What is Vaisheshika वैशेषिक क्या है?

वैशेषिक का ज्ञाता आज के समय में कोइ नहीं है। इसके विषय में बहुत ही भ्रान्त धारणायें है। रावणकृत कटन्दी, भरद्वाजवृत्ति तथा अत्रिभाष्य लुप्त हो चुका है। परम्परा से प्राप्त यत्किञ्चित् सामान्य अवधारणा है, उसीसे यहाँ उस भ्रान्ति का निराकरण किया जा रहा है। वैशेषिक क्षर का निरूपण करता है, जो विश्व का समवायी कारण (material cause or constituent) है। अतः सर्वप्रथम क्षर क्या है और विश्वरचना में उसका क्या भूमिका है, यह जानना चाहिये।

दे॒वानां॑ यु॒गे प्र॑थ॒मेऽस॑तः॒ सद॑जायत।
तदाशा॒ अन्व॑जायंत॒ तदु॑त्ता॒नप॑द॒स्परि॑॥ऋग्वेदः सूक्तम् १०.७२.३॥

असद्वा इदमग्र आसीत्‌। ततो वै सदजायत। तदात्मानँ स्वयमकुरुत। तस्मात् तत्सुकृतमुच्यत इति। यद्वै तत्‌सुकृतम्‌। रसो वै सः। रसँ ह्येवायं लब्ध्वाऽऽनन्दी भवति। … अथ सोऽभयं गतो भवति ॥ तैत्तिरीय उपनिषद् २.७.१.॥

द्वाविमौ पुरुषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च।
क्षरः सर्वाणि भूतानि कूटस्थोऽक्षर उच्यते ॥

उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः परमात्मेत्युदाहृतः।
यो लोकत्रयमाविश्य बिभर्त्यव्यय ईश्वरः ॥श्रीमद्भगवद्‌गीता १५ – १६/१७॥

गताः कलाः पञ्चदश प्रतिष्ठा देवाश्च सर्वे प्रतिदेवतासु।
कर्माणि विज्ञानमयश्च आत्मा परेऽव्यये सर्व एकीभवन्ति ॥ मुण्डकोपनिषद् ३.२.७.॥

जगत् के दो रूप है – निरुक्त तथा अनिरुक्त। जो पृथक् रूपसे स्पष्ट जानाजाय, वही निरुक्त है। शेष अनिरुक्त है। दृश्यमान अनन्त विश्व – जिसका उपरामनहीं है – वह निरुक्त है। निरुक्ति से पूर्व जो उन्मुग्ध, अव्याकृत, निर्विकल्प अवस्था है, वह अनिरुक्त है। अनिरुक्तका दो भेद है – सर्वअनिरुक्त जो एक है, तथा आपेक्षिकअनिरुक्त जो अनेक है। सर्वअनिरुक्त आपेक्षिकअनिरुक्त में लीन हो जाता है। अनिरुक्त नभ्य और सर्व भेद से द्विधा विभक्त है। यही प्रतिष्ठा है। सवका केन्द्रमेंस्थित नभ्यअनिरुक्त अणिमा है। महिमामण्डलस्थित सर्वअनिरुक्त भूमा है। समस्त निरुक्त अनिरुक्तनिष्ठ है। नभ्य सर्वथा अनिरुक्त है। अणुहोनेसे उसका विभाजन असम्भव है। वह ऋक् है – प्रतिष्ठा है। उसमें स्थित क्रियाशक्तिका यत् (जोऽयं पवते) एवं जू (आकाश) दो विभागसे यज्जु वनता है। उसका महिमामण्डल साम वनता है, जिसे सर्व कहते हैं। सवकुछका उसीमें अन्तर्भाव हे। परममहान् (analog) होनेसे उसकेविषयमें सवकुछ जानना असम्भव है। परन्तु खण्डखण्ड करके (digitized version of the analog one) उसके विषयमें जाना जासकता है।

