श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड २ — पृष्ठ 1511–1520
महाभारत — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1511–1520
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आक्रोशतां हि भूतानां यः करोति हि निष्कृतिम् ।
अग्निः स निष्कृतिर्नाम शोभयत्यभिसेविते ॥ १४ ॥
वे वेदनासे पीडित होकर आर्तनाद करनेवाले प्राणियोंको उस कष्टसे निष्कृति ( छुटकारा) दिलाते हैं, इसीलिये उन अग्निका एक नाम निष्कृति भी है । वे ही प्राणियोंद्वारा सेवित गृह और उद्यान आदिमें शोभाकी सृष्टि करते हैं ॥ १४ ॥
अनुकूजन्ति येनेह वेदनार्ताः स्वयं जनाः ।
तस्य पुत्रः स्वनो नाम पावकः स रुजस्करः ॥ १५ ॥
सत्यके पुत्रका नाम ‘ स्वन' है, जिनसे पीडित होकर लोग वेदनासे स्वयं कराह उठते हैं ।
इसीलिये उनका यह नाम पड़ा है । वे रोगकारक अग्नि हैं ॥ १५ ॥
यस्तु विश्वस्य जगतो बुद्धिमाक्रम्य तिष्ठति ।
तं प्राहुरध्यात्मविदो विश्वजिन्नाम पावकम् ॥ १६ ॥
( बृहस्पतिके तीसरे पुत्रका नाम 'विश्वजित्' है ) वे सम्पूर्ण विश्वकी बुद्धिको अपने वशमें करके स्थित हैं, इसीलिये अध्यात्मशास्त्रके विद्वानोंने उन्हें 'विश्वजित्' अग्नि कहा है ॥ १६ ॥
अन्तराग्निः स्मृतो यस्तु भुक्तं पचति देहिनाम् ।
स जज्ञे विश्वभुङ्नाम सर्वलोकेषु भारत ॥ १७ ॥
भरतनन्दन! जो समस्त प्राणियोंके उदरमें स्थित हो उनके खाये हुए पदार्थोंको पचाते हैं, वे सम्पूर्ण लोकोंमें ' विश्वभुक् ' नामसे प्रसिद्ध अग्नि बृहस्पतिके ( चौथे ) पुत्रके रूपमें प्रकट हुए हैं ॥ १७ ॥
ब्रह्मचारी यतात्मा च सततं विपुलव्रतः ।
ब्राह्मणाः पूजयन्त्येनं पाकयज्ञेषु पावकम् ॥ १८ ॥
ये विश्वभुक् अग्नि ब्रह्मचारी, जितात्मा तथा सदा प्रचुर व्रतोंका पालन करनेवाले हैं । ब्राह्मणलोग पाकयज्ञोंमें इन्हींकी पूजा करते हैं ॥ १८ ॥
पवित्रा गोमती नाम नदी यस्याभवत् प्रिया ।
तस्मिन् कर्माणि सर्वाणि क्रियन्ते धर्मकर्तृभिः ॥ १ ९ ॥
पवित्र गोमती नदी इनकी प्रिय पत्नी हुईं । धर्माचरण करनेवाले द्विजलोग विश्वभुक् अग्निमें ही सम्पूर्ण कर्मोंका अनुष्ठान करते हैं ॥ १ ९ ॥
वडवाग्निः पिबत्यम्भो योऽसौ परमदारुणः ।
ऊर्ध्वभागूर्ध्वभाङ्नाम कविः प्राणाश्रितस्तु यः ॥ २० ॥
जो अत्यन्त भयंकर वडवानलरूपसे समुद्रका जल सोखते रहते हैं, वे ही शरीरके भीतर ऊर्ध्वगति — ‘ उदान ' नामसे प्रसिद्ध हैं । ऊपरकी ओर गतिशील होनेसे ही उनका नाम ‘ ऊर्ध्वभाक्’ है । वे प्राणवायुके आश्रित एवं त्रिकालदर्शी हैं । ( उन्हें बृहस्पतिका पाँचवाँ पुत्र माना गया है ) ॥ २० ॥
