श्रीगणेशाय नमः।

महाभारत — खण्ड २ — पृष्ठ 1351–1360

महाभारत — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1351–1360

पृष्ठ 1351

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चतुर्नवत्यधिकशततमोऽध्यायः क्षत्रिय राजाओंका महत्त्व- सुहोत्र और शिबिकी प्रशंसा वैशम्पायन उवाच ततः पाण्डवाः पुनर्मार्कण्डेयमूचुः ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! तदनन्तर पाण्डवोंने पुनः मार्कण्डेयजीसे प्रश्न किया ॥ १ ॥

कथितं ब्राह्मणमहाभाग्यं राजन्यमहाभाग्यमिदानीं शुश्रूषामह इति तानुवाच मार्कण्डेयो महर्षिः श्रूयता- मिति इदानीं राजन्यानां महाभाग्यमिति । कुरूणामन्य-तमः सुहोत्रो नाम राजा महर्षीनभिगम्य निवृत्य रथस्थमेव राजानमौशीनरं शिबिं ददर्शाभिमुखं तौ समेत्य परस्परेण यथावयः पूजां प्रयुज्य गुणसाम्येन परस्परेण तुल्यात्मानौ विदित्वान्योन्यस्य पन्थानं न ददतुस्तत्र नारदः प्रादुरासीत् किमिदं भवन्तौ परस्परस्य पन्थानमावृत्य तिष्ठत इति ॥ २ ॥

' मुनिवर! आपने ब्राह्मणोंके माहात्म्यका तो वर्णन किया, अब हम क्षत्रियोंकी महत्ताके विषयमें इस समय कुछ सुनना चाहते हैं । ' यह बात सुनकर महर्षि मार्कण्डेयने कहा - ' अच्छा सुनो । अब मैं क्षत्रियोंके माहात्म्यका वर्णन करता हूँ । कुरुवंशी क्षत्रियोंमें सुहोत्र नामसे प्रसिद्ध एक राजा हो गये हैं । एक दिन वे महर्षियोंका सत्संग करके जब वहाँसे लौट रहे थे, उस समय उन्होंने अपने सामने ही रथपर बैठे हुए उशीनरपुत्र राजा शिबिको देखा । निकट आनेपर उन दोनोंने अवस्थाके अनुसार एक- दूसरेका सम्मान किया । परंतु गुणमें अपनेको बराबर समझकर एकने दूसरेके लिये राह नहीं दी । इतनेहीमें वहाँ देवर्षि नारदजी प्रकट हो गये और पूछ बैठे ' यह क्या बात है ' जो कि तुम दोनों इस तरह एक -दूसरेका मार्ग रोककर खड़े हो? ' ॥ २ ॥

पृष्ठ 1352

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तावूचतुर्नारदं नैतद् भगवन् पूर्वकर्मकर्त्रादिभि र्विशिष्टस्य पन्था उपदिश्यते समर्थाय वा आवां च सख्यं परस्परेणोपगतौ तच्चावधानतोऽत्युत्कृष्टमधरो - त्तरं परिभ्रष्टं नारदस्त्वेवमुक्तः श्लोकत्रयमपठत् ॥ ‘ तब उन दोनोंने नारदजीसे कहा-' भगवन्! ऐसे बात नहीं है । पहलेके कर्म- कर्ताओं ( धर्म- व्यवस्थापकों) -ने यह उपदेश दिया है कि जो अपनेसे सभी बातोंमें बढ़ा- चढ़ा हो या अधिक शक्तिशाली हो, उसीको मार्ग देना चाहिए । हम दोनों एक- दूसरेसे मित्रभाव रखकर मिले हैं । विचार करनेपर हम यह निर्णय नहीं कर पाते कि हम दोनोंमेंसे कौन अत्यन्त श्रेष्ठ है और कौन उसकी अपेक्षा अधिक छोटा? ' उनके ऐसा कहनेपर नारदजीने तीन श्लोक पढ़े ॥ ३ ॥

क्रूरः कौरव्य मृदवे मृदुः क्रूरे च कौरव । साधुश्चासाधवे साधुः साधवे नाप्नुयात् कथम् ॥ ४ ॥

