॥ श्रीहरि: ॥
योग (Yoga)
योग चित्त की वृत्तियों का निरोध है।
सर्वथा, सर्वदा किसी भी प्राणी से चित्त से भी द्रोह न करना। अन्य सभी यम-नियम अहिंसा को निर्मल करने के लिए ही हैं।
अहिंसा की प्रतिष्ठा हो जाने पर क्या होता है?अहिंसा की पूर्ण प्रतिष्ठा हो जाने पर समीपस्थ प्राणियों में भी वैर त्याग हो जाता है।
अर्थार्थी वाणी और मन का व्यवहार करना। जैसा देखा हो वा अनुमान हो वा सुना हो, वैसा कहना और मानना। ऐसी वाणी जो सब भूतों के उपकारार्थ ही प्रवृत्त न कि किसी प्राणी के नाश हेतु। उत्तम प्रकार से (शास्त्र से) परीक्षित सर्वभूतोपकारार्थ वाणी।
सत्य की प्रतिष्ठा हो जाने पर क्या होता है?सत्य की पूर्ण प्रतिष्ठा हो जाने पर उसकी वाणी अमोघ हो जाती है। “धार्मिक हो जा” योगी के इस वचन मात्र से व्यक्ति धार्मिक हो जाता है। “स्वर्ग को प्राप्त हो” वचन मात्र से स्वर्ग को प्राप्त हो जाता है।
शास्त्राज्ञा विरुद्ध कोई द्रव्य दूसरों से ग्रहण करना स्तेय है। सर्वथा अलोभ ही अस्तेय है।
अस्तेय की प्रतिष्ठा हो जाने पर क्या होता है?अस्तेय की पूर्ण प्रतिष्ठा हो जाने पर योगी को सभी दिशाओं में होने वाले सारे रत्न समीपस्थ प्राप्त हो जाते हैं।
उपस्थगुप्तेन्द्रिय संयम। अष्टविध मैथुन (दर्शन, स्पर्शन, स्मरण, क्रीड़न, कीर्तन, एकान्तवास, गुह्यभाषण तथा क्रियानिवृत्ति) का त्याग।
ब्रह्मचर्य की प्रतिष्ठा हो जाने पर क्या होता है?ब्रह्मचर्य की पूर्ण प्रतिष्ठा हो जाने पर वीर्यलाभ होता है। अर्थात् द्रव्यों के गुण योगी को बाधा नहीं पहुँचा पाते। विनयी जिज्ञासु को तत्त्वज्ञान प्रदान करने में सिद्ध हो जाता है।
विषयप्राप्ति, उसकी रक्षा, नाश से क्षोभ, उसके हेतु हिंसा आदि का विचार कर विषय का अस्वीकरण अपरिग्रह है।
अपरिग्रह के दृढ़ हो जाने पर क्या होता है?अपरिग्रह के दृढ़ होने पर जन्म किस प्रकार का है, यह बोध हो जाता है। मैं कौन हूँ, किस प्रकार का हूँ, कैसे यह जन्म हुआ है, आगे कौनसे जन्म होंगे, किस प्रकार के जन्म होंगे यह सब जान लेता है। भूत, वर्तमान और भविष्यकी इन आत्मसम्बन्धी जिज्ञासाओं से निवृत्त होजाता है। योगी को ऐसी स्वतः सिद्धि हो जाती है।
इन यमों का जाति-देश-काल से अबाधित पालन महाव्रत है।
मिट्टीजलादि से शारीरिक, और मेध्य (पवित्र) परिमित भोजन से उदर प्रक्षालन बाह्य शौच है। चित्त के मलों को धोना आभ्यन्तर शौच है।
शौच के सिद्ध होने से क्या होता है?शौच के सिद्ध होने पर अपने अङ्गों को स्वच्छ करता भी उन्हें पवित्र नहीं पाता। अपने शरीर को त्याज्य देखता है। जब स्वयं शौच का पालन करता भी अपना शरीर त्याज्य पाता तो शौचपालन में असावधान अन्यों से संसर्ग कैसे करे।
