श्रीगणेशाय नमः।

महाभारत — खण्ड २ — पृष्ठ 771–780

महाभारत — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 771–780

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याद करने लगते थे । इस प्रकार बहुत- सी अद्भुत बातें देखकर पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरने लोमशजीसे पुनः इस अद्भुत अवस्थाके विषयमें पूछा ॥ (युधिष्ठिर उवाच यदेतद् भगवंश्चित्रं पर्वतेऽस्मिन् महौजसि । एतन्मे सर्वमाचक्ष्व विस्तरेण महाद्युते ॥ ) युधिष्ठिरने कहा – महातेजस्वी भगवन्! इस परम तेजोमय पर्वतपर जो ये आश्चर्यजनक बातें होती हैं, इसका क्या रहस्य है? यह सब विस्तारपूर्वक मुझे बताइये । लोमशउवाच

यथाश्रुतमिदं पूर्वमस्माभिररिकर्शन ।

तदेकाग्रमना राजन् निबोध गदतो मम ॥ ७ ॥

तब लोमशजीने कहा – शत्रुसूदन! हमने पूर्वकालमें जैसा सुन रखा है वैसा बताया जाता है । तुम एकाग्रचित्त हो मेरे मुखसे इसका रहस्य सुनो ॥ ७ ॥

अस्मिन्नृषभकूटेऽभूदृषभो नाम तापसः ।

अनेकशतवर्षायुस्तपस्वी कोपनो भृशम् ॥ ८ ॥

पहलेकी बात है, इस ऋषभकूटपर ऋषभनामसे प्रसिद्ध एक तपस्वी रहते थे । उनकी

आयु कई सौ वर्षोंकी थी । वे तपस्वी होनेके साथ ही बड़े क्रोधी थे ॥

सवै सम्भाष्यमाणोऽन्यैः कोपाद् गिरिमुवाच ह ।

य इह व्याहरेत् कश्चिदुपलानुत्सृजेस्तथा ॥ ९ ॥

वातं चाहूय मा शब्दमित्युवाच स तापसः ।

व्याहरंश्चेह पुरुषो मेघशब्देन वार्यते ॥ १० ॥

एवमेतानि कर्माणि राजंस्तेन महर्षिणा ।

कृतानि कानिचित् क्रोधात् प्रतिषिद्धानि कानिचित् ॥ ११ ॥

उन्होंने दूसरोंके बुलाने पर कुपित होकर उस पर्वतसे कहा- 'जो कोई यहाँपर बातचीत करे उसपर तू ओले बरसा । ' इसी प्रकार वायुको भी बुलाकर उन तपस्वी मुनिने कहा – ' देखो, यहाँ किसी प्रकारका शब्द नहीं होना चाहिये । ' तबसे जो कोई पुरुष यहाँ बोलता है उसे मेघकी गर्जनाद्वारा रोका जाता है । राजन्! इस प्रकार उन महर्षिने ही ये अद्भुत कार्य किये हैं । उन्होंने क्रोधवश कुछ कार्योंका विधान और कुछ बातोंका निषेध कर दिया है ॥ ९

−११ नन्दां॥ त्वभिगता देवाः पुरा राजन्निति श्रुतिः ।

अन्वपद्यन्त सहसा पुरुषा देवदर्शिनः ॥ १२ ॥

राजन्! यह सुना जाता है कि प्राचीन कालमें देवतालोग नन्दाके तटपर आये थे, उस समय उनके दर्शनकी इच्छासे बहुतेरे मनुष्य सहसा वहाँ आ पहुँचे ॥ १२ ॥

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ते दर्शनं त्वनिच्छन्तो देवाः शक्रपुरोगमाः ।

दुर्गं चक्रुरिमं देशं गिरिं प्रत्यूहरूपकम् ॥ १३ ॥

इन्द्र आदि देवता उन्हें दर्शन देना नहीं चाहते थे, अतः विघ्नस्वरूप इस पर्वतीय प्रदेशको उन्होंने जनसाधारणके लिये दुर्गम बना दिया ॥ १३ ॥

