पतिव्रतोपाख्यान : अत्यन्त कठिन और निन्दनीय कर्मों के बीच धर्म का मार्ग कैसे खोजें?
कर्म की नियति और आत्म-संयम
महर्षि वेदव्यास कृत महाभारतके सन्दर्भ सहित वास्तविक आख्यान पढ़ें।
वनपर्व → मार्कण्डेयसमास्यापर्व · अध्याय 205–208 · पृष्ठ 1420–1453
मार्कण्डेय ने युधिष्ठिर से कहा
धर्मविषयक कठिन प्रश्नों के समाधान हेतु
श्रीमद्भागवत महाभारत के वनपर्व के अन्तर्गत मार्कण्डेय समास्यापर्व में राजा युधिष्ठिर ने महातेजस्वी मार्कण्डेय मुनि से धर्मविषयक प्रश्न किया। यह प्रश्न समझने में अत्यन्त कठिन था। युधिष्ठिर बोले— ‘भगवन्! मैं आपके मुखसे पतिव्रता स्त्रियों के सूक्ष्म, धर्मसम्मत एवं उत्तम माहात्म्य का यथार्थ वर्णन सुनना चाहता हूँ। भगवन्! श्रेष्ठ ब्रह्मर्षे! इस जगत् में सूर्य, चन्द्रमा, वायु, पृथ्वी, अग्नि, पिता, माता और गुरु— ये प्रत्यक्ष देवता दिखाई देते हैं। भृगुनन्दन! इसके सिवा अन्य जो देवतारूप से स्थापित देवविग्रह हैं, वे भी प्रत्यक्ष देवताओं की ही कोटि में हैं। समस्त गुरुजन और पतिव्रता नारियाँ भी समादर के योग्य हैं। पतिव्रता स्त्रियाँ अपने पति की जैसी सेवा-शुश्रूषा करती हैं; वह दूसरे किसी के लिये मुझे अत्यन्त कठिन प्रतीत होती है। प्रभो! आप अब हमें पतिव्रता स्त्रियों की महिमा सुनावें। निष्पाप सहर्ष! जो अपनी इन्द्रियों को संयम में रखती हुई मन को वश में करके अपने पति को देवता के समान ही चिन्तन करती रहती हैं, वे नारियाँ धन्य हैं। प्रभो! भगवन्! उनका वह त्याग और सेवाभाव मुझे तो अत्यन्त कठिन जान पड़ता है। ब्रह्मन्! पुत्रों द्वारा माता-पिता की सेवा तथा स्त्रियों द्वारा की हुई पति की सेवा बहुत कठिन है। स्त्रियों के इस कठोर धर्म से बढ़कर और कोई दुष्कर कार्य मुझे नहीं दिखाई देता है। एकपत्न्यश्च या नार्यो याश्च सत्यं वदन्त्युत। ब्रह्मन्! समाज में सदा आदर पाने वाली सदाचारिणी स्त्रियाँ जो महान कार्य करती हैं वह अत्यन्त कठिन है। जो लोग पिता-माता की सेवा करते हैं उनका कर्म भी बहुत कठिन है। पतिव्रता तथा सत्यवादिनी स्त्रियाँ अत्यन्त कठोर धर्म का पालन करती हैं। नार्यः कालेन सम्भूय किमद्भततरं ततः। स्त्रियाँ अपने उदर में दस महीने तक जो गर्भ धारण करती हैं और यथासमय उसको जन्म देती हैं, इससे अद्भुत कार्य और कौन होगा? भगवन्! अपने को भारी प्राणसङ्कट में डालकर और अतुल वेदना को सहकर नारियाँ बड़े कष्ट से सन्तान उत्पन्न करती हैं! विप्रवर! फिर बड़े स्नेह से उनका पालन भी करती हैं। जो सती-साध्वी स्त्रियाँ क्रूर स्वभाव के पतियों की सेवा में रहकर उनके तिरस्कार का पात्र बनकर भी सदा अपने सती-धर्म का पालन करती रहती हैं, वह तो मुझे और भी अत्यन्त कठिन प्रतीत होता है। ब्रह्मन्! आप मुझे क्षत्रियों के धर्म और आचार का तत्त्व भी विस्तारपूर्वक बताइये। विप्रवर! जो क्रूर स्वभाव के मनुष्य हैं, उनके लिये महात्माओं का धर्म अत्यन्त दुर्लभ है। भगवन! भृगुकुल शिरोमणे! आप उत्तम व्रत के पालक और प्रश्न का समाधान करने वाले विद्वानों में श्रेष्ठ हैं। मैंने जो प्रश्न आपके सम्मुख उपस्थित किया है, उसी का उत्तर मैं आपसे सुनना चाहता हूँ।'
ततो युधिष्ठिरो राजा मार्कण्डेयं महाद्युतिम् ।
पप्रच्छ भरतश्रेष्ठ धर्मप्रश्नं सुदुर्विदम् ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं- भरतश्रेष्ठ जनमेजय! तदनन्तर राजा युधिष्ठिरने महातेजस्वी मार्कण्डेय मुनिसे धर्मविषयक प्रश्न किया, जो समझनेमें अत्यन्त कठिन था ।
