श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड २ — पृष्ठ 1421–1430
महाभारत — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1421–1430
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पञ्चाधिकद्विशततमोऽध्यायः पतिव्रता स्त्री तथा पिता- माताकी सेवाका माहात्म्य वैशम्पायन उवाच
ततो युधिष्ठिरो राजा मार्कण्डेयं महाद्युतिम् ।
पप्रच्छ भरतश्रेष्ठ धर्मप्रश्नं सुदुर्विदम् ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं- भरतश्रेष्ठ जनमेजय! तदनन्तर राजा युधिष्ठिरने महातेजस्वी मार्कण्डेय मुनिसे धर्मविषयक प्रश्न किया, जो समझनेमें अत्यन्त कठिन था ॥ १ ॥
श्रोतुमिच्छामि भगवन् स्त्रीणां माहात्म्यमुत्तमम् ।
कथ्यमानं त्वया विप्र सूक्ष्मं धर्म्यं च तत्त्वतः ॥ २ ॥
वे बोले — ‘ भगवन्! मैं आपके मुखसे ( पतिव्रता ) स्त्रियोंके सूक्ष्म, धर्मसम्मत एवं उत्तम माहात्म्यका यथार्थ वर्णन सुनना चाहता हूँ ॥ २ ॥
प्रत्यक्षमिह विप्रर्षे देवा दृश्यन्ति सत्तम ।
सूर्याचन्द्रमसौ वायुः पृथिवी वह्निरेव च ॥ ३ ॥
पिता माता च भगवन् गुरुरेव च सत्तम ।
यच्चान्यद् देवविहितं तच्चापि भृगुनन्दन ॥ ४ ॥
‘ भगवन्! श्रेष्ठ ब्रह्मर्षे! इस जगत्में सूर्य, चन्द्रमा, वायु, पृथिवी, अग्नि, पिता, माता और गुरु — ये प्रत्यक्ष देवता दिखायी देते हैं । भृगुनन्दन! इसके सिवा अन्य जो देवतारूपसे स्थापित देवविग्रह हैं, वे भी प्रत्यक्ष देवताओंकी ही कोटिमें हैं ' ॥ ३-४ ॥
मान्या हि गुरवः सर्वे एकपत्न्यस्तथा स्त्रियः ।
पतिव्रतानां शश्रूषा दुष्करा प्रतिभाति मे ॥ ५ ॥
'समस्त गुरुजन और पतिव्रता नारियाँ भी समादरके योग्य हैं । पतिव्रता स्त्रियाँ अपने पतिकी जैसी सेवा- शुश्रूषा करती हैं; वह दूसरे किसीके लिये मुझे अत्यन्त कठिन प्रतीत होती है ॥ ५ ॥
पतिव्रतानां माहात्म्यं वक्तुमर्हसि नः प्रभो ।
निरुद्धय चेन्द्रियग्रामं मनः संरुध्य चानघ ॥ ६ ॥
पतिं दैवतवच्चापि चिन्तयन्त्यः स्थिता हि याः ।
भगवन् दुष्करं त्वेतत् प्रतिभाति मम प्रभो ॥ ७ ॥
'प्रभो! आप अब हमें पतिव्रता स्त्रियोंकी महिमा सुनावें । निष्पाप सहर्ष! जो अपनी इन्द्रियोंको संयममें रखती हुई मनको वशमें करके अपने पतिका देवताके समान ही चिन्तन करती रहती हैं, वे नारियाँ धन्य हैं । प्रभो! भगवन्! उनका वह त्याग और सेवाभाव मुझे तो अत्यन्त कठिन जान पड़ता है ॥ ६-७ ॥
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मातापित्रोश्च शुश्रूषा स्त्रीणां भर्तरि च द्विज ।
स्त्रीणां धर्मात् सुघोराद्धि नान्यं पश्यामि दुष्करम् ॥ ८ ॥
