ऋष्यशृङ्गोपाख्यान : तपस्वी पुत्र को वेश्या के प्रलोभन से कैसे बचाया गया?
धैर्य और युक्तिपूर्ण समाधान
महर्षि वेदव्यास कृत महाभारतके सन्दर्भ सहित वास्तविक आख्यान पढ़ें।
वनपर्व → तीर्थयात्रापर्व · अध्याय 110–113 · पृष्ठ 769–796
लोमश ऋषि ने युधिष्ठिर से कहा
तीर्थयात्रा के दौरान ऋषियों की महिमा बताते हुए
श्रीमद्भागवत के अन्तर्गत तीर्थयात्रा पर्व में जब कुन्तीनन्दन युधिष्ठिर क्रमशः आगे बढ़ने लगे, तब वे नन्दा और अपरनन्दा नामक दो नदियों के समीप पहुँचे। इन नदियों के मार्ग में वायु का सहारा लिए बिना ही अचानक बादल उमड़ आते थे और हजारों पत्थर रूपी ओले गिरने लगते थे। ऐसे पर्वत पर वे मनुष्य चढ़ नहीं सकते थे जिनके मन खेद से भरे हों।
तभी लोमश ऋषि ने कहा— "शत्रुसूदन! पूर्वकाल की एक बात सुनो। इस ऋषभकूट पर्वत पर ऋषभ नामक एक तपस्वी रहते थे, जिनकी आयु कई सौ वर्ष थी। वे अत्यन्त क्रोधी स्वभाव के थे। एक बार जब अन्य लोगों ने उन्हें सम्भाष्यमाणो (बुलाते हुए) किया, तो वे कुपित होकर पर्वत से बोले— 'जो कोई यहाँ बातचीत करे, उस पर ओले बरसें!' उन्होंने वायु को भी बुलाकर कहा— 'देखो, यहाँ किसी प्रकार का शब्द नहीं होना चाहिए।' तब से जो कोई पुरुष यहाँ बोलता है, उसे मेघ की गर्जना द्वारा रोका जाता है। राजन्! उन महर्षियों ने क्रोधवश कुछ कार्यों का विधान और कुछ बातों का निषेध कर दिया है।"
यथाश्रुतमिदं पूर्वमस्माभिररिकर्शन ।
तदेकाग्रमना राजन् निबोध गदतो मम ॥
तब लोमशजीने कहा – शत्रुसूदन! हमने पूर्वकालमें जैसा सुन रखा है वैसा बताया जाता है । तुम एकाग्रचित्त हो मेरे मुखसे इसका रहस्य सुनो ।
लोमश ऋषि ने आगे बताया— "राजन्! प्राचीन काल में देवगण नन्दा नदी के तट पर आए थे। उस समय देवताओं के दर्शन की इच्छा से अनेक मनुष्य वहाँ पहुँच गए, किन्तु इन्द्र आदि देवता उन्हें दर्शन देना नहीं चाहते थे। अतः उन्होंने इस पर्वतीय प्रदेश को जनसाधारण के लिए दुर्गम बना दिया। जो मनुष्य तपस्या नहीं करता, वह इस महान पर्वत को देख भी नहीं सकता और न ही चढ़ सकता है। इसलिए तुम मौन व्रत धारण करो।"
नातप्ततपसा शक्यो द्रष्टुमेष महागिरिः ।
आरोढुं वापि कौन्तेय तस्मान्नियतवाग् भव ॥
कुन्तीकुमार! जिसने तपस्या नहीं की है वह मनुष्य इस महान् पर्वतको न तो देख सकता है और न चढ़ ही सकता है; अतः तुम मौन व्रत धारण करो ।
ऋषि ने कहा— "इस तीर्थ में गोता लगाने वाले मनुष्यों का सारा पाप तत्काल नष्ट हो जाता है। यहाँ देवता और ऋषि आज भी निवास करते हैं; सायङ्काल और प्रातः काल उनके द्वारा प्रज्वलित की गई अग्नि के दर्शन होते हैं। नन्दा में स्नान के पश्चात् तुम्हें कौशिकी के तट पर चलना होगा, जहाँ महर्षि विश्वामित्र ने उग्र तपस्या की थी। वहीं कश्यपगोत्रीय महात्मा विभाण्डक का 'पुण्य' नामक आश्रम है और उनके तेजस्वी पुत्र ऋष्यशृङ्ग निवास करते हैं। वे मृगी के पेट से उत्पन्न हुए थे और उन्होंने अपने तप के प्रभाव से इन्द्र द्वारा वर्षा करवाई थी।"