'उनका सारांश इस प्रकार है— कौरव! अपने साथ कोमलताका बर्ताव करनेवालेके लिये क्रूर मनुष्य भी कोमल बन जाता है । क्रूरतापूर्ण बर्ताव तो वह क्रूर मनुष्योंके प्रति ही

पृष्ठ 1353

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करता है, परंतु साधु पुरुष दुष्टोंके प्रति भी साधुताका ही बर्ताव करता है । फिर वह साधु पुरुषोंके साथ साधुताका बर्ताव कैसे नहीं अपनायेगा? ॥ कृतं शतगुणं कुर्या न्नास्ति देवेषु निर्णयः । औशीनरः साधुशीलो भवतो वै महीपतिः ॥ ५ ॥

'मनुष्य भी चाहे तो वह अपने ऊपर किये हुए उपकारका बदला सौगुना करके चुका सकता है । देवताओंमें ही यह प्रत्युपकारका भाव होता है, ऐसा कोई नियम नहीं है । सुहोत्र! उशीनरपुत्र शिबिका शील- स्वभाव तुमसे कहीं अच्छा है ॥ ५ ॥

जयेत् कदर्यं दानेन

सत्येनानृतवादिनम् ।

क्षमया क्रूरकर्माण- मसाधुं साधुना जयेत् ॥ ६ ॥

'नीच प्रकृतिवाले मनुष्यको दान देकर वशमें करे । असत्यवादीको सत्य भाषणसे जीते । क्रूरको क्षमासे और दुष्टको उत्तम व्यवहारसे अपने वशमें करे ॥ ६ ॥

तदुभावेव भवन्तावुदारौ व इदानीं भवद्भयामन्यतमः सोऽपसर्पतु एतद् वै निदर्शनमित्युक्त्वा तूष्णीं नारदो बभूव । एतच्छ्रुत्वा तु कौरव्यः शिबिं प्रदक्षिणं कृत्वा पन्थानं दत्त्वा बहुकर्मभिः प्रशस्य प्रययौ ॥ ७ ॥

‘ अतः तुम दोनों ही उदार हो; इस समय तुम दोनोंमें से एक, जो अधिक उदार हो, वह मार्ग छोड़कर हट जाय; यही उदारताका आदर्श है । ' ऐसा कहकर नारदजी चुप हो गये । यह सुनकर कुरुवंशी राजा सुहोत्रने शिबिको अपनी दायीं ओर करके मार्ग दे दिया और उनके अनेक सत्कर्मोंका उल्लेख करके उनकी भूरि- भूरि प्रशंसा करते हुए वे अपनी राजधानीको चले गये ॥ ७ ॥

तदेतद् राज्ञो महाभाग्यमप्युक्तवान् नारदः ॥ ८ ॥

‘ इस प्रकार साक्षात् नारदजीने राजा शिबिकी महत्ताका अपने मुखसे वर्णन किया' ॥ ८ ॥

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमास्यापर्वणि शिबिचरिते चतुर्नवत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १ ९ ४ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत मार्कण्डेयसमास्यापर्वमें शिबिचरितविषयक एक सौ चौरानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १ ९४ ॥

पृष्ठ 1354

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पञ्चनवत्यधिकशततमोऽध्यायः राजा ययातिद्वारा ब्राह्मणको सहस्र गौओंका दान मार्कण्डेय उवाच इदमन्यच्छूयतां ययातिर्नाहुषो राजा राज्यस्थः पौरजनावृत आसांचक्रे गुर्वर्थी ब्राह्मण उपेत्याब्रवीद् भो राजन् गुर्वर्थं भिक्षेयं समयादिति ॥ १ ॥

मार्कण्डेयजी कहते हैं - युधिष्ठिर! अब एक- दूसरे क्षत्रिय नरेशका महत्त्व सुनो-नहुषके पुत्र राजा ययाति जब पुरवासी मनुष्योंसे घिरे हुए राजसिंहासन पर विराजमान थे, उन्हीं दिनोंकी बात है, एक ब्राह्मण गुरु- दक्षिणा देनेके लिये भिक्षा माँगनेकी इच्छासे उनके पास आकर बोला — ‘ राजन्! मैं गुरु - दक्षिणा देनेके लिये भिक्षा चाहता हूँ, किंतु उसके साथ एक शर्त है ' ॥ १ ॥

