काव्यानुशीलन।
श्रीमद्वासुदेव मिश्रशर्म्मा
सक्तुमिव तितउना पुनन्तो यत्र धीरा मनसा वाचमक्रत।
अत्रा सखायः सख्यानि जानते भद्रैषां लक्ष्मीर्निहिताधि वाचि।
ऋग्वेदः १०-७१-२. बृहस्पतिराङ्गिरसः ऋषिः, ज्ञानम् देवता, त्रिष्टुप् छन्दः।
“ऐसा हो जाय” – इस प्रकार के चित्तवृत्ति को इच्छा कहते हैं (भवत्विति चित्तवृत्तिरिच्छा) । इसका दो भेद है। “मेरा ऐसा हो” – इसप्रकार स्वीयत्वसापेक्ष इच्छा को स्वीया, तथा “उसका ऐसा हो” – इसप्रकार परकीयत्वसापेक्ष इच्छा को परकीया कहते हैं। अपने हृदयके इच्छाको जिसकेद्वारा परहृदयमें समुन्नीयत कियाजाता है, उसे भाषा कहते हैं (स्वहृदयस्थो भावो यया परहृदये समुन्नीयते सा भाषा – Language is the mechanism for transposition of one’s thought in the mind/CPU of another person/system through sounds/signals)। देश, काल, पात्र और माध्यम के भेदसे यह बहुत प्रकारके होते हैं। भाषा वाक्य और साहित्य भेदसे द्विविध है। अर्थविशेषित (जहाँ अर्थ प्रधान हो) विशिष्टप्रकार शब्दसङ्केत को वाक्य कहते हैं। शब्दविशेषित (जहाँ शब्द प्रधान हो) विशिष्टप्रकार अर्थसङ्केत (गौण) को साहित्य कहते हैं। “शुष्कंकाष्ठं पतत्यग्रे” वाक्य है। “नीरसतरुवर पुरतो भाति” साहित्य है।
भाषासम्बन्धी पाठ्यका तीन विभाग है। प्रथमविभाग प्रभुसम्मित कहलाता है, जो विधि-निषेध का नियमन करता है। यह शब्दप्रमाण प्रधान है, जिसे निर्विरोध मानना पडता है। इसका विरुद्धाचरण दण्डनीय अपराध है। वेद, भारतका सम्विधान तथा दण्ड/आचार संहिता इसी श्रेणीमें आते हैं। द्वितीयविभाग सुहृत्सम्मित कहलाता है, जो अर्थप्रधान है, जिसे मानना वाञ्छनीय है, परन्तु बाध्यतामूलक नहीं है। यह मित्र जैसे हमारे मार्गदर्शन करता है। पुराण-इतिहास इस श्रेणीमें आते हैं। तृतीयविभाग कान्तासम्मित कहलाता है, जो रसप्रधान है। रसात्मक वाक्य एवं साहित्य काव्य पदवाच्य हैं। रसका उपकर्ष काव्यका गुण तथा अपकर्ष काव्यका दोष है।
साहित्यसंगीतकलाविहीनः साक्षात्पशुः पुच्छविषाणहीनः।
तृणं न खादन्नपि जीवमानस्तद्भागधेयं परमं पशूनाम्॥
जो मनुष्य साहित्य, संगीत, कलासे वञ्चित रहता है वह साक्षात् बिनापूँछ तथा बिनासींगों वाले पशु के समान है। वह जो बिना पशुओंके भागका घासखाए रहता है, यह उनके लिए निःसंदेह सौभाग्यकी बात है।
भरतके मतमें त्रेतायूगके प्रारम्भमें दुःखका आविर्भाव हुआ (ईर्ष्या क्रोधादि संम्मूढे लोके सुखित दुःखिते)। उससे वचनेके लिए इन्द्रादि देवगण ब्रह्मासे दृश्य-श्राव्य क्रीडनीयक (मनोरञ्जक खिलौना जैसे) कुछ सृष्टि करनेका प्रार्थनाकिया (क्रीडनीयकमिच्छामो दृश्यं श्राव्यं च यद्भवेत्)। तव ब्रह्माजीने सार्ववर्णिक (समस्त वर्णों के लिये) दृश्य-श्राव्य नाट्यशास्त्रका सृजन किया। जिनसेनाचार्यने भी अलङ्कार चिन्तामणि ग्रन्थमें कहा है काव्य एवं नाटक आदिमें रस श्रवण एवं दर्शन कियाजाता है (काव्यादौ नाटकादौ च शृण्वतां पश्यतां रसान्)। काव्य कवि का कर्म है एवं नाट्य नट का कर्म है। नाट्य खेल है – देखने का विषय है। वह नियतश्राव्य (सम्पूर्ण श्राव्य नहीं) है – सूचनीय भी है। इसके विपरीत काव्य खेल नहीं है। सूचनीय भी नहीं है। यह नियतश्राव्य भी नहीं है – सर्वश्राव्य (पठनीय भी) है। परन्तु काव्य के साथ नाट्य की अभेद है। गीतिकाव्य, रागकाव्य, मुक्तक, खण्डकाव्य, दूतकाव्य आदि जैसे दशरुपक अभिनयार्थ काव्य है।
भाष्याणि तर्कयुक्तानि देहवन्ति विशांपते। नाटका विविधाः काव्याः कथाख्यायिककारिका।