श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड २ — पृष्ठ 1531–1540
महाभारत — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1531–1540
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पुरंदरस्तु तामाह मा भैर्नास्ति भयं तव ।
एवमुक्त्वा ततोऽपश्यत् केशिनं स्थितमग्रतः ॥ ८ ॥
यह सुनकर इन्द्रने उससे कहा- ' भद्रे! डरो मत, अब तुम्हें कोई भय नहीं है । ' ऐसा कहकर जब उन्होंने उधर दृष्टि डाली, तब केशी दानव सामने खड़ा दिखायी दिया ॥ ८ ॥
किरीटिनं गदापाणिं धातुमन्तमिवाचलम् ।
हस्ते गृहीत्वा कन्यां तामथैनं वासवोऽब्रवीत् ॥ ९ ॥
उसने मस्तकपर किरीट धारण कर रखा था । उसके हाथमें गदा थी और वह एक कन्याका हाथ पकड़े विविध धातुओंसे विभूषित पर्वत-सा जान पड़ता था । यह देख इन्द्रने उससे कहा— ॥ ९ ॥
अनार्यकर्मन् कस्मात् त्वमिमां कन्यां जिहीर्षसि ।
वज्रिणं मां विजानीहि विरमास्याः प्रबाधनात् ॥ १० ॥
‘ रे नीच कर्म करनेवाले दानव! तू कैसे इस कन्याका अपहरण करना चाहता है? समझ
ले, मैं वज्रधारी इन्द्र हूँ । अब इस अबलाको सताना छोड़ दे ॥ १० ॥
केश्युवाच
विसृजस्व त्वमेवैनां शक्रैषा प्रार्थिता मया ।
क्षमं ते जीवतो गन्तुं स्वपुरं पाकशासन ॥ ११ ॥
केशी बोला- इन्द्र! तू ही इसे छोड़ दे । मैंने इसका वरण कर लिया है । पाकशासन! ऐसा करनेपर ही तू जीता- जागता अपनी अमरावती पुरीको लौट सकता है ॥ ११ ॥
एवमुक्त्वा गदां केशी चिक्षेपेन्द्रवधाय वै ।
तामापतन्तीं चिच्छेद मध्ये वज्रेण वासवः ॥ १२ ॥
ऐसा कहकर केशीने इन्द्रका वध करनेके लिये अपनी गदा चलायी । परंतु इन्द्रने अपने वज्रद्वारा उस आती हुई गदाको बीचसे ही काट डाला ॥ १२ ॥
अथास्य शैलशिखरं केशी क्रुद्धो व्यवासृजत् ।
तदा पतन्तं सम्प्रेक्ष्य शैलशृङ्गं शतक्रतुः ॥ १३ ॥
बिभेद राजन् वज्रेण भुवि तन्निपपात ह ।
पतता तु तदा केशी तेन शृङ्गेण ताडितः ॥ १४ ॥
तब केशीने कुपित होकर इन्द्रपर पर्वतकी एक चट्टान फेंकी । राजन्! उस शैलशिखरको अपने ऊपर सरिता देख इन्द्रने वज्रसे उसके टुकड़े - टुकड़े कर दिये और वह चूर- चूर होकर पृथ्वीपर गिर पड़ा । उस समय गिरते हुए उस शिलाखण्डने केशीको ही भारी चोट पहुँचायी ॥ हित्वा कन्यां महाभागां प्राद्रवद् भृशपीडितः । अपयातेऽसुरे तस्मिंस्तां कन्यां वासवोऽब्रवीत् ।
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कासि कस्यासि किञ्चेह कुरुषे त्वं शुभानने ॥ १५ ॥