राजोवाच ब्रवीतु भगवान् समयमिति ॥ २ ॥

राजाने कहा — भगवन्! आप अपनी शर्त बताइये ॥ २ ॥

ब्राह्मणउवाच विद्वेषणं परमं जीवलोके कुर्यान्नरः पार्थिव याच्यमानः । तं त्वां पृच्छामि कथं तु राजन् दद्याद् भवान् दयितं च मेऽद्य ॥ ३ ॥

ब्राह्मण बोला— भूपाल! इस संसारमें प्रायः देखा जाता है कि जब किसी मनुष्यसे कोई वस्तु माँगी जाती है, तब वह उस माँगनेवालेसे अत्यन्त द्वेष करने लगता है । अतः राजन्! मैं आपसे पूछता हूँ कि आज आप मुझे मेरी प्रिय वस्तु कैसे दे सकते हैं? ॥ ३ ॥

राजोवाच न चानुकीर्तयेदद्य दत्त्वा अयाच्यमर्थं न च संशृणोमि । प्राप्यमर्थं च संश्रुत्य तं चापि दत्त्वा सुसुखी भवामि ॥ ४ ॥

राजाने कहा — दान लेनेके अधिकारी ब्राह्मणदेव! मैं कोई वस्तु देकर उसकी बार- बार चर्चा नहीं करता और यह प्रतिज्ञापूर्वक कहता हूँ कि मेरे पास कोई ऐसी वस्तु नहीं है, जो

पृष्ठ 1355

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आपके माँगने योग्य न हो । जो वस्तु प्राप्त हो सकती है, उसे देनेकी प्रतिज्ञा कर लेनेपर मैं उसे देकर ही अधिक सुखी होता हूँ ॥ ४ ॥

ददामि ते रोहिणीनां सहस्रं प्रियो हि मे ब्राह्मणो याचमानः । न मे मनः कुप्यति याचमाने दत्तं न शोचामि कदाचिदर्थम् ॥ ५ ॥

मैं आपको लाल रंगकी एक हजार गौएँ देता हूँ; क्योंकि न्याययुक्त याचना करनेवाला ब्राह्मण मुझे बहुत प्रिय है । मेरे मनमें याचकपर कभी क्रोध नहीं आता है और न मैं कभी दिये हुए धनके लिये पश्चात्ताप ही करता हूँ ॥ ५ ॥

इत्युक्त्वा ब्राह्मणाय राजा गोसहस्रं ददौ ।

प्राप्तवांश्च गवां सहस्रं ब्राह्मण इति ॥ ६ ॥

ऐसा कहकर राजाने ब्राह्मणको एक हजार गौएँ दे दीं और ब्राह्मणने उन सहस्रों गौओंको ग्रहण कर लिया ॥ ६ ॥

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमास्यापर्वणि नाहुषचरिते पञ्चनवत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १ ९ ५ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत मार्कण्डेयसमास्यापर्वमें ययातिचरितविषयक एक सौ पञ्चानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १ ९ ५ ॥

पृष्ठ 1356

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षण्णवत्यधिकशततमोऽध्यायः सेदुक और वृषदर्भका चरित्र वैशम्पायन उवाच भूय एव महाभाग्यं कथ्यतामित्यब्रवीत् पाण्डवः ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं -जनमेजय! पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरने मार्कण्डेयजीसे पुनः यह अनुरोध किया— ‘ भगवन्! फिर मुझे क्षत्रियोंका माहात्म्य सुनाइये ' ॥ १ ॥

वृषदर्भसेदुकनामानौ राजानौ अथाचष्ट मार्कण्डेयो महाराज नीतिमार्गरतावस्त्रोपास्त्रकृतिनौ ॥ २ ॥

तब मार्कण्डेयजीने कहा - ' महाराज! पूर्वकालमें वृषदर्भ और सेदुक ये दो राजा थे । दोनोंही नीतिके मार्गपर चलनेवाले और अस्त्र तथा उपास्त्रोंकी विद्यामें निपुण थे ॥ २ ॥

