आङ्गिरसोपाख्यान : अतुलनीय शक्ति वाले आदर्श पति की खोज कैसे हुई?
कर्म और पात्रता का सङ्गम
महर्षि वेदव्यास कृत महाभारतके सन्दर्भ सहित वास्तविक आख्यान पढ़ें।
वनपर्व → मार्कण्डेयसमास्यापर्व · अध्याय 219–224 · पृष्ठ 1508–1539
मार्कण्डेय ने युधिष्ठिर से कहा
परम बुद्धिमान कार्तिकेय के जन्म और अग्नि-वंश की उत्पत्ति समझाने हेतु
मार्कण्डेय जी ने कहा— हे राजन्! बृहस्पति की वह यशस्विनी पत्नी, जो चान्द्रमसी नाम से विख्यात थी, उसने पुत्रों के रूप में छह पवित्र अग्नियों और एक पुत्री को जन्म दिया। उन अग्नियों में शंयु नामक महान व्रतधारी अग्नि सबसे प्रथम है। जब दर्श या पौर्णमास जैसे अवसरों पर प्रधान आहुतियां दी जाती हैं, तब सर्वप्रथम घी की आहुति जिस अग्नि के लिए दी जाती है, वही शंयु है। वह चातुर्मास्य और अश्वमेध यज्ञों में पूजनीय है, जो सर्वसमर्थ है और अनेक वर्ण की ज्वालाओं से प्रज्वलित है।
शंयु की पत्नी सत्या थी, जो धर्म की पुत्री थी। उसके रूप और गुणों की कहीं तुलना नहीं थी और वह सदा सत्य के पालन में तत्पर रहती थी। शंयु और सत्या के गर्भ से एक अग्निस्वरूप पुत्र और तीन कन्याएँ हुईं। शंयु का ज्येष्ठ पुत्र भरद्वाज कहलाया। वहीं शंयु की दूसरी स्त्री से भरत नामक अग्नि उत्पन्न हुआ, जो उत्सवों में 'प्रथम आघार' के रूप में पूजनीय है। भरत ने ही उन तीन कन्याओं का भरण-पोषण किया। भरत के वंश में ही 'भरती' नाम की एक कन्या और 'भरत' नाम का एक पुत्र हुआ। इन सबको पालने वाले प्रजापति भरत नामक अग्नि से ही पावक की उत्पत्ति हुई, जो अपने महनीय होने के कारण महान कहा गया।
भरतो भरतस्याग्नेः पावकस्तु प्रजापतेः ।
महानत्यर्थमहितस्तथा भरतसत्तम ॥
सबका भरण- पोषण करनेवाले प्रजापति भरत नामक अग्निसे ' पावक' की उत्पत्ति हुई । भरतश्रेष्ठ! वह अत्यन्त महनीय ( पूज्य) होनेके कारण ' महान्' कहा गया है ।
शंयु के प्रथम पुत्र भरद्वाज की पत्नी वीरा थी, जिसने वीर नामक पुत्र को जन्म दिया। ब्राह्मणों द्वारा सोमदेवता के समान ही वीर की भी आज्यभाग से पूजा की जाती है; इनके लिए मन्त्र का उपांशु उच्चारण किया जाता है। वीर ने सरयू नामक पत्नी से सिद्धि नामक पुत्र को प्राप्त किया। सिद्धि की प्रभा ने सूर्य को भी आच्छादित कर लिया था, जिसके पश्चात उसने अग्नि सम्बन्धी यज्ञ का अनुष्ठान किया। आह्वान-मन्त्रों में इसी सिद्धि की स्तुति की जाती है।
सरय्वां जनयत् सिद्धिं भानुं भाभिः समावृणोत् ।
आग्नेयमानयन् नित्यमाह्वाने ह्येष सूयते ॥
वीरने ‘ सरयू’ नामवाली पत्नीके गर्भसे ' सिद्धि' नामक पुत्रको जन्म दिया । सिद्धिने अपनी प्रभासे सूर्यको भी आच्छादित कर लिया । सूर्यके आच्छादित हो जानेपर उसने अग्निदेवता- सम्बन्धी यज्ञका अनुष्ठान किया । आह्वान - मन्त्र ( अग्निमग्न आवह इत्यादि ) - में इस सिद्धि नामक अग्निकी ही स्तुति की जाती है ।
बृहस्पति के दूसरे पुत्र का नाम निश्चयवन है। वे यश, तेज और कान्ति से कभी च्युत नहीं होते। वे निष्पाप, निर्मल और विशुद्ध हैं। निश्चयवन का पुत्र सत्य नामक अग्नि है, जो कालधर्म के प्रवर्तक हैं। सत्य के पुत्र का नाम 'स्वन' है, जिनकी पीड़ा से लोग स्वयं कराह उठते हैं; अतः वे रोगकारक अग्नि कहलाते हैं। वहीं तीसरे पुत्र का नाम विश्वजित् है, जो सम्पूर्ण विश्व की बुद्धि को अपने वश में रखते हैं। चौथे पुत्र के रूप में 'विश्वभुक्' अग्नि प्रकट हुए, जो प्राणियों के उदर में पदार्थों को पचाते हैं और पवित्र गोमती नदी उनकी प्रिय पत्नी हुईं। पाँचवें पुत्र के रूप में 'ऊर्ध्वभाक्' अग्नि हैं, जो ऊपर की ओर गति करने वाले हैं और प्राणवायु के आश्रित हैं। छठे पुत्र के रूप में 'स्विष्टकृत्' अग्नि हैं, जिनकी घी की उत्तराभिमुख धारा मनोरथ सिद्ध करती है।
जब बृहस्पति का क्रोध शान्त हुआ, तब उनके शरीर से निकला पसीना उनकी पुत्री बना, जिसका नाम स्वाहा पड़ा। वह अत्यन्त क्रूर कन्या है और स्वर्ग में उसके समान कोई दूसरा रूपवान नहीं है; इसलिए देवताओं ने उसके पुत्र को 'काम' नामक अग्नि कहा है। हृदय में क्रोध धारण किए, रथ पर सवार होकर शत्रुओं का नाश करने वाला 'अमोघ' अग्नि भी उन्हीं की सन्तान है।