उस आघातसे अत्यन्त पीडित हो वह दानव उस परम सौभाग्यशालिनी कन्याको छोड़कर भाग गया । उस असुरके भाग जानेपर इन्द्रने उस कन्यासे पूछा— ' सुमुखि! तुम कौन हो? किसकी पुत्री हो? और यहाँ क्या करती हो? ' ॥ १५ ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमास्यापर्वणि आङ्गिरसोपाख्याने स्कन्दोत्पत्तौ केशिपराभवे त्रयोविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २२३ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत मार्कण्डेयसमास्यापर्वमें आंगिरसोपाख्यानप्रकरणमें स्कन्दकी उत्पत्तिके विषयमें केशिपराभवविषयक दो सौ तेईसवाँअध्याय समाप्तहुआ ॥ २२३ ॥
( दाक्षिणात्य अधिक पाठके २३ श्लोक मिलाकर कुल १७ श्लोक हैं )
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चतुर्विंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः इन्द्रका देवसेनाके साथ ब्रह्माजीके पास तथा ब्रह्मर्षियोंके आश्रमपर जाना, अग्निका मोह और वनगमन कन्योवाच
अहं प्रजापतेः कन्या देवसेनेति विश्रुता ।
भगिनी दैत्यसेना मे सा पूर्वं केशिना हृता ॥ १ ॥
कन्या बोली – देवेन्द्र! मैं प्रजापतिकी पुत्री हूँ। मेरा नाम देवसेना है । मेरी बहिनका नाम दैत्यसेना है, जिसे इस केशीने पहले ही हर लिया था ॥ १ ॥
सदैवावां भगिन्यौ तु सखीभिः सह मानसम् ।
आगच्छावेह रत्यर्थमनुज्ञाप्य प्रजापतिम् ॥ २ ॥
हम दोनों बहिनें अपनी सखियोंके साथ प्रजापतिकी आज्ञा लेकर सदा क्रीडाविहारके लिये इस मानस पर्वतपर आया करती थीं ॥ २ ॥
नित्यं चावां प्रार्थयते हर्तुं केशी महासुरः ।
इच्छत्येनं दैत्यसेना न चाहं पाकशासन ॥ ३ ॥
पाकशासन! महान् असुर केशी प्रतिदिन यहाँ आकर हम दोनोंको हर ले जानेके लिये फुसलाया करता था । दैत्यसेना इसे चाहती थी, परंतु मेरा इसपर प्रेम नहीं था ॥
साहृतानेन भगवन् मुक्ताहं त्वद्बलेन तु ।
त्वया देवेन्द्र निर्दिष्टं पतिमिच्छामि दुर्जयम् ॥ ४ ॥
अतः दैत्यसेनाको तो यह हर ले गया, परंतु मैं आपके पराक्रमसे बच गयी । भगवन्! देवेन्द्र! अब मैं आपके आदेशके अनुसार किसी दुर्जय वीरको अपना पति बनाना चाहती ॥ ४ ॥
इन्द्र उवाच
मम मातृष्वसेयी त्वं माता दाक्षायणी मम ।
आख्यातुं त्वहमिच्छामि स्वयमात्मबलं त्वया ॥ ५ ॥
इन्द्र बोले – शुभे! तुम मेरी मौसेरी बहिन हो । मेरी माता भी दक्षकी ही पुत्री हैं । मेरी इच्छा है कि तुम स्वयं ही अपने बलका परिचय दो ॥ ५ ॥
कन्योवाच
अबलाहं महाबाहो पतिस्तु बलवान् मम ।
वरदानात् पितुर्भावी सुरासुरनमस्कृतः ॥ ६ ॥
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कन्या बोली – महाबाहो! मैं तो अबला हूँ। पिताजीके वरदानसे मेरे भावी पति बलवान् तथा देवदानव-वन्दित होंगे ॥ ६ ॥
इन्द्र उवाच
कीदृशं तु बलं देवि पत्युस्तव भविष्यति ।
एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं तव वाक्यमनिन्दिते ॥ ७ ॥
इन्द्रने पूछा — देवि! तुम्हारे पतिका बल कैसा होगा? अनिन्दिते! यह बात मैं तुम्हारे ही मुँहसे सुनना चाहता हूँ ॥ ७ ॥
कन्योवाच
देवदानवयक्षाणां किन्नरोरगरक्षसाम् ।
जेता यो दुष्टदैत्यानां महावीर्यो महाबलः ॥ ८ ॥
यस्तु सर्वाणि भूतानि त्वया सह विजेष्यति ।
स हि मे भविता भर्ता ब्रह्मण्यः कीर्तिवर्धनः ॥ ९ ॥
कन्या बोली – देवराज! जो देवता, दानव, यक्ष, किन्नर, नाग, राक्षस तथा दुष्ट दैत्योंको जीतनेवाला हो; जिसका पराक्रम महान् और बल असाधारण हो तथा जो तुम्हारे साथ रहकर समस्त प्राणियोंपर विजय प्राप्त कर सके, वह ब्राह्मणहितैषी तथा अपने यशकी वृद्धि करनेवाला वीर पुरुष मेरा पति होगा ॥ ८ -९ ॥ मार्कण्डेय उवाच
इन्द्रस्तस्या वचः श्रुत्वा दुःखितोऽचिन्तयद् भृशम् ।
अस्या देव्याः पतिर्नास्ति यादृशं सम्प्रभाषते ॥ १० ॥
मार्कण्डेयजी कहते हैं - राजन्! देवसेनाकी बात सुनकर इन्द्र अत्यन्त दुःखी हो सोचने लगे ‘ इस देवीको जैसा यह बता रही है, वैसा पति मिलना सम्भव नहीं जान पड़ता' ॥ १० ॥
अथापश्यत् स उदये भास्करं भास्करद्युतिः ।
सोमं चैव महाभागं विशमानं दिवाकरम् ॥ ११ ॥
तदनन्तर सूर्यके समान तेजस्वी इन्द्रने देखा, सूर्य उदयाचलपर आ गये हैं । महाभाग चन्द्रमा भी सूर्यमें ही प्रवेश कर रहे हैं ॥ ११ ॥
अमावास्यां प्रवृत्तायां मुहुर्ते रौद्र एव तु ।
देवासुरं च संग्रामं सोऽपश्यदुदये गिरौ ॥ १२ ॥
अमावस्या आरम्भ हो गयी थी । उस रौद्र ( भयंकर ) मुहूर्तमें ही उदयगिरिके शिखरपर उन्हें देवासुर- संग्रामका लक्षण दिखायी दिया ॥ १२ ॥
लोहितैश्च धनैर्युक्तां पूर्वां संध्यां शतक्रतुः ।
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अपश्यल्लोहितोदं च भगवान् वरुणालयम् ॥ १३ ॥
ऐश्वर्यशाली इन्द्रने देखा, पूर्वसंध्या (प्रभात) -का समय है, प्राचीके आकाशमें लाल रंगके घने बादल घिर आये हैं और समुद्रका जल भी लाल ही दृष्टिगोचर हो रहा है ॥ १३ ॥
भृगुभिश्चाङ्गिरोभ्यश्च हुतं मन्त्रैः पृथग्विधैः ।
हव्यं गृहीत्वा वह्निं च प्रविशन्तं दिवाकरम् ॥ १४ ॥
भृगु तथा अंगिरा गोत्रके ऋषियोंद्वारा पृथक् - पृथक् मन्त्र पढ़कर हवन किये हुए हविष्यको ग्रहण करके अग्निदेव भी सूर्यमें ही प्रवेश करते हैं ॥ १४ ॥
पर्व चैव चतुर्विंशं तदा सूर्यमुपस्थितम् ।
तथा धर्मगतं रौद्रं सोमं सूर्यगतं च तम् ॥ १५ ॥
उस समय भगवान् सूर्यके निकट चौबीसवाँ पर्व उपस्थित था; अर्थात् पहले जिस अमावस्यापर्वमें देवासुर- संग्राम हुआ था; उससे पूरे एक वर्षके बाद पुनः वैसा अवसर आया था । धर्मकी अर्थात् होम और संध्याकी वेलामें वह रौद्र मुहूर्त उपस्थित था और चन्द्रमा सूर्यकी राशिमें स्थित हो गये थे ॥ १५ ॥