‘ ब्रह्मन्! पुत्रोंद्वारा माता-पिताकी सेवा तथा स्त्रियोंद्वारा की हुई पतिकी सेवा बहुत कठिन है । स्त्रियोंके इस कठोर धर्मसे बढ़कर और कोई दुष्कर कार्य मुझे नहीं दिखायी देता है ॥ ८ ॥
साध्वाचाराः स्त्रियो ब्रह्मन् यत् कुर्वन्ति सदाऽऽदृताः ।
दुष्करं खलु कुर्वन्ति पितरं मातरं च वै ॥ ९ ॥
एकपत्न्यश्च या नार्यो याश्च सत्यं वदन्त्युत । ‘ ब्रह्मन्! समाजमें सदा आदर पानेवाली सदाचारिणी स्त्रियाँ जो महान् कार्य करती हैं वह अत्यन्त कठिन है । जो लोग पिता -माताकी सेवा करते हैं उनका कर्म भी बहुत कठिन है । पतिव्रता तथा सत्यवादिनी स्त्रियाँ अत्यन्त कठोर धर्मका पालन करती हैं ॥ ९ ३ ॥ कुक्षिणा दश मासांश्च गर्भं संधारयन्ति याः ॥ १० ॥
नार्यः कालेन सम्भूय किमद्भततरं ततः । ‘स्त्रियाँ अपने उदरमें दस महीनेतक जो गर्भ धारण करती हैं और यथासमय उसको जन्म देती हैं, इससे अद्भुत कार्य और कौन होगा? ॥ १०३ ॥
संशयं परमं प्राप्य वेदनामतुलामपि ॥ ११ ॥
प्रजायते सुतान् नार्यो दुःखेन महता विभो ।
पुष्णन्ति चापि महता स्नेहेन द्विजपुङ्गव ॥ १२ ॥
‘ भगवन्! अपनेको भारी प्राणसंकटमें डालकर और अतुल वेदनाको सहकर नारियाँ बड़े कष्टसे संतान उत्पन्न करती हैं! विप्रवर! फिर बड़े स्नेहसे उनका पालन भी करती हैं ॥ ११-१२ ॥
याश्च क्रूरेषु सत्त्वेषु वर्तमाना जुगुप्सिताः ।
स्वकर्म कुर्वन्ति सदा दुष्करं तच्च मे मतम् ॥ १३ ॥
' जो सती- साध्वी स्त्रियाँ क्रूर स्वभावके पतियोंकी सेवामें रहकर उनके तिरस्कारका पात्र बनकर भी सदा अपने सती- धर्मका पालन करती रहती हैं, वह तो मुझे और भी अत्यन्त कठिन प्रतीत होता है ॥ १३ ॥
क्षत्रधर्मसमाचारतत्त्वं व्याख्याहि मे द्विज ।
धर्मः सुदुर्लभो विप्र नृशंसेन महात्मनाम् ॥ १४ ॥
' ब्रह्मन्! आप मुझे क्षत्रियोंके धर्म और आचारका तत्त्व भी विस्तारपूर्वक बताइये । विप्रवर! जो क्रूर स्वभावके मनुष्य हैं, उनके लिये महात्माओंका धर्म अत्यन्त दुर्लभ है ॥ १४ ॥
एतदिच्छामि भगवन् प्रश्नं प्रश्नविदां वर ।
श्रीतुं भृगुकुलश्रेष्ठ शुश्रूषे तव सुव्रत ॥ १५ ॥
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भगवन्! भृगुकुलशिरोमणे! आप उत्तम व्रतके पालक और प्रश्नका समाधान करनेवाले विद्वानोंमें श्रेष्ठ हैं । मैंने जो प्रश्न आपके सम्मुख उपस्थित किया है, उसीका उत्तर मैं आपसे सुनना चाहता हूँ' ॥ १५ ॥
मार्कण्डेय उवाच
हन्त तेऽहं समाख्यास्ये प्रश्नमेतं सुदुर्वचम् ।
तत्त्वेन भरतश्रेष्ठ गदतस्तन्निबोध मे ॥ १६ ॥
मार्कण्डेयजी बोले- भरतश्रेष्ठ! तुम्हारे इस प्रश्नका विवेचन करना यद्यपि बहुत
कठिन है, तो भी मैं अब इसका यथावत् समाधान करूँगा । तुम मेरे मुखसे सुनो ॥ १६ ॥