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उदग्द्वारं हविर्यस्य गृहे नित्यं प्रदीयते ।
ततः स्विष्टं भवेदाज्यं स्विष्टकृत् परमः स्मृतः ॥ २१ ॥
प्रत्येक गृह्यकर्ममें जिस अग्निके लिये सदा घीकी ऐसी धारा दी जाती है जिसका प्रवाह उत्तराभिमुख हो और इस प्रकार दी हुई वह घृतकी आहुति अभीष्ट मनोरथकी सिद्धि करती है । इसीलिये उस उत्कृष्ट अग्निका नाम ' स्विष्टकृत्' है। ( उसे बृहस्पतिका छठा पुत्र समझना चाहिये ) ॥ २१ ॥
यः प्रशान्तेषु भूतेषु मन्युर्भवति पावकः ।
क्रुद्धस्य तु रसो जज्ञे मन्युतीव्रा च पुत्रिका ।
स्वाहेति दारुणा क्रूरा सर्वभूतेषु तिष्ठति ॥ २२ ॥
जिस समय अग्निस्वरूप बृहस्पतिका क्रोध प्रशान्त प्राणियोंपर प्रकट हुआ उस समय उनके शरीरसे जो पसीना निकला, वही उनकी पुत्रीके रूपमें परिणत हो गया। वह पुत्री अधिक क्रोधवाली थी । वह ' स्वाहा' नामसे प्रसिद्ध हुई । वह दारुण एवं क्रूर कन्या सम्पूर्ण भूतोंमें निवास करती है ॥ २२ ॥
त्रिदिवे यस्य सदृशो नास्ति रूपेण कश्चन ।
अतुलत्वात् कृतो देवैर्नाम्ना कामस्तु पावकः ॥ २३ ॥
स्वर्गमें भी कहीं तुलना न होनेके कारण जिसके समान रूपवान् दूसरा कोई नहीं है, उस स्वाहा - पुत्रको देवताओंने ' काम ' नामक अग्नि कहा है ॥ २३ ॥
संहर्षाद् धारयन् क्रोधं धन्वी स्रग्वी रथे स्थितः ।
समरे नाशयेच्छत्रूनमोघो नाम पावकः ॥ २४ ॥
जो हृदयमें क्रोध धारण किये धनुष और मालासे विभूषित हो रथपर बैठकर हर्ष और उत्साहके साथ युद्धमें शत्रुओंका नाश करते हैं, उसका नाम है ' अमोघ' अग्नि ॥
उक्थो नाम महाभाग त्रिभिरुक्थैरभिष्टुतः ।
महावाचं त्वजनयत् समाश्वासं हि यं विदुः ॥ २५ ॥
महाभाग! ब्राह्मणलोग त्रिविध उक्थ मन्त्रोंद्वारा जिसकी स्तुति करते हैं, जिसने महावाणी ( परा ) -का आविष्कार किया है तथा ज्ञानी पुरुष जिसे आश्वासन देनेवाला समझते हैं; उस अग्निका नाम ' उक्थ ' है ॥ इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमास्यापर्वणि आंगिरसोपाख्याने एकोनविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २१ ९ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत मार्कण्डेयसमास्यापर्वमें आंगिरसोपाख्यानविषयक दो सौ उन्नीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २१९ ॥