आश्रमश्चैव पुण्याख्यः काश्यपस्य महात्मनः ।
ऋष्यशृङ्गः सुतो यस्य तपस्वी संयतेन्द्रियः ॥
तपसो यः प्रभावेण वर्षयामास वासवम् ।
अनावृष्ट्यां भयाद् यस्य ववर्ष बलवृत्रहा ॥
यहीं कश्यपगोत्रीय महात्मा विभाण्डकका ' पुण्य' नामक आश्रम है । इन्हींके तपस्वी एवं जितेन्द्रिय पुत्र महात्मा ऋष्यशृंग हैं, जिन्होंने अपनी तपस्याके प्रभावसे इन्द्रद्वारा वर्षा करवायी थी । उन दिनों देशमें घोर अनावृष्टि फैल रही थी, वैसे समयमें ऋष्यशृंग मुनिके भयसे बल और वृत्रासुरके विनाशक देवराज इन्द्रने उस देशमें वर्षा की थी ।
युधिष्ठिर ने जिज्ञासावश पूछा— "भगवन्! विभाण्डक मुनि के पुत्र ऋष्यशृङ्ग का जन्म मृगी के गर्भ से कैसे हुआ? मनुष्य का पशु योनि से संसर्ग तो शास्त्र और व्यवहार दोनों की दृष्टि से विरुद्ध है। ऐसे विरुद्ध योनि-संसर्ग से उत्पन्न बालक तपस्वी कैसे हो सका? और राजकुमारी शान्ता, जिसने मृग स्वरूप मुनि का मन मोह लिया, वह कैसी थी? राजा लोमपाद धर्मात्मा थे, फिर उनके राज्य में इन्द्र वर्षा क्यों नहीं करते थे?"
लोमश ऋषि ने उत्तर दिया— "राजन्! ब्रह्मर्षि विभाण्डक अत्यन्त तेजस्वी थे। वे एक बड़े कुण्ड में प्रविष्ट होकर दीर्घकाल तक महान क्लेश सहते हुए तपस्या करने लगे। उसी समय प्यास से व्याकुल एक मृगी वहाँ आई और पानी के साथ उनका वीर्य पी गई। वह मृगी पूर्वजन्म में एक देवकन्या थी जिसे ब्रह्माजी ने वचन दिया था कि वह मुनि को जन्म देने के बाद इस योनि से मुक्त हो जाएगी। इसी कारण ऋष्यशृङ्ग का जन्म मृगी के गर्भ से हुआ। उनके सिर पर एक सींग था, इसलिए वे 'ऋष्यशृङ्ग' कहलाए। उन्होंने अपने पिता के सिवा किसी मनुष्य को नहीं देखा था, अतः उनका मन सदा ब्रह्मचर्य में लगा रहता था।"
सह तोयेन तृषिता गर्भिणी चाभवत् ततः ।
सा पुरोक्ता भगवता ब्रह्मणा लोककर्तृणा ॥
देवकन्या मृगी भूत्वा मुनिं सूय विमोक्ष्यसे ।
अमोघत्वाद् विधेश्चैव भावित्वाद् दैवनिर्मितात् ॥
तस्यां मृग्यां समभवत् तस्य पुत्रो महानृषिः ।
ऋष्यशृङ्गस्तपोनित्यो वन एवाभ्यवर्तत ॥
स्खलित हो गया । उसी समय प्याससे व्याकुल हुई एक मृगी वहाँ आयी और पानीके साथ उस वीर्यको भी पी गयी । इससे उसके गर्भ रह गया। वह पूर्वजन्ममें एक देवकन्या थी । लोकस्रष्टा भगवान् ब्रह्माने उसे यह वचन दिया था कि तू मृगी होकर एक मुनिको जन्म देनेके पश्चात् उस योनिसे मुक्त हो जायगी । ब्रह्माजीकी वाणी अमोघ है और दैवके विधानको कोई टाल नहीं सकता, इसलिये विभाण्डकके पुत्र महर्षि ऋष्यशृंगका जन्म मृगीके ही पेटसे हुआ । वे सदा तपस्यामें संलग्न रहकर वनमें ही निवास करते थे ।