मार्कण्डेय जी बोले— 'भरतश्रेष्ठ! तुम्हारे इस प्रश्न का विवेचन करना यद्यपि बहुत कठिन है, तो भी मैं अब इसका यथावत् समाधान करूँगा। तुम मेरे मुख से सुनो। कुछ लोग माताओं को गौरव की दृष्टि से बड़ी मानते हैं। दूसरे लोग पिता को महत्त्व देते हैं। परन्तु माता जो अपनी सन्तानों को पाल-पोसकर बड़ा बनाती है, वह उसका कठिन कार्य है। माता-पिता तपस्या, देवपूजा, वन्दना, तितिक्षा तथा अन्य श्रेष्ठ उपायों द्वारा भी पुत्रों को प्राप्त करना चाहते हैं। वीर! इस प्रकार बड़ी कठिनाई से परम दुर्लभ पुत्र को पाकर लोग सदा इस चिन्ता में डूबे रहते हैं कि न जाने यह किस तरह का होगा। भारत! पिता और माता अपने पुत्रों के लिये यश, कीर्ति और ऐश्वर्य, सन्तान तथा धर्म की शुभकामना करते हैं। इह प्रेत्य च तस्याथ कीर्तिर्धर्मश्च शाश्वतः। राजेन्द्र! जो उन दोनों की आशा को सफल करता है, वही पुत्र धर्मज्ञ है। जिसके माता-पिता उससे सदा सन्तुष्ट रहते हैं, उसे इहलोक और परलोक में भी अक्षय कीर्ति और शाश्वत धर्म की प्राप्ति होती है। या तु भर्तरि शुश्रूषा तया स्वर्गं जयत्युत।' नारी के लिये किसी यज्ञकर्म, श्राद्ध और उपवास की आवश्यकता नहीं है। वह जो पति की सेवा करती है, उसी के द्वारा स्वर्गलोक पर विजय प्राप्त कर लेती है। इस प्रकरण में पतिव्रताओं के नियत धर्म का वर्णन किया जाएगा। तुम सावधान होकर सुनो।
पतिव्रतानां नियतं धर्मं चावहितः शृणु ॥
राजा युधिष्ठिर! इसी प्रकरणमें पतिव्रताओंके नियत धर्मका वर्णन किया जायगा । तुम सावधान होकर सुनो ।
भरतनन्दन! कौशिक नाम से प्रसिद्ध एक ब्राह्मण था, जो वेद का अध्ययन करने वाला, तपस्या का धनी और धर्मात्मा था। वह तपस्वी ब्राह्मण सम्पूर्ण द्विजातियों में श्रेष्ठ समझा जाता था। द्विजश्रेष्ठ कौशिक ने सम्पूर्ण अङ्गों सहित वेदों और उपनिषदों का अध्ययन किया था। एक दिन की बात है, वह किसी वृक्ष के नीचे बैठकर वेदपाठ कर रहा था। उस समय उस वृक्ष के ऊपर एक बगुली छिपी बैठी थी। उसने ब्राह्मण देवता के ऊपर बीट कर दी। यह देख ब्राह्मण क्रोधित हो गया और उस पक्षी की ओर दृष्टि डालकर उसका अनिष्ट चिन्तन करने लगा। उसने अत्यन्त कुपित होकर उस बगुली को देखा और उसका अनिष्ट चिन्तन किया था, अतः वह पृथ्वी पर गिर पड़ी। उस बगुली को अचेत एवं निष्प्राण होकर पड़ी देख ब्राह्मण का हृदय दया से द्रवित हो उठा। उसे अपने इस कुकृत्य पर पश्चात्ताप हुआ। वह इस प्रकार शोक प्रकट करता हुआ बोला— ‘ओह! आज क्रोध और आसक्ति के वशीभूत होकर मैंने यह अनुचित कार्य कर डाला।'
कश्चिद् द्विजातिप्रवरो वेदाध्यायी तपोधनः ।
तपस्वी धर्मशीलश्च कौशिको नाम भारत ॥
मार्कण्डेयजी कहते हैं- भरतनन्दन! कौशिक नामसे प्रसिद्ध एक ब्राह्मण था, जो वेदका अध्ययन करनेवाला, तपस्याका धनी और धर्मात्मा था । वह तपस्वी ब्राह्मण सम्पूर्ण द्विजातियोंमें श्रेष्ठ समझा जाता था ।
इस प्रकार बार-बार पछताकर वह विद्वान् ब्राह्मण गाँव में भिक्षा के लिये गया। उस गाँव में जो लोग शुद्ध और पवित्र आचरण वाले थे, उन्हीं के घरों पर भिक्षा माँगता हुआ वह एक ऐसे घर पर जा पहुँचा, जहाँ पहले भी कभी भिक्षा प्राप्त कर चुका था। दरवाजे पर पहुँचकर ब्राह्मण बोला— 'भिक्षा दें!'
इत्युक्त्वा बहुशो विद्वान् ग्रामं भैक्ष्याय संश्रितः ।
ग्रामे शुचीनि प्रचरन् कुलानि भरतर्षभ ॥
प्रविष्टस्तत् कुलं यत्र पूर्वं चरितवांस्तु सः ।
देहीति याचमानोऽसौ तिष्ठेत्युक्तः स्त्रिया ततः ॥
मार्कण्डेयजी कहते हैं- भरतश्रेष्ठ! इस प्रकार बार - बार पछताकर वह विद्वान् ब्राह्मण गाँवमें भिक्षाके लिये गया । उस गाँवमें जो लोग शुद्ध और पवित्र आचरणवाले थे, उन्हींके घरोंपर भिक्षा माँगता हुआ वह एक ऐसे घरपर जा पहुँचा, जहाँ पहले भी कभी भिक्षा प्राप्त कर चुका था । दरवाजेपर पहुँचकर ब्राह्मण बोला- 'भिक्षा दें! ' भीतरसे किसी स्त्रीने उत्तर दिया— ' ठहरो! ( अभी लाती हूँ) '
भीतर से किसी स्त्री ने उत्तर दिया— 'ठहरो!'