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१. ‘ अग्नीषोमावुपांशु यष्टव्यावजामित्वाय ' इस श्रुतिमें अग्नि और सोमको उपांशु मन्त्रोच्चारणपूर्वक आज्यभाग अर्पण करनेका विधान है । यहाँ सोमके साथ जिस अग्निको आज्यभागका अधिकारी बताया गया है, वह ' वीर' नामक अग्नि ही है । २. ये वाक्के अभिमानी देवता हैं। ' तस्य वाचा सृष्टौ पृथिवी चाग्निश्च ' इस श्रुतिसे भी यही सिद्ध होता है ।
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विंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः पाञ्चजन्य अग्निकी उत्पत्ति तथा उसकी संततिका वर्णन मार्कण्डेय उवाच
काश्यपो ह्यथ वासिष्ठः प्राणश्च प्राणपुत्रकः ।
अग्निराङ्गिरसश्चैव च्यवनस्त्रिषु वर्चकः ॥ १ ॥
मार्कण्डेयजी कहते हैं - युधिष्ठिर! कश्यपपुत्र काश्यप, वसिष्ठ - पुत्र वासिष्ठ, प्राणपुत्र प्राणक, अंगिराके पुत्र च्यवन तथा त्रिवर्चा - ये पाँच अग्नि हैं ॥ १ ॥
अचरन्त तपस्तीव्रं पुत्रार्थे बहुवार्षिकम् ।
पुत्रं लभेम धर्मिष्ठं यशसा ब्रह्मणा समम् ॥ २ ॥
इन्होंने पुत्रकी प्राप्तिके लिये बहुत वर्षोंतक तीव्र तपस्या की । इनकी तपस्याका उद्देश्य यह था कि हम ब्रह्माजीके समान यशस्वी और धर्मिष्ठ पुत्र प्राप्त करें ॥
महाव्याहृतिभिर्ध्यातः पञ्चभिस्तैस्तदा त्वथ ।
जज्ञे तेजो महार्चिष्मान् पञ्चवर्णः प्रभावनः ॥ ३ ॥
पूर्वोक्त पाँच अग्निस्वरूप ऋषियोंने महाव्याहृतिसंज्ञक पाँच मन्त्रोंद्वारा* परमात्माका ध्यान किया, तब उनके समक्ष अत्यन्त तेजोमय, पाँच वर्णोंसे विभूषित एक पुरुष प्रकट हुआ, जो ज्वालाओंसे प्रज्वलित अग्निके समान प्रकाशित होता था । वह सम्पूर्ण जगत्की सृष्टि करनेमें समर्थ था ॥ ३ ॥
समिद्धोऽग्निः शिरस्तस्य बाहू सूर्यनिभौ तथा ।
त्वङ्नेत्रे च सुवर्णाभे कृष्णे जङ्घे च भारत ॥ ४ ॥
भारत! उसका मस्तक प्रज्वलित अग्निके समान जगमगा रहा था, दोनों भुजाएँ प्रभाकरकी प्रभाके समान थीं, दोनों आँखें तथा त्वचा– सुवर्णके समान देदीप्यमान हो रही थीं और उस पुरुषकी पिण्डलियाँ काले रंगकी दिखायी देती थीं ॥ ४ ॥
पञ्चवर्णः स तपसा कृतस्तैः पञ्चभिर्जनैः ।
पाञ्चजन्यः श्रुतो देवः पञ्चवंशकरस्तु सः ॥ ५ ॥
उपर्युक्त पाँच मुनिजनोंने अपनी तपस्याके प्रभावसे उस पाँच वर्णवाले पुरुषको प्रकट किया था, इसलिये उस देवोपम पुरुषका नाम पाञ्चजन्य हो गया। वह उन पाँचों ऋषियोंके वंशका प्रवर्तक हुआ ॥ ५ ॥
दशवर्षसहस्राणि तपस्तप्त्वा महातपाः ।
जनयत् पावकं घोरं पितॄणां स प्रजाः सृजन् ॥ ६ ॥