साधनों के सन्निकट सुलभ होने पर भी। अधिक प्राप्त कर लेने की इच्छा न होना।
सन्तोष के सिद्ध होने से क्या होता है?सन्तोष से अनुत्तम सुख की प्राप्ति होती है। संसार में प्राप्त कामभोग और दिव्यलोकों में प्राप्त महान सुख मिलाकर भी सन्तोष से प्राप्त सुख के १६वें अंश भी नहीं हैं।
द्वन्द्व सहन तप है। द्वन्द्व हैं क्षुधा, प्यास, शीतोष्णता, स्थान और आसन। मौन में भी काष्ठवत मौन धारणकर चेष्टारहित हो जाना। व्रत है कृच्छ्र, चान्द्रायण, सान्तपन आदि यथाशक्ति करना।
तप के पूर्ण होने से क्या होता है?तप के पूर्ण होने पर अशुद्धिरूपी आवरण का क्षय। उससे अणिमा, लघिमा आदि शरीर की सिद्धियाँ और दूर तक देखपाने आदि की इन्द्रियसम्बन्धी सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं।
मोक्षविषयक शास्त्रों का अध्ययन, प्रणवादि का जप।
स्वाध्याय के पूर्ण होने पर क्या होता है?स्वाध्याय के पूर्ण होनेपर देवता, ऋषि और सिद्धों के दर्शन होते हैं। तथा वह योगी के कार्य में प्रवृत्त होते हैं।
उस परमगुरु ईश्वर में सर्वकर्मों का अर्पण।
ईश्वरप्रणिधान के सिद्ध होने पर क्या होता है?ईश्वरप्रणिधान के सिद्ध होनेपर समाधि की प्राप्ति होती है। सर्वभाव ईश्वरार्पित किए योगी को समाधिलाभ होता है जिससे सबकुछ यथार्थ जान जाता है। भूत-वर्तमान-भविष्य काल, सारे देहों और देशों में उसकी प्रज्ञा सब जान लेती है।
जिसमें स्थिरता और सुख हो वही आसन है।
जैसे?पद्मासन, वीरासन, भद्रासन, स्वस्तिक, दण्डासन, सोपाश्रय, पर्यङ्क, क्रौञ्चनिषदन, हस्तिनिषदन, उष्ट्रनिषदन आसन हैं जिनमें स्थिरता, कम्पराहित्य से बैठ सके।
प्रयत्न के उपराम होनेपर आसन सिद्ध होता है। आसन के सिद्ध होनेपर अङ्गों में कम्पन नहीं होता। अनन्तविध आसनों में लगाया हुआ चित्त आसन को सिद्ध करलेता है। आसन के सिद्ध होने पर योगी को शीतोष्ण, क्षुधा, तृष्णा आदि द्वन्द्व बाधित नहीं करते।
आसन के रहते वायु को अन्दर खींचना श्वास है। उदर के वायु को बाहर निकालना प्रश्वास है। दोनों को रोक देना अर्थात् उनका अभाव प्राणायाम है।
बाह्य, आभ्यन्तर, स्तम्भवृत्ति, देश, काल, सङ्ख्या के सहित परीक्षित किया हुआ प्राणायाम दीर्घ-सूक्ष्म कहलाता है।प्रश्वास को बाहर रोककर गति का अभाव करदेना बाह्य (प्राणायाम) है।
श्वास को भीतर रोककर गतिका अभाव करदेना आभ्यन्तर (प्राणायाम) है।
तीसरा जिसमें दोनों का अभाव स्तम्भवृत्ति कहलाती है। वह एकसाथ प्रयत्न से होता है।
इन तीनों के भेद देश से भी देखे गये हैं अर्थात् इतनी दूर तक वायु खींचा गया वा बाहर फेंका गया।
तीनों का काल से भी परीक्षा करते हैं कि इतने क्षणों तक श्वास-प्रस्वास रोका गया।