वह घर की मालकिन थी, जो जूँठे बर्तन माँज रही थी। ज्यों ही वह बर्तन साफ करके उधर से निवृत्त हुई, त्यों ही उसके पतिदेव सहसा घर पर आ गये। वे भूख से अत्यन्त पीड़ित थे। पतिको आया देख उस श्याम नेत्रों वाली पतिव्रता ने ब्राह्मण को तो उसी क्षण छोड़ दिया और अत्यन्त विनीत भाव से वह पतिकी सेवा में लग गयी। पानी लाकर उसने पतिके पैर धोये, हाथ-मुँह धुलाये और बैठने को आसन दिया। फिर सुन्दर स्वादिष्ट भक्ष्य-भोज्य पदार्थ परोसकर वह पतिको भोजन कराने लगी। वह सती स्त्री प्रतिदिन पतिको भोजन कराकर उनके उच्छिष्ट को प्रसाद मानकर बड़े आदर और प्रेम से भोजन करती थी। वह पतिको देवता मानती और उनके विचार के अनुकूल ही चलती थी। उसका मन कभी पर पुरुष की ओर नहीं जाता था। वह मन, वाणी और क्रिया से पतिपरायणा थी। अपने हृदय की समस्त भावनाएँ, सम्पूर्ण प्रेम पतिके चरणों में चढ़ाकर वह अनन्य भाव से उन्हीं की सेवा में लगी रहती थी। सदाचार का पालन करती, बाहर-भीतर से शुद्ध-पवित्र रहती, घर के काम-काज को कुशलतापूर्वक करती और कुटुम्ब के सभी लोगों का हित चाहती थी। पतिके लिये जो हितकर कार्य जान पड़ता उसमें भी वह सदा संलग्न रहती थी। देवताओं की पूजा, अतिथियों के सत्कार, भृत्यों के भरण-पोषण और सास-ससुर की सेवा में भी वह सर्वदा तत्पर रहती थी। अपने मन और इन्द्रियों पर वह निरन्तर पूर्ण संयम रखती थी।
सा तु दृष्ट्वा पतिं साध्वी ब्राह्मणं व्यवहाय तम् ॥
पाद्यमाचमनीयं वै ददौ भर्तुस्तथाऽऽसनम् ।
प्रह्वा पर्यचरच्चापि भर्तारमसितेक्षणा ॥
पतिको आया देख उस श्याम नेत्रोंवाली पतिव्रताने ब्राह्मणको तो उसी दशामें छोड़ दिया और अत्यन्त विनीतभावसे वह पतिकी सेवामें लग गयी । पानी लाकर उसने पतिके पैर धोये, हाथ - मुँह धुलाये और बैठनेको आसन दिया ।
पतिकी सेवा करते-करते उस मङ्गलमयी दृष्टि वाली देवी को भिक्षा के लिये खड़े हुए ब्राह्मण की याद आयी। अपनी भूल के कारण वह यशस्विनी साध्वी स्त्री बहुत लज्जित हुई और ब्राह्मण के लिये भिक्षा लेकर घर से बाहर निकली। उसे देखकर ब्राह्मण ने कहा— 'सुन्दरी! तुम्हारा यह कैसा बर्ताव है? देख! तुम्हें इतना विलम्ब करना था तो 'ठहरो' कहकर मुझे रोक क्यों लिया? मुझे जाने क्यों नहीं दिया?'
मार्कण्डेय जी कहते हैं— युधिष्ठिर! उस पतिव्रता देवी की कही हुई सारी बातों पर विचार करके कौशिक ब्राह्मण को बड़ा आश्चर्य हुआ। वह अपने आप को धिक्कारता हुआ अपराधी सा जान पड़ने लगा। अपने धर्म की सूक्ष्म गति पर विचार करते हुए उसने मन ही मन कहा— 'मुझे इस सती के कथन पर श्रद्धा और विश्वास करना चाहिए; अतः मैं अवश्य मिथिला जाऊँगा। सुना है वहाँ एक पुण्यात्मा धर्मज्ञ व्याध निवास करता है। मैं उस तपोधन व्याध से धर्म की बात पूछने के लिए आज ही उसके पास जाऊँगा।'
चिन्तयानः स्वधर्मस्य सूक्ष्मां गतिमथाब्रवीत् ।
श्रद्दधानेन वै भाव्यं गच्छामि मिथिलामहम् ॥
फिर अपने धर्मकी सूक्ष्म गतिपर विचार करके वह मन-ही- मन बोला — ' मुझे ( उस सतीके कथनपर) श्रद्धा और विश्वास करना चाहिये; अतः मैं अवश्य मिथिला जाऊँगा ।
कौशिक कौतूहलवश मिथिलापुरी की ओर चल दिया। वह स्त्री तो बगुली पक्षी वाली घटना स्वयं जान गई थी और उसने धर्मानुकूल शुभ वचनों द्वारा उपदेश भी दे दिया था; इन कारणों से कौशिक ब्राह्मण की श्रद्धा बढ़ गई थी। वह अनेक जङ्गलों, गाँवों तथा नगरों को पार करता हुआ राजा जनक द्वारा सुरक्षित, धर्म की मर्यादा से व्याप्त और यज्ञ सम्बन्धी उत्सवों से सुशोभित सुन्दर मिथिलापुरी में जा पहुँचा। वह रमणीय पुरी अनेक विमानों से युक्त थी, जहाँ दुकानें उसके सौन्दर्य को बढ़ा रही थीं। बड़ी-बड़ी सड़कें शोभा पा रही थीं और नगर घोड़ों, रथों, हाथियों तथा सैनिकों के साथ हृष्ट-पुष्ट मनुष्यों से भरा हुआ था। वहाँ नित्य नाना प्रकार के उत्सव होते थे। ब्राह्मण ने पुरी में प्रवेश कर सब ओर घूम-घामकर उसे देखा।
वहाँ उसने लोगों से उस धर्मव्याध का पता पूछा, तो ब्राह्मणों ने उसे उसका स्थान बता दिया। कौशिक जब वहाँ पहुँचा, तो उसने देखा कि वह तपस्वी धर्मव्याध एक कसाईखाने में बैठकर सूअर और भैंस आदि पशुओं का मांस बेच रहा है। वहाँ ग्राहकों की भारी भीड़ लगी थी, इसलिए कौशिक एकान्त में जाकर खड़ा हो गया। ब्राह्मण को आते देख व्याध सहसा शीघ्रता से उठ खड़ा हुआ और उस स्थान पर आया जहाँ कौशिक खड़ा था।