मातृस्तु गौरवादन्ये पितॄनन्ये तु मेनिरे ।
दुष्करं कुरुते माता विवर्धयति या प्रजाः ॥ १७ ॥
कुछ लोग माताओंको गौरवकी दृष्टिसे बड़ी मानते हैं । दूसरे लोग पिताको महत्त्व देते हैं । परंतु माता जो अपनी संतानोंको पाल- पोसकर बड़ा बनाती है, वह उसका कठिन कार्य है ॥ १७ ॥
तपसा देवतेज्याभिवन्दनेन तितिक्षया ।
सुप्रशस्तैरुपायैश्चापीहन्ते पितरः सुतान् ॥ १८ ॥
माता- पिता तपस्या, देवपूजा, वन्दना, तितिक्षा तथा अन्य श्रेष्ठ उपायोंद्वारा भी पुत्रोंको प्राप्त करना चाहते हैं ॥ १८ ॥
एवं कृष्छ्रेण महता पुत्रं प्राप्य सुदुर्लभम् ।
चिन्तयन्ति सदा वीर कीदृशोऽयं भविष्यति ॥ १ ९ ॥
वीर! इस प्रकार बड़ी कठिनाईसे परम दुर्लभ पुत्रको पाकर लोग सदा इस चिन्तामें डूबे रहते हैं कि न जाने यह किस तरहका होगा ॥ १ ९ ॥
आशंसते हि पुत्रेषु पिता माता च भारत ।
यशः कीर्तिमथैश्वर्यं प्रजा धर्मं तथैव च ॥ २० ॥
भारत! पिता और माता अपने पुत्रोंके लिये यश, कीर्ति और ऐश्वर्य, संतान तथा धर्मकी शुभकामना करते हैं ॥ २० ॥
तयोराशां तु सफलां यः करोति स धर्मवित् ।
पिता माता च राजेन्द्र तुष्यतो यस्य नित्यशः ॥ २१ ॥
इह प्रेत्य च तस्याथ कीर्तिर्धर्मश्च शाश्वतः । राजेन्द्र! जो उन दोनोंकी आशाको सफल करता है, वही पुत्र धर्मज्ञ है । जिसके माता-पिता उससे सदा संतुष्ट रहते हैं, उसे इहलोक और परलोकमें भी अक्षय कीर्ति और शाश्वत धर्मकी प्राप्ति होती है ॥ २१ ॥
नैव यज्ञक्रियाः काश्चिन्न श्राद्धं नोपवासकम् ॥ २२ ॥
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या तु भर्तरि शुश्रूषा तया स्वर्गं जयत्युत । नारीके लिये किसी यज्ञकर्म, श्राद्ध और उपवासकी आवश्यकता नहीं है । वह जो पतिकी सेवा करती है, उसीके द्वारा स्वर्गलोकपर विजय प्राप्त कर लेती है ॥ एतत् प्रकरणं राजन्नधिकृत्य युधिष्ठिर ॥ २३ ॥
पतिव्रतानां नियतं धर्मं चावहितः शृणु ॥ २४ ॥
राजा युधिष्ठिर! इसी प्रकरणमें पतिव्रताओंके नियत धर्मका वर्णन किया जायगा । तुम सावधान होकर सुनो ॥ २३-२४ ॥ इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमास्यापर्वणि पतिव्रतोपाख्याने पञ्चाधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २०५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत मार्कण्डेयसमास्यापर्वमें पतिव्रतोपाख्यानविषयक दो सौ पाँचवाँअध्याय पूरा हुआ ॥ २०५ ॥
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षडधिकद्विशततमोऽध्यायः कौशिक ब्राह्मण और पतिव्रताके उपाख्यानके अन्तर्गत ब्राह्मणोंके धर्मका वर्णन मार्कण्डेय उवाच
