ब्राह्मणमाहात्म्यकथन : अज्ञानवश हुए पाप से मुक्ति और मृत्यु पर विजय कैसे प्राप्त होती है?
तपस्या और शुद्ध आचरण की शक्ति
महाभारतके सन्दर्भ सहित वास्तविक आख्यान — मूल श्लोक और पृष्ठ-सङ्केतके साथ।
महाभारत — खण्ड २ · वनपर्व → मार्कण्डेयसमास्यापर्व · अध्याय 184 · पृष्ठ 1252–1257
680 शब्द · 4 मिनटका पाठ · 14 श्लोक
मार्कण्डेय ने पाण्डुपुत्र से कहा
ब्राह्मणों के माहात्म्य की जिज्ञासा पूर्ति हेतु
वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! उस समय पाण्डुपुत्रों ने महात्मा मार्कण्डेयजी से कहा – 'मुने! हम श्रेष्ठ ब्राह्मणों का माहात्म्य सुनना चाहते हैं, आप उसका वर्णन कीजिये।' उनके ऐसे कहने पर महातपस्वी, महान तेजस्वी और सम्पूर्ण शास्त्रों के निपुण विद्वान् भगवान् मार्कण्डेय ने इस प्रकार कहना आरम्भ किया।
मार्कण्डेयं महात्मानमूचुः पाण्डुसुतास्तदा ।
माहात्म्यं द्विजमुख्यानां श्रोतुमिच्छाम कथ्यताम् ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं -जनमेजय! उस समय पाण्डुपुत्रोंने महात्मा मार्कण्डेयजीसे कहा – ' मुने! हम श्रेष्ठ ब्राह्मणोंका माहात्म्य सुनना चाहते हैं, आप उसका वर्णन कीजिये '
एवमुक्तः स भगवान् मार्कण्डेयो महातपाः ।
उवाच सुमहातेजाः सर्वशास्त्रविशारदः ॥
उनके ऐसा कहनेपर महातपस्वी, महान् तेजस्वी और सम्पूर्ण शास्त्रोंके निपुण विद्वान् भगवान् मार्कण्डेयने इस प्रकार कहा ।
हैहयानां कुलकरो राजा परपुरंजयः ।
कुमारो रूपसम्पन्नो मृगयां व्यचरद् बली ॥
मार्कण्डेयजी बोले - हैहयवंशी क्षत्रियोंकी वंशपरम्पराको बढ़ानेवाला राजा परपुरंजय, जो अभी कुमारावस्थामें था, बड़ा ही सुन्दर और बलवान् था, एक दिन वनमें हिंसक पशुओंको मारनेके लिये गया ।
चरमाणस्तु सोऽरण्ये तृणवीरुत्समावृते ।
कृष्णाजिनोत्तरासङ्गं ददर्श मुनिमन्तिके ॥
तृण और लताओंसे भरे हुए उस वनमें घूमते - घूमते उस राजकुमारने एक मुनिको देखा, जो काले हिंसक पशुके चर्मकी ओढ़नी ओढ़े थोड़ी ही दूरपर बैठे थे ।
स तेन निहतोऽरण्ये मन्यमानेन वै मृगम् ।
व्यथितः कर्म तत् कृत्वा शोकोपहतचेतनः ॥
राजकुमारने उन्हें हिंसक पशु ही समझा और उस वनमें अपने बाणोंसे उन्हें मार डाला । अज्ञानवश यह पापकर्म करके वह राजकुमार व्यथित हो शोकसे मूर्च्छित हो गया ।
जगाम हैहयानां वै सकाशं प्रथितात्मनाम् ।
राज्ञां राजीवनेत्रोऽसौ कुमारः पृथिवीपतिः ।
तेषां च तद् यथावृत्तं कथयामास वै तदा ॥
तत्पश्चात् होशमें आकर वह सुविख्यात हैहयवंशी राजाओंके पास गया । वहाँ पृथ्वीका पालन करनेवाले उस कमलनयन राजकुमारने उन सबके सामने इस दुर्घटनाका यथावत् समाचार कहा ।
तं चापि हिंसितं तात मुनिं मूलफलाशिनम् ।
श्रुत्वा दृष्ट्वा च ते तत्र बभूवुर्दीनमानसाः ॥
तात! फल- मूलका आहार करनेवाले एक मुनिकी हिंसा हो गयी, यह सुनकर और देखकर वे सभी क्षत्रिय मन- ही- मन बहुत दुःखी हुए ।
कस्यायमिति ते सर्वे मार्गमाणास्ततस्ततः ।
जग्मुश्चारिष्टनेम्नोऽथ तार्क्ष्यस्याश्रममञ्जसा ॥
फिर वे सब - के - सब जहाँ- तहाँ यह पता लगाते हुए कि ये मुनि किसके पुत्र हैं, शीघ्र ही कश्यप - नन्दन अरिष्टनेमिके आश्रमपर गये ।
तेऽभिवाद्य महात्मानं तं मुनिं नियतव्रतम् ।
तस्थुः सर्वे स तु मुनिस्तेषां पूजामथाहरत् ॥