व्याध बोला— 'भगवन्! मैं आपके चरणों में प्रणाम करता हूँ। द्विजश्रेष्ठ! आपका स्वागत है। मैं ही वह व्याध हूँ जिसकी खोज में आपने यहाँ तक आने का कष्ट किया है। आज्ञा दीजिए, मैं क्या सेवा करूँ? उस पतिव्रता देवी ने आपको जो मिथिला जाने के लिए भेजा है, वह सब मैं जानता हूँ और आप जिस उद्देश्य से यहाँ पधारे हैं, वह भी मुझे मालूम है।'
एकपत्न्या यदुक्तोऽसि गच्छ त्वं मिथिलामिति ।
जानाम्येतदहं सर्वं यदर्थं त्वमिहागतः ॥
उस पतिव्रता देवीने जो आपसे यह कहकर भेजा है कि ' तुम मिथिलापुरीको जाओ । ’ वह सब मैं जानता हूँ । आप जिस उद्देश्यसे यहाँ पधारे हैं, वह भी मुझे मालूम है ।
व्याध की बात सुनकर ब्राह्मण को बड़ा विस्मय हुआ। उसने मन ही मन सोचा— 'यह तो दूसरा आश्चर्य है!' इसके बाद व्याध ने कहा— 'भगवन्! यह स्थान आपके ठहरने योग्य नहीं है। अनघ! यदि आपकी रुचि हो, तो हम दोनों हमारे घर चलें।' यह सुनकर कौशिक को बड़ा हर्ष हुआ। उसने कहा— 'बहुत अच्छा, ऐसा ही करो।'
श्रुत्वा च तस्य तद् वाक्यं स विप्रो भृशविस्मितः ।
द्वितीयमिदमाश्चर्यमित्यचिन्तयत द्विजिः ॥
व्याधकी वह बात सुनकर ब्राह्मणको बड़ा विस्मय हुआ । वह मन- ही - मन सोचने लगा —' यह दूसरा आश्चर्य दृष्टिगोचर हुआ है '
व्याध ब्राह्मण को आगे करके अपने घर की ओर चला। उसका घर बहुत सुन्दर था। वहाँ पहुँचकर व्याध ने ब्राह्मण को बैठने के लिए आसन दिया और अर्घ्य देकर आदर सहित पूजा की। सुखपूर्वक बैठ जाने पर ब्राह्मण ने व्याध से कहा— 'तात! यह मांस बेचने का काम निश्चय ही तुम्हारे योग्य नहीं है। मुझे तो तुम्हारे इस घोर कर्म से बहुत सन्ताप हो रहा है।' \स्थ व्याध बोला— 'ब्रह्मन्! यह काम मेरे बाप-दादों के समय से होता चला आ रहा है। मेरे कुल के लिए जो उचित है, वही धन्धा मैंने अपनाया है। मैं अपने धर्म का ही पालन कर रहा हूँ; अतः आप मुझ पर क्रोध न करें। विधाता ने इस कुल में जन्म देकर मेरे लिए जो कार्य प्रस्तुत किया है, उसका पालन करते हुए मैं अपने बूढ़े माता-पिता की बड़े यत्न से सेवा करता रहता हूँ। मैं सत्य बोलता हूँ, किसी की निन्दा नहीं करता और अपनी शक्ति के अनुसार दान भी करता हूँ। देवताओं, अतिथियों तथा भरण-पोषण के योग्य कुटुम्बीजनों और सेवकों को भोजन देकर जो बचता है, उसी से शरीर का निर्वाह करता हूँ। द्विजश्रेष्ठ! मैं किसी के दोषों की चर्चा नहीं करता और अपने से बलिष्ठ पुरुष की निन्दा नहीं करता; क्योंकि पहले के किए हुए शुभाशुभ कर्मों का परिणाम स्वयं कर्ता को ही भोगना पड़ता है।'
मार्कण्डेय जी ने युधिष्ठिर से कहा— "हे राजन्! जब कौशिक ब्राह्मण उस साध्वी स्त्री के उपदेशों को सुनकर आत्म-ग्लानि से भर गए, तब उन्होंने स्वयं के भीतर उठते सन्ताप को शान्त करने हेतु मिथिलापुरी जाने का सङ्कल्प लिया। वे धर्मज्ञ व्याध से संवाद कर सत्य की खोज करना चाहते थे।"
कौशिक ब्राह्मण जब मिथिलापुरी पहुँचे, तो वहाँ के दृश्य अत्यन्त भव्य और उत्सवपूर्ण थे। नगर की समृद्धि देखते ही बनती थी। चलते-चलते उन्होंने वहाँ के शासन और व्यवस्था का अवलोकन किया। वहाँ के लोगों ने उन्हें बताया कि यह राजा जनक का नगर है। यहाँ चारों वर्णों के लोग अपने-अपने निर्धारित कर्मों में लीन हैं। कोई कृषि करता है, कोई गोरक्षा में लगा है, तो कोई वाणिज्य। ब्राह्मण ने देखा कि यहाँ कोई भी अपने वर्ण-धर्म के विरुद्ध आचरण नहीं करता। राजा जनक अत्यन्त न्यायप्रिय शासक हैं; वे दुराचारी को—चाहे वह उनका अपना पुत्र ही क्यों न हो—दण्ड देते हैं और धर्मात्माओं को कभी कष्ट नहीं होने देते। राजा ने पूरे राज्य में गुप्तचर लगा रखे हैं ताकि प्रजा का धर्मानुसार पालन सुनिश्चित हो सके। यहाँ के राजा प्रजा को अपने पिता की भाँति पालते हैं और सबको उनके स्वधर्म में तत्पर रहने हेतु अनुग्रहित करते हैं।
स एष जनको राजा दुर्वृत्तमपि चेत् सुतम् ।
दण्ड्यं दण्डे निक्षिपति तथा न ग्लाति धार्मिकम् ॥