नभ्यअनिरुक्त अपने अवतार और विकासकेकारण ज्ञेयहोता है। केन्द्रशक्तिकी अपने ही शक्तिके संसर्गसे जो व्यक्तिकरण होता है, उसे अवतार कहते हैं। उसी केन्द्रशक्तिका अन्य अनेकप्रकारके विचित्र संसर्गसे जो व्यक्तिकरण होता है, उसे विकास कहते हैं। अपरिणामी ब्रह्मसे ही परिणामिनी सत्ता, चेतनादि व्यक्तहोते हैं। वही अपरिणामी ब्रह्म “अजायमानो बहुधा व्यजायत”, “एकोहं बहुस्याम”, “इन्द्रो मायाभिः पुरुरूप ईयते” इत्यादि श्रुतिसे अर्थात अजायमान, अखण्डैकरस, अद्वितीय और एक परमतत्त्व, मायाबलसे बहुरूपमें जायमानसा प्रतीत होता है। वही उसका निरुक्तावस्था है।

“एकमेवाद्वितीयम्” में “एक” शव्द विजातीयभेद (जैसे फलों में विजातीय आम, जामुन, केला आदि का भेद) का निराकरण करता है। “एव” शव्द सजातीयभेद (जैसे सजातीयफल आम में लङ्गडा, सुन्दरी, चौसार, दशेरी आदिका भेद) का निराकरण करता है। “अद्वितीयम्” शव्द स्वगत (जैसे एकही आममें छिलका, शस, गुटली आदिका) भेदका निराकरण करता है। अतः चैतन्य एक एवं भेदशून्य है।

परिणाम द्विविध है – औपादानिक और लाक्षणिक। जिसमें एकाधिक उपादान का संयोग है, उसका उपादान का भिन्नता से औपादानिक परिणाम होता है। जिसका उपादान एकमात्र है, उसका औपादानिक परिणाम नहीं होता। गति लाक्षणिक परिणाम है। कारण उसमें पूर्वदेश परित्यागपूर्वक उत्तरदेश प्रापण ही होता है – अवयवान्तर प्रापण नहीं होता। ईच्छा, द्वेष आदि आन्तर वोध का दैर्घ्य, प्रस्थादि परिमाण नहीं है। अतः आन्तर वोध देशव्यापी नहीं है। वोध स्वरूप होने से चैतन्य देशव्यापी नहीं है। कारण देशव्यापीत्व रूपादि वाह्यपदार्थ का धर्म है, और देशाश्रय पदार्थ सावयव होता है। असंयोगज होने से चैतन्य का “औपादानिक परिणाम” नहीं है“नित्यः सर्वगतः स्थाणुरचलोऽयं सनातनः” (गीता) होने से चैतन्य का लाक्षणिक परिणाम नहीं है। द्विविध परिणामशून्य होने से चैतन्य पुरुष काल के द्वारा अव्यपदेश्य है (काल के द्वारा लक्षणीय नहीं है)।

परिणामशील (परिवर्त्तनशील) पदार्थ (जो कुछ समय रहकर उसके पश्चात् नहीं रहता अथवा परिणम्यमान हो जाता हैं (वदल जाता हैं), असत्य कहलाता है। जो अपरिणम्यमान हो – निज स्वरूपसे सदा वर्त्तमान रहता हो – उसे सत्य कहते हैं। असत् का एक अन्यअर्थ वोधगम्य न होना है। वोधगम्य वस्तुका सत्ता दृश्यमान होनेसे उसे सत्य कहते हैं। प्रथम निरुक्तका ज्ञान होता है। उससे अनिरुक्तका अनुमान होता है। अतः असत् से सत् की उत्पत्ति उपसर्जन (गौण) भावसे कहीगयी है (अव्यक्तात् व्यक्तयः सर्वे प्रहरन्त्यहरागमे – गीता)। यह ex-nihiloनहीं है, जो असम्भव है (नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः। उभयोरपि दृष्टोऽन्तस्त्वनयोस्तत्वदर्शिभिः ॥गीता – २.१६)। छान्दोग्य उपनिषद में इसके उपर विशद चर्चा की गयी है।