ऋषि ने आगे कहा— "राजन्! ऋष्यशृङ्ग ने जान-बूझकर एक ब्राह्मण के साथ मिथ्या व्यवहार किया था। इसी अपराध के कारण ब्राह्मणों ने राजा लोमपाद का त्याग कर दिया और इन्द्र ने उनके राज्य में वर्षा बन्द कर दी। अनावृष्टि से त्रस्त होकर राजा ने विद्वान ब्राह्मणों से उपाय पूछा। उन मनीषियों में से एक श्रेष्ठ महर्षि ने कहा— 'राजेन्द्र! तुम्हारे ऊपर ब्राह्मण कुपित हैं, प्रायश्चित्त करो। अपने राज्य में तपस्वी ऋष्यशृङ्ग को बुलाओ; वे स्त्रियों से सर्वथा अपरिचित हैं और यदि वे यहाँ पदार्पण करें, तो तत्काल मेघ वर्षा करेंगे।'
तत्र त्वेको मुनिवरस्तं राजानमुवाच ह ।
कुपितास्तव राजेन्द्र ब्राह्मणा निष्कृतिं चर ॥
उन्हीं ब्राह्मणोंमें एक श्रेष्ठ महर्षि भी थे । उन्होंने राजासे कहा- ' राजेन्द्र! तुम्हारे ऊपर ब्राह्मण कुपित हैं; इसके लिये तुम प्रायश्चित्त करो '
यह सुनकर राजा लोमपाद ने ब्राह्मणों के पास जाकर अपराध का प्रायश्चित्त किया और पुनः राजधानी लौट आए। प्रजा के हर्षित होते ही राजा ने अपने नीतिनिपुण मन्त्रियों के साथ विचार करके मुनिकुमार को लाने का उपाय खोजा। उन्होंने लुभाने में कुशल प्रधान वेश्याओं को बुलाकर कहा— 'तुम लोग कोई उपाय करके मुनिकुमार ऋष्यशृङ्ग को यहाँ ले आओ। उन्हें सुख-सुविधा का विश्वास दिलाकर मेरे राज्य में लाना।'
यह सुनते ही वेश्याओं का रङ्ग फीका पड़ गया। वे मुनि के शाप से डरकर इस कार्य को असम्भव बताने लगीं। तब उनमें से एक बूढ़ी स्त्री ने राजा से कहा— 'महाराज! मैं उन तपोधन मुनि को लाने का प्रयत्न करूँगी; परन्तु आप मुझे अपनी मनचाही व्यवस्था करने की आज्ञा दें।' राजा ने उसे प्रचुर धन और रत्न देकर अनुमति दे दी। तदनन्तर वह वेश्या कुछ सुन्दरी स्त्रियों को साथ लेकर शीघ्रतापूर्वक वन की ओर चल दी।"
धनं च प्रददौ भूरि रत्नानि विविधानि च ।
ततो रूपेण सम्पन्ना वयसा च महीपते ।
स्त्रिय आदाय काश्चित् सा जगाम वनमञ्जसा ॥
साथ ही उसे प्रचुर धन और नाना प्रकारके रत्न भी दिये । युधिष्ठिर! तदनन्तर वह वेश्या रूप और यौवनसे सम्पन्न कुछ सुन्दरी स्त्रियोंको साथ लेकर शीघ्रतापूर्वक वनकी ओर चल दी ।
लोमशजी कहते हैं— भरतनन्दन! उस वेश्याने राजा की आज्ञा के अनुसार और अपनी बुद्धि से भी उनका कार्य सिद्ध करने के लिये नाव पर एक सुन्दर आश्रम बनाया। वह आश्रम भाँति-भाँति के पुष्प और फलों से सुशोभित कृत्रिम वृक्षों से घिरा हुआ था। उन वृक्षों पर नाना प्रकार के गुल्म और लता समूह फैले हुए थे और वे वृक्ष स्वादिष्ट एवं वाञ्छनीय फल देने वाले थे। उन वृक्षों के कारण वह आश्रम अत्यन्त रमणीय और परम मनोहर दिखाई देता था। वह आश्रम देखने में अद्भुत था। तदनन्तर उसने उस नाव को काश्यप गोत्रीय विभाण्डक मुनि के आश्रम से थोड़ी ही दूर पर बाँध दिया और गुप्तचरों को भेजकर यह पता लगा लिया कि इस समय विभाण्डक मुनि अपनी कुटिया से बाहर गये हैं।
अतीव रमणीयं तदतीव च मनोहरम् ।
चक्रे नाव्याश्रमं रम्यमद्भुतोपमदर्शनम् ॥
उन वृक्षोंके कारण वह आश्रम अत्यन्त रमणीय और परम मनोहर दिखायी देता था । वेश्याने उस नावपर जिस सुन्दर आश्रमका निर्माण किया था, वह देखनेमें अद्भुत- सा था ।