सेदुको वृषदर्भस्य बालस्यैव उपांशुव्रतमभ्यजानात् कुप्यमदेयं ब्राह्मणस्य ॥ ३ ॥

' वृषदर्भने बचपनसे ही एक गुप्त व्रत ले रखा था कि ' ब्राह्मणको सोना - चाँदीके सिवा और कुछ नहीं देना चाहिये ( तात्पर्य यह कि उसे सुवर्ण तथा रजत ही प्रदान करना चाहिये ) ’ । उनके इस व्रतको सेदुक जानते थे ॥ ३ ॥

अथ तं सेदिकं ब्राह्मणः कश्चिद् वेदाध्ययनसम्पन्न आशिषं दत्त्वा गुर्वर्थी भिक्षितवान् ॥ ४ ॥

अश्वसहस्रं मे भवान् ददात्विति तं सेदुको ब्राह्मणमब्रवीत् ॥ ५ ॥

नास्ति सम्भवो गुर्वर्थं दातुमिति ॥ ६ ॥

'एक दिन कोई वेदाध्ययनसम्पन्न ब्राह्मण राजा सेदुकके पास आया और उन्हें आशीर्वाद देकर गुरु- दक्षिणाके लिये भिक्षा माँगता हुआ बोला -' राजन्! आप मुझे एक हजार घोड़े दीजिये। ' तब सेदुकने उस ब्राह्मण- से कहा — ' ब्रह्मन्! आपकी अभीष्ट गुरु-दक्षिणा देना मेरे लिये सम्भव नहीं है ॥ ४-६ ॥ स त्वं गच्छ वृषदर्भसकाशम् । राजा परम धर्मज्ञो ब्राह्मण तं भिक्षस्व । स ते दास्यति तस्यैतदुपांशुव्रतमिति ॥ ७ ॥

‘ अतः आप वृषदर्भके पास चले जाइये । ब्राह्मण! राजा वृषदर्भ बड़े धर्मज्ञ हैं । आप उन्हींसे याचना कीजिये । वे आपकी अभीष्ट वस्तु अवश्य दे देंगे। यह उनका गुप्त नियम है ' ॥ ७ ॥

अथ ब्राह्मणो वृषदर्भसकाशं गत्वा अश्वसहस्रमयाचत् । स राजा तं कशेनाताडयत् ॥ ८ ॥

पृष्ठ 1357

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‘ तब ब्राह्मण देवताने वृषदर्भके पास जाकर एक हजार घोड़े माँगे । यह सुनकर राजा उन्हें कोड़ेसे पीटने लगे ' ॥ ८ ॥

तं ब्राह्मणोऽब्रवीत् । किं हिंस्यनागसं मामिति ॥ ९ ॥

‘ यह देख ब्राह्मणने उनसे पूछा – ' राजन्! मुझ निरपराधको आप क्यों मार रहे हैं ' ॥ ९ ॥

एवमुक्त्वा तं शपन्तं राजाऽऽह । विप्र किं यो न ददाति तुभ्यमुताहोस्विद् ब्राह्मण्यमेतत् ॥ १० ॥

'ऐसा कहकर ब्राह्मण देवता शाप देनेको उद्यत हो गये । तब राजाने उनसे कहा —‘विप्रवर! क्या जो आपको अपना धन न दे, उसको शाप देना ही उचित है? अथवा यही ब्राह्मणोचित कर्म है? ' ॥ १० ॥

ब्राह्मणउवाच राजाधिराज तव समीपं सेदुकेन प्रेषितो भिक्षितु- मागतः । तेनानुशिष्टेन मया त्वं भिक्षितोऽसि ॥ ११ ॥

ब्राह्मणने कहा — ‘ राजाधिराज! आपके पास राजा सेदुकने मुझे भेजा है, तभी आपसे गुरु- दक्षिणा माँगने आया हूँ । उनके उपदेशके अनुसार ही मैंने आपसे याचना की है ' ॥ ११ ॥

राजोवाच पूर्वाह्णे ते दास्यामि यो मेऽद्य बलिरागमिष्यति । यो हन्यते कशया कथं मोघं क्षेपणं तस्य स्यात् ॥ १२ ॥

राजा बोले — ब्रह्मन्! आज जो भी राजकीय कर मेरे पास आयेगा, उसे कल पूर्वाह्णमें ही आपको दे दूँगा । जिसे कोड़ेसे पीटा जाय, उसे खाली हाथ कैसे लौटाया जा सकता है? ॥ १२ ॥