समालोक्यैकतामेव शशिनो भास्करस्य च ।
समवायं तु तं रौद्रं दृष्ट्वा शक्रोऽन्वचिन्तयत् ॥ १६ ॥
इस प्रकार चन्द्रमा और सूर्यकी एकता (एक राशिपर स्थिति ) तथा रौद्र मुहूर्तका संयोग देखकर इन्द्र मन- ही - मन इस प्रकार चिन्तन करने लगे- ॥ १६ ॥
सूर्याचन्द्रमसोर्घोरं दृश्यते परिवेषणम् ।
एतस्मिन्नेव रात्र्यन्ते महद् युद्धं तु शंसति ॥ १७ ॥
‘ अहो! इस समय चन्द्रमा और सूर्यपर यह भयंकर घेरा दिखायी दे रहा है । इससे सूचित होता है कि रात बीतते - बीतते भारी युद्ध छिड़ जायगा ॥ १७ ॥
सरित्सिन्धुरपीयं तु प्रत्यसृग्वाहिनी भृशम् ।
शृगालिन्यग्निवक्त्रा च प्रत्यादित्यं विराविणी ॥ १८ ॥
' यह सिन्धु नदी भी उलटी धारामें बहकर रक्तके स्रोत बहा रही है । सियारिन मुँहसे आग उगलती हुई - सी सूर्यकी ओर देखकर रोती है ॥ १८ ॥
एष रौद्रश्च सङ्घातो महान् युक्तश्च तेजसा ।
सोमस्य वह्निसूर्याभ्यामद्भुतोऽयं समागमः ॥ १ ९ ॥
‘ अनेक योगोंका यह भयंकर तथा महान् संघात ( सम्मेलन ) तेजसे आलोकित हो रहा है । अग्नि और सूर्यके साथ चन्द्रमाका यह अद्भुत समागम दृष्टिगोचर होता है ॥
जनयेद्यं सुतं सोमः सोऽस्या देव्याः पतिर्भवेत् ।
अग्निश्चैतैर्गुणैर्युक्तः सर्वैरग्निश्च देवता ॥ २० ॥
'जान पड़ता है, इस समय चन्द्रमा जिस पुत्रको जन्म देंगे, वही इस देवीका पति होगा
अथवा अग्नि भी इन सभी अभीष्ट गुणोंसे युक्त हैं । वे भी देवकोटिमें ही हैं ॥
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एष चेज्जनयेद् गर्भं सोऽस्या देव्याः पतिर्भवेत् ।
एवं संचिन्त्य भगवान् ब्रह्मलोकं तदा गतः ॥ २१ ॥
गृहीत्वा देवसेनां तामवदत् स पितामहम् ।
उवाच चास्या देव्यास्त्वं साधुशूरं पतिं दिश ॥ २२ ॥
‘ अतः ये यदि किसी बालकको उत्पन्न करें तो वही इस देवीका पति होगा । ' ऐसा सोच-विचारकर ऐश्वर्यशाली इन्द्र उस समय उस देवसेनाको साथ ले ब्रह्मलोकमें गये और ब्रह्माजीसे इस प्रकार बोले— ' भगवन्! आप इस देवीके लिये कोई अच्छे स्वभावका शूरवीर पति प्रदान कीजिये ' ॥ २१-२२ ॥ ब्रह्मोवाच
मयैतच्चिन्तितं कार्यं त्वया दानवसूदन ।
तथा स भविता गर्भो बलवानुरुविक्रमः ॥ २३ ॥
ब्रह्माजीने कहा- दानवसूदन! इस विषयमें तुमने जो विचार किया है वही मैंने भी सोचा है । वैसा होनेपर ही एक महान् पराक्रमी बलवान् वीरका प्रादुर्भाव होगा ॥ २३ ॥
स भविष्यति सेनानीस्त्वया सह शतक्रतो ।
अस्या देव्याःपतिश्चैव स भविष्यति वीर्यवान् ॥ २४ ॥
शतक्रतो! वही तुम्हारे साथ रहकर देवसेनाका पराक्रमी सेनापति होगा और वही इस देवीका भी पति होगा ॥ २४ ॥