विभाण्डक मुनि को दूर देख, उस वेश्याने अपनी परम बुद्धिमती पुत्री को—जो उसी की भाँति वेश्यावृत्ति अपनाये हुए थी—कर्तव्य की शिक्षा देकर मुनि के आश्रम पर भेजा। वह भी कार्यसाधन में कुशल थी। उसने वहाँ जाकर निरन्तर तपस्या में लगे रहने वाले ऋषिकुमार ऋष्यशृङ्ग के समीप उस आश्रम में पहुँचकर उनको देखा।
वेश्या ने पास जाकर कहा— "मुने! तपस्वी लोग कुशल से तो हैं न? आप लोगों को पर्याप्त फल-मूल तो मिल जाते हैं न? आप इस आश्रम में प्रसन्न तो हैं न? मैं इस समय आपके दर्शन के लिये ही यहाँ आयी हूँ। क्या तपस्वी लोगों की तपस्या उत्तरोत्तर बढ़ रही है? आपके पिता का तेज क्षीण तो नहीं हो रहा है? ब्रह्मन्! आप मजे में हैं न? ऋष्यशृङ्गजी! आपके स्वाध्याय का क्रम चल रहा है न?"
कच्चित् तपो वर्धते तापसानां पिता च ते कच्चिदहीनतेजाः ।
कच्चित् त्वया प्रीयते चैव विप्र कच्चित् स्वाध्यायः क्रियते चर्ष्यशृङ्ग ॥
क्या तपस्वीलोगोंकी तपस्या उत्तरोत्तर बढ़ रही है? आपके पिताका तेज क्षीण तो नहीं हो रहा है? ब्रह्मन्! आप मजेमें हैं न? ऋष्यशृंगजी! आपके स्वाध्यायका क्रम चल रहा है न?
ऋष्यशृङ्ग बोले— "ब्रह्मन्! आप अपनी समृद्धि से ज्योति की भाँति प्रकाशित हो रही हैं। मैं आपको अपने लिये वन्दनीय मानता हूँ और स्वेच्छा से धर्म के अनुसार आपके लिये पाद्य-अर्घ्य एवं फल-मूल अर्पण करता हूँ। इस कुशासन पर आप सुखपूर्वक बैठें। इस पर काला मृगचर्म बिछाया गया है, इसलिये इस पर बैठने में आराम रहेगा। आपका आश्रम कहाँ है? और आपका नाम क्या है? ब्रह्मन्! आप देवता के समान यह किस व्रत का आचरण कर रही हैं?"
वेश्या बोली— "काश्यपनन्दन! मेरा आश्रम बड़ा मनोहर है। वह इस पर्वत के उस पार तीन योजन की दूरी पर स्थित है। वहाँ मेरा जो अपना धर्म है, उसके अनुसार आपको मेरा अभिवादन नहीं करना चाहिये। मैं आपके दिये हुए अर्घ्य और पाद्य का स्पर्श नहीं करूँगी। मैं आपके लिये वन्दनीय नहीं हूँ; आप ही मेरे वन्दनीय हैं। ब्रह्मन्! मेरा यह नियम है, जिसके अनुसार मुझे आपका आलिङ्गन करना चाहिये।"
ऋष्यशृङ्ग ने कहा— "ब्रह्मन्! मैं तुम्हें पके फल दे रहा हूँ। ये भिलावा, आँवले, करूषक, इङ्गुद, धन्वन और पीपल के फल प्रस्तुत हैं—इन सबका इच्छानुसार उपयोग कीजिये।"
लोमशजी कहते हैं— राजन्! तदनन्तर वेश्याने उन सब फलों को छोड़कर स्वयं ऋष्यशृङ्ग को अत्यन्त सुन्दर और अमूल्य भक्ष्य पदार्थ दिये। उन परम सरस फलों ने उनकी रुचि को बढ़ाया। साथ ही सुगन्धित मालाएँ तथा विचित्र एवं चमकीले वस्त्र प्रदान किये। इतना ही नहीं, उसने मुनिकुमार को अच्छी श्रेणी के पेय पिलाये जिससे वे बहुत प्रसन्न हुए। वे उसके साथ खेलने लगे और जोर-जोर से हँसने लगे। वेश्या ऋष्यशृङ्ग के पास ही गेंद खेलने लगी। वह अपने अङ्गों को मोड़ती हुई फलों के भार से लदी लता की भाँति झुक जाती और ऋષ્યशृङ्ग मुनि को बार-बार अपने अङ्क में भर लेती थी। साथ ही अपने अङ्गों से उनके अङ्गों को इस प्रकार दबाती मानो उनके भीतर समा जाएगी।