विश्वमें जितनेभी द्रव्य प्रतिभात होते हैं, सवमें स्थिरता और गति – यह दोनोंभाव लक्षित होते हैं। इनके मूल तत्त्व को रस (रसो वै सः – तैत्तिरीयोपनिषद् २.७.) और बल (नायमात्मा बलहीनेन लभ्यो – मुण्डकोपनिषद् ३.२.४.) कहा जाता है। रस सदाएकरूप रहकर सवका आलम्बन वनता है। बल सदागतिशील होनेसे परिवर्त्तित होता रहता है। बलका प्रष्फुटितरूप क्रिया है, जो उत्पत्तिके साथसाथ विनाश होतारहता है। समस्तजगत् क्रियाके ही विजृम्भणरूप है। उत्पत्ति और विनाशरूपी क्रिया निराधार नहीं हो सकता। रस और बल निर्धर्मक है। परन्तु उनके सम्मिश्रणसे जो विशिष्ट तत्त्व सृष्टिहोता है, उसमें यहदोनों प्रविष्ट होजाते हैं (तत्सृष्ट्वा तदेवानुप्राविशत् – तैत्तिरीयोपनिषद् २.६.)। तव रसका सत्ता, चेतना, आनन्द – यह तीन स्थिरधर्म तथा बल का नाम, रूप, क्रिया – यह तीन अस्थिर धर्म का उदय होता है।

इनका संसर्ग ५ प्रकार से होता है – स्थानावरोध (exclusion principle of particle physics), समञ्जस (bosonic principle of coexistence of particle physic), ऐकात्म्य (complementarity principle), ऐकभाव्य (transition states in chemical reactions), और भक्ति (अवयवी गति – translation of motion to the encompassing frame of reference, like when we are sitting in a moving train, we also move with the train.)। यह सम्बन्ध सावयव पदार्थ में होते हैं। परन्तु रसप्रधान पुरुष तथा बलप्रधान शक्तिमें यह सम्बन्ध सम्भव नहीं है। उनका साधारण अवस्थामें स्वरूपसम्बन्ध तथा विशिष्टअवस्था में वृत्तित्वसम्बन्ध हो जाता है।

पुरुष तथा शक्ति का स्वरूपसम्बन्ध ३ प्रकार का होता है – विभूति, योग, बन्ध। जहाँ दो तत्त्वोंके सम्बन्धसे एक अपने स्वरूपमें रहे तथा अन्य परतन्त्र होजाये, उसे विभूतिसम्बन्ध कहते हैं। रस और बलका सदा विभूतिसम्बन्ध रहता है। बलविशिष्ट रस के साथ बलान्तर के सम्बन्ध से यदि दोनों का मूलस्वरूप रहते हुये एक तृतीय तत्त्व वनता है, तो उसे योग कहते हैं। परन्तु यदि दोनों का मूलस्वरूप नाश होकर तृतीय तत्त्व वनता है, तो उसे बन्ध कहते हैं। विभूतिसम्बन्धसे अव्ययपुरुषका, योगसम्बन्धसे अक्षरपुरुषका और बन्धसम्बन्धसे क्षरपुरुषका प्रादुर्भाव होता है। इस प्रकार त्रिविधपुरुष हैं। उन्हीसे सवकुछ वना है – पुरुषं एवेदं सर्वम्। वही सबका निर्माता है। जो अन्य सामग्री न होते हुए भी अपनी इच्छा से और अपनी आत्मा से सब कुछ वनवा ले उसे स्रष्टा कहते हैं। जैसे मकडी अपना जाल बुनता है और फिर उसे अन्तर्लीन कर देता है। सृष्टि स्रष्टा का विकारमात्र है। जो अविकारी है, वह सृष्टि नहीं कर सकता। जो वाह्यसामग्री को ले कर उसके आधार पर कुछ रचना करता हो, परन्तु वाह्यसामग्री न मिलनेपर इच्छा रहते हुये भी निर्माण करने में असमर्थ होता है, उसे निर्माता कहते हैं। इस कारण निर्माता परतन्त्र है। इसीलिए अक्षरपुरुष विना क्षरपुरुष के निर्माण नहीं कर सकता।