ये राजा जनक दुराचारीको, वह अपना पुत्र ही क्यों न हो, दण्डनीय मानकर दण्ड देते ही हैं तथा किसी भी धर्मात्माको कष्ट नहीं पहुँचने देते हैं ।
कौशिक ब्राह्मण आगे बढ़े और उन्होंने एक ऐसे व्यक्ति का पता पूछा जो मांस का व्यापार करता था। वे उस धर्मव्याध के पास पहुँचे जो कसाईखाने में पशुओं का मांस बेच रहा था। व्याध को देखते ही कौशिक ब्राह्मण के मन में सन्ताप जाग उठा। उन्होंने व्याध के इस हिंसक कर्म को देखकर दुख प्रकट किया।
व्याध ने शान्त भाव से उत्तर दिया— "द्विजश्रेष्ठ! मैं स्वयं किसी जीव की हिंसा नहीं करता। मैं तो केवल दूसरों के मारे हुए सूमरों और भैंसों का मांस बेचता हूँ। मैं स्वयं कभी मांस नहीं खाता। मैं ऋतुकाल प्राप्त होने पर ही पत्नी के सान्निध्य में जाता हूँ। मैं दिन में उपवास रखता हूँ और रात्रि में भोजन करता हूँ।"
परेण हि हतान् ब्रह्मन् वराहमहिषानहम् ।
न स्वयं हन्मि विप्रर्षे विक्रीणामि सदा त्वहम् ॥
ब्रह्मन्! मैं स्वयं किसी जीवकी हिंसा नहीं करता । सदा दूसरोंके मारे हुए सूअर और भैसोंका मांस बेचता हूँ ।
व्याध ने आगे कहा— "ब्राह्मण देव! शील से रहित पुरुष भी यदि सदाचार अपना ले, तो वह पुनः धर्मात्मा हो सकता है। इस संसार में राजाओं के व्यभिचार-दोष से धर्म सङ्कीर्ण हो जाता है और अधर्म बढ़ने लगता है, जिससे प्रजा में वर्ण-सङ्करता आ जाती है। उस अवस्था में भयङ्कर आकृति वाले, बौने, कुबड़े, मोटे मस्तक वाले, नपुंसक, अन्धे, बहरे और अधिक ऊँचे नेत्रों वाले मनुष्य उत्पन्न होते हैं। किन्तु हमारे राजा जनक समस्त प्रजा को धर्मपूर्ण दृष्टि से देखते हैं। वे अपनी शक्ति के अनुसार दूसरों को अन्न देते हैं, कष्ट सहते हैं और धर्म में दृढ़ रहते हैं।"
व्यभिचारान्नरेन्द्राणां धर्मः संकीर्यते महान् ।
अधर्मो वर्धते चापि संकीर्यन्ते ततः प्रजाः ॥
राजाओंके व्यभिचार- दोषसे धर्म अत्यन्त संकीर्ण हो जाता है और अधर्म बढ़ जाता है, इससे प्रजामें वर्णसंकरता आ जाती है ।
कौशिक ब्राह्मण ने जिज्ञासावश पूछा— "हे नरश्रेष्ठ! मुझे शिष्टाचार का ज्ञान कैसे हो?"
व्याध ने उत्तर दिया— "महामते व्याध! यदि आप जानना चाहते हैं, तो सुनिए। यज्ञ, दान, तपस्या, वेदों का स्वाध्याय और सत्यभाषण—ये पाँच पवित्र वस्तुएँ शिष्ट पुरुषों के आचार में सदा देखी जाती हैं। जो मनुष्य काम, क्रोध, लोभ, दम्भ और कुटिलता को वश में करके केवल धर्म को अपना लेते हैं, वही वास्तव में शिष्ट कहलाते हैं।"
कामक्रोधौ वशे कृत्वा दम्भं लोभमनार्जवम् ।
धर्ममित्येव संतुष्टास्ते शिष्टाः शिष्टसम्मताः ॥
जो काम, क्रोध, लोभ, दम्भ और कुटिलताको वशमें करके केवल धर्मको ही अपनाकर संतुष्ट रहते हैं, वे शिष्ट कहलाते हैं और उन्हींका शिष्ट पुरुष आदर करते हैं ।
व्याध ने अपनी बात जारी रखते हुए कहा— "वेद का सार सत्य है, सत्य का सार इन्द्रिय-संयम है और संयम का सार त्याग है। जो लोग बुद्धिमोहवश धर्म में दोष देखते हैं, वे स्वयं कुमार्गगामी होते हैं। शिष्ट पुरुष सदा नियमित जीवन व्यतीत करते हैं और सत्यधर्म को ही अपना परम आश्रय मानते हैं। हे द्विज! यह शरीर एक नदी के समान है, जिसमें पाँच इन्द्रियाँ जल हैं और काम-लोभ रूपी मगर भरे पड़े हैं। जन्म और मृत्यु के दुर्गम प्रदेश में यह नदी बह रही है; तुम धैर्य की नाव पर बैठकर इन क्लेशों को पार कर जाओ।"
ये तु शिष्टाः सुनियताः श्रुतित्यागपरायणाः ।
धर्मपन्थानमारूढाः सत्यधर्मपरायणाः ॥
जो शिष्ट हैं वे सदा ही नियमित जीवन व्यतीत करते हैं, वेदोंके स्वाध्यायमें तत्पर और त्यागी होते हैं । धर्मके मार्गपर ही चलते हैं और सत्यधर्मको ही अपना परम आश्रय मानते हैं ।
व्याध ने आगे समझाया— "अहिंसा सबसे महान धर्म है, जो सत्य में प्रतिष्ठित है। शिष्ट पुरुषों के आचार में सत्य ही सबसे गौरवशाली है। जो मनुष्य क्रोध का त्याग करते हैं, दूसरों के दोष नहीं देखते और जिनमें अहङ्कार व ईर्ष्या का अभाव है, वे ही वास्तव में शिष्टाचारी कहलाते हैं। जो तीनों वेदों के विद्वानों में श्रेष्ठ, पवित्र, सदाचारी और जितेन्द्रिय हैं, वही सच्चे शिष्ट हैं।"
अहिंसा सत्यवचनं सर्वभूतहितं परम् ।