वहाँ शाल, अशोक और तिलक के वृक्ष खूब फूले हुए थे। उनकी डालियों को झुकाकर वह मदोन्मत्त वेश्या लज्जा का नाट्य-सा करती हुई महर्षि के उस पुत्र को लुभाने लगी। ऋष्यशृङ्ग की आकृति में किञ्चित् विकार देखकर उसने बार-बार उनके शरीर को आलिङ्गन के द्वारा दबाया और अग्निहोत्र का बहाना बनाकर वह उनके द्वारा देखी जाती हुई धीरे-धीरे वहाँ से चली गयी।
उसके चले जाने पर उसके अनुराग से उन्मत्त मुनिकुमार ऋष्यशृङ्ग अचेत से हो गये। उस निर्जन स्थान में उनकी मनोवृत्ति उसी की ओर लगी रही और वे लम्बी साँस खींचते हुए अत्यन्त व्यथित हो उठे। तदनन्तर दो घड़ी के बाद हरे-पीले नेत्रों वाले काश्यपनन्दन विभाण्डक मुनि वहाँ आ पहुँचे। वे सिर से लेकर पैरों के नखों तक रोमावलियों से भरे हुए थे। महात्मा विभाण्डक स्वाध्यायशील, सदाचारी तथा समाधिनिष्ठ महर्षि थे।
उस दयनीय दशा में पुत्र को देखकर विभाण्डक मुनि ने पूछा— "तात! आज तुम अग्निकुण्ड में समिधाएँ क्यों नहीं रख रहे हो? क्या तुमने अग्निहोत्र कर लिया? स्रुक् और स्रुवा आदि यज्ञपात्रों को भलीभाँति शुद्ध करके रखा है न? कहीं ऐसा तो नहीं हुआ कि तुमने हवन के लिये दूध देने वाली गाय का बछड़ा खोल दिया हो जिससे वह सारा दूध पी गया हो? बेटा! आज तुम पहले-जैसे दिखाई नहीं देते। किसी भारी चिन्ता में निमग्न हो, अपनी सुध-बुध खो बैठे हो। क्या कारण है जो आज तुम अत्यन्त दीन हो रहे हो? मैं तुमसे पूछता हूँ, बताओ, आज यहाँ कौन आया था?"
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्व के अन्तर्गत तीर्थयात्रा पर्व में लोमश तीर्थयात्रा के प्रसङ्ग में ऋष्यशृङ्गोपाख्यान विषयक एक सौ ग्यारहवाँ अध्याय पूरा हुआ।
"पिताजी! मैं उसी के पास जाता हूँ, देखूँ कि उसकी ब्रह्मचर्य की साधना कैसी है? वह आर्यधर्म का पालन करने वाला ब्रह्मचारी जिस प्रकार तप करता है, उसके साथ रहकर मैं भी वैसी ही तपस्या करना चाहता हूँ। यदि उसे नहीं देखूँगा तो मेरा यह चित्त सन्तप्त होता रहेगा।"
रक्षांसि चैतानि चरन्ति पुत्र रूपेण तेनाद्भुतदर्शनेन ।
अतुल्यवीर्याण्यभिरूपवन्ति विघ्नं सदा तपसश्चिन्तयन्ति ॥
विभाण्डकने कहा — बेटा! इस प्रकार अद्भुत दर्शनीय रूप धारण करके तो राक्षस ही इस वनमें विचरा करते हैं । ये अनुपम पराक्रमी और मनोहर रूप धारण करनेवाले होते हैं, तथा ऋषि- मुनियोंकी तपस्यामें सदा विघ्न डालनेका ही उपाय सोचते रहते हैं ।
ऋष्यशृङ्ग के ये शब्द सुनकर विभाण्डक मुनि गम्भीर हुए। उन्होंने अपने पुत्र को समझाते हुए कहा— "बेटा! इस प्रकार अद्भुत और दर्शनीय रूप धारण करके तो राक्षस ही इस वन में विचरा करते हैं। ये अनुपम पराक्रम वाले और मनोहर रूप धारण करने वाले होते हैं तथा ऋषि-मुनियों की तपस्या में सदा विघ्न डालने का ही उपाय सोचते रहते हैं। हे तात! वे मनोहर रूपधारी राक्षस नाना प्रकार के उपायों द्वारा मुनिलोगों को प्रलोभन में डालते रहते हैं। फिर वे ही भयानक रूप धारण करके वन में निवास करने वाले मुनियों को आनन्दमय लोकों से नीचे गिरा देते हैं। अतः जो साधु पुरुषों को मिलने वाले पुण्यलोकों को पाना चाहता है, उसे मन को संयम में रखकर उन राक्षसों का किसी प्रकार सवेन न करना चाहिए। वे पापाचारी निशाचर तपस्वियों के तप में विघ्न डालकर प्रसन्न होते हैं, अतः तपस्वी को चाहिए कि वह उनकी ओर आँख उठाकर देखे ही नहीं।"