त्रिदिवे यस्य सदृशो नास्ति रूपेण कश्चन ।
अतुलत्वात् कृतो देवैर्नाम्ना कामस्तु पावकः ॥
स्वर्गमें भी कहीं तुलना न होनेके कारण जिसके समान रूपवान् दूसरा कोई नहीं है, उस स्वाहा - पुत्रको देवताओंने ' काम ' नामक अग्नि कहा है ।
मार्कण्डेय जी बोले— हे युधिष्ठिर! कश्यपपुत्र कश्यप, वसिष्ठ-पुत्र वासिष्ठ, प्राणपुत्र प्राणक, अङ्गिरा के पुत्र च्यवन और त्रिवर्चा—ये पाँच अग्नि स्वरूप ऋषि हैं। इन्होंने ब्रह्माजी के समान यशस्वी पुत्र प्राप्त करने के लिए वर्षों तक घोर तपस्या की। जब इन पाँचों ने महाव्याहृति मन्त्रों द्वारा परमात्मा का ध्यान किया, तब उनके समक्ष एक अत्यन्त तेजोमय पुरुष प्रकट हुआ। वह ज्वालाओं से प्रज्वलित अग्नि के समान था; उसका मस्तक जगमगा रहा था, भुजाएँ प्रभाकर के समान थीं और आँखें व त्वचा स्वर्ण की तरह देदीप्यमान थीं। उन पाँच ऋषियों की तपस्या से उत्पन्न होने के कारण उस देवोपम पुरुष का नाम 'पाञ्चजन्य' पड़ा।
पञ्चवर्णः स तपसा कृतस्तैः पञ्चभिर्जनैः ।
पाञ्चजन्यः श्रुतो देवः पञ्चवंशकरस्तु सः ॥
उपर्युक्त पाँच मुनिजनोंने अपनी तपस्याके प्रभावसे उस पाँच वर्णवाले पुरुषको प्रकट किया था, इसलिये उस देवोपम पुरुषका नाम पाञ्चजन्य हो गया। वह उन पाँचों ऋषियोंके वंशका प्रवर्तक हुआ ।
महातपस्वी पाञ्चजन्य ने अपने पितरों का वंश चलाने के लिए दस हजार वर्षों तक घरी तपस्या कर भयङ्कर दक्षिणाग्नि को उत्पन्न किया। उन्होंने अपने मस्तक से 'बृहत्' और मुख से 'रथन्तर' नामक अग्नि प्रकट किए, जो आयु को हर लेते हैं, इसलिए उन्हें 'तरसाहर' कहा जाता है। फिर उन्होंने अपनी नाभि से रुद्र को, बल से इन्द्र को तथा प्राण से वायु और अग्नि को उत्पन्न किया। अपनी दोनों भुजाओं से उन्होंने मन और ज्ञानेन्द्रियों के छह देवताओं तथा पाँच महाभूतों की सृष्टि की। इसके पश्चात उन्होंने अपने पाँच पितरों के लिए पाँच पुत्र उत्पन्न किए: वासिष्ठ के अंश से प्रणिधि, काश्यप के अंश से महत्तर, अङ्गिरस-च्यवन के अंश से भानु, त्रिवर्चा के अंश से सौभर और प्राण के अंश से अनुदात्त।
अन्त में, पाञ्चजन्य ने यज्ञ में विघ्न डालने वाले पन्द्रह विनायकों की भी सृष्टि की। उन्होंने पहले पाँच विनायक उत्पन्न किए— सुभीम, अतिभीम, भीम, भीमबल और अबल। इसके पश्चात उन्होंने पाँच देवरूपी विनायकों को जन्म दिया— सुमित्र, मित्रवान्, मित्रज्ञ, मित्रवर्धन और मित्रधर्म।
सुमित्रं मित्रवन्तं च मित्रज्ञं मित्रवर्धनम् ।
मित्रधर्माणमित्येतान् देवानभ्यसृजत् तपः ॥
इनके बाद पाञ्चजन्यने सुमित्र, मित्रवान्, मित्रज्ञ, मित्रवर्धन और मित्रधर्मा—इन पाँच देवरूपी विनायकोंको उत्पन्न किया ।
ये पन्द्रह देवोपम प्रभावशाली विनायक तीन दलों में विभक्त हैं। ये पृथ्वी पर रहकर स्वर्गलोक के यज्ञकर्ता पुरुषों की यज्ञ-सामग्री का अपहरण कर लेते हैं। ये विनायकगण अग्नियों के लिए अभीष्ट महान् हविष्य का अपहरण तो करते ही हैं, उसे नष्ट भी कर डालते हैं। क्योंकि इनका सम्बन्ध अग्नियों के साथ है, इसलिए ये हविष्य का विध्वंस करते हैं। इसीलिए यज्ञनिपुण विद्वानों ने यह नियम बनाया है कि यज्ञशाला की बाह्य वेदी पर इन विनायकों के लिए देय भाग रख दिया जाए; क्योंकि जहाँ अग्नि की स्थापना होती है, वहाँ ये विनायक नहीं फटकते। मन्त्रों द्वारा संस्कार किए जाने के पश्चात जब प्रज्वलित अग्निदेव आहुति ग्रहण करते हुए यज्ञ का सम्पादन करते हैं, तब वे अपनी दोनों पार्श्ववर्ती शिखाओं द्वारा इन विनायकों को कष्ट पहुँचाते हैं; इसीलिए ये उनके निकट नहीं आते। मन्त्रों द्वारा शान्त कर दिए जाने पर ये विनायक यज्ञ सम्बन्धी हविष्य का अपहरण नहीं कर पाते।
चितोऽग्निरुद्वहन् यज्ञं पक्षाभ्यां तान् प्रबाधते ।
मन्त्रैः प्रशमिता ह्येते नेष्टं मुष्णन्ति यज्ञियम् ॥
मन्त्रद्वारा संस्कार करनेके पश्चात् प्रज्वलित अग्निदेव जिस समय आहुति ग्रहण करते हुए यज्ञका सम्पादन करते हैं, उस समय वे अपने दोनों पंखों ( पार्श्ववर्ती शिखाओं ) द्वारा उन विनायकोंको कष्ट पहुँचाते हैं ( इसीलिये वे उनके पास नहीं फटकते ) । मन्त्रोंद्वारा शान्त कर देनेपर वे विनायक यज्ञसम्बन्धी हविष्यका अपहरण नहीं कर पाते हैं ।