फिर महातपस्वी पाञ्चजन्यने अपने पितरोंका वंश चलानेके लिये दस हजार वर्षोंतक घोर तपस्या करके भयंकर दक्षिणाग्निको उत्पन्न किया ॥ ६ ॥
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बृहद् रथन्तरं मूर्ध्वो वक्त्राद् वा तरसाहरौ ।
शिवं नाभ्यां बलादिन्द्रं वाय्वग्नी प्राणतोऽसृजत् ॥ ७ ॥
उन्होंने मस्तकसे बृहत् तथा मुखसे रथन्तर सामको प्रकट किया । ये दोनों वेगपूर्वक आयु आदिको हर लेते हैं, इसलिये ' तरसाहर' कहलाते हैं । फिर उन्होंने नाभिसे रुद्रको, बलसे इन्द्रको तथा प्राणसे वायु और अग्निको उत्पन्न किया ॥ ७ ॥
बाहुभ्यामनुदात्तौ च विश्वे भूतानि चैव ह ।
एतान् सृष्ट्वा ततः पञ्च पितॄणामसृजत् सुतान् ॥ ८ ॥
दोनों भुजाओंसे प्राकृत और वैकृत भेदवाले दोनों अनुदात्तोंको मन और ज्ञानेन्द्रियोंके समस्त (छहों) देवताओंको तथा पाँच महाभूतोंको उत्पन्न किया । इन सबकी सृष्टि करनेके पश्चात् उन्होंने पाँचों पितरोंके लिये पाँच पुत्र और उत्पन्न किये ॥ ८ ॥
बृहद्रथस्य प्रणिधिः काश्यपस्य महत्तरः ।
भानुरङ्गिरसो धीरः पुत्रो वर्चस्य सौभरः ॥ ९ ॥
(जिनके नाम इस प्रकार हैं - ) वासिष्ठ बृहद्रथके अंशसे प्रणिधि, काश्यपके अंशसे महत्तर, अंगिरस च्यवनके अंशसे भानु तथा वर्चके अंशसे सौभर नामक पुत्रकी उत्पत्ति हुई ॥ ९ ॥
प्राणस्य चानुदात्तस्तु व्याख्याताः पञ्चविंशतिः ।
देवान् यज्ञमुषश्चान्यान् सृजत् पञ्चदशोत्तरान् ॥ १० ॥
सुभीममतिभीमं च भीमं भीमबलाबलम् ।
एतान् यज्ञमुषः पञ्च देवानां ह्यसृजत् तपः ॥ ११ ॥
प्राणके अंशसे अनुदात्तकी उत्पत्ति हुई । इस प्रकार पचीस पुत्रोंके नाम बताये गये । तत्पश्चात् ‘ तप ’ नामधारी पांचजन्यने यज्ञमें विघ्न डालनेवाले अन्य पंद्रह उत्तर देवों ( विनायकों ) की सृष्टि की । उनका विवरण इस प्रकार है- सुभीम, अतिभीम, भीम, भीमबल और अबल -इन पाँच विनायकोंकी उत्पत्ति उन्होंने पहले की, जो देवताओंके यज्ञका विनाश करनेवाले हैं ॥ १०-११ ॥
सुमित्रं मित्रवन्तं च मित्रज्ञं मित्रवर्धनम् ।
मित्रधर्माणमित्येतान् देवानभ्यसृजत् तपः ॥ १२ ॥
इनके बाद पाञ्चजन्यने सुमित्र, मित्रवान्, मित्रज्ञ, मित्रवर्धन और मित्रधर्मा—इन पाँच देवरूपी विनायकोंको उत्पन्न किया ॥ १२ ॥
सुरप्रवीरं वीरं च सुरेशं च सुवर्चसम् ।
सुराणामपि हन्तारं पञ्चैतानसृजत् तपः ॥ १३ ॥
तदनन्तर पाञ्चजन्यने सुरप्रवीर, वीर, सुरेश, सुवर्चा तथा सुरहन्ता –इन पाँचोंको प्रकट किया ॥ १३ ॥
त्रिविधं संस्थिता ह्येते पञ्च पञ्च पृथक् पृथक् ।