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एतच्छ्रुत्वा नमस्तस्मै कृत्वासौ सह कन्यया ।
तत्राभ्यगच्छद् देवेन्द्रो यत्र देवर्षयोऽभवन् ॥ २५ ॥
वसिष्ठप्रमुखा मुख्या विप्रेन्द्राः सुमहाबलाः । यह सुनकर देवराज इन्द्र ब्रह्माजीको नमस्कार करके उस कन्याको साथ ले जहाँ महान् शक्तिशाली वसिष्ठ आदि श्रेष्ठ ब्राह्मण एवं देवर्षि थे, वहाँ उनके आश्रमपर आये ॥ २५३ ॥
भागार्थं तपसो धातुं तेषां सोमं तथाध्वरे ॥ २६ ॥
पिपासवो ययुर्देवाः शतक्रतुपुरोगमाः । उन दिनों वे महर्षिगण जो यज्ञ कर रहे थे, उसमें भाग लेनेके लिये तथा सोमपान करनेके लिये इन्द्र आदि सभी देवता वहाँ पधारे थे । उन सबके मनमें सोमपान की इच्छा थी ॥ २६ || इष्टिं कृत्वा यथान्यायं सुसमिद्धे हुताशने ॥ २७ ॥
जुहुवुस्ते महात्मानो हव्यं सर्वदिवौकसाम् । उन महात्मा ऋषियोंने प्रज्वलित अग्निमें शास्त्रीय विधिसे इष्टिका सम्पादन करके सम्पूर्ण देवताओंके लिये हविष्यकी आहुति दी ॥ २७ ॥
समाहूतो हुतवहः सोऽद्भुतः सूर्यमण्डलात् ॥ २८ ॥
विनिःसृत्य ययौ वह्निर्वाग्यतो विधिवत् प्रभुः ।
आगम्याहवनीयं वै तैर्द्विजैर्मन्त्रतो हुतम् ॥ २ ९ ॥
स तत्र विविधं हव्यं प्रतिगृह्य हुताशनः ।
ऋषिभ्यो भरतश्रेष्ठ प्रायच्छत दिवौकसाम् ॥ ३० ॥
भरतश्रेष्ठ! मन्त्रोंद्वारा आवाहन होनेपर वे अद्भुत नामक अग्नि सूर्यमण्डलसे निकलकर मौनभावसे वहाँ आये और ब्रह्मर्षियोंद्वारा मन्त्रोच्चारणपूर्वक विधिवत् हवन किये हुए भाँति-भाँतिके हवनीय पदार्थोंको उन महर्षियोंसे प्राप्त करके उन्होंने सम्पूर्ण देवताओंकी सेवामें अर्पित किया ॥
निष्क्रामंश्चाप्यपश्यत् स पत्नीस्तेषां महात्मनाम् ।
स्वेष्वासनेषूपविष्टाः स्वपन्तीश्च तथा सुखम् ॥ ३१ ॥
देवताओंको हविष्य पहुँचाकर जब अग्निदेव वहाँसे जाने लगे, तब उनकी दृष्टि उन महात्मा सप्तर्षियोंकी पत्नियोंपर पड़ी । उनमेंसे कुछ तो अपने आसनोंपर बैठी थीं और कुछ सुखपूर्वक सो रही थीं ' ॥ ३१ ॥
रुक्मवेदिनिभास्तास्तु चन्द्रलेखा इवामलाः ।
हुताशनार्चिप्रतिमाः सर्वास्तारा इवाद्भुताः ॥ ३२ ॥
उनकी अंगकान्ति सुवर्णमयी वेदीके समान गौर थी, वे चन्द्रमाकी कलाके समान निर्मल थीं, अग्निकी लपटोंके समान प्रभा बिखेर रही थीं और तारिकाओंके समान अद्भुत सौन्दर्यसे प्रकाशित हो रही थीं ॥ ३२ ॥
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स तत्र तेन मनसा बभूव क्षुभितेन्द्रियः ।
पत्नीर्दृष्ट्वा द्विजेन्द्राणां वह्निः कामवशं ययौ ॥ ३३ ॥
इस प्रकार वहाँ ( आसक्तियुक्त) मनसे उन ब्रह्मर्षियोंकी पत्नियोंको देखकर अग्निदेवकी