इत्युक्त्वा ब्राह्मणाय दैवसिकामुत्पत्तिं प्रादात् ।

अधिकस्याश्वसहस्रस्य मूल्यमेवादादिति ॥ १३ ॥

ऐसा कहकर राजाने ब्राह्मणको एक दिनकी आय दे दी । इस प्रकार उन्होंने एक हजारसे अधिक घोड़ोंका मूल्य ही दिया* ॥ १३ ॥

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमास्यापर्वणि सेदुकवृषदर्भचरिते षण्णवत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १ ९ ६ ॥ इस प्रकारश्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत मार्कण्डेयसमास्यापर्वमें सेदुकवृषदर्भचरितविषयक एक सौ छियानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १ ९ ६ ॥

पृष्ठ 1358

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सप्तनवत्यधिकशततमोऽध्यायः इन्द्र और अग्निद्वारा राजा शिबिकी परीक्षा मार्कण्डेय उवाच देवानां कथा संजाता महीतलं गत्वा महीपतिं शिबिमौशीनरं साध्वेनं शिबिं जिज्ञास्याम इति । एवं भो इत्युक्त्वा अग्नीन्द्रावुपतिष्ठेताम् ॥ १ ॥

मार्कण्डेयजी कहते हैं - युधिष्ठिर! एक समय देवताओंमें परस्पर यह बातचीत हुई कि ' पृथ्वीपर चलकर हम उशीनरके पुत्र राजा शिबिकी श्रेष्ठताकी परीक्षा करें। ' ' ऐसा ही हो ' यह कहकर अग्नि और इन्द्र वहाँ जानेके लिये उद्यत हुए ॥ १ ॥

अग्निः कपोतरूपेण तमभ्यधावदामिषार्थमिन्द्रः श्येनरूपेण ॥ २ ॥

अग्निदेव कबूतरका रूप धारण करके मानो अपने प्राण बचानेके लिये राजाके पास भागते हुए गये और इन्द्रने बाज पक्षीका रूप धारण कर मांसके लिये उस कबूतरका पीछा किया ॥ २ ॥

अथ कपोतो राज्ञो दिव्यासनासीनस्योत्सङ्गं न्यपतत् ॥ ३ ॥

राजा शिबि अपने दिव्य सिंहासनपर बैठे हुए थे । कबूतर उनकी गोदमें जा गिरा ॥ ३ ॥

अथ पुरोहितो राजानमब्रवीत् । प्राणरक्षार्थं श्येनाद् भीतो भवन्तं प्राणार्थी प्रपद्यते ॥ ४ ॥

यह देखकर पुरोहितने राजासे कहा- ' महाराज! यह कबूतर बाजके डरसे अपने प्राणोंकी रक्षाके लिये आपकी शरणमें आया है । किसी तरह प्राण बच जायँ - यही इसका प्रयोजन है ॥ ४ ॥

वसु ददातु अन्तवान् पार्थिवोऽस्य निष्कृतिं कुर्याद् घोरं कपोतस्य निपातमाहुः ॥ ५ ॥

' परंतु विद्वान् पुरुष कहते हैं कि ' इस तरह कबूतरका आकर गिरना भयंकर अनिष्टका सूचक है । ' आपकी मृत्यु निकट जान पड़ती है; अतः आपको इस उत्पातकी शान्ति करनी चाहिये । आप धन दान करें' ॥ ५ ॥

पृष्ठ 1359

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अथ कपोतो राजानमब्रवीत् । प्राणरक्षार्थं श्येनाद् भीतो भवन्तं प्राणार्थी प्रपद्ये अङ्गैरङ्गानि प्राप्यार्थी मुनिर्भूत्वा प्राणांस्त्वां प्रपद्ये ॥ ६ ॥

तदनन्तर कबूतरने राजासे कहा – 'महाराज! मैं बाजके डरसे प्राण बचानेके लिये प्राणार्थी होकर आपकी शरणमें आया हूँ । मैं वास्तवमें कबूतर नहीं ऋषि हूँ । मैंने स्वेच्छासे पूर्व शरीरसे यह शरीर बदल लिया है । प्राणरक्षक होनेके कारण आप ही मेरे प्राण हैं । मैं आपकी शरणमें हूँ, मुझे बचाइये ॥ ६ ॥ I स्वाध्यायेन कर्शितं ब्रह्मचारिणं मां विद्धि तपसा द