अहिंसा परमो धर्मः स च सत्ये प्रतिष्ठितः ।
सत्ये कृत्वा प्रतिष्ठां तु प्रवर्तन्ते प्रवृत्तयः ॥
अहिंसा और सत्यभाषण- ये समस्त प्राणियोंके लिये अत्यन्त हितकर हैं । अहिंसा सबसे महान् धर्म है, परंतु वह सत्यमें ही प्रतिष्ठित है । सत्यके ही आधारपर श्रेष्ठ पुरुषोंके सभी कार्य आरम्भ होते हैं ।
मार्कण्डेय जी ने युधिष्ठिर से कहा—"हे कुन्तीपुत्र! विप्रवर! मैंने शिष्टाचार के गुणों के सम्बन्ध में जो कुछ जाना और सुना है, वह सब आपसे कह सुनाया है।
जो सत्त्वगुणसे सम्पन्न हैं, जिनके आचार और कर्म पापियोंके लिये कठिन हैं तथा जो संसारमें अपने सत्कर्मोंके द्वारा सत्कृत हैं, उनके हिंसा आदि दोष स्वतः नष्ट हो जाते हैं। जिसका श्रेष्ठ पुरुषोंने पालन किया है, जो अनादि, सनातन और नित्य है, उस धर्मको धर्मदृष्टिसे ही देखनेवाले मनीषी पुरुष स्वर्गलोकमें जाते हैं। जो आस्तिक, अहङ्कारशून्य, ब्राह्मणोंका समादर करनेवाले, विद्वान् और सदाचारसे सम्पन्न हैं, वे श्रेष्ठ पुरुष स्वर्गमें निवास करते हैं।
तं सदाचारमाश्चर्यं पुराणं शाश्वतं ध्रुवम् ।
धर्मं धर्मेण पश्यन्तः स्वर्ग यान्ति मनीषिणः ॥
जिसका श्रेष्ठ पुरुषोंने पालन किया है, जो अनादि, सनातन और नित्य है, उस धर्मको धर्मदृष्टिसे ही देखनेवाले मनीषी पुरुष स्वर्गलोकमें जाते हैं ।
वेदोक्तः परमो धर्मो धर्मशास्त्रेषु चापरः । शिष्टाचारश्च शिष्टानां त्रिविधं धर्मलक्षणम् ॥ अर्थात्, जिसका वेदोंमें वर्णन है, वह धर्मका पहला लक्षण है; धर्मशास्त्रोंमें जिसका प्रतिपादन किया गया है, वह दूसरा लक्षण है और शिष्टाचार धर्मका तीसरा लक्षण है। क्षमा सत्यार्जवं शौचं सतामाचारदर्शनम् — सब विद्याओंका अध्ययन, सब तीर्थोंमें स्नान, क्षमा, सत्य, सरलता और शौच (पवित्रता) ये श्रेष्ठ पुरुषोंके आचारको लक्षित करानेवाले हैं। जो समस्त प्राणियोंपर दया करते, सदा अहिंसा-धर्मके पालनमें तत्पर रहते और कभी किसीसे कटु वचन नहीं बोलते, ऐसे सन्त सदा समस्त द्विजोंके प्रिय होते हैं। जो शुभ और अशुभ कर्मोंके फलसञ्चयसे सम्बन्ध रखनेवाले परिणामको जानते हैं, वे शिष्ट कहे गये है और शिष्ट पुरुषोंमें उनका समादर होता है।
जो न्यायपरायण, सद्गुणसम्पन्न, सब लोगोंका हित चाहनेवाले, हिंसारहित और सन्मार्गपर चलनेवाले हैं, वे श्रेष्ठ पुरुष स्वर्गलोकपर विजय पाते हैं। जो सबको दान देनेवाले, अपने कुटुम्बीजनोंमें प्रत्येक वस्तुको समानरूपसे बाँटकर उसका उपयोग करनेवाले, दीनजनोंपर कृपाभाव बनाये रखनेवाले, शास्त्रज्ञानके धनी, सबके लिये समादरणीय, तपस्वी और समस्त प्राणियोंके प्रति दयालु हैं, वे श्रेष्ठ पुरुषोंद्वारा सम्मानित शिष्ट कहे गये हैं। जो दानसे अवशिष्ट वस्तुका उपयोग करनेवाले हैं, वे श्रेष्ठ पुरुष इस लोकमें सम्पत्ति और परलोकमें सुखमय लोक प्राप्त करते हैं। शिष्ट पुरुषोंके पास जब उत्तम पुरुष कुछ माँगनेके लिये पधारते हैं, उस समय वे अपनी स्त्री तथा कुटुम्बी जनोंको कष्ट देकर सभी मनोयोगपूर्वक अपनी शक्तिसे अधिक दान देते हैं।
दातारः संविभक्तारो दीनानुग्रहकारिणः ॥
सर्वपूज्याः श्रुतधनास्तथैव च तपस्विनः ।
सर्वभूतदयावन्तस्ते शिष्टाः शिष्टसम्मताः ॥
जो सबको दान देनेवाले, अपने कुटुम्बीजनोंमें प्रत्येक वस्तुको समानरूपसे बाँटकर उसका उपयोग करनेवाले, दीनजनोंपर कृपाभाव बनाये रखनेवाले, शास्त्रज्ञानके धनी, सबके लिये समादरणीय, तपस्वी और समस्त प्राणियोंके प्रति दयालु हैं, वे श्रेष्ठ पुरुषोंद्वारा सम्मानित शिष्ट कहे गये हैं ।
न्यायपूर्वक लोकयात्राका निर्वाह कैसे हो? धर्मकी रक्षा और आत्माका कल्याण किस प्रकार हो? इन्हीं बातोंकी ओर उनकी दृष्टि रहती है। ऐसा बर्ताव करनेवाले सन्त पुरुष अनन्त कालतक उन्नतिकी ओर अग्रसर होते रहते हैं। जो अहिंसा, सत्यभाषण, कोमलता, सरलता, अद्रोह, अहङ्कारका त्याग, लज्जा, क्षमा, शम, दम—इन गुणोंसे युक्त बुद्धिमान, धैर्यवान् समस्त प्राणियोंपर अनुग्रह करनेवाले तथा राग-द्वेषसे रहित हैं, वे सन्त सम्पूर्ण लोकोंके लिये प्रमाणभूत हैं। त्रीण्येव तु पदान्याहुः सतां व्रतमनुत्तमम् — श्रेष्ठ पुरुष तीन ही पद बताते हैं: किसीसे द्रोह न करे, दान करे और सदा सत्य ही बोले। यह श्रेष्ठ पुरुषोंका सर्वोत्तम व्रत है। जो सर्वत्र दया करते हैं, जिनके हृदयमें करुणाकी अनुभूति होती है, वे श्रेष्ठ पुरुष इस लोकमें अत्यन्त सन्तुष्ट रहकर धर्मके उत्तम पथपर चलते हैं। कर्म च श्रुतसम्पन्नं सतां मार्गमनुत्तमम् — दोषदृष्टिका अभाव, क्षमा, शान्ति, सन्तोष, प्रियभाषण और काम-क्रोधका त्याग, शिष्टाचारका सेवन और शास्त्रके अनुकूल कर्म करना ही श्रेष्ठ पुरुषोंका अति उत्तम मार्ग है।