न तानि सेवेत मुनिर्यतात्मा सतां लोकान् प्रार्थयानः कथंचित् ।
कृत्वा विघ्नं तापसानां रमन्ते पापाचारास्तापसस्तान् न पश्येत् ॥
अतः जो साधु पुरुषोंको मिलनेवाले पुण्यलोकोंको पाना चाहता है, वह मुनि मनको संयममें रखकर उन राक्षसोंका ( जो मोहक रूप बनाकर धोखा देनेके लिये आते हैं ) किसी प्रकार सवेन न करे । वे पापाचारी निशाचर तपस्वी मुनियोंके तपमें विघ्न डालकर प्रसन्न होते हैं, अतः तपस्वीको चाहिये कि वह उनकी ओर आँख उठाकर देखे ही नहीं ।
विभाण्डक मुनि ने आगे कहा— "वत्स! जिसे तुम जल समझते थे, वह मद्य था। वह पापजनक और अपेय है, उसे कभी नहीं पीना चाहिए। ये विचित्र, उज्ज्वल और सुगन्धित पुष्पमालाएँ भी मुनियों के योग्य नहीं हैं। ऐसी वस्तुएँ लाने वाले राक्षस ही हैं।" इतना कहकर विभाण्डक मुनि ने अपने पुत्र को उससे मिलने-जुलने से मना कर दिया और स्वयं उस वेश्या की खोज करने लगे। तीन दिनों तक भटकने के बाद जब वे उसका पता न लगा सके, तब वे आश्रम लौट आए।
रक्षांसि तानीति निवार्य पुत्रं विभाण्डकस्तां मृगयाम्बभूव ।
नासादयामास यदा त्र्यहेण तदा स पर्याववृतेऽऽश्रमाय ॥
' ऐसी वस्तुएँ लानेवाले राक्षस ही हैं । ' ऐसा कहकर विभाण्डक मुनिने पुत्रको उससे मिलने - जुलनेसे मना कर दिया और स्वयं उस वेश्याकी खोज करने लगे । तीन दिनोंतक ढूँढ़नेपर भी जब वे उसका पता न लगा सके, तब आश्रमपर लौट आये ।
उधर, जब काश्यपनन्दन विभाण्डक मुनि फल-मूल लेने के लिए पुनः वन में गए, तब वह वेश्या ऋष्यशृङ्ग मुनि को लुभाने के लिए फिर उनके आश्रम पर आयी। उसे देखते ही ऋष्यशृङ्ग मुनि हर्ष से विभोर हो उठे और घबराकर तुरन्त उसके पास दौड़ पड़े। निकट जाकर उन्होंने कहा— "ब्रह्मन्! मेरे पिताजी जब तक लौटकर नहीं आते, तभी तक मैं और आप—दोनों आपके आश्रम की ओर चल दें।"
दृष्ट्वैव तामृष्यशृङ्गः प्रहृष्टः सम्भ्रान्तरूपोऽभ्यपतत् तदानीम् ।
प्रोवाच चैनां भवतः श्रमाय गच्छाव यावन्न पिता ममैति ॥
उसे देखते ही ऋष्यशृंग मुनि हर्ष - विभोर हो उठे और घबराकर तुरंत उसके पास दौड़ गये । निकट जाकर उन्होंने कहा – ' ब्रह्मन्! मेरे पिताजी जबतक लौटकर नहीं आते, तभीतक मैं और आप —दोनों आपके आश्रमकी ओर चल दें '
इस बीच, राजा लोमपाद ने एक युक्ति अपनाई। उन्होंने विभाण्डक मुनि के इकलौते पुत्र को नाव में ले जाकर उस वेश्या को सौंप दिया, जिसने नाव पर ही एक सुन्दर आश्रम बना लिया था। फिर अनेक युवतियाँ भाँति-भाँति के उपायों से उनका मनोरञ्जन करती हुई अङ्गराज के समीप आयीं। नाविकों द्वारा सञ्चालित उस अत्यन्त उज्ज्वल नौका को जल से बाहर निकालकर राजा ने एक स्थान पर स्थापित कर दिया। जितनी दूरी से वह नौकागत आश्रम दिखाई देता था, उतनी ही विस्तृत भूमि पर उन्होंने ऋष्यशृङ्ग मुनि के आश्रम के समान एक विचित्र वन का निर्माण करा दिया, जो 'नाव्याश्रम' के नाम से प्रसिद्ध हुआ।
