श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड २ — पृष्ठ 1431–1440
महाभारत — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1431–1440
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जितेन्द्रियो धर्मपरः स्वाध्यायनिरतः शुचिः ॥ ३४ ॥
कामक्रोधौ वशौ यस्य तं देवा ब्राह्मणं विदुः । जो जितेन्द्रिय, धर्मपरायण, स्वाध्यायतत्पर और पवित्र है तथा काम और क्रोध जिसके वशमें है, उसे देवतालोग ब्राह्मण मानते हैं ॥ ३४ ॥
यस्य चात्मसमो लोको धर्मज्ञस्य मनस्विनः ॥ ३५ ॥
सर्वधर्मेषु च रतस्तं देवा ब्राह्मणं विदुः । जिस धर्मज्ञ एवं मनस्वी पुरुषका सम्पूर्ण जगत्के प्रति आत्मभाव है तथा सभी धर्मोंपर जिसका समान अनुराग है, उसे देवतालोग ब्राह्मण मानते हैं ॥ ३५३ ॥
योऽध्यापयेदधीयीत यजेद् वा याजयीत वा ॥ ३६ ॥
दद्याद् वापि यथाशक्ति तं देवा ब्राह्मणं विदुः । जो पढ़े और पढ़ाये, यज्ञ करे और कराये तथा यथाशक्ति दान दे, उसे देवतालोग ब्राह्मण कहते हैं ॥ ब्रह्मचारी वदान्यो योऽधीयीत द्विजपुङ्गवः ॥ ३७ ॥
स्वाध्यायवानमत्तो वै तं देवा ब्राह्मणं विदुः । जो द्विजश्रेष्ठ ब्रह्मचर्यका पालन करे, उदार बने, वेदोंका अध्ययन करे और सतत सावधान रहकर स्वाध्यायमें ही लगा रहे, उसे देवतालोग ब्राह्मण मानते हैं ॥ ३७ ॥
यद् ब्राह्मणानां कुशलं तदेषां परिकीर्तयेत् ॥ ३८ ॥
सत्यं तथा व्याहरतां नानृते रमते मनः । ब्राह्मणके लिये जो हितकर कर्म हो, उसीका उनके सामने वर्णन करना चाहिये । सत्य बोलनेवाले लोगोंका मन कभी असत्यमें नहीं लगता ॥ ३८३ ॥
धर्मं तु ब्राह्मणस्याहुः स्वाध्यायं दममार्जवम् ॥ ३ ९ ॥ इन्द्रियाणां निग्रहं च शाश्वतं द्विजसत्तम । द्विजश्रेष्ठ! स्वाध्याय मनोनिग्रह, सरलता और इन्द्रियनिग्रह –ये ब्राह्मणके लिये सनातनधर्म कहे गये हैं ॥ ३ ९ ॥ सत्यार्जवे धर्ममाहुः परं धर्मविदो जनाः ॥ ४० ॥
दुर्ज्ञेयः शाश्वतो धर्मः स च सत्ये प्रतिष्ठितः ।
श्रुतिप्रमाणो धर्मः स्यादिति वृद्धानुशासनम् ॥ ४१ ॥
धर्मज्ञ पुरुष सत्य और सरलताको सर्वोत्तम धर्म बताते हैं । सनातनधर्मके स्वरूपको जानना तो अत्यन्त कठिन है, परंतु वह सत्यमें प्रतिष्ठित है । जो वेदोंके द्वारा प्रमाणित हो, वही धर्म है — यह वृद्ध पुरुषोंका उपदेश है ॥ ४०-४१ ॥
बहुधा दृश्यते धर्मः सूक्ष्म एव द्विजोत्तम ।
भवानपि च धर्मज्ञः स्वाध्यायनिरतः शुचिः ॥ ४२ ॥
