श्रीगणेशाय नमः।

चित्रसेनोर्वशीसंवाद : इन्द्र ने उर्वशी को अर्जुन की सेवा हेतु क्यों भेजा?

आज्ञा और कामभाव का सम्बन्ध

महाभारतके सन्दर्भ सहित वास्तविक आख्यान — मूल श्लोक और पृष्ठ-सङ्केतके साथ।

महाभारत — खण्ड २ · वनपर्व → इन्द्रलोकाभिगमनपर्व · अध्याय 45 · पृष्ठ 339–343

366 शब्द · 2 मिनटका पाठ · 4 श्लोक

वैशम्पायन ने जनमेजय से कहा

राजा जनमेजय को कथा सुनाते हुए

वैशम्पायन जी ने कहा— हे जनमेजय! एक समय देवराज इन्द्र ने देखा कि अर्जुन के नेत्र उर्वशी के प्रति आसक्त हो गए हैं। इस बात को जानकर इन्द्र ने गन्धर्वराज चित्रसेन को एकान्त में बुलाया और उनसे कहा, ‘गन्धर्वराज! तुम मेरे भेजने से अप्सराओं में श्रेष्ठ उर्वशी के पास जाओ। पुरुषश्रेष्ठ! तुम्हें वहाँ भेजने का उद्देश्य यह है कि उर्वशी अर्जुन की सेवा में उपस्थित हो सके। जैसे अस्त्र-विद्या सीख लेने के पश्चात् तुमने अर्जुन को मेरी आज्ञा से सङ्गीत-विद्या द्वारा सम्मानित किया है, उसी प्रकार वे स्त्री-सङ्ग में भी विशारद हो सकें, ऐसा प्रयत्न करो।’ इन्द्र के इस आदेश को सुनकर चित्रसेन ने ‘तथास्तु’ कहा और उनकी आज्ञा लेकर उर्वशी के पास प्रस्थान कर गए।

एवमुक्तस्तथेत्युक्त्वा सोऽनुज्ञां प्राप्य वासवात् ।
गन्धर्वराजोऽप्सरसमभ्यगादुर्वशीं वराम् ॥

इन्द्रके इस प्रकार कहनेपर 'तथास्तु' कहकर उनसे आज्ञा ले गन्धर्वराज चित्रसेन सुन्दरी अप्सरा उर्वशीके पास गये ।

महाभारत · वनपर्व · इन्द्रलोकाभिगमनपर्व · अध्याय 45 · श्लोक 4पृष्ठ 341

जब चित्रसेन सुन्दरी अप्सरा उर्वशी के पास पहुँचे, तो उनसे मिलकर वे बहुत प्रसन्न हुए। उर्वशी ने चित्रसेन का आया हुआ जानकर स्वागतपूर्वक उनका सत्कार किया। जब वे आराम से बैठ गए, तब सुखपूर्वक सुन्दर आसन पर बैठी हुई उर्वशी से चित्रसेन मुस्कराकर बोले— ‘सुश्रोणि! तुम्हें मालूम होना चाहिए कि स्वर्ग के एकमात्र सम्राट् इन्द्र ने, जो तुम्हारे कृपा-प्रसाद का अभिनन्दन करते हैं, मुझे तुम्हारे पास भेजा है।

स्तुति

विदितं तेऽस्तु सुश्रोणि प्रहितोऽहमिहागतः ।
त्रिदिवस्यैकराजेन त्वत्प्रसादाभिनन्दिना ॥

' सुश्रोणि! तुम्हें मालूम होना चाहिये कि स्वर्गके एकमात्र सम्राट् इन्द्रने, जो तुम्हारे कृपाप्रसादका अभिनन्दन करते हैं, मुझे तुम्हारे पास भेजा है । उन्हींकी आज्ञासे मैं यहाँ आया हूँ ।

महाभारत · वनपर्व · इन्द्रलोकाभिगमनपर्व · अध्याय 45 · श्लोक 6पृष्ठ 341

उन्हीं की आज्ञा से मैं यहाँ आया हूँ। वे स्थिरतापूर्वक डटे रहने वाले हैं, जिनके सद्गुणों की दूसरे लोग स्पृहा रखते हैं और उन्हीं गुणों के कारण जो महेन्द्र और वरुण के समान आदरणीय माने जाते हैं, उन वीरवर अर्जुन को तुम अच्छी तरह जानती हो। उन्हें स्वर्ग में आने का फल अवश्य मिलना चाहिए। तुम देवराज की आज्ञा के अनुसार अब अर्जुन के चरणों के समीप जाओ। कल्याणि! तुम ऐसा प्रयत्न करो जिससे कुन्तीकुमार धनञ्जय तुम पर प्रसन्न हों।’

महेन्द्रस्य नियोगेन त्वत्तः सम्प्रणयेन च ।
तस्य चाहं गुणौघेन फाल्गुने जातमन्मथा ।
गच्छ त्वं हि यथाकाममागमिष्याम्यहं सुखम् ॥

‘ महेन्द्रकी आज्ञासे, तुम्हारे प्रेमपूर्ण बर्तावसे तथा अर्जुनके सद्गुणसमुदायसे मेरा उनके प्रति कामभाव हो गया है । अतः अब तुम जाओ । मैं इच्छानुसार सुखपूर्वक उनके स्थानपर यथासमय आऊँगी'

महाभारत · वनपर्व · इन्द्रलोकाभिगमनपर्व · अध्याय 45 · श्लोक 16पृष्ठ 342

चित्रसेन के इन वचनों को सुनकर उर्वशी के अधरों पर मुस्कान दौड़ गई; उसने इस आदेश को अपने लिए बड़ा सम्मान समझा। वह अत्यन्त प्रसन्न होकर चित्रसेन से बोली— ‘गन्धर्वराज! तुमने जो अर्जुन के लेशमात्र गुणों का मेरे सामने वर्णन किया है, वह सब सत्य है। मैं दूसरे लोगों के मुख से भी उनकी प्रशंसा सुनकर उनके लिये व्यथित उठी हूँ; अतः इससे अधिक मैं अर्जुन का क्या वरण करूँ? महेन्द्र की आज्ञा से, तुम्हारे प्रेमपूर्ण बर्ताव से तथा अर्जुन के सद्गुण-समुदाय से मेरा उनके प्रति कामभाव हो गया है। अतः अब तुम जाओ, मैं इच्छानुसार सुखपूर्वक उनके स्थान पर यथासमय आऊँगी।’

यस्त्वस्य कथितः सत्यो गुणोद्देशस्त्वया मम ।
तं श्रुत्वाव्यथयं पुंसो वृणुयां किमतोऽर्जुनम् ॥

‘ गन्धर्वराज! तुमने जो अर्जुनके लेशमात्र गुणोंका मेरे सामने वर्णन किया है, वह सब सत्य है । मैं दूसरे लोगोंके मुखसे भी उनकी प्रशंसा सुनकर उनके लिये व्यथित हो उठी हूँ । अतः इससे अधिक मैं अर्जुनका क्या वरण करूँ?'

महाभारत · वनपर्व · इन्द्रलोकाभिगमनपर्व · अध्याय 45 · श्लोक 15पृष्ठ 342

In English

Indra's command to Urvashi regarding Arjuna

Indra notices Arjuna's interest in Urvashi and sends the Gandharva Chitrasena to instruct her. Chitrasena tells Urvashi to serve Arjuna so that he may become experienced in feminine company, and Urvashi agrees to visit him at the proper time.

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