राजा लोमपाद ने विभाण्डक मुनि के पुत्र को महल के भीतर रनिवास में ठहरा दिया। देखते ही देखते इन्द्रदेव ने वर्षा आरम्भ कर दी और सारा जगत् जल से परिपूर्ण हो गया। राजा की कामना पूरी हुई। उन्होंने प्रसन्न होकर अपनी पुत्री शान्ता का विवाह ऋष्यशृङ्ग मुनि से कर दिया। इसके पश्चात उन्होंने विभाण्डक मुनि के क्रोध को शान्त करने का उपाय भी किया। जिस मार्ग से महर्षि आने वाले थे, वहाँ स्थान-स्थान पर बहुत से गाय-बैल रखवा दिए गए और किसानों द्वारा खेतों की जुताई आरम्भ करा दी गई।
सलोमपादः परिपूर्णकामः सुतां ददावृष्यशृङ्गाय शान्ताम् ।
क्रोधप्रतीकारकरं च चक्रे गाश्चैव मार्गेषु च कर्षणानि ॥
लोमपादकी कामना पूरी हुई । उन्होंने प्रसन्न होकर अपनी पुत्री शान्ता ऋष्यशृंग मुनिको ब्याह दी । फिर विभाण्डक मुनिके क्रोधके निवारणका भी उपाय कर दिया । जिस रास्तेसे महर्षि आनेवाले थे, उसमें स्थान - स्थानपर बहुत - से गाय - बैल रखवा दिये और किसानोंद्वारा खेतोंकी जुताई आरम्भ करा दी ।
राजा ने पशु-रक्षकों को आदेश दिया था कि जब महर्षि विभाण्डक पूछें, तो हाथ जोड़कर कहना— "ये सब आपके पुत्र के ही पशु हैं, ये खेत भी उन्हीं के जोते जा रहे हैं। महर्षे! आज्ञा दें, हम आपका कौन सा प्रिय कार्य करें? हम सब लोग आपके आज्ञापालक दास हैं।"
तभी प्रचण्ड कोपधारी महात्मा विभाण्डक मुनि फल-मूल लेकर अपने आश्रम पहुँचे। वहाँ बहुत खोजने पर भी जब उन्हें अपना पुत्र नहीं दिखा, तो वे अत्यन्त क्रोधित हो गए। उनका हृदय विदीर्ण होने लगा और मन में सन्देह हुआ कि कहीं यह राजा लोमपाद की करतूत तो नहीं? वे क्रोध में चम्पानगरी की ओर चल दिए, मानो अङ्गराज को उनके राष्ट्र सहित जला देना चाहते हों।
ततः स कोपेन विदीर्यमाण आशङ्कमानो नृपतेर्विधानम् ।
जगाम चम्पां प्रति धक्ष्यमाण- स्तमङ्गराजं सपुरं सराष्ट्रम् ॥
कोपसे उनका हृदय विदीर्ण-सा होने लगा | उनके मनमें यह संदेह हुआ कि कहीं राजा लोमपादकी तो यह करतूत नहीं है । तब वे चम्पानगरीकी ओर चल दिये, मानो अंगराजको उनके राष्ट्र और नगरसहित जला देना चाहते हों ।
थककर और भूख से पीड़ित होकर जब वे सायङ्काल में समृद्ध गोष्ठों में पहुँचे, तो वहाँ के गोपगणों ने उनकी विधिपूर्वक पूजा की। वे राजा की भाँति सुख-सुविधाओं के बीच वहीं रात भर रहे। वहाँ लोगों ने आकर कहा— "यह सारा धन आपके पुत्र का ही है।" देश-देश में सम्मानित होकर और मधुर वचन सुनते-सुनते मुनि का रजोगुण जनित क्रोध शान्त हो गया। वे प्रसन्नतापूर्वक राजधानी पहुँचे और अङ्गराज से मिले।
स वै श्रान्तः क्षुधितः काश्यपस्तान् घोषान् समासादितवान् समृद्धान् ।