इस पृथ्वी पर जब अग्निहोत्र होने लगता है, तब पाञ्चजन्य के पुत्र बृहदुक्थ, जो तप के ही पुत्र हैं, श्रेष्ठ पुरुषों द्वारा पूजे जाते हैं। यजुर्वेदी विद्वान मानते हैं कि तप के ये पुत्र, जिन्हें रथन्तर नामक अग्नि कहा जाता है, उन्हें दी गई हवि मित्रविन्द देवता का भाग है। महायशस्वी पाञ्चजन्य अपने इन सभी पुत्रों के सहित अत्यन्त प्रसन्न और आनन्दमग्न रहते हैं।
रथन्तरश्च तपसः पुत्रोऽग्निः परिपठ्यते ।
मित्रविन्दाय वै तस्य हविरध्वर्यवो विदुः ॥
मुमुदे परमप्रीतः सह पुत्रैर्महायशाः ॥
तपके पुत्र जो रथन्तर नामक अग्नि कहे जाते हैं, उनको दी हुई हवि मित्रविन्द देवताका भाग है, ऐसा यजुर्वेदी विद्वान् मानते हैं । महायशस्वी तप ( पाञ्चजन्य ) अपने इन सभी पुत्रोंके सहित अत्यन्त प्रसन्न हो आनन्दमग्न रहते हैं ।
मार्कण्डेय जी कहते हैं— हे युधिष्ठिर! पूर्वोक्त भरत नामक अग्नि (जो शंयु के पौत्र और ऊर्ज के पुत्र हैं) गुरुतर नियमों से युक्त हैं। वे सन्तुष्ट होने पर पुष्टि प्रदान करते हैं, इसलिए उन्हें 'पुष्टिमति' भी कहा जाता है। वे समस्त प्रजा का भरण-पोषण करते हैं, इसीलिए उन्हें भरत कहते हैं। वहीं 'शिव' नाम से प्रसिद्ध अग्नि शक्ति की आराधना में लगे रहते हैं और दुःखातुर मनुष्यों का कल्याण करते हैं, अतः उन्हें 'शिव' कहा जाता है।
गुरुभिर्नियमैर्युक्तो भरतो नाम पावकः ।
अग्निः पुष्टिमतिर्नाम तुष्टः पुष्टिं प्रयच्छति ।
भरत्येष प्रजाः सर्वास्ततो भरत उच्यते ॥
मार्कण्डेयजी कहते हैं - युधिष्ठिर! पूर्वोक्त भरत नामक अग्नि ( जो शंयुके पौत्र और ऊर्जके पुत्र हैं) गुरुतर नियमों युक्त हैं । वे संतुष्ट होनेपर पुष्टि प्रदान करते हैं, इसलिये उनका एक नाम ‘ पुष्टिमति' भी है । समस्त प्रजाका भरण- पोषण करते हैं, इसलिये उन्हें भरत कहते हैं ।
पाञ्चजन्य का तपस्या जनित ऐश्वर्य जब बढ़कर महान् हो गया, तब उसे प्राप्त करने की इच्छा से बुद्धिमान इन्द्र स्वयं उनके पुत्र 'पुरन्दर' बनकर प्रकट हुए। उन्हीं पाञ्चजन्य से 'ऊष्मा' नामक अग्नि का प्रादुर्भाव हुआ, जो समस्त प्राणियों के शरीर में ऊष्मा के रूप में परिलक्षित होती है। इसके पश्चात तप के 'मनु' नामक अग्निस्वरूप पुत्र ने 'प्राजापत्य' यज्ञ सम्पन्न कराया।
पाञ्चजन्य ने पाँच ऐसे पुत्रों को उत्पन्न किया जिन्हें यज्ञ में सोम की आहुति दी जाती है। वे सुवर्ण के समान कान्तिमान, बल और तेज प्रदान करने वाले तथा देवताओं के लिए हविष्य पहुँचाने वाले हैं। महाभाग! अस्तकाल में सूर्यदेव अग्नि में प्रविष्ट होकर अग्निस्वरूप हो जाते हैं और भयङ्कर असुरों तथा मरणधर्मा मनुष्यों को उत्पन्न करते हैं; उन्हें भी तप की ही सन्तति माना गया है।
तप के 'मनु' स्वरूप पुत्र 'भानु' को अङ्गिरा ने अपना प्रभाव देकर नूतन जीवन प्रदान किया। वेदों के पारगामी विद्वान भानु को ही 'बृहद्भानु' कहते हैं। भानु की दो पत्नियाँ थीं— सुप्रजा और बृहद्भासा। बृहद्भासा सूर्य की कन्या थी। इन दोनों से छह पुत्र उत्पन्न हुए। इनमें 'बलद' नामक अग्नि प्रथम पुत्र है, जो दुर्बल प्राणियों को प्राण और बल प्रदान करते हैं। दूसरा 'विष्णु' नामक अग्नि है, जिसके लिए दर्श और पौर्णमास याग में हविष्य समर्पण का विधान है; वे अङ्गिरा गोत्र के माने जाते हैं और उनका दूसरा नाम 'धृतिमान्' है। तीसरा पुत्र 'आग्रयण' है, जिसके लिए इन्द्र सहित हवि का अग्रगमन माना जाता है। चौथे पुत्र 'अग्रह' (वैश्वदेव) हैं, जो चातुर्मास्य यज्ञों में आठ हविष्यों के उद्भवस्थान हैं। पाँचवाँ पुत्र 'स्तुभ' है।