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मुष्णन्त्यत्र स्थिता ह्येते स्वर्गतो यज्ञयाजिनः ॥ १४ ॥
इस प्रकार ये पंद्रह देवोपम प्रभावशाली विनायक पृथक् - पृथक् पाँच- पाँच व्यक्तियोंके तीन दलोंमें विभक्त हैं । इस पृथ्वीपर ही रहकर स्वर्गलोकसे भी यज्ञकर्ता पुरुषोंकी यज्ञ-सामग्रीका अपहरण कर लेते हैं ॥ १४ ॥
तेषामिष्टं हरन्त्येते निघ्नन्ति च महद्धविः ।
स्पर्धया हव्यवाहानां निघ्नन्त्येते हरन्ति च ॥ १५ ॥
ये विनायकगण अग्नियोंके लिये अभीष्ट महान् हविष्यका अपहरण तो करते ही हैं, उसे नष्ट भी कर डालते हैं । अग्निगणोंके साथ लाग- डाँट रखनेके कारण ही ये हविष्यका अपहरण और विध्वंस करते हैं ॥ १५ ॥
बहिर्वेद्यां तदादानं कुशलैः सम्प्रवर्तितम् ।
तदेते नोपसर्पन्ति यत्र चाग्निः स्थितो भवेत् ॥ १६ ॥
इसीलिये यज्ञनिपुण विद्वानोंने यज्ञशालाकी बाह्य वेदीपर इन विनायकोंके लिये देयभाग रख देनेका नियम चालू किया है; क्योंकि जहाँ अग्निकी स्थापना हुई हो, उस स्थानके निकट ये विनायक नहीं जाते हैं ॥ १६ ॥
चितोऽग्निरुद्वहन् यज्ञं पक्षाभ्यां तान् प्रबाधते ।
मन्त्रैः प्रशमिता ह्येते नेष्टं मुष्णन्ति यज्ञियम् ॥ १७ ॥
मन्त्रद्वारा संस्कार करनेके पश्चात् प्रज्वलित अग्निदेव जिस समय आहुति ग्रहण करते हुए यज्ञका सम्पादन करते हैं, उस समय वे अपने दोनों पंखों ( पार्श्ववर्ती शिखाओं ) द्वारा उन विनायकोंको कष्ट पहुँचाते हैं ( इसीलिये वे उनके पास नहीं फटकते ) । मन्त्रोंद्वारा शान्त कर देनेपर वे विनायक यज्ञसम्बन्धी हविष्यका अपहरण नहीं कर पाते हैं ॥ १७ ॥
बृहदुक्थस्तपस्यैव पुत्रो भूमिमुपाश्रितः ।
अग्निहोत्रे हूयमाने पृथिव्यां सद्भिरिज्यते ॥ १८ ॥
इस पृथ्वीपर जब अग्निहोत्र होने लगता है, उस समय तप ( पाञ्चजन्य ) - के ही पुत्र बृहदुक्थ इस भूतलपर स्थित हो श्रेष्ठ पुरुषोंद्वारा पूजित होते हैं ॥ १८ ॥
रथन्तरश्च तपसः पुत्रोऽग्निः परिपठ्यते ।
मित्रविन्दाय वै तस्य हविरध्वर्यवो विदुः ॥ १ ९ ॥
मुमुदे परमप्रीतः सह पुत्रैर्महायशाः ॥ २० ॥
तपके पुत्र जो रथन्तर नामक अग्नि कहे जाते हैं, उनको दी हुई हवि मित्रविन्द देवताका भाग है, ऐसा यजुर्वेदी विद्वान् मानते हैं । महायशस्वी तप ( पाञ्चजन्य ) अपने इन सभी पुत्रोंके सहित अत्यन्त प्रसन्न हो आनन्दमग्न रहते हैं ॥ १ ९-२० ॥ इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमास्यापर्वणि आङ्गिरसोपाख्याने विंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २२० ॥