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द्विजश्रेष्ठ! बहुधा धर्मका स्वरूप सूक्ष्म ही देखा जाता है । तुम भी धर्मज्ञ, स्वाध्यायपरायण और पवित्र हो ॥ ४२ ॥
न तु तत्त्वेन भगवन् धर्म वेत्सीति मे मतिः ।
यदि विप्र न जानीषे धर्म परमकं द्विज ॥ ४३ ॥
धर्मव्याधं ततः पृच्छ गत्वा तु मिथिलां पुरीम् । भगवन्! तो भी मेरा विचार यह है कि तुम्हें धर्मका यथार्थ ज्ञान नहीं है । विप्रवर! यदि तुम परम धर्म क्या है, यह नहीं जानते तो मिथिलापुरीमें धर्मव्याधके पास जाकर पूछो ॥ ४३३ ॥
मातापितृभ्यां शुश्रूषुः सत्यवादी जितेन्द्रियः ॥ ४४ ॥
मिथिलायां वसेद् व्याधः स ते धर्मान् प्रवक्ष्यति ।
तत्र गच्छस्व भद्रं ते यथाकामं द्विजोत्तम ॥ ४५ ॥
मिथिलामें एक व्याध रहता है, जो माता - पिताका सेवक, सत्यवादी और जितेन्द्रिय है, वह तुम्हें धर्मका उपदेश करेगा। द्विजश्रेष्ठ! तुम अपनी रुचिके अनुसार वहीं जाओ, तुम्हारा मंगल हो ॥ ४४-४५ ॥
अत्युक्तमपि मे सर्वं क्षन्तुमर्हस्यनिन्दित ।
स्त्रियो ह्यवध्याः सर्वेषां ये च धर्मविदो जनाः ॥ ४६ ॥
अनिन्दनीय ब्राह्मण! यदि मेरे मुखसे कोई अनुचित बातें निकल गयी हों तो उन सबके लिये मुझे क्षमा करें; क्योंकि जो धर्मज्ञ पुरुष हैं, उन सबकी दृष्टिमें स्त्रियाँ अदण्डनीय हैं ॥ ४६ ॥
ब्राह्मणउवाच प्रीतोऽस्मि तव भद्रं ते गतः क्रोधश्च शोभने ।
उपालम्भस्त्वयात्युक्तो मम निःश्रेयसं परम् ।
स्वस्ति तेऽस्तु गमिष्यामि साधयिष्यामि शोभने ॥ ४७ ॥
( धन्या त्वमसि कल्याणि यस्यास्ते वृत्तमीदृशम् । ) ब्राह्मण बोला - शुभे! तुम्हारा भला हो । मैं तुमपर बहुत प्रसन्न हूँ। मेरा सारा दूर हो गया । तुमने जो उलाहना दिया है, वह अनुचित वचन नहीं, मेरे लिये परम कल्याणकारी
है । शोभने! तुम्हारा कल्याण हो । अब मैं जाऊँगा और अपना कार्यसाधन करूँगा ।
कल्याणि! तुम धन्य हो, जिसका सदाचार इतनी उच्चकोटिका है ॥ ४७ ॥
मार्कण्डेय उवाच
तया विसृष्टी निर्गम्य स्वमेव भवनं ययौ ।
विनिन्दन् स स्वमात्मानं कौशिको द्विजसत्तमः ॥ ४८ ॥
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मार्कण्डेयजी कहते हैं - युधिष्ठिर! उस साध्वी स्त्रीसे विदा लेकर वह द्विजश्रेष्ठ कौशिक अपने आत्माकी निन्दा करता हुआ अपने घरको लौट गया ॥ ४८ ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमास्यापर्वणि पतिव्रतोपाख्याने षडधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २०६ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत मार्कण्डेयसमास्यापर्वमें पतिव्रतोपाख्यानविषयक दो सौ छठाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २०६ ॥