कश्चिद् द्विजातिप्रवरो वेदाध्यायी तपोधनः ।
तपस्वी धर्मशीलश्च कौशिको नाम भारत ॥ १ ॥
मार्कण्डेयजी कहते हैं- भरतनन्दन! कौशिक नामसे प्रसिद्ध एक ब्राह्मण था, जो वेदका अध्ययन करनेवाला, तपस्याका धनी और धर्मात्मा था । वह तपस्वी ब्राह्मण सम्पूर्ण द्विजातियोंमें श्रेष्ठ समझा जाता था ॥ १ ॥
साङ्गोपनिषदो वेदानधीते द्विजसत्तमः ।
स वृक्षमूले कस्मिंश्चिद् वेदानुच्चारयन् स्थितः ॥ २ ॥
द्विजश्रेष्ठ कौशिकने सम्पूर्ण अंगोंसहित वेदों और उपनिषदोंका अध्ययन किया था ।
एक दिनकी बात है, वह किसी वृक्षके नीचे बैठकर वेदपाठ कर रहा था ॥ २ ॥
उपरिष्टाच्च वृक्षस्य बलाका संन्यलीयत ।
तया पुरीषमुत्सृष्टं ब्राह्मणस्य तदोपरि ॥ ३ ॥
उस समय उस वृक्षके ऊपर एक बगुली छिपी बैठी थी । उसने ब्राह्मण देवताके ऊपर बीट कर दी ॥ ३ ॥
तामवेक्ष्य ततः क्रुद्धः समपध्यायत द्विजः ।
भृशं क्रोधाभिभूतेन बलाका सा निरीक्षिता ॥ ४ ॥
अपध्याता च विप्रेण न्यपतद् धरणीतले । यह देख ब्राह्मण क्रोधित हो गया और उस पक्षीकी ओर दृष्टि डालकर उसका अनिष्टचिन्तन करने लगा । उसने अत्यन्त कुपित होकर उस बगुलीको देखा और उसका अनिष्टचिन्तन किया था, अतः वह पृथ्वीपर गिर पड़ी ॥ ४३ ॥
बलाकां पतितां दृष्ट्वा गतसत्त्वामचेतनाम् ॥ ५ ॥
कारुण्यादभिसंतप्तः पर्यशोचत तां द्विजः ।
अकार्यं कृतवानस्मि रोषरागबलात्कृतः ॥ ६ ॥
उस बगुलीको अचेत एवं निष्प्राण होकर पड़ी देख ब्राह्मणका हृदय दयासे द्रवित हो उठा । उसे अपने इस कुकृत्यपर पश्चात्ताप हुआ । वह इस प्रकार शोक प्रकट करता हुआ बोला — ‘ ओह! आज क्रोध और आसक्तिके वशीभूत होकर मैंने यह अनुचित कार्य कर डाला' ॥ ५-६ ॥
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मार्कण्डेय उवाच
इत्युक्त्वा बहुशो विद्वान् ग्रामं भैक्ष्याय संश्रितः ।
ग्रामे शुचीनि प्रचरन् कुलानि भरतर्षभ ॥ ७ ॥
प्रविष्टस्तत् कुलं यत्र पूर्वं चरितवांस्तु सः ।
देहीति याचमानोऽसौ तिष्ठेत्युक्तः स्त्रिया ततः ॥ ८ ॥
मार्कण्डेयजी कहते हैं- भरतश्रेष्ठ! इस प्रकार बार - बार पछताकर वह विद्वान् ब्राह्मण गाँवमें भिक्षाके लिये गया । उस गाँवमें जो लोग शुद्ध और पवित्र आचरणवाले थे, उन्हींके घरोंपर भिक्षा माँगता हुआ वह एक ऐसे घरपर जा पहुँचा, जहाँ पहले भी कभी भिक्षा प्राप्त कर चुका था । दरवाजेपर पहुँचकर ब्राह्मण बोला- 'भिक्षा दें! ' भीतरसे किसी स्त्रीने उत्तर दिया— ' ठहरो! ( अभी लाती हूँ) ' ॥ ७-८ ॥
शौचं तु यावत् कुरुते भाजनस्य कुटुम्बिनी ।
एतस्मिन्नन्तरे राजन् क्षुधासम्पीडितो भृशम् ॥ ९ ॥