वहाँ नियमपूर्वक उत्तम व्रतका पालन करनेवाले उन महात्मा मुनिको प्रणाम करके वे सब खड़े हो गये । तब मुनिने उनके लिये अर्घ्य आदि पूजन- सामग्री अर्पित की ।
ते तमूचुर्महात्मानं न वयं सत्क्रियां मुने ।
त्वत्तोऽर्हाः कर्मदोषेण ब्राह्मणो हिंसितो हि नः ॥
यह देखकर उन्होंने उन महात्मासे कहा – ' मुने! हम अपने दूषित कर्मके कारण आपसे सत्कार पानेयोग्य नहीं रह गये हैं । हमसे एक ब्राह्मणकी हत्या हो गयी है '
तानब्रवीत् स विप्रर्षिः कथं वो ब्राह्मणो हतः ।
क्व चासौ ब्रूत सहिताः पश्यध्वं मे तपोबलम् ॥
यह सुनकर उन ब्रह्मर्षिने कहा - ' आपलोगोंसे ब्राह्मणकी हत्या कैसे हुई? और वह मरा हुआ ब्राह्मण कहाँ है? बताइये । फिर सब लोग एक साथ मेरी तपस्याका बल देखियेगा'
ते तु तत् सर्वमखिलमाख्यायास्मै यथातथम् ।
नापश्यंस्तमृषिं तत्र गतासुं ते समागताः ॥
उनके इस प्रकार पूछनेपर क्षत्रियोंने मुनिके वधका सारा समाचार उनसे ठीक-ठीक कह सुनाया और उन्हें साथ लेकर सभी उस स्थानपर आये जहाँ मुनिकी हत्या हुई थी । किंतु उन्होंने वहाँ मरे हुए मुनिकी लाश नहीं देखी ।
अन्वेषमाणाः सव्रीडाः स्वप्नवद्गतचेतनाः ।
तानब्रवीत् तत्र मुनिस्तार्क्ष्यः परपुरंजय ॥
फिर तो वे लज्जित होकर इधर - उधर उसकी खोज करने लगे । स्वप्नकी भाँति उनकी चेतना लुप्त- सी हो गयी । तब मुनिवर अरिष्टनेमिने उनसे कहा – ' परपुरंजय! तुम लोगोंने जिसे मार डाला था, वह यही ब्राह्मण तो नहीं है? राजाओ! यह मेरा तपोबलसम्पन्न पुत्र है '
स्यादयं ब्राह्मणः सोऽथ युष्माभिर्यो विनाशितः ।
पुत्रो ह्ययं मम नृपास्तपोबलसमन्वितः ॥
फिर तो वे लज्जित होकर इधर - उधर उसकी खोज करने लगे । स्वप्नकी भाँति उनकी चेतना लुप्त- सी हो गयी । तब मुनिवर अरिष्टनेमिने उनसे कहा – ' परपुरंजय! तुम लोगोंने जिसे मार डाला था, वह यही ब्राह्मण तो नहीं है? राजाओ! यह मेरा तपोबलसम्पन्न पुत्र है '
इस स्तुतिके श्लोक 1–183 में से आरम्भके 14 यहाँ दिये गये हैं। पूरी स्तुति मूल ग्रन्थमें पढ़ें →
मार्कण्डेयजी बोले - हैहयवंशी क्षत्रियों की वंश-परम्परा को बढ़ाने वाला राजा परपुरञ्जय, जो अभी कुमारावस्था में था, बड़ा ही सुन्दर और बलवान था। एक दिन वह वन में हिंसक पशुओं को मारने के लिये गया। तृण और लताओं से भरे हुए उस वन में घूमते-घूमते उस राजकुमार ने एक मुनि को देखा, जो काले हिंसक पशु के चर्म की ओढ़नी ओढ़े थोड़ी ही दूर पर बैठे थे। राजकुमार ने उन्हें हिंसक पशु ही समझा और उस वन में अपने बाणों से उन्हें मार डाला। अज्ञानवश यह पापकर्म करके वह राजकुमार व्यथित हो गया और शोक से मूर्च्छित होकर गिर पड़ा।
जब उसे होश आया, तो वह सुविख्यात हैहयवंशी राजाओं के पास गया। वहाँ पृथ्वी का पालन करने वाले उस कमलनयन राजकुमार ने उन सबके सामने इस दुर्घटना का यथावत् समाचार सुनाया। 'तात! फल-मूल का आहार करने वाले एक मुनि की हिंसा हो गयी है।' यह सुनकर और देखकर वे सभी क्षत्रिय मन ही मन बहुत दुःखी हुए। फिर वे सब जहाँ-तहाँ यह पता लगाते हुए कि ये मुनि किसके पुत्र हैं, शीघ्र ही कश्यप-नन्दन अरिष्टनेमि के आश्रम पर गये। वहाँ नियमपूर्वक उत्तम व्रत का पालन करने वाले उन महात्मा मुनियों को प्रणाम करके वे सब खड़े हो गये। तब मुनि ने उनके लिये अर्घ्य आदि पूजन-सामग्री अर्पित की।