( दाक्षिणात्य अधिक पाठका श्लोक मिलाकर कुल ४८३ श्लोक हैं)
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सप्ताधिकद्विशततमोऽध्यायः कौशिकका धर्मव्याधके पास जाना, धर्मव्याधके द्वारा पतिव्रतासे प्रेषित जान लेनेपर कौशिकको आश्चर्य होना, धर्मव्याधके द्वारा वर्णधर्मका वर्णन, जनकराज्यकी प्रशंसा और शिष्टाचारका वर्णन मार्कण्डेय उवाच
चिन्तयित्वा तदाश्चर्यं स्त्रिया प्रोक्तमशेषतः ।
विनिन्दन् स स्वमात्मानमागस्कृत इवाबभौ ॥ १ ॥
मार्कण्डेयजी कहते हैं - युधिष्ठिर! उस पतिव्रता देवीकी कही हुई सारी बातोंपर विचार करके कौशिक ब्राह्मणको बड़ा आश्चर्य हुआ । वह अपने- आपको धिक्कारता हुआ अपराधी- सा जान पड़ने लगा ॥ १ ॥
चिन्तयानः स्वधर्मस्य सूक्ष्मां गतिमथाब्रवीत् ।
श्रद्दधानेन वै भाव्यं गच्छामि मिथिलामहम् ॥ २ ॥
फिर अपने धर्मकी सूक्ष्म गतिपर विचार करके वह मन-ही- मन बोला — ' मुझे ( उस सतीके कथनपर) श्रद्धा और विश्वास करना चाहिये; अतः मैं अवश्य मिथिला जाऊँगा ॥ २ ॥
कृतात्मा धर्मवित् तस्यां व्याधो निवसते किल ।
तं गच्छाम्यहमद्यैव धर्मं प्रष्टुं तपोधनम् ॥ ३ ॥
'कहते हैं, वहाँ एक पुण्यात्मा धर्मज्ञ व्याध निवास करता है । मैं उस तपोधन व्याधसे धर्मकी बात पूछनेके लिये आज ही उसके पास जाऊँगा ' ॥ ३ ॥
इति संचित्य मनसा श्रद्दधानः स्त्रिया वचः ।
बलाकाप्रत्ययेनासौ धर्म्येश्च वचनैः शुभैः ॥ ४ ॥
सम्प्रतस्थे स मिथिलां कौतूहलसमन्वितः । मन-ही- मन ऐसा निश्चय करके वह कौतूहलवश मिथिलापुरीकी ओर चल दिया । पतिव्रता स्त्री बगुली पक्षीवाली घटना स्वयं जान गयी थी और उसने धर्मानुकूल शुभ वचनोंद्वारा उपदेश दिया था, इन कारणोंसे उसकी बातोंपर कौशिक ब्राह्मणकी बड़ी श्रद्धा हो गयी थी ॥ ४३ ॥
अतिक्रामन्तरण्यानि ग्रामांश्च नगराणि च ॥ ५ ॥
ततो जगाम मिथिलां जनकेन सुरक्षिताम् ।
धर्मसेतुसमाकीर्णां यज्ञोत्सववतीं शुभाम् ॥ ६ ॥
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वह अनेकानेक जंगलों, गाँवों तथा नगरोंको पार करता हुआ राजा जनकके द्वारा सुरक्षित, धर्मकी मर्यादासे व्याप्त तथा यज्ञसम्बन्धी उत्सवोंसे सुशोभित सुन्दर मिथिलापुरीमें जा पहुँचा ॥ ५-६ ॥
गोपुराट्टालकवतीं हर्म्यप्राकारशोभनाम् ।
प्रविश्य नगरीं रम्यां विमानैर्बहुभिर्युताम् ॥ ७ ॥