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इसप्रकारश्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत मार्कण्डेयसमास्यापर्वमें आंगिरसोपाख्मानविषयक दो सौ बीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २२० ॥
* भूः, भुवः, स्वः, महः, जनः - ये पाँच महाव्याहृतियाँ हैं । ध्यानके लिये मन्त्रप्रयोग इस प्रकार है— ' ॐ भूरन्नमग्नये पृथिव्यै स्वाहा ' इत्यादि ।
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एकविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः अग्निस्वरूप तप और भानु ( मनु ) - की संततिका वर्णन मार्कण्डेय उवाच गुरुभिर्नियमैर्युक्तो भरतो नाम पावकः ।
अग्निः पुष्टिमतिर्नाम तुष्टः पुष्टिं प्रयच्छति ।
भरत्येष प्रजाः सर्वास्ततो भरत उच्यते ॥ १ ॥
मार्कण्डेयजी कहते हैं - युधिष्ठिर! पूर्वोक्त भरत नामक अग्नि ( जो शंयुके पौत्र और ऊर्जके पुत्र हैं) गुरुतर नियमों युक्त हैं । वे संतुष्ट होनेपर पुष्टि प्रदान करते हैं, इसलिये उनका एक नाम ‘ पुष्टिमति' भी है । समस्त प्रजाका भरण- पोषण करते हैं, इसलिये उन्हें भरत कहते हैं ॥ १ ॥
अग्निर्यश्च शिवो नाम शक्तिपूजापरश्च सः ।
दुःखार्तानां च सर्वेषां शिवकृत् सततं शिवः ॥ २ ॥
' शिव ' नामसे प्रसिद्ध जो अग्नि हैं, वे शक्तिकी आराधनामें लगे रहते हैं । समस्त दुःखातुर मनुष्योंका सदा ही शिव ( कल्याण ) करते हैं, इसलिये उन्हें ' शिव' कहते हैं ॥ २ ॥
तपसस्तु फलं दृष्ट्वा सम्प्रवृद्धं तपो महत् ।
उद्धर्तुकामो मतिमान् पुत्रो जज्ञे पुरंदरः ॥ ३ ॥
तप ( पाञ्चजन्य) -का तपस्याजनित फल ( ऐश्वर्य ) बढ़कर महान् हो गया है, यह देख उसे प्राप्त करनेकी इच्छासे मानो बुद्धिमान् इन्द्र ही पुरंदर नामसे उनके पुत्र होकर प्रकट हुए ॥ ३ ॥१
ऊष्मा चैवोष्मणो जज्ञे सोऽग्निधूतस्य लक्ष्यते ।
अग्निश्चापि मनुर्नाम प्राजापत्यमकारयत् ॥ ४ ॥
उन्हीं पांचजन्यसे ‘ ऊष्मा' नामक अग्निका प्रादुर्भाव हुआ । जो समस्त प्राणियोंके शरीरमें ऊष्मा ( गर्मी) -के द्वारा परिलक्षित होते हैं तथा तपके जो ' मनु ' नामक अग्निस्वरूप पुत्र हैं, उन्होंने ' प्राजापत्य' यज्ञ सम्पन्न कराया था ॥ ४ ॥
शम्भुमग्निमथ प्राहुर्ब्राह्मणा वेदपारगाः ।
आवसथ्यं द्विजाः प्राहुर्दीप्तमग्निं महाप्रभम् ॥ ५ ॥
वेदोंके पारंगत विद्वान् ब्राह्मण ' शम्भु' तथा ' आवसथ्य ' नामक अग्निको देदीप्यमान तथा महान् तेजः पुञ्जसे सम्पन्न बताते हैं ॥ ५ ॥
ऊर्जस्करान् हव्यवाहान् सुवर्णसदृशप्रभान् ।