भर्ता प्रविष्टः सहसा तस्या भरतसत्तम । राजन्! वह घरकी मालकिन थी, जो जूँठे बर्तन माँज रही थी । ज्यों ही वह बर्तन साफ करके उधरसे निवृत्त हुई, त्यों ही उसके पतिदेव सहसा घरपर आ गये । भरतश्रेष्ठ! वे भूखसे अत्यन्त पीड़ित थे ॥ ९ ३ ॥
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सा तु दृष्ट्वा पतिं साध्वी ब्राह्मणं व्यवहाय तम् ॥ १० ॥
पाद्यमाचमनीयं वै ददौ भर्तुस्तथाऽऽसनम् ।
प्रह्वा पर्यचरच्चापि भर्तारमसितेक्षणा ॥ ११ ॥
पतिको आया देख उस श्याम नेत्रोंवाली पतिव्रताने ब्राह्मणको तो उसी दशामें छोड़ दिया और अत्यन्त विनीतभावसे वह पतिकी सेवामें लग गयी । पानी लाकर उसने पतिके पैर धोये, हाथ - मुँह धुलाये और बैठनेको आसन दिया ॥ १०-११ ॥
आहारेणाथ भक्ष्यैश्च भोज्यैः सुमधुरैस्तथा ।
उच्छिष्टं भाविता भर्तुर्भुङ्क्ते नित्यं युधिष्ठिर ॥ १२ ॥
फिर सुन्दर स्वादिष्ट भक्ष्य- भोज्य पदार्थ परोसकर वह पतिको भोजन कराने लगी । युधिष्ठिर! वह सती स्त्री प्रतिदिन पतिको भोजन कराकर उनके उच्छिष्टको प्रसाद मानकर बड़े आदर और प्रेमसे भोजन करती थी ॥
दैवतं च पतिं मेने भर्तुश्चित्तानुसारिणी ।
कर्मणा मनसा वाचा नान्यचित्ताभ्यगात् पतिम् ॥ १३ ॥
वह पतिको देवता मानती और उनके विचारके अनुकूल ही चलती थी । उसका मन कभी पर पुरुषकी ओर नहीं जाता था । वह मन, वाणी और क्रियासे पतिपरायणा थी ॥ १३ ॥
तं सर्वभावोपगता पतिशुश्रूषणे रता ।
साध्वाचारा शचिर्दक्षा कुटुम्बस्य हितैषिणी ॥ १४ ॥
अपने हृदयकी समस्त भावनाएँ, सम्पूर्ण प्रेम पतिके चरणोंमें चढ़ाकर वह अनन्यभावसे उन्हींकी सेवामें लगी रहती थी । सदाचारका पालन करती, बाहर- भीतरसे शुद्ध - पवित्र रहती, घरके काम - काजको कुशलतापूर्वक करती और कुटुम्बके सभी लोगोंका हित चाहती थी ॥
भर्तुश्चापि हितं यत् तत् सततं सानुवर्तते ।
देवतातिथिभृत्यानां श्वश्रूश्वशुरयोस्तथा ॥ १५ ॥
शुश्रूषणपरा नित्यं सततं संयतेन्द्रिया । पतिके लिये जो हितकर कार्य जान पड़ता उसमें भी वह सदा संलग्न रहती थी । देवताओंकी पूजा, अतिथियोंके सत्कार, भृत्योंके भरण- पोषण और सास - ससुरकी सेवामें भी वह सर्वदा तत्पर रहती थी । अपने मन और इन्द्रियोंपर वह निरन्तर पूर्ण संयम रखती थी ॥
सा ब्राह्मणं तदा दृष्ट्वा संस्थितं भैक्ष्यकाङ्क्षिणम् ।
कुर्वती पतिशुश्रूषां सस्माराथ शुभेक्षणा ॥ १६ ॥
पतिकी सेवा करते - करते उस मंगलमयी दृष्टिवाली देवीको भिक्षाके लिये खड़े हुए ब्राह्मणकी याद आयी ॥
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व्रीडिता साभवत् साध्वी तदा भरतसत्तम ।
भिक्षामादाय विप्राय निर्जगाम यशस्विनी ॥ १७ ॥
भरतवंशविभूषण! अपनी भूलके कारण वह यशस्विनी साध्वी स्त्री बहुत लज्जित हुई और ब्राह्मणके लिये भिक्षा लेकर घरसे बाहर निकली ॥ १७ ॥