पण्यैश्च बहुभिर्युक्तां सुविभक्तमहापथाम् ।
अश्वै रथैस्तथा नागैर्योधैश्च बहुभिर्युताम् ॥ ८ ॥
हृष्टपुष्टजनाकीर्णां नित्योत्सवसमाकुलाम् ।
सोऽपश्यद् बहुवृत्तान्तां ब्राह्मणः समतिक्रमन् ॥ ९ ॥
बहुत - से गोपुर, अट्टालिकाएँ, महल और चहारदीवारियाँ उस नगरकी शोभा बढ़ा रही थीं । वह रमणीय पुरी बहुत - से विमानोंसे युक्त थी तथा बहुत- सी दुकानें उस पुरीका सौन्दर्य बढ़ाती थीं । सुन्दर ढंगसे बनायी हुई बड़ी - बड़ी सड़कें शोभा पा रही थीं । बहुसंख्यक घोड़े, रथ, हाथी और सैनिकोंसे संयुक्त मिथिलापुरी हृष्ट -पुष्ट मनुष्योंसे भरी हुई थी । वहाँ नित्य नाना प्रकारके उत्सव होते रहते थे और अनेक प्रकारकी घटनाएँ घटित होती थीं । ब्राह्मणने उस पुरीमें प्रवेश करके सब ओर घूम - घामकर उसे अच्छी तरह देखा ॥
धर्मव्याधमपृच्छच्च स चास्य कथितो द्विजैः ।
अपश्यत् तत्र गत्वा तं सूनामध्ये व्यवस्थितम् ॥ १० ॥
मार्गमाहिषमांसानि विक्रीणन्तं तपस्विनम् ।
आकुलत्वाच्च क्रेतॄणामेकान्ते संस्थितो द्विजः ॥ ११ ॥
वहाँ उसने लोगोंसे धर्मव्याधका पता पूछा और ब्राह्मणोंने उसे उसका स्थान बता दिया । कौशिकने वहाँ जाकर देखा कि तपस्वी धर्मव्याध कसाईखानेमें बैठकर सूअर, भैंसे आदि पशुओंका मांस बेच रहा है । वहाँ ग्राहकोंकी भीड़ लगी हुई थी, इसलिये कौशिक एकान्तमें जाकर खड़ा हो गया ॥ १०-११ ॥
स तु ज्ञात्वा द्विजं प्राप्तं सहसा सम्भ्रमोत्थितः ।
आजगाम यतो विप्रः स्थित एकान्तदर्शने ॥ १२ ॥
ब्राह्मणको आया हुआ जानकर व्याध सहसा शीघ्रतापूर्वक उठ खड़ा हुआ और उस स्थानपर आ गया जहाँ ब्राह्मण एकान्त स्थानमें खड़ा था ॥ १२ ॥
व्याध उवाच
अभिवादये त्वां भगवन् स्वागतं ते द्विजोत्तम ।
अहं व्याधो हि भद्रं ते किं करोमि प्रशाधि माम् ॥ १३ ॥
व्याध बोला— भगवन्! मैं आपके चरणोंमें प्रणाम करता हूँ । द्विजश्रेष्ठ! आपका स्वागत है । मैं ही वह व्याध हूँ ( जिसकी खोजमें आपने यहाँतक आनेका कष्ट किया है ) ।
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आपका भला हो, आज्ञा दीजिये, मैं क्या सेवा करूँ? ॥ १३ ॥
एकपत्न्या यदुक्तोऽसि गच्छ त्वं मिथिलामिति ।
जानाम्येतदहं सर्वं यदर्थं त्वमिहागतः ॥ १४ ॥
उस पतिव्रता देवीने जो आपसे यह कहकर भेजा है कि ' तुम मिथिलापुरीको जाओ । ’ वह सब मैं जानता हूँ । आप जिस उद्देश्यसे यहाँ पधारे हैं, वह भी मुझे मालूम है ॥ १४ ॥
श्रुत्वा च तस्य तद् वाक्यं स विप्रो भृशविस्मितः ।