ततस्तपो ह्यजनयत् पञ्च यज्ञसुतानिह ॥ ६ ॥
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इस प्रकार जिन्हें यज्ञमें सोमकी आहुति दी जाती है, ऐसे पाँच पुत्रोंको तपने पैदा किया । वे सब - के - सब सुवर्ण- सदृश कान्तिमान्, बल और तेजकी प्राप्ति करानेवाले तथा देवताओंके लिये हविष्य पहुँचानेवाले हैं ॥ ६ ॥
प्रशान्तेऽग्निर्महाभाग परिश्रान्तो गवां पतिः ।
असुरान् जनयन् घोरान् मर्त्यांश्चैव पृथग्विधान् ॥ ७ ॥
महाभाग! अस्तकालमें परिश्रमसे थके - माँदे सूर्यदेव ( अग्निमें प्रविष्ट होनेके कारण) अग्निस्वरूप हो जाते हैं ।2 भयंकर असुरों तथा नाना प्रकारके मरणधर्मा मनुष्योंको उत्पन्न करते हैं । ( उन्हें भी तपकी ही संततिके अन्तर्गत माना गया है ) ॥ ७ ॥
तपसश्च मनुं पुत्रं भानुं चाप्यङ्गिराः सृजत् ।
बृहद्भानुं तु तं प्राहुर्ब्राह्मणा वेदपारगाः ॥ ८ ॥
तपके मनु ( प्रजापति ) स्वरूप पुत्र भानु नामक अग्निको अंगिराने भी ( अपना प्रभाव अर्पित करके ) नूतन जीवन प्रदान किया है । वेदोंके पारगामी विद्वान् ब्राह्मण भानुको ही ' बृहद्भानु ' कहते हैं ॥ ८ ॥
भानोर्भार्या सुप्रजा तु बृहद्भासा तु सूर्यजा ।
असृजेतां तु षट् पुत्रान् शृणू तासां प्रजाविधिम् ॥ ९ ॥
भानुकी दो पत्नियाँ हुईं – सुप्रजा और बृहद्भासा । इनमें बृहद्भासा सूर्यकी कन्या थी । इन दोनोंने छः पुत्रोंको जन्म दिया । इनके द्वारा जो संतानोंकी सृष्टि हुई, उसका वर्णन सुनो ॥ ९ ॥
दुर्बलानां तु भूतानामसून् यः सम्प्रयच्छति ।
तमग्निं बलदं प्राहुः प्रथमं भानुतः सुतम् ॥ १० ॥
जो दुर्बल प्राणियोंको प्राण एवं बल प्रदान करते हैं, उन्हें ' बलद ' नामक अग्नि बताया जाता है । ये भानुके प्रथम पुत्र हैं ॥ १० ॥
यः प्रशान्तेषु भूतेषु मन्युर्भवति दारुणः ।
अग्निः स मन्युमान्नाम द्वितीयो भानुतः सुतः ॥ ११ ॥
जो शान्त प्राणियोंमें भयंकर ' क्रोध' बनकर प्रकट होते हैं, वे ' मन्युमान्' नामक अग्नि भानुके द्वितीय पुत्र हैं ॥ ११ ॥
दर्शे च पौर्णमासे च यस्येह हविरुच्यते ।
विष्णुर्नामेह योऽग्निस्तु धृतिमान्नाम सोऽङ्गिराः ॥ १२ ॥
यहाँ जिनके लिये दर्श तथा पौर्णमास यागोंमें हविष्य - समर्पणका विधान पाया जाता है, उन अग्निका नाम ‘ विष्णु' है । वे ' अंगिरा ' गोत्रीय माने गये हैं । उन्हींका दूसरा नाम ‘ धृतिमान् ’ अग्नि है ( ये भानुके तीसरे पुत्र हैं ) ॥ १२ ॥३
इन्द्रेण सहितं यस्य हविराग्रयणं स्मृतम् ।
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अग्निराग्रयणो नाम भानोरेवान्वयस्तु सः ॥ १३ ॥
