श्रीगणेशाय नमः।

इन्द्रस्कन्दसमागम : अहङ्कार और शक्ति के अतिरेक से बचने का मार्ग क्या है?

अहङ्कार का पतन और अभयदान

महाभारतके सन्दर्भ सहित वास्तविक आख्यान — मूल श्लोक और पृष्ठ-सङ्केतके साथ।

महाभारत — खण्ड २ · वनपर्व → मार्कण्डेयसमास्यापर्व · अध्याय 227 · पृष्ठ 1551–1554

419 शब्द · 3 मिनटका पाठ · 4 श्लोक

मार्कण्डेय ने कहा

इन्द्र के अहङ्कार और स्कन्द की शक्ति के माध्यम से धर्म की रक्षा हेतु।

मार्कण्डेय जी ने कहा— राजन्! सुनो, उस समय जब महासेन की रक्षा के लिए ग्रह, उपग्रह, ऋषि, मातृकागण और मुख से आग उगलने वाले वे दर्पयुक्त पार्षदगण उन्हें चारों ओर से घेरे हुए खड़े थे। उन भयङ्कर स्वर्गवासी प्राणियों के बीच इन्द्र के मन में अपनी विजय को लेकर सन्देह तो था, परन्तु विजय की तीव्र अभिलाषा उन्हें ऐरावत हाथी पर सवार होकर देवताओं के साथ आगे बढ़ा रही थी। वे सभी देवता बलवान इन्द्र के साथ महासेन को मार डालने के उद्देश्य से बड़ी तेजी से बढ़ रहे थे।

मार्कण्डेय उवाच

ग्रहाः सोपग्रहाश्चैव ऋषयो मातरस्तथा ।
हुताशनमुखाश्चैव दृप्ताः पारिषदां गणाः ॥

एते चान्ये च बहवो घोरास्त्रिदिववासिनः ।
परिवार्य महासेनं स्थिता मातृगणैः सह ॥

मार्कण्डेयजी कहते हैं - राजन्! ग्रह, उपग्रह, ऋषि, मातृकागण और मुखसे आग उगलनेवाले दर्पयुक्त पार्षदगण –ये तथा दूसरे बहुत-से भयंकर स्वर्गवासी प्राणी मातृकागणोंके साथ रहकर महासेनको सब ओरसे घेरे हुए उनकी रक्षाके लिये खड़े थे ।

महाभारत · वनपर्व · मार्कण्डेयसमास्यापर्व · अध्याय 227 · श्लोक 1-2पृष्ठ 1552

देवताओं की वह सेना अत्यन्त भयानक थी; चारों ओर विकट गर्जनाएँ गूँज रही थीं। उनके ध्वज और कवच विचित्र थे, सैनिक श्रेष्ठ वस्त्रों में सुसज्जित थे और विविध आभूषणों से विभूषित होकर वे श्रीसम्पन्न दिख रहे थे। दूसरी ओर, इन्द्र को अपने वध के लिए आते देख कुमार कार्तिकेय भी उन पर धावा बोल पड़े। जब देवराज इन्द्र देवताओं के साथ सिंह के समान गर्जना करते हुए कुमार कार्तिकेय के निकट पहुँचे, तब स्कन्द ने भी समुद्र के समान भयङ्कर गर्जना की। देवताओं की वह उमड़ती हुई सेना स्कन्द की उस भारी गर्जना को सुनकर अचेत सी होकर वहीं चक्कर काटने लगी।

तस्य शब्देन महता समुद्धूतोदधिप्रभम् ।
बभ्राम तत्र तत्रैव देवसैन्यमचेतनम् ॥

देवताओंकी सेना उमड़ते हुए समुद्रके समान जान पड़ती थी । परंतु स्कन्दकी भारी गर्जनासे अचेत - सी होकर वहीं चक्कर काटने लगी ।