भानु की तीसरी पत्नी 'निशा' थी, जिसने एक कन्या और दो पुत्रों को जन्म दिया। कन्या का नाम रोहिणी है और पुत्रों के नाम अग्नि तथा सोम हैं। निशा ने पाँच अन्य अग्निस्वरूप पुत्र भी उत्पन्न किए— वैश्वानर, विश्वपति, सन्निहित, कपिल और अग्रणी। चातुर्मास्य यज्ञों में 'वैश्वानर' प्रथम पुत्र हैं जिनकी पूजा पर्जन्य सहित की जाती है। दूसरे पुत्र 'विश्वपति' हैं, जो सम्पूर्ण जगत् के पति कहे जाते हैं; उनके प्रभाव से हविष्य की सुन्दर आहुति सम्पन्न होती है, इसलिए वे 'परम स्विष्टकृत्' कहलाते हैं। मनु की कन्या रोहिणी भी 'स्विष्टकृत्' ही है; वह किसी अशुभ कर्म के कारण हिरण्यकशिपु की पत्नी हुई थी। वास्तव में 'मनु' ही वह्नि और प्रजापति हैं। तीसरे पुत्र 'सन्निहित' हैं, जो देहधारियों के प्राणों का आश्रय लेकर उन्हें कार्य में प्रवृत्त करते हैं। चौथे पुत्र 'कपिल' हैं; वे क्रोधस्वरूप अग्नि के आश्रय में रहकर साङ्ख्ययोग का प्रवर्तन करते हैं। पाँचवें पुत्र 'अ अग्रणी' हैं, जो समस्त प्राणियों के लिए अन्न का अग्र भाग अर्पित करते हैं।
मनु ने अग्निहोत्र के दोषों के प्रायश्चित्त हेतु कुछ विशिष्ट अग्नियों की सृष्टि की है। यदि हवा के चलने से अग्नियों का परस्पर स्पर्श हो जाए, तो अष्टाकपाल पुरोडाश द्वारा 'शुचि' नामक अग्नि के लिए इष्टि करनी चाहिए। यदि दक्षिणाग्नि का गार्हपत्य और हवनीय अग्नियों से संसर्ग हो जाए, तो मिट्टी के आठ पुरवों में तैयार पुरोडाश द्वारा 'वीति' नामक अग्नि के लिए आहुति देनी चाहिए। यदि कोई रजस्वला स्त्री अग्निहोत्र की अग्नि को छू ले, तो 'वसुमान्' अग्नि के लिए आठ पुरवों में संस्कृत चरु द्वारा आहुति देनी चाहिए। यदि किसी पशु या कुक्कुर के स्पर्श से अग्नि अशुद्ध हो जाए, तो 'सुरभिमान्' अग्नि के लिए आठ पुरवों में संस्कारपूर्वक पुरोडाश से होम करना चाहिए। यदि दर्श या पौर्णमास यज्ञ बीच में ही रुक जाए, तो 'पथिकृत' अग्नि के लिए चरु से होम करना चाहिए। और यदि सूतिकागृह की अग्नि, अग्निहोत्र की अग्नि को स्पर्श कर ले, तो आठ पुरवों में संस्कारित पुरोडाश द्वारा 'अग्निमान्' नामक अग्नि की आहुति देनी चाहिए।
इमानन्यान् समसृजत् पावकान् प्रथितान् भुवि ।
अग्निहोत्रस्य दुष्टस्य प्रायश्चित्तार्थमुल्बणान् ॥
मनुने अग्निहोत्र कर्ममें की हुई त्रुटिके प्रायश्चित्त ( समाधान ) -के लिये इन लोकविख्यात तेजस्वी अग्नियोंकी सृष्टि की, जो पूर्वोक्त अग्नियोंसे भिन्न हैं ।
मार्कण्डेयजी बोले— राजन्! जल में निवास करने के कारण प्रसिद्ध हुए 'सह' नामक अग्नि की एक परम प्रिय पत्नी थी, जिसका नाम मुदिता था। उनके गर्भ से भूलोक और भुवर्लोक के स्वामी 'अद्भुत' नामक उत्कृष्ट अग्नि का जन्म हुआ। ब्राह्मणों के बीच यह वंश-परम्परा प्रचलित है कि 'अद्भुत' ही सम्पूर्ण प्राणियों के अधिपति हैं; वे ही सबके आत्मा, भुवनभर्ता और इस जगत् के समस्त महाभूतों के पति हैं। उनमें सम्पूर्ण ऐश्वर्य सुशोभित है। वे महातेजस्वी अग्निदेव सदा सर्वत्र विचरण करते हैं। जो 'गृहपति' नाम से यज्ञों में पूजे जाते हैं और देवताओं तक हविष्य पहुँचाते हैं, वे ही अद्भुत अग्नि इस जगत् को पवित्र करने वाले हैं।
उसी अद्भुत या गृहपति का एक अग्निस्वरूप पुत्र हुआ, जिसका नाम 'भरत' है। ये मरे हुए प्राणियों के शव का दाह करते हैं। भरत का अग्निष्टोम यज्ञ में नित्य निवास है, इसलिए इन्हें 'नियत' भी कहा जाता है। नियत का सङ्कल्प उत्तम है। प्रथम अग्नि 'सह' अत्यन्त प्रभावशाली हैं। एक समय देवतालोग उन्हें ढूँढ़ रहे थे। जब वे अपने पौत्र नियत को अपने साथ आते देखते, तो उससे छू जाने के भय से सह समुद्र के भीतर घुस जाते थे।
स वह्निः प्रथमो नित्यं देवैरन्विष्यते प्रभुः ।
आयान्तं नियतं दृष्ट्वा प्रविवेशार्णवं भयात् ॥
‘ प्रथम अग्नि ‘ सह ’ बड़े प्रभावशाली हैं । एक समय देवतालोग उनको ढूँढ़ रहे थे । उनके साथ अपने पौत्र नियतको भी आता देख ( उससे छू जानेके ) भयसे वे समुद्रके भीतर घुस गये ।
देवता उन्हें सब दिशाओं में खोजते हुए वहाँ भी पहुँचने लगे। एक दिन अथर्वा (अङ्गिरा) को देखकर अग्नि ने उनसे कहा— "वीर! तुम देवताओं के पास उनका हविष्य पहुँचाओ। मैं अत्यन्त दुर्बल हो गया हूँ। अब केवल तुम्हीं अग्निपद पर प्रतिष्ठित हो जाओ और मेरा यह प्रिय कार्य सम्पन्न करो।" इस प्रकार अथर्वा को भेजकर अग्निदेव दूसरे स्थान में चले गए। किन्तु मत्स्यों ने अथर्वा को बता दिया कि उनकी स्थिति कहाँ है। इससे कुपित होकर अग्नि ने उन्हें शाप देते हुए कहा— "तुम लोग नाना प्रकार से जीवों के भक्ष्य बनोगे!"