गच्छन्तीह सुसंतुष्टा धर्मपन्थानमुत्तमम् ।
शिष्टाचारा महात्मानो येषां धर्मः सुनिश्चितः ॥
जो सर्वत्र दया करते हैं, जिनके हृदयमें करुणाकी अनुभूति होती है, वे श्रेष्ठ पुरुष इस लोकमें अत्यन्त संतुष्ट रहकर धर्मके उत्तम पथपर चलते हैं । जिन्होंने धर्मको अपनाये रखनेका दृढ़ निश्चय कर लिया है, वे ही महात्मा सदाचारी हैं ।
अतिपुण्यानि पापानि तानि द्विजवरोत्तम! जो धर्मात्मा पुरुष सदा शिष्टाचारका सेवन करते हैं और प्रज्ञारूपी प्रासादपर आरूढ़ हो भाँति-भाँतिके लोकचरित्रोंका निरीक्षण तथा अत्यन्त पुण्य एवं पापकर्मोंकी समीक्षा करते हैं, वे महान् भयसे मुक्त हो जाते हैं।
शिष्टाचारं निषेवन्ते नित्यं धर्ममनुव्रताः ॥
प्रज्ञाप्रासादमारुह्य मुच्यन्ते महतो भयात् ।
प्रेक्षन्तो लोकवृत्तानि विविधानि द्विजोत्तम ॥
अतिपुण्यानि पापानि तानि द्विजवरोत्तम । द्विजश्रेष्ठ! जो धर्मात्मा पुरुष सदा शिष्टाचारका सेवन करते हैं और प्रज्ञारूपी प्रासादपर आरूढ़ हो भाँति- भाँतिके लोकचरित्रोंका निरीक्षण तथा अत्यन्त पुण्य एवं पापकर्मोंकी समीक्षा करते हैं, वे महान् भयसे मुक्त हो जाते हैं ।
मार्कण्डेय जी ने कहा—हे विप्रवर! तदनन्तर धर्मव्याधने कौशिक ब्राह्मणसे कहा—'मैं जो यह मांस बेचनेका व्यवसाय कर रहा हूँ, वास्तवमें यह अत्यन्त घोर कर्म है, इसमें संशय नहीं है। किन्तु ब्रह्मन्! दैव बलवान् है। पूर्वजन्ममें किये हुए कर्मका ही नाम दैव है। उससे पार पाना बहुत कठिन है। यह जो कर्मदोषजनित व्याधके घर जन्म हुआ है, यह मेरे पूर्वजन्ममें किये हुए पापका ही फल है। मैं इस दोषके निवारणके लिये प्रयत्नशील हूँ। क्योंकि विधाताके द्वारा पहलेसे ही जीवकी मृत्यु निश्चित की जाती है; किन्तु घातक (कसाई) उसमें निमित्त बन जाता है जो स्वेच्छासे ज्ञानपूर्वक जीवहिंसा करता है, वह घातक व्यर्थ ही निमित्त बनकर दोषका भागी होता है।
पूर्वं हि विहितं कर्म देहिनं न विमुञ्चति ।
धात्रा विधिरयं दृष्टो बहुधा कर्मनिर्णये ॥
' पहलेका किया हुआ कर्म देहधारी मनुष्यको नहीं छोड़ता है। बहुधा कर्मका निर्णय करते समय विधाताने इसी विधिको अपने सामने रखा है ।
द्विजश्रेष्ठ! इस कार्यमें हम निमित्तमात्र हैं। ब्रह्मन्! मैं जिन मारे गये प्राणियोंका मांस बेचता हूँ, उनके जीते-जी यदि उनका सदुपयोग किया जाता तो बड़ा धर्म होता। मांस-भक्षणमें तो धर्मका नाम भी नहीं है, वह तो महान् अधर्म है; जबकि देवता, अतिथि, भरणीय कुटुम्बीजन और पितरोंका पूजन अवश्य धर्म है। ओषधियाँ, अन्न, तृण, लता, पशु, मृग और पक्षी आदि सभी वस्तुएँ सम्पूर्ण प्राणियोंके अनादि-कालसे उपयोगमें आती रहती हैं—ऐसी श्रुति भी सुनी जाती है।
द्विजश्रेष्ठ! उशीनरके पुत्र क्षमाशील राजा शिबिने एक भूखे बाजको कबूतरके बदले अपने शरीरका मांस अर्पित कर दिया था और उसीके प्रसादसे उन्हें परम दुर्लभ स्वर्गलोककी प्राप्ति हुई थी। विप्रवर! मैं अपना स्वधर्म समझकर यह धन्धा नहीं छोड़ रहा हूँ, क्योंकि मेरे पूर्वज यही करते आये हैं। ब्रह्मन्! अपने कर्मका परित्याग करनेवालेको यहाँ अधर्मकी प्राप्ति देखी जाती है; जो अपने कर्ममें तत्पर है, उसीका बर्ताव धर्मपूर्ण है—ऐसा सिद्धान्त है।
पहलेका किया हुआ कर्म देहधारी मनुष्यको नहीं छोड़ता है। बहुधा कर्मका निर्णय करते समय विधाताने इसी विधिको अपने सामने रखा है। जो क्रूर कर्ममें लगा हुआ है, उसे सदा यह सोचते रहना चाहिये कि 'मैं कैसे शुभ कर्म करूँ और किस प्रकार इस निन्दित कर्मसे छुटकारा पाऊँ?' बार-बार ऐसा करनेसे उस घोर कर्मसे छूटनेके विषयमें कोई निश्चित उपाय प्राप्त हो जाता है। द्विजश्रेष्ठ! मैं दान, सत्यभाषण, गुरुसेवा, ब्राह्मणपूजन तथा धर्मपालनमें सदा तत्पर रहकर अभिमान और अतिवादसे दूर रहता हूँ।