तदाप्रभृति कौन्तेय नरा गिरिमिमं सदा ।

नाशक्नुवन्नभिद्रष्टुं कुत एवाधिरोहितुम् ॥ १४ ॥

कुन्तीनन्दन! तभीसे साधारण मनुष्य इस पर्वतको देख भी नहीं सकते, चढ़ना तो दूरकी बात है ॥ १४ ॥

नातप्ततपसा शक्यो द्रष्टुमेष महागिरिः ।

आरोढुं वापि कौन्तेय तस्मान्नियतवाग् भव ॥ १५ ॥

कुन्तीकुमार! जिसने तपस्या नहीं की है वह मनुष्य इस महान् पर्वतको न तो देख सकता है और न चढ़ ही सकता है; अतः तुम मौन व्रत धारण करो ॥ १५ ॥

इह देवास्तदा सर्वे यज्ञानाजह्रुरुत्तमान् ।

तेषामेतानि लिङ्गानि दृश्यन्तेद्यापि भारत ॥ १६ ॥

उन दिनों सम्पूर्ण देवताओंने यहाँ आकर उत्तम यज्ञोंका अनुष्ठान किया था । भारत! उनके ये चिह्न आज भी प्रत्यक्ष देखे जाते हैं ॥ १६ ॥

कुशाकारेव दूर्वेयं संस्तीर्णेव च भूरियम् ।

यूपप्रकारा बहवो वृक्षाश्चेमे विशाम्पते ॥ १७ ॥

यह दूर्वा कुशके आकारकी दिखायी देती है और यह भूमि ऐसी लगती है मानो इसपर कुश बिछाये गये हों। महाराज! ये वृक्ष भी यज्ञयूपके समान जान पड़ते हैं ॥ १७ ॥

देवाश्च ऋषयश्चैव वसन्त्यद्यापि भारत ।

तेषां सायं तथा प्रातर्दृश्यते हव्यवाहनः ॥ १८ ॥

भारत! आज भी यहाँ देवता तथा ऋषि निवास करते हैं । सायंकाल और प्रातः काल यहाँ उनके द्वारा प्रज्वलित की हुई अग्निका दर्शन होता है ॥ १८ ॥

इहाप्लुतानां कौन्तेय सद्यः पाप्माभिहन्यते ।

कुरुश्रेष्ठाभिषेकं वै तस्मात् कुरु सहानुजः ॥ १ ९ ॥

कुन्तीनन्दन! इस तीर्थमें गोता लगानेवाले मानवोंका सारा पाप तत्काल नष्ट हो जाता है । अतः कुरुश्रेष्ठ! तुम अपने भाइयोंके साथ यहाँ स्नान करो ॥ १ ९ ॥

ततो नन्दाप्लुताङ्गस्त्वं कौशिकीमभियास्यसि ।

विश्वामित्रेण यत्रोग्रं तपस्तप्तमनुत्तमम् ॥ २० ॥

नन्दामें गोता लगानेके पश्चात् तुम्हें कौशिकीके तटपर चलना होगा जहाँ महर्षि विश्वामित्रजीने उत्तम एवं उग्र तपस्या की थी ॥ २० ॥

वैशम्पायन उवाच

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ततस्तत्र समाप्लुत्य गात्राणि सगणो नृपः ।

जगाम कौशिकीं पुण्यां रम्यां शीतजलां शुभाम् ॥ २१ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं - तदनन्तर राजा युधिष्ठिर अपने दल- बलके साथ नन्दामें गोता लगाकर रमणीय एवं शीतल जलवाली शुभ पुण्यमयी कौशिकीके तटपर गये ॥ लोमश उवाच