द्वितीयमिदमाश्चर्यमित्यचिन्तयत द्विजिः ॥ १५ ॥
व्याधकी वह बात सुनकर ब्राह्मणको बड़ा विस्मय हुआ । वह मन- ही - मन सोचने लगा —' यह दूसरा आश्चर्य दृष्टिगोचर हुआ है ' ॥ १५ ॥
अदेशस्थं हि ते स्थानमिति व्याधोऽब्रवीदिदम् ।
गृहं गच्छाव भगवन् यदि ते रोचतेऽनघ ॥ १६ ॥
इसके बाद व्याधने कहा- ' भगवन्! यह स्थान आपके ठहरनेयोग्य नहीं है । अनघ! यदि आपकी रुचि हो तो हम दोनों हमारे घरपर चलें ' ॥ १६ ॥
मार्कण्डेय उवाच
बाढमित्येव तं विप्रो हृष्टो वचनमब्रवीत् ।
अग्रतस्तु द्विजं कृत्वा स जगाम गृहं प्रति ॥ १७ ॥
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मार्कण्डेयजी कहते हैं - युधिष्ठिर! यह सुनकर ब्राह्मणको बड़ा हर्ष हुआ । उसने व्याधसे कहा — ' बहुत अच्छा, ऐसा ही करो । ' तब व्याध ब्राह्मणको आगे करके घरकी ओर चला ॥ १७ ॥
प्रविश्य च गृहं रम्यमासनेनाभिपूजितः ।
अर्घ्येण च स वै तेन व्याधेन द्विजसत्तमः ॥ १८ ॥
व्याधका घर बहुत सुन्दर था । वहाँ पहुँचकर उस व्याधने ब्राह्मणको बैठनेके लिये आसन दिया और अर्घ्य देकर उस श्रेष्ठ ब्राह्मणकी आदरसहित पूजा की ॥ १८ ॥
ततः सुखोपविष्टस्तं व्याधं वचनमब्रवीत् ।
कर्मैतद् वै न सदृशं भवतः प्रतिभाति मे ।
अनुतप्ये भृशं तात तव घोरेण कर्मणा ॥ १ ९ ॥
सुखपूर्वक बैठ जानेपर ब्राह्मणने व्याधसे कहा — ' तात! यह मांस बेचनेका काम निश्चय ही तुम्हारे योग्य नहीं है । मुझे तो तुम्हारे इस घोर कर्मसे बहुत संताप हो रहा है ' ॥ १ ९ ॥ व्याध उवाच
कुलोचितमिदं कर्म पितृपैतामहं परम् ।
वर्तमानस्य मे धर्मे स्वे मन्युं मा कृथा द्विज ॥ २० ॥
व्याध बोला — ब्रह्मन्! यह काम मेरे बाप -दादोंके समयसे होता चला आ रहा है । मेरे कुलके लिये जो उचित है वही धंधा मैंने भी अपनाया है । मैं अपने धर्मका ही पालन कर रहा हूँ; अतः आप मुझपर क्रोध न करें ॥ २० ॥
विधात्रा विहितं पूर्वं कर्म स्वमनुपालयन् ।
प्रयत्नाच्च गुरू वृद्धौ शुश्रूषेऽहं द्विजोत्तम ॥ २१ ॥
द्विजश्रेष्ठ! विधाताने इस कुलमें जन्म देकर मेरे लिये जो कार्य प्रस्तुत किया है, उसका पालन करता हुआ मैं अपने बूढ़े माता- पिताकी बड़े यत्नसे सेवा करता रहता हूँ ॥ २१ ॥
सत्यं वदे नाभ्यसूये यथाशक्ति ददामि च ।
देवतातिथिभृत्यानामवशिष्टेन वर्तये ॥ २२ ॥
सत्य बोलता हूँ। किसीकी निन्दा नहीं करता और अपनी शक्तिके अनुसार दान भी करता हूँ। देवताओं, अतिथियों और भरण - पोषणके योग्य कुटुम्बीजनों तथा सेवकोंको भोजन देकर जो बचता है उसीसे शरीरका निर्वाह करता हूँ ॥ २२ ॥
