श्रीगणेशाय नमः।

नाहुषचरित : दान देते समय मन में द्वेष क्यों नहीं आना चाहिए?

दान और उदारता का धर्म

महाभारतके सन्दर्भ सहित वास्तविक आख्यान — मूल श्लोक और पृष्ठ-सङ्केतके साथ।

महाभारत — खण्ड २ · वनपर्व → मार्कण्डेयसमास्यापर्व · अध्याय 195 · पृष्ठ 1353–1355

256 शब्द · 2 मिनटका पाठ · 4 श्लोक

मार्कण्डेय ने युधिष्ठिर से कहा

एक क्षत्रिय नरेश के महत्त्व का वर्णन करते हुए

मार्कण्डेयजी युधिष्ठिर से कहते हैं— 'हे युधिष्ठिर! अब एक दूसरे क्षत्रिय नरेश का महत्त्व सुनो।' यह कथा उस समय की है जब नहुष के पुत्र राजा ययाति पुरवासी मनुष्यों से घिरे हुए अपने राजसिंहासन पर विराजमान थे। उन्हीं दिनों की बात है, एक ब्राह्मण गुरु-दक्षिणा देने के प्रयोजन से भिक्षा माँगने की इच्छा लेकर राजा के पास आया और बोला— 'राजन्! मैं गुरु-दक्षिणा देने के लिये भिक्षा चाहता हूँ, किन्तु उसके साथ एक शर्त है।'

मार्कण्डेय उवाच

इदमन्यच्छूयतां ययातिर्नाहुषो राजा राज्यस्थः पौरजनावृत आसांचक्रे गुर्वर्थी ब्राह्मण उपेत्याब्रवीद् भो राजन् गुर्वर्थं भिक्षेयं समयादिति ॥

मार्कण्डेयजी कहते हैं - युधिष्ठिर! अब एक- दूसरे क्षत्रिय नरेशका महत्त्व सुनो-नहुषके पुत्र राजा ययाति जब पुरवासी मनुष्योंसे घिरे हुए राजसिंहासन पर विराजमान थे, उन्हीं दिनोंकी बात है, एक ब्राह्मण गुरु- दक्षिणा देनेके लिये भिक्षा माँगनेकी इच्छासे उनके पास आकर बोला — ‘ राजन्! मैं गुरु - दक्षिणा देनेके लिये भिक्षा चाहता हूँ, किंतु उसके साथ एक शर्त है '

महाभारत · वनपर्व · मार्कण्डेयसमास्यापर्व · अध्याय 195 · श्लोक 1पृष्ठ 1354

उस ब्राह्मण ने अपनी आशङ्का व्यक्त करते हुए कहा— 'भूपाल! इस संसार में प्रायः देखा जाता है कि जब किसी मनुष्य से कोई वस्तु माँगी जाती है, तब वह उस माँगने वाले से अत्यन्त द्वेष करने लगता है। अतः राजन्! मैं आपसे पूछता हूँ कि आज आप मुझे मेरी प्रिय वस्तु कैसे दे सकते हैं?'

ब्राह्मण उवाच

विद्वेषणं परमं जीवलोके कुर्यान्नरः पार्थिव याच्यमानः ।
तं त्वां पृच्छामि कथं तु राजन् दद्याद् भवान् दयितं च मेऽद्य ॥

ब्राह्मण बोला— भूपाल! इस संसारमें प्रायः देखा जाता है कि जब किसी मनुष्यसे कोई वस्तु माँगी जाती है, तब वह उस माँगनेवालेसे अत्यन्त द्वेष करने लगता है । अतः राजन्! मैं आपसे पूछता हूँ कि आज आप मुझे मेरी प्रिय वस्तु कैसे दे सकते हैं?

महाभारत · वनपर्व · मार्कण्डेयसमास्यापर्व · अध्याय 195 · श्लोक 3पृष्ठ 1354

राजा ने उत्तर दिया— 'दान लेने के अधिकारी ब्राह्मणदेव! मैं कोई वस्तु देकर उसकी बार-बार चर्चा नहीं करता और यह प्रतिज्ञापूर्वक कहता हूँ कि मेरे पास कोई ऐसी वस्तु नहीं है, जो आपके माँगने योग्य न हो। जो वस्तु प्राप्त हो सकती है, उसे देने की प्रतिज्ञा कर लेने पर मैं उसे देकर ही अधिक सुखी होता हूँ।"

ददामि ते रोहिणीनां सहस्रं प्रियो हि मे ब्राह्मणो याचमानः ।
न मे मनः कुप्यति याचमाने दत्तं न शोचामि कदाचिदर्थम् ॥

मैं आपको लाल रंगकी एक हजार गौएँ देता हूँ; क्योंकि न्याययुक्त याचना करनेवाला ब्राह्मण मुझे बहुत प्रिय है । मेरे मनमें याचकपर कभी क्रोध नहीं आता है और न मैं कभी दिये हुए धनके लिये पश्चात्ताप ही करता हूँ ।

महाभारत · वनपर्व · मार्कण्डेयसमास्यापर्व · अध्याय 195 · श्लोक 5पृष्ठ 1355

राजा ने आगे कहा— 'मैं आपको लाल रङ्ग की एक हजार गौएँ देता हूँ; क्योंकि न्याययुक्त याचना करने वाला ब्राह्मण मुझे बहुत प्रिय है। मेरे मन में याचक पर कभी क्रोध नहीं आता है और न मैं कभी दिये हुए धन के लिये पश्चात्ताप ही करता हूँ।' ऐसा कहकर राजा ने ब्राह्मण को एक हजार गौएँ दे दीं और ब्राह्मण ने उन सहस्रों गौओं को ग्रहण कर लिया।

इत्युक्त्वा ब्राह्मणाय राजा गोसहस्रं ददौ ।
प्राप्तवांश्च गवां सहस्रं ब्राह्मण इति ॥

ऐसा कहकर राजाने ब्राह्मणको एक हजार गौएँ दे दीं और ब्राह्मणने उन सहस्रों गौओंको ग्रहण कर लिया ।

महाभारत · वनपर्व · मार्कण्डेयसमास्यापर्व · अध्याय 195 · श्लोक 6पृष्ठ 1355

In English

King Yayati and the Brahmin's Request

A Brahmin approaches King Yayati to ask for a gift as guru-dakshina. The King promises that nothing he asks for will be denied, and then gives the Brahmin one thousand red cows.

This page answers

  • What did the brahmin ask king yayati for?
  • How many cows did king yayati give to the brahmin?
  • What color were the cows given by yayati?

Also written: Nahushacharita, Nahusha, नाहुषचरित