सारी इन्द्रियाँ क्षोभसे चञ्चल हो उठीं । वे सर्वथा कामके अधीन हो गये ॥ ३३ ॥
भूयः संचिन्तयामास न न्याय्यं क्षुभितो ह्यहम् ।
साध्व्यः पत्न्यो द्विजेन्द्राणामकामाः कामयाम्यहम् ॥ ३४ ॥
फिर उन्होंने मन- ही- मन विचार किया कि ' मेरा यह कार्य कदापि उचित नहीं है । मेरे मनमें विचार आ गया है। इन ब्रह्मर्षियोंकी पत्नियाँ पतिव्रता हैं । ये मुझे बिलकुल नहीं चाहतीं, तो भी मैं इनकी कामना करता हूँ ॥ ३४ ॥
नैताः शक्या मया द्रष्टुं स्प्रष्टुं वाप्यनिमित्ततः ।
गार्हपत्यं समाविश्य तस्मात् पश्याम्यभीक्ष्णशः ॥ ३५ ॥
' मैं अकारण न तो इन्हें देख सकता हूँ और न इनका स्पर्श ही कर सकता हूँ। ऐसी दशामें यदि मैं गार्हपत्य अग्निमें प्रविष्ट हो जाऊँ तो बार- बार इनके दर्शनका अवसर पा सकता हूँ' ॥ ३५ ॥
मार्कण्डेय उवाच
संस्पृशन्निव सर्वास्ताः शिखाभिः काञ्चनप्रभाः ।
पश्यमानश्च मुमुदे गार्हपत्यं समाश्रितः ॥ ३६ ॥
मार्कण्डेयजी कहते हैं - राजन्! ऐसा निश्चय करके अग्निदेवने गार्हपत्य अग्निका आश्रय लिया और अपनी लपटोंसे स्वर्गकी - सी कान्तिवाली उन ऋषि -पत्नियोंका स्पर्श तथा दर्शन- सा करते हुए वे बड़ी प्रसन्नताका अनुभव करने लगे ॥ ३६ ॥
निरुष्य तत्र सुचिरमेवं वह्निर्वशं गतः ।
मनस्तासु विनिक्षिप्य कामयानो वराङ्गनाः ॥ ३७ ॥
इस प्रकार बहुत देरतक वहाँ टिके रहकर अग्निदेव कामके वशमें हो गये । वे अपना हृदय उन सुन्दरियोंपर निछावर करके उनसे मिलनेकी कामना कर रहे थे ॥
कामसंतप्तहृदयो देहत्यागविनिश्चितः ।
अलाभे ब्राह्मणस्त्रीणामग्निर्वनमुपागमत् ॥ ३८ ॥
उनका हृदय कामाग्निसे संतप्त हो रहा था । वे उन ब्रह्मर्षियोंकी पत्नियोंके न मिलनेसे
अपने शरीरको त्याग देनेका निश्चय कर चुके थे । अतः वनमें चले गये ॥
स्वाहा तं दक्षदुहिता प्रथमं कामयत् तदा ।
सा तस्य छिद्रमन्वैच्छच्चिरात्प्रभृति भाविनी ॥ ३ ९ ॥
प्रजापति दक्षकी पुत्री स्वाहा पहलेसे ही अग्निदेवको अपना पति बनाना चाहती थी और इसके लिये बहुत दिनोंसे वह अग्निका छिद्र ढूँढ़ रही थी ॥ ३ ९ ॥
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अप्रमत्तस्य देवस्य न च पश्यत्यनिन्दिता ।
सा तं ज्ञात्वा यथावत् तु वह्निं वनमुपागतम् ॥ ४० ॥
तत्त्वतः कामसंतप्तं चिन्तयामास भाविनी । परंतु अग्निदेवके सदा सावधान रहनेके कारण साध्वी स्वाहा उनका कोई दोष नहीं देख पाती थी । जब उसे अच्छी तरह मालूम हो गया कि अग्नि कामसंतप्त होकर वनमें चले गये हैं, तब उसने मन - ही- मन इस प्रकार विचार किया ॥ ४० ॥
अहं सप्तर्षिपत्नीनां कृत्वा रूपाणि पावकम् ॥ ४१ ॥