देवानां वह हव्यं त्वमहं वीर सुदुर्बलः ।
अथ त्वं गच्छ मध्वक्षं प्रियमेतत् कुरुष्व मे ॥
वीर! तुम देवताओंके पास उनका हविष्य पहुँचाओ । मैं अत्यन्त दुर्बल हो गया हूँ । अब केवल तुम्हीं अग्निपदपर प्रतिष्ठित हो जाओ और मेरा यह प्रिय कार्य सम्पन्न करो '
तदनन्तर अग्नि ने अथर्वा से पुनः वही बात कही। उस समय देवताओं के कहने पर अथर्वा मुनि ने सह नामक अग्निदेव से अत्यन्त अनुनय-विनय की; परन्तु उन्होंने न तो हविष्य ढोने का भार लेने की इच्छा दिखाई और न ही वे अपने उस जीर्ण शरीर का भार सह सके। अन्ततः उन्होंने अपना शरीर त्याग दिया। शरीर त्यागकर वे धरती में समा गए और भूमि को स्पर्श करते हुए उन्होंने पृथक्-पृथक् बहुत से धातुओं की सृष्टि की।
स तच्छरीरं संत्यज्य प्रविवेश धरां तदा ।
भूमिं स्पृष्टासृजद् धातून् पृथक् पृथगतीव हि ॥
उस समय अपने उस शरीरको त्यागकर वे धरतीमें समा गये । भूमिका स्पर्श करके उन्होंने पृथक् - पृथक् बहुत - से धातुओंकी सृष्टि की ।
'सह' नामक अग्नि ने अपने पीब तथा रक्त से गन्धक एवं तैजस धातुओं को उत्पन्न किया। उनकी हड्डियों से देवदारु के वृक्ष प्रकट हुए; कफ से स्फटिक तथा पित्त से मरकतमणिका का प्रादुर्भाव हुआ। उनका यकृत ही काले रङ्ग का लोहा बनकर प्रकट हुआ। काष्ठ, पाषाण और लोहा— इन तीनों से ही प्रजाजनों की शोभा होती है। उनके नख मेघसमूह के रूप में हैं और नाड़ियाँ मूँगा बनकर प्रकट हुई हैं।
राजन्! सह नामक अग्नि के शरीर से अन्य नाना प्रकार के धातु उत्पन्न हुए। इस प्रकार शरीर त्यागकर वे बड़ी भारी तपस्या में लग गए। जब भृगु और अङ्गिरा आदि ऋषियों ने उन्हें पुनः तपस्या से उपरत कर दिया, तब वे तेजस्वी अग्निदेव अत्यन्त प्रज्वलित होकर उठे। महर्षि अङ्गिरा को सामने देख वे भय के मारे पुनः महासागर के भीतर प्रविष्ट हो गए। इस प्रकार अग्नि के अदृश्य होने पर सारा संसार भयभीत होकर अथर्वा-अङ्गिरा की शरण में आया और देवताओं ने उनकी पूजा की।
दृष्ट्वा ऋषिं भयाच्चापि प्रविवेश महार्णवम् ।
तस्मिन् नष्टे जगद् भीतमथर्वाणमथाश्रितम् ।
अर्चयामासुरेवैनमथर्वाणं सुरादयः ॥
महर्षि अंगिराको सामने देख वे अग्नि भयके मारे पुनः महासागरके भीतर प्रविष्ट हो गये । इस प्रकार अग्निके अदृश्य हो जानेपर सारा संसार भयभीत हो अथर्वा — अंगिराकी शरणमें आया तथा देवताओंने इन अथर्वाकी पूजा की ।
अथर्वा ने समस्त प्राणियों के देखते-देखते समुद्र को मथ डाला और अग्निदेव के दर्शन कर स्वयं सम्पूर्ण लोकों की सृष्टि की। इस प्रकार पूर्वकाल में अदृश्य हुए अग्निको भगवान अङ्गिरा ने पुनः बुलाया, जिससे प्रकट होकर वे सदा प्राणियों का हविष्य वहन करते हैं। सह अग्नि ने समुद्र के भीतर भ्रमण करते हुए विविध वेदोक्त अग्निदेवों और उनके स्थानों को उत्पन्न किया।
एवमग्निर्भगवता नष्टः पूर्वमथर्वणा ।
आहूतः सर्वभूतानां हव्यं वहति सर्वदा ॥
इस प्रकार पूर्वकालमें अदृश्य हुए अग्निको भगवान् अंगिराने फिर बुलाया । जिससे प्रकट होकर वे सदा सम्पूर्ण प्राणियोंका हविष्य वहन करते हैं ।
वे नदियाँ— सिन्धु, पञ्चनद, देविका, सरस्वती, गङ्गा, शतकुम्भा, सरयू, गण्डकी, चर्मण्वती, मही, मेध्या, मेधातिथि, ताम्रवती, वेत्रवती, कौशिकी, तमसा, नर्मदा, गोदावरी, वेणा, उपवेणा, भीमा, वडवा, भारती, सुप्रयोगा, कावेरी, मुर्मुरा, तुङ्गवेणा, कृष्णवेणा, कपिला तथा शोणभद्र— ये सब अग्नियों के उत्पत्ति-स्थान कहे गए हैं।
अद्भुत की प्रियतमा पत्नी के गर्भ से उनका 'विभूरसि' नामक पुत्र हुआ। अग्नियों की जितनी सङ्ख्या बताई गई है, सोमयागों की भी उतनी ही है। वे सब ब्रह्माजी के मानसिक सङ्कल्प से अत्रिके वंश में उत्पन्न हुए हैं। जब अत्रिक को प्रजा की सृष्टि करनी थी, तब उन्होंने उन अग्नियों को अपने हृदय में धारण किया और फिर उस ब्रह्मर्षि के शरीर से विभिन्न अग्नियों का प्रादुर्भाव हुआ।
अद्भुतस्य प्रिया भार्या तस्य पुत्रो विभूरसिः ॥
यावन्तः पावकाः प्रोक्ताः सोमास्तावन्त एव तु ।
अत्रेश्चाप्यन्वये जाता ब्रह्मणो मानसाः प्रजाः ॥
अद्भुतकी जो प्रियतमा पत्नी है, उसके गर्भसे उनके ' विभूरसि' नामक पुत्र हुआ । अग्नियोंकी जितनी संख्या बतायी गयी है, सोमयागोंकी भी उतनी ही है । वे सब अग्नि ब्रह्माजीके मानसिक संकल्पसे अत्रिके वंशमें उनकी संतानरूपसे उत्पन्न हुए हैं ।