न कुत्सयाम्यहं किंचिन्न गर्हे बलवत्तरम् ।
कृतमन्वेति कर्तारं पुरा कर्म द्विजोत्तम ॥ २३ ॥
द्विजश्रेष्ठ! किसीके दोषोंकी चर्चा नहीं करता और अपनेसे बलिष्ठ पुरुषकी निन्दा नहीं करता, क्योंकि पहलेके किये हुए शुभाशुभ कर्मोंका परिणाम स्वयं कर्ताको ही भोगना पड़ता है ॥ २३ ॥
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कृषिगोरक्ष्यवाणिज्यमिह लोकस्य जीवनम् ।
दण्डनीतिस्त्रयी विद्या तेन लोको भवत्युत ॥ २४ ॥
कृषि, गोरक्षा, वाणिज्य, दण्डनीति और त्रयीविद्या- ऋक्, यजु, सामके अनुसार यज्ञादिका अनुष्ठान करना और कराना ये लोगोंकी जीविकाके साधन हैं। इनसे ही लौकिक और पारलौकिक उन्नति सम्भव होती है ॥ २४ ॥
कर्म शूद्रे कृषिर्वैश्ये संग्रामः क्षत्रिये स्मृतः ।
ब्रह्मचर्यं तपो मन्त्राः सत्यं च ब्राह्मणे सदा ॥ २५ ॥
शूद्रका कर्तव्य है सेवा- कर्म, वैश्यका कार्य है खेती और युद्ध करना क्षत्रियका कर्म माना गया है । ब्रह्मचर्य, तपस्या, मन्त्र जप, वेदाध्ययन तथा सत्यभाषण — ये सदा ब्राह्मणके पालन करनेयोग्य धर्म हैं ॥ २५ ॥
राजा प्रशास्ति धर्मेण स्वकर्मनिरताः प्रजाः ।
विकर्माणश्च ये केचित् तान् युनक्ति स्वकर्मसु ॥ २६ ॥
राजा अपने - अपने वर्णाश्रमोचित कर्ममें लगी हुई प्रजाका धर्मपूर्वक शासन करता है और जो कोई अपने कर्मोंसे गिरकर विपरीत दिशामें जा रहे हों उन्हें पुनः अपने कर्तव्यके पालनमें लगाता है ॥ २६ ॥
भेतव्यं हि सदा राज्ञः प्रजानामधिपा हि ते ।
वारयन्ति विकर्मस्थं तृपा मृगमिवेषुभिः ॥ २७ ॥
इसलिये राजाओंसे सदा डरते रहना चाहिये; क्योंकि वे प्रजाके स्वामी हैं । जो लोग धर्मके विपरीत कार्य करते हैं, उन्हें राजा दण्डद्वारा उसी प्रकार पापसे रोकते हैं, जैसे द्वारा वे हिंसक पशुओंको हिंसासे रोकते हैं ॥
जनकस्येह विप्रर्षे विकर्मस्थो न विद्यते ।
स्वकर्मनिरता वर्णाश्चत्वारोऽपि द्विजोत्तम ॥ २८ ॥
ब्रह्मर्षे! यह राजा जनकका नगर है, यहाँ कोई भी ऐसा नहीं है जो वर्ण- धर्मके विरुद्ध आचरण करे । द्विजश्रेष्ठ! यहाँ चारों वर्णोंके लोग अपना- अपना कर्म करते हैं ॥ २८ ॥
स एष जनको राजा दुर्वृत्तमपि चेत् सुतम् ।
दण्ड्यं दण्डे निक्षिपति तथा न ग्लाति धार्मिकम् ॥ २ ९ ॥
ये राजा जनक दुराचारीको, वह अपना पुत्र ही क्यों न हो, दण्डनीय मानकर दण्ड देते ही हैं तथा किसी भी धर्मात्माको कष्ट नहीं पहुँचने देते हैं ॥ २ ९ ॥