कामयिष्यामि कामार्ता तासां रूपेण मोहितम् ।
एवं कृते प्रीतिरस्य कामावाप्तिश्च मे भवेत् ॥ ४२ ॥
मैं अग्निके प्रति कामभावसे पीड़ित हूँ । अतः स्वयं ही सप्तर्षिपत्नियोंके रूप धारण करके अग्निदेवकी कामना करूँगी; क्योंकि वे उनके रूपसे मोहित हो रहे हैं । ऐसा करनेसे उन्हें प्रसन्नता होगी और मेरी कामना भी पूर्ण हो जायगी' ॥ ४१-४२ ॥ इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमास्यापर्वणि आङ्गिरसोपाख्याने स्कन्दोत्पत्तौ चतुर्विंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २२४ ॥
इसप्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत मार्कण्डेयसमास्यापर्वमें आंगिरसोपाख्यानके प्रसंगमें स्कन्दकी उत्पत्तिविषयक दो सौ चौबीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २२४ ॥
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पञ्चविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः स्वाहाका मुनिपत्नियोंके रूपोंमें अग्निके साथ समागम, स्कन्दकी उत्पत्ति तथा उनके द्वारा क्रौंच आदि पर्वतोंका विदारण मार्कण्डेय उवाच
शिवा भार्या त्वङ्गिरसः शीलरूपगुणान्विता ।
तस्याः सा प्रथमं रूपं कृत्वा देवी जनाधिप ॥ १ ॥
जगाम पावकाभ्याशं तं चोवाच वराङ्गना ।
मामग्ने कामसंतप्तां त्वं कामयितुमर्हसि ॥ २ ॥
करिष्यसि न चेदेवं मृतां मामुपधारय ।
अहमङ्गिरसो भार्या शिवा नाम हुताशन ।
शिष्टाभिः प्रहिता प्राप्ता मन्त्रयित्वा विनिश्चयम् ॥ ३ ॥
मार्कण्डेयजी कहते हैं— नरेश्वर! अंगिराकी पत्नी शिवा शील, रूप और सद्गुणोंसे सम्पन्न थी । सुन्दरी स्वाहादेवी पहले उसीका रूप धारण करके अग्निदेवके निकट गयी और उनसे इस प्रकार बोली- ' अग्ने! मैं कामवेदनासे संतप्त हूँ, तुम मुझे अपने हृदयमें स्थान दो । यदि ऐसा नहीं करोगे तो यह निश्चय जान लो, मैं अपने प्राण त्याग दूँगी । हुताशन! मैं अंगिराकी पत्नी हूँ । मेरा नाम शिवा है । दूसरी ऋषि- पत्नियोंने सलाह करके एक निश्चयपर पहुँचकर मुझे यहाँ भेजा है ' ॥ १–३ ॥ अग्निरुवाच
कथं मां त्वं विजानीषे कामार्तमितराः कथम् ।
यास्त्वया कीर्तिताः सर्वाः सप्तर्षीणां प्रियाः स्त्रियः ॥ ४ ॥
अग्निने पूछा—देवि! तुम तथा दूसरी सप्तर्षियोंकी सभी प्यारी स्त्रियाँ, जिनके विषयमें अभी तुमने चर्चा की है, कैसे जानती हैं कि मैं तुमलोगोंके प्रति कामभावसे पीड़ित हूँ ॥ ४ ॥
शिवोवाच
अस्माकं त्वं प्रियो नित्यं बिभीमस्तु वयं तव ।
त्वच्चित्तमिङ्गितैर्ज्ञात्वा प्रेषितास्मि तवान्तिकम् ॥ ५ ॥
मैथुनायेह सम्प्राप्ता कामं प्राप्तं द्रुतं चर ।
जामयो मां प्रतीक्षन्ते गमिष्यामि हुताशन ॥ ६ ॥