राजन्! इस प्रकार मैंने इन अप्रमेय, अन्धकार निवारक और दीप्तिमान महामना अग्नियों की उत्पत्ति का वर्णन किया। वेदों में 'अद्भुत' नामक अग्नि का जैसा माहात्म्य है, वैसा ही सब अग्नियों का समझना चाहिए; क्योंकि इन सबमें एक ही अग्नितत्त्व विद्यमान है। जो प्रथम भगवान अग्नि हैं, जिन्हें अङ्गिरा भी कहते हैं, वे एक ही हैं। जिस प्रकार ज्योतिष्टोम यज्ञ आदि अनेक रूपों में प्रकट हुआ है, उसी प्रकार एक ही अग्नितत्त्व प्रजापतिके शरीर से विविध रूपों में उत्पन्न हुआ है।
एक एवैष भगवान् विज्ञेयः प्रथमोऽङ्गिराः ॥
बहुधा निःसृतः कायाज्ज्योतिष्टोमः क्रतुर्यथा । ये प्रथम भगवान् अग्नि, जिन्हें अंगिरा भी कहते हैं, एक ही हैं, ऐसा जानना चाहिये । जैसे ज्योतिष्टोम यज्ञ उद्भिद् आदि अनेक रूपोंमें प्रकट हुआ है, उसी प्रकार एक ही अग्नितत्त्व प्रजापतिके शरीरसे विविध रूपोंमें उत्पन्न हुआ है ।
इस प्रकार मेरे द्वारा अग्निदेव के महान वंश का प्रतिपादन किया गया। वे विविध वेदमन्त्रों द्वारा पूजित होकर देहधारियों के हविष्य को देवताओं के पास पहुँचाते हैं। इस प्रकार वनपर्व के अन्तर्गत आङ्गिरसोपाख्यान विषयक अग्नि-प्रादुर्भाव सम्बन्धी यह अध्याय पूरा हुआ।
इत्येष वंशः सुमहानग्नीनां कीर्तितो मया ।
योऽर्चितो विविधैर्मन्त्रैर्हव्यं वहति देहिनाम् ॥
इस प्रकार मेरेद्वारा अग्निदेवके महान् वंशका प्रतिपादन किया गया । वे भगवान् अग्नि विविध वेदमन्त्रोंद्वारा पूजित होकर देहधारियोंके दिये हुए हविष्यको देवताओंके पास पहुँचाते हैं ।
मार्कण्डेयजी बोले— "निष्पाप युधिष्ठिर! मैंने तुमसे अग्नियों के विविध वंशों का वर्णन किया। अब तुम परम बुद्धिमान कार्तिकेय के जन्म का वृत्तान्त सुनो। अद्भुत अग्नि के पुत्र कार्तिकेय का बल और तेज असीम है। उनका जन्म ब्रह्मर्षियों की पत्नियों के गर्भ से हुआ है। वे उत्तम यश वाले और ब्राह्मणभक्त हैं। मैं उनके जन्म का वृत्तान्त बता रहा हूँ, सुनो।"
"पूर्वकाल की बात है, देवता और असुर युद्ध के लिए उद्यत होकर एक-दूसरे को अस्त्र-शस्त्रों से चोट पहुँचाया करते थे। उस सङ्घर्ष में भयङ्कर रूपवाले दानव सदा देवताओं पर विजय पाते थे। जब इन्द्र ने देखा कि दानव बार-बार देवताओं की सेना का वध कर रहे हैं, तब वे एक सुयोग्य सेनापति के लिए चिन्तित हो उठे।"
"उन्होंने सोचा— 'मुझे ऐसे पुरुष का पता लगाना चाहिए जो महान बलवान हो और अपने पराक्रम से देवताओं की उस सेना का संरक्षण करे जिसका दानव नाश कर देते हैं।' इसी विचार के साथ इन्द्र मानसपर्वत पर गए। वहाँ उन्हें एक स्त्री के मुख से निकला हुआ भयङ्कर आर्तनाद सुनाई दिया, जो कह रही थी— 'कोई वीर पुरुष दौड़कर आए और मेरी रक्षा करे। वह मेरे लिए पति प्रदान करे या स्वयं ही मेरा पति हो जाए!'"
केश्युवाच विसृजस्व त्वमेवैनां शक्रैषा प्रार्थिता मया ।
क्षमं ते जीवतो गन्तुं स्वपुरं पाकशासन ॥
केशी बोला- इन्द्र! तू ही इसे छोड़ दे । मैंने इसका वरण कर लिया है । पाकशासन! ऐसा करनेपर ही तू जीता- जागता अपनी अमरावती पुरीको लौट सकता है ।
"यह सुनकर इन्द्र ने कहा— 'भद्रे! डरो मत, अब तुम्हें कोई भय नहीं है।' जब उन्होंने उधर दृष्टि डाली, तो केशी दानव सामने खड़ा दिखाई दिया। उसने मस्तक पर किरीट धारण कर रखा था और हाथ में गदा लिए वह एक कन्या का हाथ पकड़े विविध धातुओं से विभूषित पर्वत-सा जान पड़ता था। यह देख इन्द्र ने कहा— 'रे नीच कर्म करने वाले दानव! तू कैसे इस कन्या का अपहरण करना चाहता है? समझ ले, मैं वज्रधारी इन्द्र हूँ। अब इस अबला को सताना छोड़ दे!'"
"केशी बोला— 'इन्द्र! तू ही इसे छोड़ दे। मैंने इसका वरण कर लिया है। पाकशासन! ऐसा करने पर ही तू जीवित अपनी अमरावती पुरी लौट सकता है।' इतना कहकर केशी ने इन्द्र का वध करने के लिए अपनी गदा चलाई, परन्तु इन्द्र ने अपने वज्र द्वारा उस आती हुई गदा को बीच से ही काट डाला।"
उस भीषण आघात से अत्यन्त पीडित होकर वह दानव उस परम सौभाग्यशालिनी कन्या को अकेला छोड़कर वहाँ से भाग गया। असुर के भाग जाने पर इन्द्र ने व्याकुल होकर उस कन्या की ओर देखा और पूछा— 'सुमुखि! तुम कौन हो? किसकी पुत्री हो? और यहाँ क्या करती हो?'