एषा देवनदी पुण्या कौशिकी भरतर्षभ ।

विश्वामित्राश्रमो रम्य एष चात्र प्रकाशते ॥ २२ ॥

वहाँ लोमशजीने कहा - भरतश्रेष्ठ! यह देवताओंकी नदी पुण्यसलिला कौशिकी है और यह विश्वामित्रका रमणीय आश्रम है, जो यहाँ प्रकाशित हो रहा है ॥ २२ ॥

आश्रमश्चैव पुण्याख्यः काश्यपस्य महात्मनः ।

ऋष्यशृङ्गः सुतो यस्य तपस्वी संयतेन्द्रियः ॥ २३ ॥

तपसो यः प्रभावेण वर्षयामास वासवम् ।

अनावृष्ट्यां भयाद् यस्य ववर्ष बलवृत्रहा ॥ २४ ॥

यहीं कश्यपगोत्रीय महात्मा विभाण्डकका ' पुण्य' नामक आश्रम है । इन्हींके तपस्वी एवं जितेन्द्रिय पुत्र महात्मा ऋष्यशृंग हैं, जिन्होंने अपनी तपस्याके प्रभावसे इन्द्रद्वारा वर्षा करवायी थी । उन दिनों देशमें घोर अनावृष्टि फैल रही थी, वैसे समयमें ऋष्यशृंग मुनिके भयसे बल और वृत्रासुरके विनाशक देवराज इन्द्रने उस देशमें वर्षा की थी ॥ २३-२४ ॥

मृग्यां जातः स तेजस्वी काश्यपस्य सुतः प्रभुः ।

विषये लोमपादस्य यश्चकाराद्भुतं महत् ॥ २५ ॥

वे तेजस्वी एवं शक्तिशाली मुनि मृगीके पेटसे पैदा हुए थे और कश्यपनन्दन विभाण्डकके पुत्र थे । उन्होंने राजा लोमपादके राज्यमें अत्यन्त अद्भुत कार्य किया था ॥ २५ ॥

निर्वर्तितेषु सस्येषु यस्मै शान्तां ददौ नृपः ।

लोमपादो दुहितरं सावित्रीं सविता यथा ॥ २६ ॥

जब वर्षासे खेती अच्छी तरह लहलहा उठी तब राजा लोमपादने अपनी पुत्री शान्ता ऋष्यशृंगको ब्याह दी; ठीक उसी तरह, जैसे सूर्यदेवने अपनी बेटी सावित्रीका ब्रह्माजीके साथ ब्याह किया था ॥ २६ ॥

युधिष्ठिर उवाच

ऋष्यशृङ्गः कथं मृग्यामुत्पन्नः काश्यपात्मजः ।

विरुद्धे योनिसंसर्गे कथं च तपसा युतः ॥ २७ ॥

किमर्थं च भयाच्छक्रस्तस्य बालस्य धीमतः ।

अनावृष्ट्यां प्रवृत्तायां ववर्ष बलवृत्रहा ॥ २८ ॥

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युधिष्ठिरने पूछा— भगवन्! कश्यपनन्दन विभाण्डकके पुत्र ऋष्यशृंग मृगीके पेटसे कैसे उत्पन्न हुए? मनुष्यका पशुयोनिसे संसर्ग करना तो शास्त्र और व्यवहार दोनों ही दृष्टियोंसे विरुद्ध है । ऐसे विरुद्ध योनि- संसर्गसे उत्पन्न हुआ बालक तपस्वी कैसे हो सका? उस बुद्धिमान् बालकके भयसे बल और वृत्रासुरका विनाश करनेवाले देवराज इन्द्रने अनावृष्टिके समय वर्षा कैसे की? ॥ २७-२८ ॥