यह देखकर क्षत्रियों ने उन महात्मा से कहा – 'मुने! हम अपने दूषित कर्म के कारण आपसे सत्कार पाने योग्य नहीं रह गये हैं। हमसे एक ब्राह्मण की हत्या हो गयी है।' यह सुनकर उन ब्रह्मर्षि ने पूछा - 'आप लोगों से ब्राह्मण की हत्या कैसे हुई? और वह मरा हुआ ब्राह्मण कहाँ है? बताइये। फिर सब लोग एक साथ मेरी तपस्या का बल देखियेगा।' उनके इस प्रकार पूछने पर क्षत्रियों ने मुनि के वध का सारा समाचार उन्हें सुनाया और उन्हें साथ लेकर उस स्थान पर आये जहाँ मुनि की हत्या हुई थी। किन्तु वहाँ उन्होंने मरे हुए मुनि की लाश नहीं देखी। वे लज्जित होकर इधर-उधर उसकी खोज करने लगे, यहाँ तक कि स्वप्न की भाँति उनकी चेतना लुप्त सी हो गयी।
तब मुनिवर अरिष्टनेमि ने उनसे कहा – 'परपुरञ्जय! तुम लोगों ने जिसे मार डाला था, वह यही ब्राह्मण तो नहीं है? राजाओ! यह मेरा तपोबल सम्पन्न पुत्र है।' उन महर्षि को जीवित हुआ देख वे सभी क्षत्रिय विस्मित होकर कहने लगे - 'यह तो बड़े आश्चर्य की बात है! ये मरे हुए मुनि यहाँ कैसे लाये गये और किस प्रकार इन्हें जीवन मिला? क्या यह तपस्या की ही शक्ति है, जिससे फिर ये जीवित हो गये? ब्रह्मन्! हम यह सब रहस्य सुनना चाहते हैं। यदि सुनने योग्य हो तो कहिये।'
तब महर्षि ने कहा— 'राजाओ! हम लोगों पर मृत्यु का वश नहीं चलता। इसका क्या कारण है? यह मैं तर्क और युक्ति के साथ सङ्क्षेप से बता रहा हूँ। श्रेष्ठ नृपतिगण! सुनिये— हम शुद्ध आचार-विचार से रहते हैं, आलस्य से रहित हैं, प्रतिदिन सन्ध्योपासन के परायण रहते हैं, शुद्ध अन्न खाते हैं और शुद्ध रीति से न्यायपूर्वक धनोपार्जन करते हैं; यही नहीं हम लोग सदा ब्रह्मचर्य व्रत के पालन में लगे रहते हैं। हम केवल सत्य को ही जानते हैं और कभी झूठ में मन नहीं लगाते। हम सदा अपने धर्म का पालन करते रहते हैं। ब्राह्मणों के जो शुभ कर्म हैं, उन्हीं की हम चर्चा करते हैं, उनके दोषों का बखान नहीं करते। हम अतिथियों को अन्न और जल से तृप्त करते हैं। हमारे ऊपर जिनके भरण-पोषण का भार है, उन्हें हम पूरा भोजन देते हैं और बचा हुआ अन्न स्वयं खाते हैं। हम सदा शम, दम, क्षमा, तीर्थ सेवन और दान में तत्पर रहते हैं तथा पवित्र देश में निवास करते हैं। हम तेजस्वी पुरुषों के समीप रहते हैं, इस कारण हमें मृत्यु से भय नहीं होता।'
ईर्ष्यारहित राजाओ! महर्षि ने कहा— 'ये सब बातें मैंने तुम्हें सङ्क्षेप से सुनाई हैं। अब तुम सब लोग एक साथ यहाँ से जाओ, तुम्हें ब्रह्महत्या के पाप से भय नहीं रहा।'
In English
The Story of King Parpuranjaya and the Sage Arishtanemi
While hunting in the forest, Prince Parpuranjaya accidentally kills a sage with his arrows. The prince's people take the body to the sage Arishtanemi, who uses his spiritual power to bring his son back to life.
This page answers
- How did parpuranjaya kill a sage?
- Who was the son of arishtanemi?
- How did arishtanemi bring the dead sage back to life?
- What qualities make a sage immune to death?
Also written: Brahmanamahatmyakathana, Markandeya, Parapuranjaya, Arishtanemi, Panduputra, ब्राह्मणमाहात्म्यकथन