इन्द्र, देवसेना को लेकर ब्रह्माजी के पास और ब्रह्मर्षियों के आश्रम की ओर बढ़ चले। मार्ग में कन्या ने कहा— 'देवेन्द्र! मैं प्रजापतेः कन्या हूँ, मेरा नाम देवसेना है। मेरी भगिनी दैत्यसेना है, जिसे इस केशी ने पहले ही हर लिया था। हम दोनों बहनें अपनी सखियों के साथ प्रजापतेः आज्ञा लेकर सदा क्रीडा-विहार के लिए इस मानस पर्वत पर आया करती थीं। किन्तु उस महान असुर केशी ने प्रतिदिन यहाँ आकर हमें फुसलाने का प्रयास किया; दैत्यसेना तो इसे चाहती थी, परन्तु मेरा इस पर कोई प्रेम नहीं था। हे भगवन! आपके बल से मैं उस साहृता के चङ्गुल से मुक्त हो गई हूँ। अब मैं आपके आदेशानुसार किसी दुर्जय वीर को ही अपना पति बनाना चाहती हूँ।'
सदैवावां भगिन्यौ तु सखीभिः सह मानसम् ।
आगच्छावेह रत्यर्थमनुज्ञाप्य प्रजापतिम् ॥
हम दोनों बहिनें अपनी सखियोंके साथ प्रजापतिकी आज्ञा लेकर सदा क्रीडाविहारके लिये इस मानस पर्वतपर आया करती थीं ।
इन्द्र ने उसे ढाँढस बँधाते हुए कहा— 'शुभे! तुम मेरी मौसेरी बहन हो, मेरी माता भी दक्ष की ही पुत्री हैं। किन्तु मेरी इच्छा है कि तुम स्वयं अपने बल का परिचय दो। हे देवी! तुम्हारे पति का बल कैसा होना चाहिए?'
कीदृशं तु बलं देवि पत्युस्तव भविष्यति ।
एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं तव वाक्यमनिन्दिते ॥
इन्द्रने पूछा — देवि! तुम्हारे पतिका बल कैसा होगा? अनिन्दिते! यह बात मैं तुम्हारे ही मुँहसे सुनना चाहता हूँ ।
कन्या ने अपनी इच्छा स्पष्ट करते हुए कहा— 'देवराज! मेरा पति वह हो जो देवता, दानव, यक्ष, किन्नर, नाग और दुष्ट दैत्यों को जीतने वाला हो; जिसका पराक्रम महान और बल असाधारण हो तथा जो आपके साथ रहकर समस्त प्राणियों पर विजय प्राप्त कर सके। वह ब्राह्मणहितैषी और अपने यश की वृद्धि करने वाला वीर पुरुष हो।'
कन्योवाच देवदानवयक्षाणां किन्नरोरगरक्षसाम् ।
जेता यो दुष्टदैत्यानां महावीर्यो महाबलः ॥
यस्तु सर्वाणि भूतानि त्वया सह विजेष्यति ।
स हि मे भविता भर्ता ब्रह्मण्यः कीर्तिवर्धनः ॥
कन्या बोली – देवराज! जो देवता, दानव, यक्ष, किन्नर, नाग, राक्षस तथा दुष्ट दैत्योंको जीतनेवाला हो; जिसका पराक्रम महान् और बल असाधारण हो तथा जो तुम्हारे साथ रहकर समस्त प्राणियोंपर विजय प्राप्त कर सके, वह ब्राह्मणहितैषी तथा अपने यशकी वृद्धि करनेवाला वीर पुरुष मेरा पति होगा ।
मार्कण्डेय जी कहते हैं— राजन्! देवसेना की यह बात सुनकर इन्द्र अत्यन्त दुःखी हुए। वे सोचने लगे कि इस देवी ने जिस प्रकार के पति की इच्छा व्यक्त की है, वैसा पति मिलना तो असम्भव जान पड़ता है। तभी इन्द्र की दृष्टि सूर्य पर पड़ी जो उदयाचल पर आ गए थे। चन्द्रमा भी सूर्य में ही प्रवेश कर रहे थे और अमावस्या आरम्भ हो चुकी थी। उस भयङ्कर मुहूर्त में उदयगिरि के शिखर पर उन्हें देवासुर-सङ्ग्राम के लक्षण दिखाई दिए। आकाश में लाल रङ्ग के घने बादल घिर आए थे और समुद्र का जल भी रक्त की भान्ति लाल दृष्टिगोचर हो रहा था।
इन्द्रस्तस्या वचः श्रुत्वा दुःखितोऽचिन्तयद् भृशम् ।
अस्या देव्याः पतिर्नास्ति यादृशं सम्प्रभाषते ॥
मार्कण्डेयजी कहते हैं - राजन्! देवसेनाकी बात सुनकर इन्द्र अत्यन्त दुःखी हो सोचने लगे ‘ इस देवीको जैसा यह बता रही है, वैसा पति मिलना सम्भव नहीं जान पड़ता'
भृगु तथा अङ्गिरा गोत्र के ऋषियों द्वारा मन्त्र पढ़कर हवन किया जा रहा था। चन्द्रमा और सूर्य की एक राशि में स्थिति और उस रौद्र मुहूर्त को देखकर इन्द्र मन ही मन चिन्तन करने लगे— 'अहो! इस समय चन्द्रमा और सूर्य पर यह भयङ्कर घेरा दिख रहा है, जिससे सूचित होता है कि रात बीतते-बीतते भारी युद्ध छिड़ जाएगा। देखिए, यह सिन्धु नदी भी उलटी धार में बहकर रक्त के स्रोत बहा रही है और सियारिनें आग उगलती हुई सूर्य की ओर देखकर रो रही हैं।'
इन्द्र ने आगे सोचा— 'अग्नि और सूर्य के साथ चन्द्रमा का यह अद्भुत समागम देख कर लगता है कि इस समय चन्द्रमा जिस पुत्र को जन्म देंगे, वही इस देवी का पति होगा; अथवा अग्नि भी इन सभी अभीष्ट गुणों से युक्त हैं।' ऐसा सोचकर इन्द्र देवसेना को लेकर ब्रह्मलोक गए और ब्रह्माजी से बोले— 'भगवन! आप इस देवी के लिए कोई अच्छे स्वभाव का शूरवीर पति प्रदान कीजिये।'
एष चेज्जनयेद् गर्भं सोऽस्या देव्याः पतिर्भवेत् ।
एवं संचिन्त्य भगवान् ब्रह्मलोकं तदा गतः ॥
गृहीत्वा देवसेनां तामवदत् स पितामहम् ।
उवाच चास्या देव्यास्त्वं साधुशूरं पतिं दिश ॥