सुयुक्तचारो नृपतिः सर्वं धर्मेण पश्यति ।
श्रीश्च राज्यं च दण्डश्च क्षत्रियाणां द्विजोत्तम ॥ ३० ॥
विप्रवर! राजा जनकने सब ओर गुप्तचर लगा रखे हैं, अतः उनके द्वारा वे धर्मानुसार सबपर दृष्टि रखते हैं । सम्पत्तिका उपार्जन, राज्यकी रक्षा तथा अपराधियोंको दण्ड देना — ये क्षत्रियोंके कर्तव्य हैं ॥ ३० ॥
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राजानो हि स्वधर्मेण श्रियमिच्छन्ति भूयसीम् ।
सर्वेषामेव वर्णानां त्राता राजा भवत्युत ॥ ३१ ॥
राजालोग अपने धर्मका पालन करते हुए ही प्रचुर सम्पत्ति पानेकी इच्छा रखते हैं और राजा सभी वर्णोंका रक्षक होता है ॥ ३१ ॥
परेण हि हतान् ब्रह्मन् वराहमहिषानहम् ।
न स्वयं हन्मि विप्रर्षे विक्रीणामि सदा त्वहम् ॥ ३२ ॥
ब्रह्मन्! मैं स्वयं किसी जीवकी हिंसा नहीं करता । सदा दूसरोंके मारे हुए सूअर और भैसोंका मांस बेचता हूँ ॥ ३२ ॥
न भक्षयामि मांसानि ऋतुगामी तथा ह्यहम् ।
सदोपवासी च तथा नक्तभोजी सदा द्विज ॥ ३३ ॥
मैं स्वयं मांस कभी नहीं खाता । ऋतुकाल प्राप्त होनेपर ही पत्नी- समागम करता हूँ ।
द्विजप्रवर । मैं दिनमें सदा ही उपवास और रातमें भोजन करता हूँ ॥ ३३ ॥
अशीलश्चापि पुरुषो भूत्वा भवति शीलवान् ।
प्राणिहिंसारतश्चापि भवते धार्मिकः पुनः ॥ ३४ ॥
शीलसे रहित पुरुष भी कभी शीलवान् हो जाता है । प्राणियोंकी हिंसामें अनुरक्त मनुष्य भी फिर धर्मात्मा हो जाता है ॥ ३४ ॥
व्यभिचारान्नरेन्द्राणां धर्मः संकीर्यते महान् ।
अधर्मो वर्धते चापि संकीर्यन्ते ततः प्रजाः ॥ ३५ ॥
राजाओंके व्यभिचार- दोषसे धर्म अत्यन्त संकीर्ण हो जाता है और अधर्म बढ़ जाता है, इससे प्रजामें वर्णसंकरता आ जाती है ॥ ३५ ॥
भेरुण्डा वामनाः कुब्जाः स्थूलशीर्षास्तथैव च ।
क्लीबाश्चान्धाश्च बधिरा जायन्तेऽत्युच्चलोचनाः ॥ ३६ ॥
उस दशामें भयंकर आकृतिवाले, बौने, कुबड़े, मोटे मस्तकवाले, नपुंसक, अंधे, बहरे और अधिक ऊँचे नेत्रोंवाले मनुष्य उत्पन्न होते हैं ॥ ३६ ॥
पार्थिवानामधर्मत्वात् प्रजानामभवः सदा ।
स एष राजा जनकः प्रजा धर्मेण पश्यति ॥ ३७ ॥
राजाओंके अधर्मपरायण होनेसे प्रजाकी सदा अवनति होती है । हमारे ये राजा जनक समस्त प्रजाको धर्मपूर्ण दृष्टिसे ही देखते हैं ॥ ३७ ॥
अनुगृह्णत् प्रजाः सर्वा स्वधर्मनिरताः सदा । ( पात्येव राजा जनकः पितृवज्जनसत्तम । ) ये चैव मां प्रशंसन्ति ये च निन्दन्ति मानवाः ॥ ३८ ॥
सर्वान् सुपरिणीतेन कर्मणा तोषयाम्यहम् ।