ब्राह्मणउवाच
किमिदं भवति त्वं मां तिष्ठेत्युक्त्वा वराङ्गने ।
उपरोधं कृतवती न विसर्जितवत्यसि ॥ १८ ॥
उसे देखकर ब्राह्मणने कहा - सुन्दरी! तुम्हारा यह कैसा बर्ताव है? देख! तुम्हें इतना विलम्ब करना था तो ' ठहरो ' कहकर मुझे रोक क्यों लिया? मुझे जाने क्यों नहीं दिया? ॥ १८ ॥
मार्कण्डेय उवाच
ब्राह्मणं क्रोधसंतप्तं ज्वलन्तमिव तेजसा ।
दृष्ट्वा साध्वी मनुष्येन्द्र सान्त्वपूर्वं वचोऽब्रवीत् ॥ १ ९ ॥
मार्कण्डेयजी कहते हैं - राजन्! ब्राह्मण क्रोधसे संतप्त हो अपने तेजसे जलता- सा प्रतीत होता था । उसे देखकर उस पतिव्रता देवीने बड़ी शान्तिसे उत्तर दिया ॥
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स्त्र्युवाच
क्षन्तुमर्हसि मे विद्वन् भर्ता मे दैवतं महत् ।
स चापि क्षुधितः श्रान्तः प्राप्तः शुश्रूषितो मया ॥ २० ॥
स्त्री बोली - विद्वत्! क्षमा करें । मेरे लिये सबसे बड़े देवता पति हैं । वे भूखे और थके हुए घरपर आये थे । ( उन्हें छोड़कर कैसे आती? ) उन्हींकी सेवामें लग गयी ॥ ब्राह्मणउवाच
ब्राह्मणा न गरीयांसो गरीयांस्ते पतिः कृतः ।
गृहस्थधर्मे वर्तन्ती ब्राह्मणानवमन्यसे ॥ २१ ॥
तब ब्राह्मण बोला – क्या ब्राह्मण बड़े नहीं हैं; तुमने पतिको ही सबसे बड़ा बना दिया? गृहस्थधर्ममें रहकर भी तुम ब्राह्मणोंका अपमान करती हो? ॥ २१ ॥
इन्द्रोऽप्येषां प्रणमते किं पुनर्मानवो भुवि अवलिप्ते न जानीषे वृद्धानां न श्रुतं त्वया ॥ २२ ॥
ब्राह्मणा ह्यग्निसदृशा दहेयुः पृथिवीमपि । अरी! ( स्वर्गलोकके स्वामी) इन्द्र भी इन ब्राह्मणोंके आगे सिर झुकाते हैं, फिर भूतलके मनुष्योंकी तो बात ही क्या है? धमंडमें भरी हुई स्त्री! क्या तुम ब्राह्मणोंका प्रभाव नहीं जानती? कभी बड़े - बूढ़ोंके मुखसे भी नहीं सुना? अरी! ब्राह्मण अग्निके समान तेजस्वी होते हैं । वे चाहें तो इस पृथ्वीको भी जलाकर भस्म कर सकते हैं ॥ २२३ ॥
स्त्र्युवाच नाहं बलाका विप्रर्षे त्यज क्रोधं तपोधन ॥ २३ ॥
अनया क्रुद्धया दृष्ट्या क्रुद्धः किं मां करिष्यसि ।
नावजानाम्यहं विप्रान् देवैस्तुल्यान् मनस्विनः ॥ २४ ॥
स्त्री बोली — तपोधन! क्रोध न करो । ब्रह्मर्षे! मैं बगुली नहीं हूँ जो तुम्हारी इस क्रोधभरी दृष्टिसे जल जाऊँगी । तुम इस तरह कुपित होकर मेरा क्या करोगे? मैं ब्राह्मणोंका अपमान नहीं करती । मनस्वी ब्राह्मण तो देवताके समान होते हैं ॥ २३-२४ ॥
अपराधमिमं विप्र क्षन्तुमर्हसि मेऽनघ ।
जानामि तेजो विप्राणां महाभाग्यं च धीमताम् ॥ २५ ॥