‘ अतः ये यदि किसी बालकको उत्पन्न करें तो वही इस देवीका पति होगा । ' ऐसा सोच-विचारकर ऐश्वर्यशाली इन्द्र उस समय उस देवसेनाको साथ ले ब्रह्मलोकमें गये और ब्रह्माजीसे इस प्रकार बोले— ' भगवन्! आप इस देवीके लिये कोई अच्छे स्वभावका शूरवीर पति प्रदान कीजिये '
ब्रह्माजी ने उत्तर दिया— 'दानवसूदन! तुमने जो विचार किया है, वही मैंने भी सोचा है। वैसा होने पर ही एक महान पराक्रमी वीर का प्रादुर्भाव होगा। शतक्रतु तुम्हारे साथ रहकर देवसेना का सेनापति बनेगा और वही इस देवी का पति भी होगा।' यह सुनकर इन्द्र ब्रह्माजी को नमस्कार कर उस कन्या को लेकर वहाँ पहुँचे जहाँ वसिष्ठ आदि श्रेष्ठ ब्राह्मण यज्ञ कर रहे थे। उन महात्माओं ने मन्त्रोच्चारण के पश्चात अग्निदेव को हविष्य अर्पित करने हेतु आह्वान किया।
स भविष्यति सेनानीस्त्वया सह शतक्रतो ।
अस्या देव्याःपतिश्चैव स भविष्यति वीर्यवान् ॥
शतक्रतो! वही तुम्हारे साथ रहकर देवसेनाका पराक्रमी सेनापति होगा और वही इस देवीका भी पति होगा ।
मन्त्रों द्वारा आवाहन होने पर 'अद्भुत' नामक अग्नि सूर्यमण्डल से निकलकर मौन भाव से वहाँ आए और ऋषियों से हवनीय पदार्थ प्राप्त कर देवताओं की सेवा में अर्पित किए। जब अग्निदेव वहाँ से जाने लगे, तब उनकी दृष्टि उन महात्मा सप्तर्षियों की पत्नियों पर पड़ी। वे कुछ अपने आसनों पर बैठी थीं और कुछ सुखपूर्वक सो रही थीं। उनकी कान्ति सुवर्णमयी वेदी के समान गौर थी और वे चन्द्रमा की कलाओं की भाँति निर्मल तथा तारिकाओं के समान अद्भुत सौन्दर्य से प्रकाशित थीं।
उन ब्रह्मर्षियों की पत्नियों को देखकर अग्निदेव की समस्त इन्द्रियाँ क्षोभ से चञ्चल हो उठीं और वे सर्वथा काम के अधीन हो गए। उन्होंने मन ही मन विचार किया— 'इन ब्रह्मर्षियों की पत्नियाँ पतिव्रता हैं, ये मुझे बिलकुल नहीं चाहतीं। यदि मैं गार्हपत्य अग्नि में प्रविष्ट हो जाऊँ, तो बार-बार इनके दर्शन का अवसर पा सकूँगा।'
नैताः शक्या मया द्रष्टुं स्प्रष्टुं वाप्यनिमित्ततः ।
गार्हपत्यं समाविश्य तस्मात् पश्याम्यभीक्ष्णशः ॥
' मैं अकारण न तो इन्हें देख सकता हूँ और न इनका स्पर्श ही कर सकता हूँ। ऐसी दशामें यदि मैं गार्हपत्य अग्निमें प्रविष्ट हो जाऊँ तो बार- बार इनके दर्शनका अवसर पा सकता हूँ'
अग्निदेव ने ऐसा निश्चय कर गार्हपत्य अग्नि का आश्रय लिया और उन ऋषि-पत्नियों का स्पर्श व दर्शन कर बड़ी प्रसन्नता का अनुभव करने लगे। वे काफी देर तक वहीं टिके रहे और काम के वश में होकर अपना हृदय उन सुन्दरियों पर निछावर करने लगे। उनका हृदय कामाग्नि से सन्तप्त था और इन स्त्रियों को न पा सकने के कारण वे अपने शरीर को त्याग देने का निश्चय करके वन की ओर चले गए।
संस्पृशन्निव सर्वास्ताः शिखाभिः काञ्चनप्रभाः ।
पश्यमानश्च मुमुदे गार्हपत्यं समाश्रितः ॥
मार्कण्डेयजी कहते हैं - राजन्! ऐसा निश्चय करके अग्निदेवने गार्हपत्य अग्निका आश्रय लिया और अपनी लपटोंसे स्वर्गकी - सी कान्तिवाली उन ऋषि -पत्नियोंका स्पर्श तथा दर्शन- सा करते हुए वे बड़ी प्रसन्नताका अनुभव करने लगे ।
ततक्षण प्रजापतेः पुत्री स्वाहा, जो पहले से ही अग्निदेव को अपना पति बनाना चाहती थी, अग्नि के इस निर्णय की प्रतीक्षा कर रही थी। वह लम्बे समय से अग्नि के उस 'छिद्र' को ढूँढ़ रही थी जिससे वह उनमें प्रवेश कर सके। जब उसे ज्ञात हुआ कि अग्निदेव काम-सन्तप्त होकर वन में चले गए हैं, तो उसने निश्चय किया— 'मैं स्वयं सप्तर्षिपत्नियों के रूप धारण करके अग्निदेव की कामना करूँगी; क्योंकि वे इन रूपों से मोहित हो रहे हैं। ऐसा करने से उन्हें प्रसन्नता भी होगी और मेरी कामना भी पूर्ण हो जाएगी।'
अहं सप्तर्षिपत्नीनां कृत्वा रूपाणि पावकम् ॥
कामयिष्यामि कामार्ता तासां रूपेण मोहितम् ।
एवं कृते प्रीतिरस्य कामावाप्तिश्च मे भवेत् ॥
मैं अग्निके प्रति कामभावसे पीड़ित हूँ । अतः स्वयं ही सप्तर्षिपत्नियोंके रूप धारण करके अग्निदेवकी कामना करूँगी; क्योंकि वे उनके रूपसे मोहित हो रहे हैं । ऐसा करनेसे उन्हें प्रसन्नता होगी और मेरी कामना भी पूर्ण हो जायगी'
In English
The Lineage of Agni and Panchajanya
Markandeya describes the various forms of Agni (fire) and their lineages, starting from Brihaspati's sons. He details how the sage Panchajanya emerged from the penance of five rishis and created many deities, Vinayakas, and elemental forces.
This page answers
- Who are the sons of brihaspati?
- How was panchajanya created?
- What are the fifteen vinayakas?
- Which fires must be worshipped to correct ritual errors?
- Who is the wife of sah?
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