कथंरूपा च सा शान्ता राजपुत्री यतव्रता ।

लोभयामास या चेतो मृगभूतस्य तस्य वै ॥ २९ ॥

लोमपादश्च राजर्षिर्यदाश्रूयत धार्मिकः ।

कथं वै विषये तस्य नावर्षत् पाकशासनः ॥ ३० ॥

नियम और व्रतका पालन करनेवाली राजकुमारी शान्ता भी कैसी थी, जिसने मृगस्वरूप मुनिका भी मन मोह लिया । राजर्षि लोमपाद तो बड़े धर्मात्मा सुने गये हैं, फिर उनके राज्यमें इन्द्र वर्षा क्यों नहीं करते थे? ॥ २ ९ -३० ॥

एतन्मे भगवन् सर्वं विस्तरेण यथातथम् ।

वक्तुमर्हसि शुश्रूषोर्ऋष्यशृङ्गस्य चेष्टितम् ॥ ३१ ॥

भगवन्! ये सब बातें आप विस्तारपूर्वक यथार्थ रूपसे बताइये । मैं महर्षिऋष्यशृंगके चरित्रको सुनना चाहता हूँ ॥ ३१ ॥

लोमशउवाच

विभाण्डकस्य विप्रर्षेस्तपसा भावितात्मनः ।

अमोघवीर्यस्य सतः प्रजापतिसमद्युतेः ॥ ३२ ॥

शृणु पुत्रो यथा जात ऋष्यशृङ्ग प्रतापवान् ।

महार्हस्य महातेजा बालः स्थविरसम्मतः ॥ ३३ ॥

लोमशजीने कहा- राजन्! ब्रह्मर्षि विभाण्डकका अन्तःकरण तपस्यासे पवित्र हो गया था । वे प्रजापतिके समान तेजस्वी और अमोघवीर्य महात्मा थे । उनके प्रतापी पुत्र ऋष्यशृंगका जन्म कैसे हुआ, यह बताता हूँ, सुनो । जैसे विभाण्डक मुनि परम पूजनीय थे, वैसे ही उनका पुत्र भी बड़ा तेजस्वी हुआ। वह बाल्यावस्थामें भी वृद्ध पुरुषोंद्वारा सम्मानित होता था ॥ ३२-३३ ॥

महाहृद समासाद्य काश्यपस्तपसि स्थितः ।

दीर्घकालं परिश्रान्त ऋषिः स देवसम्मितः ॥ ३४ ॥

कश्यपगोत्रीय विभाण्डक मुनि देवताओंके समान सुन्दर थे । वे एक बहुत बड़े कुण्डमें

प्रविष्ट होकर तपस्या करने लगे । उन्होंने दीर्घकालतक महान् क्लेश सहन किया ॥ ३४ ॥

तस्य रेतः प्रचस्कन्द दृष्ट्वाप्सरसमुर्वशीम् ।

अप्सूपस्पृशतो राजन् मृगी तच्चापिबत् तदा ॥ ३५ ॥

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सह तोयेन तृषिता गर्भिणी चाभवत् ततः ।

सा पुरोक्ता भगवता ब्रह्मणा लोककर्तृणा ॥ ३६ ॥

देवकन्या मृगी भूत्वा मुनिं सूय विमोक्ष्यसे ।

अमोघत्वाद् विधेश्चैव भावित्वाद् दैवनिर्मितात् ॥ ३७ ॥

तस्यां मृग्यां समभवत् तस्य पुत्रो महानृषिः ।

ऋष्यशृङ्गस्तपोनित्यो वन एवाभ्यवर्तत ॥ ३८ ॥

राजन्! एक दिन जब वे जलमें स्नान कर रहे थे, उर्वशी अप्सराको देखकर उनका वीर्य स्खलित हो गया । उसी समय प्याससे व्याकुल हुई एक मृगी वहाँ आयी और पानीके साथ उस वीर्यको भी पी गयी । इससे उसके गर्भ रह गया। वह पूर्वजन्ममें एक देवकन्या थी । लोकस्रष्टा भगवान् ब्रह्माने उसे यह वचन दिया था कि तू मृगी होकर एक मुनिको जन्म देनेके पश्चात् उस योनिसे मुक्त हो जायगी । ब्रह्माजीकी वाणी अमोघ है और दैवके विधानको कोई टाल नहीं सकता, इसलिये विभाण्डकके पुत्र महर्षि ऋष्यशृंगका जन्म मृगीके ही पेटसे हुआ । वे सदा तपस्यामें संलग्न रहकर वनमें ही निवास करते थे ॥ ३५-३८ ॥ तस्यर्षेः शृङ्गं शिरसि राजन्नासीन्महात्मनः ।