महाभारत · वनपर्व · मार्कण्डेयसमास्यापर्व · अध्याय 227 · श्लोक 10पृष्ठ 1553

यह देखकर कि समस्त देवता मेरा वध करने की इच्छा से यहाँ एकत्र हुए हैं, अग्निकुमार स्कन्द कुपित हो उठे। उन्होंने अपने मुँह से अग्नि की बढ़ती हुई लपटें छोड़नी आरम्भ कर दीं। देखते ही देखते देवताओं की सेना जलने लगी; कोई सैनिक पृथ्वी पर गिरकर छटपटा रहा था, किसी का शरीर और सिर जल गया, तो किसी के आयुध और वाहन। वे सभी जलते हुए देवता आकाश में बिखरे तारों के समान तितर-बितर हो गए। इस प्रकार, वे सब वज्रधारी इन्द्र का साथ छोड़कर अग्निनन्दन स्कन्द की शरण में आए, जहाँ उन्हें शान्ति मिली।

प्रच्युताः सहसा भान्ति व्यस्तास्तारागणा इव ।
दह्यमानाः प्रपन्नास्ते शरणं पावकात्मजम् ॥

देवा वज्रधरं त्यक्त्वा ततः शान्तिमुपागताः ।
त्यक्तो देवैस्ततः स्कन्दे वज्रं शक्रो न्यपातयत् ॥

वे सब - के - सब सहसा तितर- बितर हो आकाशमें बिखरे हुए तारोंके समान जान पड़ते थे । इस तरह जलते हुए देवता वज्रधारी इन्द्रका साथ छोड़कर अग्निनन्दन स्कन्दकी ही शरणमें आये, तब उन्हें शान्ति मिली । देवताओंके त्याग देनेपर इन्द्रने स्कन्दपर अपने वज्रका प्रहार किया ।

महाभारत · वनपर्व · मार्कण्डेयसमास्यापर्व · अध्याय 227 · श्लोक 13-14पृष्ठ 1553

देवताओं के इस पलायन को देख इन्द्र ने क्रोध में आकर स्कन्द पर अपने वज्र से प्रहार कर दिया। वह वज्र कुमार कार्तिकेय की दायीं पसली पर अत्यन्त गहरी चोट पहुँचा गया और उनके पार्श्व भाग को क्षत-विक्षत कर दिया। उस वज्र प्रहार के क्षण में, स्कन्द के उसी दक्षिण पार्श्व से एक दूसरा वीर पुरुष प्रकट हुआ। वह युवा था, जिसने सुवर्णमय कवच धारण किया हुआ था; उसके एक हाथ में शक्ति चमक रही थी और कानों में दिव्य कुण्डल झलमला रहे थे।

वज्र के प्रहार से उत्पन्न हुए उस अत्यन्त तेजस्वी वीर को देखकर इन्द्र भय से थर्रा उठे। वे हाथ जोड़कर स्कन्ददेव की शरण में आए। तब सत्पुरुषों में श्रेष्ठ कुमार स्कन्द ने अपनी सेना सहित इन्द्र को अभयदान दिया, जिसे देख समस्त देवता हर्षित होकर बाजे बजाने लगे।

तस्याभयं ददौ स्कन्दः सह सैन्यस्य सत्तमः ।
ततः प्रहृष्टास्त्रिदशा वादित्राण्यभ्यवादयन् ॥

तब सत्पुरुषोंमें श्रेष्ठ कुमार स्कन्दने सेनासहित इन्द्रको अभयदान दिया । इससे प्रसन्न होकर सब देवता ( हर्षसूचक ) बाजे बजाने लगे ।

महाभारत · वनपर्व · मार्कण्डेयसमास्यापर्व · अध्याय 227 · श्लोक 18पृष्ठ 1554

In English

The Battle Between Skanda and Indra

Indra leads the gods to attack Mahasena's forces, but Skanda retaliates by breathing fire that burns the gods. After Indra strikes Skanda with a thunderbolt, a brilliant warrior emerges from Skanda's side, causing Indra to surrender and seek refuge.

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