तीनों का सङ्ख्या के द्वारा भी भेद देखते हैं। इतने श्वास-प्रश्वास से पहला उद्धात। उतने ही से ग्रहित दूसरा। मृदु-मध्य-तीव्र इस प्रकार सङ्ख्या से भी देखते हैं।
इन प्रकारों से परीक्षित एवम् अभ्यसित प्राणायाम दीर्घ-सूक्ष्म होता है।
देश-काल-सङ्ख्या विधियों से बाह्य प्राणायाम को जीत ले। यह प्रथम स्तर। उसी प्रकार आभ्यन्तर को जीते। यह द्वितीय। उभयविध दीर्घ-सूक्ष्म को जीत ले। यह तृतीय। क्रम से दोनों की गति का अभाव चतुर्थ प्राणायाम है।
तीसरे और चौथे में भेद यह है कि तीसरे में तो देश-काल-सङ्ख्या भेद से दीर्घसूक्ष्म कहते हैं पर चौथे में गति का ही अभाव है तो देश आदि के भेद किसमें देखे।
प्राणायाम के फलस्वरूप १) विवेकज्ञानरूप प्रकाश पर जो कर्म का आवरण चढ़ा था, उसे क्षीण करता है।
महामोहरूप इन्द्रजाल ने प्रकाशशील सत्त्व (बुद्धि) को आवरित (ढक) कर (सांसारिक) अकार्य में नियुक्त किया हुआ है।
योगी के ज्ञानपर जो आवरणरूप कर्म है वही संसार बन्धन है। प्राणायाम प्रतिक्षण उसे क्षीण करता रहता है। इसलिए कहा गया है कि प्राणायाम से परमतप कुछ नहीं। योगी के प्राणायाम से निर्मल हो जाने पर उसका विशुद्ध ज्ञान उद्दीप्त हो जाता है।
प्राणायाम के फलस्वरूप २) धारणाओं में मन कीयोग्यता हो जाती है।
चित्त के रोकने पर चित्त के निरुद्ध होने के समान इन्द्रियाँ भी निरुद्ध हो जाती हैं। इन्द्रियजय के लिए किसी अन्य उपाय की आवश्यकता नहीं रह जाती। जैसे रानी मधुमक्खी का अनुसरण अन्य मधुमखियाँ स्वतः करती हैं उसी प्रकार चित्त के निरुद्ध होने पर इन्द्रियों का निरुद्ध हो जाना प्रत्याहार है।
प्रत्याहार के सिद्ध होने पर इन्द्रियाँ योगी के परमवश में हो जाती हैं।
इसके अर्थ में विभिन्न आचार्यों के मत बताकर अन्त में उत्तर पक्ष प्रतिष्ठित करते हैं।
१। किसी के मत में शब्दादि विषयों में वासनारहित होना इन्द्रियजय है।
२। कोई शब्दादि के वेदानुकूल न्यायपूर्वक सम्यक् प्रयोग को ही इन्द्रियजय मानते हैं।
३। कोई विषयों का दास न बनकर उनका स्वामी बनकर भोगने को इन्द्रियजय मानते हैं।
४। कोई आचार्य राग-द्वेष को त्यागकर सुख-दुःख का अनुभव न करते हुए विषयों को भोगनेको इन्द्रियजय मानते हैं।
अन्त में महायोगी भगवान् जैगीषव्य के मत से उत्तर पक्ष कहते हैं। चित्र के एकाग्र होनेपर इन्द्रियों का अपने विषयों में प्रवृत्त न होना ही इन्द्रियजय है। यही योगी का इन्द्रियों पर परम वश्यता है। इसके पश्चात इन्द्रियनिग्रह हेतु अन्य उपायों की आवश्यकता नहीं होती।
नाभिचक्र, हृदयकमल, मूर्धाज्योति में, नासिका के अग्रभाग में वा जिह्वा के अग्रभाग में। वा किसी बाह्य विषय में चित्त की वृत्ति मात्र को रोकना धारणा है।