पृष्ठ 776

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तेनर्ष्यशृङ्ग इत्येवं तदा स प्रथितोऽभवत् ॥ ३ ९ ॥ राजन्! उन महात्मा मुनिके सिरपर एक सींग था, इसलिये उस समय उनका ऋष्यशृंग नाम प्रसिद्ध हुआ ॥ ३ ९ ॥

न तेन दृष्टपूर्वोऽन्यः पितुरन्यत्र मानुषः ।

तस्मात् तस्य मनो नित्यं ब्रह्मचर्येऽभवन्नृप ॥ ४० ॥

नरेश्वर! उन्होंने अपने पिताके सिवा दूसरे किसी मनुष्यको पहले कभी नहीं देखा था, इसलिये उनका मन सदा स्वभावसे ही ब्रह्मचर्यमें संलग्न रहता था ॥ ४० ॥

एतस्मिन्नेव काले तु सखा दशरथस्य वै ।

लोमपाद इति ख्यातो ह्यङ्गानामीश्वरोऽभवत् ॥ ४१ ॥

इन्हीं दिनों राजा दशरथके मित्र लोमपाद अंगदेशके राजा हुए ॥ ४१ ॥

तेन कामात् कृतं मिथ्या ब्राह्मणस्येति नः श्रुतिः ।

स ब्राह्मणैः परित्यक्तस्ततो वै जगतः पतिः ॥ ४२ ॥

पुरोहितापचाराच्च तस्य राज्ञो यदृच्छया ।

नववर्ष सहस्राक्षस्ततोऽपीड्यन्त वै प्रजाः ॥ ४३ ॥

उन्होंने जान -बूझकर एक ब्राह्मणके साथ मिथ्या व्यवहार किया-यह बात हमारे सुननेमें आयी है । इसी अपराधके कारण ब्राह्मणोंने राजा लोमपादको त्याग दिया था । राजाने पुरोहितपर मनमाना दोषारोपण किया था, इसलिये इन्द्रने उनके राज्यमें वर्षा बंद कर दी । इस अनावृष्टिके कारण प्रजाको बड़ा कष्ट होने लगा ॥ ४२-४३ ॥

स ब्राह्मणान् पर्यपृच्छत् तपोयुक्तान् मनीषिणः ।

प्रवर्षणे सुरेन्द्रस्य समर्थान् पृथिवीपते ॥ ४४ ॥

युधिष्ठिर! तब राजाने तपस्वी, मेधावी और इन्द्रसे वर्षा करवाने में समर्थ ब्राह्मणोंको बुलाकर इस संकटके निवारणका उपाय पूछा ॥ ४४ ॥

कथं प्रवर्षेत् पर्जन्य उपायः परिदृश्यताम् ।

तमूचुश्चोदितास्ते तु स्वमतानि मनीषिणः ॥ ४५ ॥

'विप्रगण! मेघ कैसे वर्षा करे –यह उपाय सोचिये। ' उनके पूछनेपर मनीषी महात्माओंने अपना- अपना विचार बताया ॥ ४५ ॥

तत्र त्वेको मुनिवरस्तं राजानमुवाच ह ।

कुपितास्तव राजेन्द्र ब्राह्मणा निष्कृतिं चर ॥ ४६ ॥

उन्हीं ब्राह्मणोंमें एक श्रेष्ठ महर्षि भी थे । उन्होंने राजासे कहा- ' राजेन्द्र! तुम्हारे ऊपर ब्राह्मण कुपित हैं; इसके लिये तुम प्रायश्चित्त करो ' ॥ ४६ ॥

