथित हो उठे और बोले, "देवराज! मैं पहले से ही दुःख से आतुर हूँ, फिर तुम मुझे क्यों पीड़ा दे रहे हो? मैं तो तुम्हारे लिए शोक करता हूँ कि जन्म से ब्राह्मण होकर भी तुम उस पद को अपना नहीं रहे हो" [अनुशासनपर्वणि · पृष्ठ 383]। मतंग ने अपनी व्यथा प्रकट करते हुए कहा कि वे एकान्त में आनंदपूर्वक रहते हैं, परिग्रहों से दूर हैं और अहिंसा का पालन करते हैं, फिर भी केवल माता के दोष के कारण उन्हें इस दुर्भाग्यपूर्ण अवस्था में रहना पड़ रहा है [अनुशासनपर्वणि · पृष्ठ 383]।
मतङ्ग ब्राह्मणत्वं ते विरुद्धमिह दृश्यते ।
ब्राह्मण्यं दुर्लभतरं संवृतं परिपन्थिभिः ॥
इन्द्रने कहा — मतंग ! इस जन्ममें तुम्हारे लिये ब्राह्मणत्वकी प्राप्ति असम्भव दिखायी देती है । ब्राह्मणत्व अत्यन्त दुर्लभ है ; साथ ही वह काम - क्रोध आदि लुटेरोंसे घिरा हुआ है ।
इन्द्र ने मतंग की तपस्या के उस कठोर स्वरूप का वर्णन किया जब उनका शरीर दुर्बल हो गया था, नसें उभर आयी थीं और वे हड्डियों का ढाँचा मात्र रह गए थे। जब धर्मात्मा मतंग स्वयं को संभाल न सके और गिर पड़े, तब समस्त भूतों के हित में तत्पर रहने वाले इन्द्र ने दौड़कर उन्हें अपनी भुजाओं में थाम लिया [अनुशासनपर्वणि · पृष्ठ 382]। इस करुणापूर्ण क्षण में इन्द्र ने उनसे कहा, "तुम मुझसे वर माँगो" [अनुशासनपर्वणि · पृष्ठ 384]।
मतंग ने विनम्रतापूर्वक प्रार्थना की, "हे पुरंदर! यदि मैं आपकी कृपा का पात्र हूँ, तो मुझे ऐसा वर दें कि मैं इच्छानुसार विचरने वाला और रूप धारण करने वाला आकाशचारी देवता बनूँ। मैं ब्राह्मणों और क्षत्रियों के विरोध से रहित होकर सर्वत्र पूजा प्राप्त करूँ और मेरी अक्षय कीर्ति का विस्तार हो" [अनुशासनपर्वणि · पृष्ठ 384]। इन्द्र ने प्रसन्न होकर उन्हें वरदान दिया, "वत्स! तुम स्त्रियों के पूजनीय होओगे और 'छन्दोदेव' के नाम से तीनों लोकों में तुम्हारी अनुपम ख्याति होगी" [अनुशासनपर्वणि · पृष्ठ 384]।
ब्राह्मणः कुरुते तद्धि यथा यद् यच्च वाञ्छति ।
वह्वीस्तु संविशन् योनीर्जायमानः पुनः पुनः ॥
पर्याये तात कस्मिंश्चिद् ब्राह्मण्यमिह विन्दति । ब्राह्मण जो - जो जिस प्रकार करना चाहता है , अपने तपके प्रभावसे वैसा ही कर सकता है । तात ! जीव इस जगत्के भीतर अनेक योनियोंमें भ्रमण करता हुआ बारंबार जन्म लेता है । इसी तरह जन्म लेते - लेते कभी किसी समयमें वह ब्राह्मणत्वको प्राप्त कर लेता है ।
इस प्रकार वरदान प्राप्त कर इन्द्र अंतर्धान हो गए। मतंग ने इस सत्य को स्वीकार किया कि पुरुषार्थ द्वारा दैव का उल्लंघन नहीं किया जा सकता, क्योंकि जिस ब्राह्मणत्व के लिए उन्होंने इतना प्रयत्न किया, वह उन्हें नहीं मिला [अनुशासनपर्वणि · पृष्ठ 384]।
अंततः, अपने प्राणों का परित्याग कर मतंग उस उत्तम स्थान (ब्रह्मलोक) को प्राप्त हुए [अनुशासनपर्वणि · पृष्ठ 384]। इस संवाद से यह सिद्ध हुआ कि ब्राह्मणत्व परम उत्तम स्थान है, किंतु अन्य वर्णों के लिए इसे प्राप्त करना अत्यंत दुर्लभ है [अनुशासनपर्वणि · पृष्ठ 385]।
एवमेतत् परं स्थानं ब्राह्मण्यं नाम भारत ।
तच्च दुष्प्रापमिह वै महेन्द्रवचनं यथा ॥
भारत ! इस तरह यह ब्राह्मणत्व परम उत्तम स्थान है । जैसा कि इन्द्रका कथन है , उसके अनुसार यह इस जीवनमें दूसरे वर्णके लोगोंके लिये दुर्लभ है ।
सार
इन्द्र ने मतंग को स्पष्ट किया कि चाण्डाल योनि में जन्म लेने के कारण उनके लिए ब्राह्मणत्व प्राप्त करना असंभव है और उन्होंने उसे इस दुष्प्राप्य पद का आग्रह छोड़कर अन्य वर मांगने की चेतावनी दी। मतंग ने अपनी व्यथा व्यक्त करते हुए इन्द्र से प्रार्थना की कि उन्हें एक ऐसा वर दें जिससे वे सर्वत्र पूजा प्राप्त करने वाले और अक्षय कीर्ति वाले आकाशचारी देवता बन सकें। इन्द्र ने प्रसन्न होकर उन्हें 'छन्दोदेव' के नाम से तीनों लोकों में प्रसिद्ध होने का वरदान दिया, जिसे पाकर मतंग ने यह सत्य स्वीकार किया कि पुरुषार्थ द्वारा दैव का उल्लंघन नहीं किया जा सकता और अंततः प्राणों का परित्याग कर उन्होंने ब्रह्मलोक प्राप्त किया।
References
महाभारत — खण्ड ६ · अनुशासनपर्वणि · पृष्ठ 372–385
- दानधर्मपर्वणि इन्द्रमतङ्गसंवादे — पृष्ठ 372–385 · [अनुशासनपर्वणि · पृष्ठ 372]
क्रम: 15/18 सोपान — ब्रह्मत्व → तपस्या → वेदों का स्वाध्याय → इन्द्र मतंग संवाद → ब्रह्मत्व की प्राप्ति → ब्राह्मणत्व → पुल्कस → वैश्यता → शूद्रता → राजन् → ब्रह्मबन्धुता → काण्डपृष्ठता → जपता → श्रोत्रिय → वर्ण → क्षत्रिय → वैश्य → शूद्र
15 श्लोक मूल ग्रन्थसे शब्दशः उद्धृत। 1,738 शब्द, 3 भागोंमें।