कर्मणस्तस्य घोरस्य बहुधा निर्णयो भवेत् ।
दाने च सत्यवाक्ये च गुरुशुश्रूषणे तथा ॥
द्विजातिपूजने चाहं धर्मे च निरतः सदा ।
अभिमानातिवादाभ्यां निवृत्तोऽस्मि द्विजोत्तम ॥
‘ बार- बार ऐसा करनेसे उस घोर कर्मसे छूटनेके विषयमें कोई निश्चित उपाय प्राप्त हो जाता है । द्विजश्रेष्ठ! मैं दान, सत्यभाषण, गुरुसेवा, ब्राह्मणपूजन तथा धर्मपालनमें सदा तत्पर रहकर अभिमान और अतिवादसे दूर रहता हूँ ।
कुछ लोग खेतीको उत्तम मानते हैं, परन्तु उसमें भी बहुत बड़ी हिंसा होती है; हल चलानेवाले मनुष्य धरतीके भीतर शयन करनेवाले बहुत- से प्राणियोंकी हत्या कर डालते हैं। इनके सिवा और भी बहुत- से जीवोंका वध वे करते रहते हैं। द्विजश्रेष्ठ! धान आदि जितने अन्नके बीज हैं, वे सब-के-सब जीव ही हैं; अतः इस विषयमें आप क्या समझते हैं? विप्रवर! कितने ही मनुष्य पशुओंपर आक्रमण करके उन्हे मारते और खाते हैं। वृक्षों तथा ओषधियों को काटते हैं; वृक्षों और फलोंमें भी बहुत- से जीव रहते हैं। जलमें भी नाना प्रकारके जीव रहते हैं। ब्रह्मन्! उनके विषयमें आप क्या समझते हैं?
अध्याक्रम्य पशूंश्चापि घ्नन्ति वै भक्षयन्ति च ।
वृक्षांस्तथौषधीश्चापि छिन्दन्ति पुरुषा द्विज ॥
जीवा हि बहवो ब्रह्मन् वृक्षेषु च फलेषु च ।
उदके बहवश्चापि तत्र किं प्रतिभाति ते ॥
' विप्रवर! कितने ही मनुष्य पशुओंपर आक्रमण करके उन्हे मारते और खाते हैं । वृक्षों तथा ओषधियों ( अन्तके पौधों ) को काटते हैं । वृक्षों और फलोंमें भी बहुत - से जीव रहते हैं । जलमें भी नाना प्रकारके जीव रहते हैं । ब्रह्मन्! उनके विषयमें आप क्या समझते हैं?
जीवोंसे ही जीवन-निर्वाह करनेवाले जीवोंद्वारा यह सारा जगत् व्याप्त है। मत्स्य मत्स्योंतकको अपना ग्रास बना लेते हैं। द्विजश्रेष्ठ! बहुधा जीव जीवोंसे ही जीवन धारण करते हैं और प्राणी स्वयं ही एक-दूसरेको अपना आहार बना लेते हैं। मनुष्य चलते-फिरते समय धरतीके बहुत- से जीव-जन्तुओंको अनजाने में पैरोंसे मार देते हैं। ब्रह्मन्! ज्ञान-विज्ञानसम्पन्न पुरुष भी बैठते-सोते समय अनेक जीवोंकी हिंसा कर बैठते हैं। आकाशसे लेकर पृथ्वीतक यह सारा जगत् जीवोंसे भरा हुआ है। कितने ही मनुष्य अनजानमें भी जीवहिंसा करते हैं।
बहु लोके विपर्यस्तं दृश्यते द्विजसत्तम ।
धर्मयुक्तमधर्मं च तत्र किं प्रतिभाति ते ॥
‘द्विजश्रेष्ठ! इस प्रकार जगत्में अनेक उलटी बातें दिखायी देती हैं । अधर्म भी धर्मसे युक्त प्रतीत होता है । इस विषयमें आप क्या समझते हैं?
पूर्वकालके अभिमानशून्य श्रेष्ठ पुरुषोंने जो अहिंसाका उपदेश किया है, उसका तत्त्व समझना चाहिये; क्योंकि द्विजश्रेष्ठ! स्थूल दृष्टिसे देखा तो इस संसारमें कौन जीवहिंसा नहीं करते हैं? यतिलोग अहिंसा-धर्मके पालनमें तत्पर रहते हैं, परन्तु वे भी हिंसा कर ही डालते हैं। अवश्य ही यत्नपूर्वक चेष्टा करनेसे हिंसाकी मात्रा बहुत कम हो सकती है।
ब्रह्मन्! उत्तम कुलमें उत्पन्न और परम सद्गुणसम्पन्न पुरुष भी अत्यन्त भयानक कर्म करके लज्जाका अनुभव करते ही हैं। मित्र दूसरे मित्रोंको और शत्रु अपने शत्रुओंको, वे अच्छे कर्ममें लगे हुए हों तो भी अच्छी दृष्टिसे नहीं देखते। बन्धु-बान्धव अपने समृद्धिशाली बान्धवोंसे भी प्रसन्न नहीं रहते। अपनेको पण्डित माननेवाले मूढ़ मनुष्य गुरुजनोंकी भी निन्दा करते हैं।
द्विजश्रेष्ठ! इस प्रकार जगत्में अनेक उलटी बातें दिखायी देती हैं; अधर्म भी धर्मसे युक्त प्रतीत होता है। जो अपने कुलोचित कर्ममें लगा हुआ है, वही महान् यशका भागी होता है।"
In English
The Story of Kaushika and the Hunter
Yudhisthira asks Markandeya about the virtues of devoted wives. Markandeya tells a story about a Brahmin named Kaushika who learns about dharma through a woman's devotion and a hunter in Mithila.
This page answers
- What did the woman tell kaushika?
- Why did the heron die?
- Who is the dharma vyadha in mithila?
- How does a devoted wife serve her husband?
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