युक्तमाचार्यस्याप्रतिकूलभाषिणम् । एवं युक्तमपापं मां विद्धि ॥ ७ ॥

‘ मुझे ब्रह्मचारी समझिये । मैंने वेदोंका स्वाध्याय करते हुए अपने शरीरको दुर्बल किया है । मैं तपस्वी और जितेन्द्रिय हूँ। आचार्यके प्रतिकूल कभी कोई बात नहीं करता । इस प्रकार मुझे योगयुक्त और निष्पाप जानिये ॥ ७ ॥

गदामि वेदान् विचिनोमि छन्दः सर्वे वेदा अक्षरशो मे अधीताः । न साधु दानं श्रोत्रियस्य प्रदानं मा प्रादाः श्येनाय न कपोतोऽस्मि ॥ ८ ॥

' मैं वेदोंका प्रवचन और छन्दोंका संग्रह करता हूँ । मैंने सम्पूर्ण वेदोंके एक- एक अक्षरका अध्ययन किया है । मैं श्रोत्रिय विद्वान् हूँ। मुझ जैसे व्यक्तिको किसी भूखे प्राणीकी

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भूख बुझानेके लिये उसके हवाले कर देना उत्तम दान नहीं है । अतः आप मुझे बाजको न सौंपिये । मैं कबूतर नहीं हूँ' ॥ ८ ॥

अथ श्येनो राजनमब्रवीत् ॥ ९ ॥

पर्यायेण वसतिर्वा भवेषु सर्गे ज्ञातः पूर्वमस्मात् कपोतात् । त्वमाददानोऽथ कपोतमेनं मा त्वं राजन् विघ्नकर्ता भवेथाः ॥ १० ॥

तदनन्तर बाजने राजासे कहा - ' महाराज! प्रायः सभी जीवोंको बारी - बारीसे विभिन्न योनियोंमें जन्म लेकर रहना पड़ता है । मालूम होता है, आप इस सृष्टि -परम्परामें पहले कभी इस कबूतरसे जन्म ग्रहण कर चुके हैं; तभी तो इसे अपने आश्रयमें ले रहे हैं! राजन्! मैं आग्रहपर्वक कहता हूँ, आप इस कबूतरको लेकर मेरे भोजनके कार्यमें विघ्न न डालें ' ॥ ९ -१० ॥ राजोवाच नेदृशी जातु परा हि दृष्टा वागुच्यमाना शकुनेन संस्कृता । यां वै कपोतो वदते यां च श्येन उभौ विदित्वा कथमस्तु साधु ॥ ११ ॥

राजा बोले- अहो! आजसे पहले किसने कभी भी किसी पक्षीके मुखसे ऐसी उत्तम संस्कृत भाषाका उच्चारण देखा या सुना है, जैसी कि ये कबूतर और बाज बोल रहे हैं? किस प्रकार इन दोनोंका स्वरूप जानकर इनके प्रति न्यायोचित बर्ताव किया जा सकता है? ॥ ११ ॥

नास्य वर्षं वर्षति वर्षकाले नास्य बीजं रोहति काल उप्तम् । भीतं प्रपन्नं यो हि ददाति शत्रवे न त्राणं लभेत् त्राणमिच्छन् स काले ॥ १२ ॥

जो राजा अपनी शरणमें आये हुए भयभीत प्राणीको उसके शत्रुके हाथमें दे देता है, उसके देशमें समयपर वर्षा नहीं होती । उसके बोये हुए बीज भी समयपर नहीं उगते हैं । वह कभी संकटके समय जब अपनी रक्षा चाहता है, तब उसे कोई रक्षक नहीं मिलता ॥ १२ ॥

जाता ह्रस्वा प्रजा प्रमीयते सदा न वासं पितरोऽस्य कुर्वते । भीतं प्रपन्नं यो हि ददाति शत्रवे नास्य देवाः प्रतिगृह्णन्ति हव्यम् ॥ १३ ॥