इन्द्रसहित जिनके लिये आग्रयण ( नूतन अन्नद्वारा सम्पन्न होनेवाले यज्ञ ) कर्ममें हविष्य-अर्पणका विधान है, वे ' आग्रयण ' नामक अग्नि भानुके ही ( चौथे ) पुत्र हैं ॥
चातुर्मास्येषु नित्यानां हविषां योनिरग्रहः ।
चतुर्भिः सहितः पुत्रैर्भानोरेवान्वयः स्तुभः ॥ १४ ॥
चातुर्मास्य यज्ञोंमें नित्य विहित आग्नेय आदि आठ हविष्योंके जो उद्भवस्थान हैं, उनका नाम ' अग्रह ' है । ( वे ही वैश्वदेव पर्वमें प्रधान विश्वदेव नामक अग्नि हैं— से भानुके पाँचवें पुत्र हैं ) ‘ स्तुभ ' नामक अग्नि भी भानुके ही पुत्र हैं । पहले कहे हुए चार पुत्रोंके साथ जो ये अग्रह ( वैश्वदेव) और स्तुभ हैं, इन्हें मिलाकर भानुके छः पुत्र हैं ॥ १४ ॥
निशा त्वजनयत् कन्यामग्नीषोमावुभौ तथा ।
मनोरेवाभवद् भार्या सुषुवे पञ्च पावकान् ॥ १५ ॥
मनु ( भानु) -की ही एक तीसरी पत्नी थी, जिसका नाम था निशा । उसने एक कन्या और दो पुत्रों को जन्म दिया । ( कन्याका नाम 'रोहिणी' तथा ) पुत्रोंके नाम थे — अग्नि और सोम, इनके सिवा, निशाने पाँच अग्निस्वरूप पुत्र और भी उत्पन्न किये । ( जिनके नाम क्रमशः इस प्रकार हैं— वैश्वानर, विश्वपति, सन्निहित, कपिल और अग्रणी ) ॥ १५ ॥
पूज्यते हविषाग्रयेण चातुर्मास्येषु पावकः ।
पर्जन्यसहितः श्रीमानग्निर्वैश्वानरस्तु सः ॥ १६ ॥
चातुर्मास्य यज्ञोंमें प्रधान हविष्यद्वारा पर्जन्यसहित जिनकी पूजा की जाती है, वे कान्तिमान् वैश्वानर नामक अग्नि ( मनुके प्रथम पुत्र ) हैं ॥ १६ ॥
अस्य लोकस्य सर्वस्य यः प्रभुः परिपठ्यते ।
सोऽग्निर्विश्वपतिर्नाम द्वितीयो वै मनोः सुतः ॥ १७ ॥
ततः स्विष्टं भवेदाज्यं स्विष्टकृत् परमस्तु सः । जो वेदोंमें ‘ सम्पूर्ण जगत्के पति' कहे गये हैं, वे विश्वपति नामक अग्नि मनुके द्वितीय पुत्र हैं । उन्हींके प्रभावसे हविष्यकी सुन्दरभावसे आहुति-क्रिया सम्पन्न होती है; अतः वे परम स्विष्टकृत् ( उत्तम अभीष्टकी पूर्ति करनेवाले) कहे जाते हैं ॥ १७३ ॥
कन्या सा रोहिणी नाम हिरण्यकशिपोः सुता ॥ १८ ॥
कर्मणासौ बभौ भार्या स वह्निः स प्रजापतिः । मनुकी कन्या भी ‘ स्विष्टकृत्' ही मानी गयी है । उसका नाम रोहिणी है; वह मनुकी कुमारी पुत्री किसी अशुभ कर्मके कारण हिरण्यकशिपुकी पत्नी हुई थी । वास्तवमें ‘ मनु’ ही वह्नि है और वे ही ‘ प्रजापति' कहे गये हैं ॥ १८३ ॥
प्राणानाश्रित्य यो देहं प्रवर्तयति देहिनाम् ।
तस्य संनिहितो नाम शब्दरूपस्य साधनः ॥ १ ९ ॥