क्षरपुरुषको अवर कहाजाता है। अव्ययपुरुषको पर कहाजाता है। मध्यपतित अक्षरपुरुषको परावर कहा जाता है। यहसव जिसमें लीनहोते हैं, उसे परात्पर कहते हैं। वही सवका स्रष्टा है। श्वेताश्वेतर उपनिषद् के अनुसार उस परात्परका न कार्य न कारण दृश्यमान होता है। न उसका सम अथवा उससेअधिक कुछ दिखता है। वह अचिन्य, अपरिमेय है। उसीके विषयमें कहगया है “यतो वाचो निवर्तन्ते। अप्राप्य मनसा सह। आनन्दं ब्रह्मणो विद्वान्। न बिभेति कुतश्चनेति” (तै.उ. २-४-१)। जहाँसे वाणी कुछ भी प्राप्तकिए बिना लौट आती है तथा मन भी जहाँ पहुँचकर विस्मयचकित होकर लौट आता है, ‘ब्रह्म’ के उस आनन्दको कौन जानता है? परपुरुषका विविध शक्तिके विषयमें सुनाजाता है, जिनमें ज्ञान, बल और क्रिया स्वाभाविक है। उसके वहुतसारे नाम है। कभी उसका व्यय नहीं होता है। इसलिये उसका एकनाम अव्यय है। उसीका विकास कुर्वाण अक्षर तथा अकुर्वाण क्षर है। अव्यय स्वयं अविकुर्वाण है। सवकुछ उसीसे व्यक्त होकर उसीमें लीन हो जाते हैं।

बल ही अखण्ड रसमें ज्ञान और कर्मका उदय करता है। उस परमपुरुषके क्रियाशक्ति सम्पूर्ण होनेसे उनके सर्वकर्तृत्वको दर्शाता है। वही सर्वकर्तृत्व सङ्कुचित होकर कला वनजाता है। अव्ययके ५ कलायें है जिसे कोष भी कहाजाता है – आनन्द, विज्ञान, मन, प्राण, वाक्। वाक् को अन्न भी कहते हैं। आनन्द सर्वस्वातन्त्र्यको कहते हैं। वह शुद्धज्ञानस्वरूप है। प्राणीयोंमें यह सङ्कुचित होकर नियति वनजाता है। विज्ञान कर्ममिश्रित ज्ञान है – ज्ञानका सङ्कुचितरूप है। मन ज्ञान-कर्म का सम मिश्रण है। क्षुव्ध कर्मको प्राण कहते हैं। मूर्च्छितकर्म ही वाक् अथवा अन्न कहलाता है। वेदान्तके अष्टविध व्याख्यामें तथा सर्वोपनिषदसार गीतामें अव्ययका निरूपण कियागया है (This is the Conscious or information interpretation of the universe – अध्यात्म)।

