श्रीगणेशाय नमः।

अङ्गिरसोपाख्यान : अङ्गिरा की पुत्रियों के विविध स्वरूपों का रहस्य क्या है?

वंश वृद्धि और प्रकृति का विस्तार

महाभारतके सन्दर्भ सहित वास्तविक आख्यान — मूल श्लोक और पृष्ठ-सङ्केतके साथ।

महाभारत — खण्ड २ · वनपर्व → मार्कण्डेयसमास्यापर्व · अध्याय 218 · पृष्ठ 1506–1508

248 शब्द · 2 मिनटका पाठ · 4 श्लोक

मार्कण्डेय मुनि ने युधिष्ठिर से कहा

अङ्गिरा के वंश और उनकी पुत्रियों के स्वरूप का वर्णन करने हेतु

मार्कण्डेय मुनि कहते हैं— हे कुरुकुलधुरन्धर युधिष्ठिर! ब्रह्माजी के तीसरे पुत्र अङ्गिरा का विवाह सुभा नाम की स्त्री से हुआ। उनके इस मिलन से संसार में सन्तानें उत्पन्न हुईं, जिनका मैं वर्णन करता हूँ, सुनो। अङ्गिरा मुनि की प्रथम पुत्री भानुमती है; वह उनकी सन्तानों में सबसे अधिक रूपवती है और उसके रूप की कहीं तुलना ही नहीं की जा सकती।

मार्कण्डेय उवाच

प्रजासु तासु सर्वासु रूपेणाप्रतिमाभवत् ।
देवी भानुमती नाम प्रथमाङ्गिरसः सुता ॥

अंगिराकी प्रथम पुत्रीका नाम देवी भानुमती है । वह उनकी संतानोंमें सबसे अधिक रूपवती है; उसके रूपकी कहीं तुलना ही नहीं है ( भानु अर्थात् सूर्यसे युक्त होनेके कारण यह दिनकी अभिमानिनी है )

महाभारत · वनपर्व · मार्कण्डेयसमास्यापर्व · अध्याय 218 · श्लोक 3पृष्ठ 1507

दूसरी कन्या 'रागा' के नाम से विख्यात हुई, जिस पर समस्त प्राणियों का विशेष अनुराग प्रकट हुआ था। तीसरी पुत्री सिनीवाली है जो चतुर्दशीयुक्ता अमावास्या है; वह इतनी कृश है कि कभी दिखाई देती है और कभी नहीं, इसी कारण लोग उसे 'दृश्यादृश्या' भी कहते हैं, और भगवान् रुद्र उसे ललाट में धारण करते हैं, इसलिए उसे सब 'रुद्रसुता' पुकारते हैं।

मार्कण्डेय उवाच

भूतानामेव सर्वेषां यस्यां रागस्तदाभवत् ।
रागाद्रागेति यामाहुर्द्वितीयाङ्गिरसः सुता ॥

अंगिरा मुनिकी दूसरी कन्या ' रागा' नामसे विख्यात है । उसपर समस्त प्राणियोंका विशेष अनुराग प्रकट हुआ था । इसीलिये उसका ऐसा नाम प्रसिद्ध हुआ । ( यह रात्रिकी अभिमानिनी है )

महाभारत · वनपर्व · मार्कण्डेयसमास्यापर्व · अध्याय 218 · श्लोक 4पृष्ठ 1507

अङ्गिरा की चौथी पुत्री अर्चिष्मती है, जो पूर्ण चन्द्रमा से युक्त होने के कारण शुद्ध पौर्णमासी कही जाती है; इसकी प्रभा इतनी तीव्र है कि लोग रात में भी सब वस्तुओं को स्पष्ट देख पाते हैं। पाँचवीं कन्या हविष्मती है, जो प्रतिपद्युक्ता पूर्णिमा राका है; उसके सान्निध्य में हविष्य द्वारा देवताओं का यजन किया जाता है। अङ्गिरा मुनि की छठी पुण्यात्मा कन्या महिष्मती कहलाती है, जिसे अनुमति भी कहा जाता है।

मार्कण्डेय उवाच

पश्यत्यर्चिष्मती भाभिर्हविर्भिश्च हविष्मती ।
षष्ठीमङ्गिरसः कन्यां पुण्यामाहुर्महिष्मतीम् ॥

उनकी चौथी पुत्री ‘ अर्चिष्मती ' है, ( यही पूर्ण चन्द्रमासे युक्त होनेके कारण शुद्ध पौर्णमासी कही जाती है ) इसकी प्रभासे लोग रातमें भी सब वस्तुओंको स्पष्ट देखते हैं । पाँचवीं कन्या ‘ हविष्मती' ( प्रतिपद्युक्ता पूर्णिमा ' राका ' ) है, जिसके सांनिध्यमें हविष्यद्वारा देवताओंका यजन किया जाता है । अंगिरा मुनिकी जो छठी पुण्यात्मा कन्या है, उसे ' महिष्मती' कहते हैं ( यही चतुर्दशीयुक्ता पूर्णिमा है, जिसे ' अनुमति' भी कहते हैं )

महाभारत · वनपर्व · मार्कण्डेयसमास्यापर्व · अध्याय 218 · श्लोक 6पृष्ठ 1507

सातवीं पुत्री महामती है, जो प्रतिपद्युक्त अमावास्या है; वह उन दीप्तिशाली सोमयाग आदि महायज्ञों में प्रकाशित होने के कारण 'महामती' नाम से विख्यात हुई है। अन्त में उनकी आठवीं पुत्री कुहू है, जिसे देखकर लोग 'कुहु कुहु' की ध्वनि कर उठते हैं; उसमें चन्द्रमा की एकमात्र कला अत्यन्त सूक्ष्म अंश से शेष रह जाती है।

महामखेष्वाङ्गिरसी दीप्तिमत्सु महामते ।
महामतीति विख्याता सप्तमी कथ्यते सुता ॥

महामते! जो दीप्तिशाली सोमयाग आदि महायज्ञोंमें प्रकाशित होनेके कारण ‘ महामती ’ नामसे विख्यात है, वह (प्रतिपद्युक्त अमावास्या ) अंगिरा मुनिकी सातवीं पुत्री कहलाती है ।

महाभारत · वनपर्व · मार्कण्डेयसमास्यापर्व · अध्याय 218 · श्लोक 7पृष्ठ 1508

In English

The Eight Daughters of Angira

Sage Angira and his wife Subha had eight daughters. Markandeya describes each daughter, including Bhanumati, Raga, Sinivali, Archishmati, Havishmati, Mahamati, and Kuhu.

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  • Who was the wife of angira?
  • What are the names of angira's daughters?
  • Why is sinivali called rudrasuta?
  • Which daughter of angira is known as mahamati?

Also written: Angirasopakhyana, Angirasa, Angira, Subha, Bhanumati, Raga, Sinivali, Archishmati, Havishmati, Mahishmati, Mahamati, Kuhu, अङ्गिरसोपाख्यान