निष्पाप ब्राह्मण! तुम मेरे इस अपराधको क्षमा करो । मैं बुद्धिमान् ब्राह्मणोंके तेज और महत्त्वको जानती हूँ ॥
अपेयः सागरः क्रोधात् कृतो हि लवणोदकः ।
तथैव दीप्ततपसां मुनीनां भावितात्मनाम् ॥ २६ ॥
येषां क्रोधाग्निरद्यापि दण्डके नोपशाम्यति ।
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ब्राह्मणोंके ही क्रोधका फल है कि समुद्रका पानी खारा एवं पीनेके अयोग्य बना दिया गया । इसी प्रकार जिनकी तपस्या बहुत बढ़ी चढ़ी थी और जिनका अन्तःकरण परम पवित्र हो चुका था ऐसे मुनियोंने भी जो क्रोधकी आग प्रज्वलित की थी, वह आज भी दण्डकारण्यमें बुझ नहीं पा रही है ॥ २६३ ॥
ब्राह्मणानां परिभवाद् वातापिः सुदुरात्मवान् ॥ २७ ॥
अगस्त्यमृषिमासाद्य जीर्णः क्रूरो महासुरः । ब्राह्मणोंका तिरस्कार करनेसे ही क्रूर स्वभाववाला महान् असुर अत्यन्त दुरात्मा वातापि अगस्त्य मुनिके पेटमें जाकर पच गया ॥ २७३ ॥
बहुप्रभावाः श्रूयन्ते ब्राह्मणानां महात्मनाम् ॥ २८ ॥
क्रोधः सुविपुलो ब्रह्मन् प्रसादश्च महात्मनाम् ।
अस्मिंस्त्वतिक्रमे ब्रह्मन् क्षन्तुमर्हसि मेऽनघ ॥ २ ९ ॥
ब्रह्मन्! महात्मा ब्राह्मणोंके प्रभावको बतानेवाले बहुत - से चरित्र सुने जाते हैं । उन महात्माओंका क्रोध और कृपा दोनों ही महान् होते हैं । निष्पाप ब्रह्मन्! मेरेद्वारा जो तुम्हारा अपराध बन गया है, उसे क्षमा करो ॥ २८-२९ ॥
पतिशुश्रूषया धर्मो यः स मे रोचते द्विज ।
दैवतेष्वपि सर्वेषु भर्ता मे दैवतं परम् ॥ ३० ॥
विप्रवर! मुझे तो पतिकी सेवासे जो धर्म प्राप्त होता है, वही अधिक पसंद है । सम्पूर्ण देवताओंमें भी पति ही मेरे सबसे बड़े देवता हैं ॥ ३० ॥
अविशेषेण तस्याहं कुर्यां धर्मं द्विजोत्तम ।
शुश्रूषायाः फलं पश्य पत्युर्ब्राह्मण यादृशम् ॥ ३१ ॥
द्विजश्रेष्ठ! मैं साधारणरूपसे ही पतिसेवारूप धर्मका पालन करती हूँ । ब्राह्मणदेवता! इस पतिसेवाका जैसा फल है, उसे प्रत्यक्ष देख लो ॥ ३१ ॥
बलाका हि त्वया दग्धा रोषात् तद् विदितं मया ।
क्रोधः शत्रुः शरीरस्थो मनुष्याणां द्विजोत्तम ॥ ३२ ॥
तुमने क्रोध करके जो एक बगुलीको जला दिया था वह बात मुझे मालूम हो गयी । द्विजश्रेष्ठ! मनुष्योंका एक बहुत बड़ा शत्रु है, वह उनके शरीरमें ही रहता है । उसका नाम है ‘ क्रोध' ॥ ३२ ॥
यः क्रोधमोहौ त्यजति तं देवा ब्राह्मणं विदुः ।
यो वदेदिह सत्यानि गुरुं संतोषयेत च ॥ ३३ ॥
हिंसितश्च न हिंसेत तं देवा ब्राह्मणं विदुः । जो क्रोध और मोहको त्याग देता है, उसीको देवतागण ब्राह्मण मानते हैं । जो यहाँ सत्य बोले, गुरुको संतुष्ट रखे, किसीके द्वारा मार खाकर भी बदलेमें उसे न मारे, उसको देवतालोग ब्राह्मण मानते हैं ॥ ३३३ ॥