गोपैश्च तैर्विधिवत् पूज्यमानो राजेव तां रात्रिमुवास तत्र ॥
थककर भूखसे पीड़ित होनेपर विभाण्डक मुनि सायंकालमें उन्हीं समृद्धिशाली गोष्ठोंमें गये । गोपगणोंने उनकी विधिपूर्वक पूजा की । वे राजाकी भाँति सुख - सुविधाके साथ वहीं रातभर रहे ।
राजा लोमपाद द्वारा पूजित होने के बाद मुनि ने अपने पुत्र को उसी प्रकार ऐश्वर्य सम्पन्न देखा, जैसे देवराज इन्द्र स्वर्गलोक में देखे जाते हैं। पुत्र के पास ही उन्होंने बहू शान्ता को भी देखा, जो विद्युत के समान देदीप्यमान हो रही थी। अपने पुत्र के अधिकार में आए हुए ग्राम, घोष और बहू शान्ता को देखकर उनका महान क्रोध शान्त हो गया। उस समय विभाण्डक मुनि ने राजा लोमपाद पर बड़ी कृपा की।
स पूजितस्तेन नरर्षभेण ददर्श पुत्रं दिवि देवं यथेन्द्रम् ।
शान्तां स्नुषां चैव ददर्श तत्र सौदामनीमुच्चरन्तीं यथैव ॥
नरश्रेष्ठ लोमपादसे पूजित हो मुनिने अपने पुत्रको उसी प्रकार ऐश्वर्यसम्पन्न देखा, जैसे देवराज इन्द्र स्वर्गलोकमें देखे जाते हैं । पुत्रके पास ही उन्होंने बहू शान्ताको भी देखा, जो विद्युत्के समान उद्भासित हो रही थी ।
सूर्य और अग्नि के समान प्रभावशाली महर्षि ने अपने पुत्र को वहीं छोड़ते हुए कहा— "बेटा! पुत्र उत्पन्न हो जाने पर इन अङ्गराज के सारे प्रिय कार्य सिद्ध करके फिर वन में ही आ जाना।" ऋष्यशृङ्ग ने पिता की आज्ञा का अक्षरशः पालन किया और अन्ततः वे पुनः उसी आश्रम में लौट आए जहाँ उनके पिता रहते थे। शान्ता उसी प्रकार उनकी सेवा करने लगी जैसे आकाश में रोहिणी चन्द्रमा की होती है। जिस प्रकार नारायणी इन्द्रसेना सदा महर्षि मुद्गल के अधीन रहती है और सीता श्रीराम के अधीन रही हैं, उसी प्रकार शान्ता भी सदा अधीन रहकर वनवासी ऋष्यशृङ्ग की प्रसन्नतापूर्वक सेवा करती थी। उनका यह पुण्यमय आश्रम, जो पवित्र कीर्ति से युक्त है, इस महान कुण्ड की शोभा बढ़ाता हुआ प्रकाशित हो रहा है।
स तत्र निक्षिप्य सुतं महर्षि- रुवाच सूर्याग्निसमप्रभावः ।
जाते च पुत्रे वनमेवाव्रजेथा राज्ञः प्रियाण्यस्य सर्वाणि कृत्वा ॥
सूर्य और अग्निके समान प्रभावशाली महर्षिने अपने पुत्रको वहीं छोड़ दिया और कहा —– ' बेटा! पुत्र उत्पन्न हो जानेपर इन अंगराजके सारे प्रिय कार्य सिद्ध करके फिर वनमें ही आ जाना'
In English
The Story of Rishyasringa
Rishyasringa is the son of Vibhandaka born from a deer. To end a drought in King Lomapada's kingdom, a woman creates an artificial garden to lure the celibate Rishyasringa away from his father's ashram.
This page answers
- How was rishyasringa born?
- Why did indra stop raining in lomapada's kingdom?
- How did the woman lure rishyasringa to her garden?
- Who is vibhandaka?
Also written: Rishyashringopakhyana, Rishyashringa, Vibhandaka, Lomapada, Shanta, Indra, Veshya, ऋष्यशृङ्गोपाख्यान