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नरश्रेष्ठ! राजा जनक सदा स्वधर्ममें तत्पर रहनेवाली सम्पूर्ण प्रजापर अनुग्रह 'रखते हु उसका पिताकी भाँति सदा पालन करते हैं । जो लोग मेरी प्रशंसा करते हैं और जो निन्दा करते हैं, उन सबको अपने सद्व्यवहारसे संतुष्ट रखता हूँ ॥ ३८ ॥
ये जीवन्ति स्वधर्मेण संयुञ्जन्ति च पार्थिवाः ॥ ३ ९ ॥ न किंचिदुपजीवन्ति दान्ता उत्थानशीलिनः । जो राजा अपने धर्मका पालन करते हुए जीवन- निर्वाह करते हैं, धर्ममें ही संयुक्त रहते हैं, किसी दूसरेकी कोई वस्तु अपने उपयोगमें नहीं लाते तथा सदा अपनी इन्द्रियोंपर संयम रखते हैं, वे ही उन्नतिशील होते हैं ॥ ३ ९ ॥ शक्त्यान्नदानं सततं तितिक्षा धर्मनित्यता ॥ ४० ॥
यथार्हं प्रति पूजा च सर्वभूतेषु वै सदा ।
त्यागान्नान्यत्र मर्त्यानां गणास्तिष्ठन्ति पूरुषे ॥ ४१ ॥
अपनी शक्तिके अनुसार सदा दूसरोंको अन्न देना, दूसरोंके अपराध तथा शीत- उष्ण आदि द्वन्दोंको सहन करना, सदा धर्ममें दृढ़तापूर्वक लगे रहना तथा सम्पूर्ण प्राणियोंमें सभी पूजनीय पुरुषोंका यथायोग्य पूजन करना - ये मनुष्योंके सद्गुण पुरुषमें स्वार्थत्यागके बिना नहीं रह पाते हैं ॥ ४०-४१ ॥
मृषा वादं परिहरेत् कुर्यात् प्रियमयाचितः ।
न च कामान्न संरम्भान्न द्वेषाद् धर्ममुत्सृजेत् ॥ ४२ ॥
झूठ बोलना छोड़ दे, बिना कहे ही दूसरोंका प्रिय करे, काम, क्रोध तथा द्वेषसे भी कभी धर्मका परित्याग न करे ॥ ४२ ॥
प्रिये नातिभृशं हृष्येदप्रिये न च संज्वरेत् ।
न मुह्येदर्थकृच्छ्रेषु न च धर्मं परित्यजेत् ॥ ४३ ॥
प्रिय वस्तुकी प्राप्ति होनेपर हर्षसे फूल न उठे, अपने मनके विपरीत कोई बात हो जाय तो दुःख न माने— चिन्तित न हो, अर्थसंकट आ जाय तो भी मोहके वशीभूत हो घबराये नहीं और किसीभी अवस्थामें अपना धर्म न छोड़े ॥ ४३ ॥
कर्म चेत्किंचिदन्यत् स्यादितरन्न तदाचरेत् ।
यत् कल्याणमभिध्यायेत् तत्रात्मानं नियोजयेत् ॥ ४४ ॥
यदि भूलसे कभी कोई निन्दित कर्म बन जाय तो फिर दुबारा वैसा काम न करे । अपने मन और बुद्धिसे विचार करनेपर जो कल्याणकारी प्रतीत हो, उसी कार्यमें अपनेको लगावे ॥ ४४ ॥
न पापे प्रतिपापः स्यात् साधुरेव सदा भवेत् ।
आत्मनैव हतः पापो यः पापं कर्तुमिच्छति ॥ ४५ ॥
यदि कोई अपने साथ बुरा बर्ताव करे तो स्वयं भी बदलेमें उसके साथ बुराई न करे । सबके साथ सदा सद्व्यवहार ही करे । जो पापी दूसरोंका अहित करना चाहता है वह स्वयं