अक्षरपुरुष सृष्टिका निमित्तकारण (instrumental cause) है। इसीलिये मुण्डकोपनिषद् में कहागया कि “अक्षरात्संभवतीह विश्वम्” (This is the energy interpretation of the universe – अधिदैव)। अक्षरपुरुषका ५ कलायें है – ब्रह्मा (स्थिति), इन्द्र-विष्णु (आदान-विसर्ग), अग्नि-सोम (संकोच-विकाश)। इन ५ भावोंको कभीभी क्षरित नहीं होनेके कारण अक्षर कहाजाता है (एष वा अक्षरम्। एष ह्येभ्यः सर्वेभ्यो भूतेभ्यः क्षरति न चैनमतिक्षरन्ति। … तस्मादक्षरमित्याचक्षते – ऐतरेयारण्यकम् – २.२.२.१०.)। शतपथब्राह्मणम् ६.१.१.१. में कहागया है – “असद्वा इदमग्र आसीत्। तदाहुः किं तदसदासीदित्यृषयो वाव तेऽग्रेऽसदासीत्तदाहुः के त ऽऋषय इति प्राणा वा ऋषयस्ते यत्पुराऽस्मात्सर्वस्मादिदमिच्छन्तः श्रमेण तपसारिषंस्तस्मादृषयः”। असत् ऋषिप्राणोंको हि कहाजाता है। वही शास्त्र आगे चलकर कहता है – “स योऽयं मध्ये प्राणः। एष एवेन्द्रस्तानेष प्राणान्मध्यत इन्द्रियेणैन्द्ध यदैन्द्ध तस्मादिन्ध इन्धो ह वै तमिन्द्र इत्याचक्षते परोऽक्षं परोऽक्षकामा हि देवास्त इद्धाः सप्त नाना पुरुषानसृजन्त”। प्राणोंमें जो नभ्य – योऽयं मध्ये प्राणः – उस मध्यप्राणको इन्द्र कहाजाता है। वह विसर्गरूप है जो केन्द्रसे प्रधिकी दिशामें गतिशील है।

विसर्ग, आदान का सहचर है। आदानभाव प्रधिसे केन्द्रके प्रति गमन – आगति – भाव हैसवमें प्रविष्ट हो कर व्याप्त होनेसे वह विष्णु कहलाता है (वि॒षॢँ॑ व्या॑प्तौ)। आदान-विसर्ग (आगति-गति) भाव का प्रतिष्ठा स्थितिरूप सर्ववृहत् भाव को ब्रह्मा कहाजाता है (वॄ वर॑णे। भर॑ण॒ इत्येके॑ – सैवास्मै प्रतिष्ठाऽभवत्। तस्मादाहुः ब्रह्म अस्य सर्वस्य प्रतिष्ठा। प्रतिष्ठा हैषा यद् ब्रह्म – शतपथब्राह्मणम् – ६.१.१-८)। स्थितिगर्भित इन आदान-विसर्ग भावोंका संकोच-विकाशको अग्नि-सोम कहाजाता है – “सोऽग्रिरसृज्यत स यदस्य सर्वस्याग्रमसृज्यत तस्मादग्रिरग्रिर्ह वै तमग्निरित्याचक्षते परोऽक्षं” – शतपथब्राह्मणम् ६.१.१.११.।

इनमेंसे ब्रह्मा- इन्द्र-विष्णु को हृदयम् (हृ+द+यम् = ह्वृ॒ सं॒वर॑णे, दो॒ अव॒खण्ड॑ने, य॒मँ उपर॒मे) कहते हैं। इन्द्र-अग्नि-सोम के समष्टिको शिव अथवा महादेव कहाजाता है। शुद्धगति (अव॒खण्ड॑ने) तथा शुद्धआगति (उपर॒मे) को संवरणकर के स्थिति वनता है, जो सीमित होनेसे परिच्छिन्न होता है। स्थिति, शुद्धगति तथा शुद्धआगतिके सम्मिश्रणसे हृदयम् वनता है। जहाँ हृदयम् नहीं, वहाँ परिच्छिन्न भाव नहीं। परिच्छिन्नभाव ही पुरुष का स्वरूप वनाता है। सांख्यशास्त्र के ४ भेदमें अक्षरका ही निरुपण किया गया है।

क्षरपुरुष सृष्टिका उपादानकारण है (constituent or material cause)। यह अधिभूत है (This is the material interpretation of the universe)। अक्षर के प्रेरणा से यह नाना भाव से परिणत होता है। अर्धभागसे यह परिणत होता है, तथा अपरार्धसे यह नियामक रूप से अपनेभीतर प्रवेश करता है (तत्सृष्ट्वा तदेवानुप्राविशत् – तैत्तिरीयोपनिषद् २.६.)। इसके यह क्षर-अक्षर समष्टिरूपको पुर कहाजाता है। इसके आध्यात्मिक, आधिदैविक, आधिभौतिक रूपसे प्रत्येक का ५-५ कलायें होते है। इसके मुख्य आध्यात्मिक कलाओंको प्राण, आप्, वाक्, अन्नाद, अन्न कहते हैं। इनसे वने हुये आधिदैविक रूपको स्वयम्भु, परमेष्ठी, सूर्य, चन्द्रमा, पृथ्वी कहते हैं। इसके आधिभौतिक कलाओंको आकाश, वायु, तेज, जल, पृथिवी आदि सत्तासिद्ध पञ्चमहाभूत कहते हैं।

योग और बन्ध सम्बन्धसे अक्षरसे भातिसिद्ध काल और देशका प्रादुर्भाव होता है (अक्षरात् सञ्जायते कालः कालाद् व्यापक उच्यते। व्यापकोहि भगवान् रूद्रो – शिवाथर्वशीर्षम्)। अव्ययका विभूतिसम्बन्धसे सृष्टि और मुक्ति साक्षि कर्म और विद्यामय आत्मा और उभयात्मक काममय मनको मिलाकर नवद्रव्याणि – नौ द्रव्य – कहे गये हैं। वैशेषिक इन्हीं नौ द्रव्योंका, उनके गुण और कर्मका तथा भातिसिद्धसम्बन्धोंका निरूपण करता है। अजन्य स्वतःसिद्धः स्वरूपको भाव कहते हैं। इसका स्वभाव और निःसर्ग दो भेद हैं। वहिर्हेतु अनपेक्षी गुण को स्वभाव कहते हैं। सुदृढाभ्यास जन्य संस्कार (गुणान्तर आधान) को निःसर्ग कहते हैं। गुणोंमें कणादप्रोक्त १७ गुण वहिर्हेतु अनपेक्षी स्वाभाविकगुण है। कणाद अनुक्त प्रशस्तपादप्रोक्त अन्य ७ गुण आवहादि वायुप्रेरित नैसर्गिकगुण है।

उत्क्षेपणादि ५ कर्म अन्तर्याम (strong nuclear interaction), वहिर्याम (beta decay), उपयाम (electromagnetic interaction), यातयाम (radioactive disintegration – alpha decay)तथा उद्याम (stable configuration against mutual barycenter) सम्बन्धों से होता है, जिससे नित्यगति (strong coupling), सम्प्रसादगति (weak coupling leading to proton-neutron conversion chain), यज्ञगति (electromagnetic configuration), साम्परायगति (particle decay) तथा उरुगायप्रतिष्ठा (stability in orbit against barycenter) होता है।

पुरुषके साथ प्रकृतिका वृत्तित्व सम्बन्ध है। जहाँ आश्रित आश्रयका अपेश्रा न करके कर्मकरने केलिये स्वतन्त्र है, उसे वृत्तित्वसम्बन्ध कहते है। अथवा बलविशिष्ट पुरुषका बलान्तर संसर्गको वृत्तित्वसम्बन्ध कहते है। उसका ३ अवान्तर भेद है – आसक्ति, उदार, समवाय। सङ्गवृत्ति आसक्ति। उसमें लोप, विकार अथवा निष्ठ होकर बल विश्राम करता है। यह क्षरका वृत्ति है – अक्षरका नहीं। शुद्धकर्ममें शुद्धरसका सम्बन्ध को अव्ययाख्य परपुरुष कहते हैं। इनका विश्वके साथ सम्बन्ध उदारवृतित्व है। इनसे सामान्य और विशेषभाव वनता है। दो कर्मविशिष्ट अक्षरसे समवायसम्बन्ध वनता है। वैशेषिक इनसवके विषयमें चर्चा करता है, जो आधुनिक विज्ञानसम्मत भी है और आधुनिकविज्ञानसे भी परे हैं।