ऋष्यशृङ्गं मुनिसुतमानयस्व च पार्थिव ।

वानेयमनभिज्ञं च नारीणामार्जवे रतम् ॥ ४७ ॥

स चेदवतरेद् राजन् विषयं ते महातपाः ।

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सद्यः प्रवर्षेत् पर्जन्य इति मे नात्र संशयः ॥ ४८ ॥

' भूपाल! साथ ही हम तुम्हें यह सलाह देते हैं कि अपने राज्यमें महर्षि विभाण्डकके पुत्र वनवासी ऋष्यशृंगको बुलाओ । वे स्त्रियोंसे सर्वथा अपरिचित हैं और सदा सरल व्यवहारमें ही तत्पर रहते हैं । महाराज! वे महातपस्वी ऋष्यशृङ्ग यदि आपके राज्यमें पदार्पण करें तो तत्काल ही मेघ वर्षा करेगा इस विषयमें मुझे तनिक भी संदेह नहीं है ' ॥ ४७-४८ ॥

एतच्छ्रुत्वा वचो राजन् कृत्वा निष्कृतिमात्मनः ।

स गत्वा पुनरागच्छत् प्रसन्नेषु द्विजातिषु ॥ ४ ९ ॥

‘ राजन्! यह सुनकर राजा लोमपाद अपने अपराधका प्रायश्चित्त करके ब्राह्मणोंके पास गये और जब वे प्रसन्न हो गये तब पुनः अपनी राजधानीको लौट आये' ॥ ४ ९ ॥

राजानमागतं श्रुत्वा प्रतिसंजहृषुः प्रजाः ।

ततोऽङ्गपतिराहूय सचिवान् मन्त्रकोविदान् ॥ ५० ॥

ऋष्यशृङ्गागमे यत्नमकरोन्मन्त्रनिश्चये ।

सोऽध्यगच्छदुपायं तु तैरमात्यैः सहाच्युतः ॥ ५१ ॥

शास्त्रज्ञैरलमर्थज्ञैर्नीत्यां च परिनिष्ठितैः ।

ततश्चानाययामास वारमुख्या महीपतिः ॥ ५२ ॥

वेश्याः सर्वत्र निष्णातास्ता उवाच स पार्थिवः ।

ऋष्यशृङ्गमृषेः पुत्रमानयध्वमुपायतः ॥ ५३ ॥

राजाका आगमन सुनकर प्रजाजनोंको बड़ा हर्ष हुआ । तदनन्तर अंगराज मन्त्रकुशल मन्त्रियोंको बुलाकर उनसे सलाह करके एक निश्चयपर पहुँच जानेके बाद मुनिकुमार ऋष्यशृंगको अपने यहाँ ले आनेके प्रयत्नमें लग गये । राजाके मन्त्री शास्त्रज्ञ, अर्थशास्त्रके विद्वान् और नीतिनिपुण थे । अपनी मर्यादासे कभी च्युत न होनेवाले नरेशने उन मन्त्रियोंके साथ विचार करके एक उपाय जान लिया । तत्पश्चात् भूपाल लोमपादने दूसरोंको लुभानेकी सब कलाओंमें कुशल प्रधान-प्रधान वेश्याओंको बुलाया और कहा - ' तुमलोग कोई उपाय करके मुनिकुमार ऋष्यशृंगको यहाँ ले आओ ॥ ५०–५३ ॥

लोभयित्वाभिविश्वास्य विषयं मम शोभनाः ।

ता राजभयभीताश्च शापभीताश्च योषितः ॥ ५४ ॥

अशक्यमूचुस्तत् कार्यं विवर्णा गतचेतसः ।

तत्र त्वेका जरद्योषा राजानमिदमब्रवीत् ॥ ५५ ॥

' सुन्दरियो! तुम लुभाकर उन्हें सब प्रकारसे सुख- सुविधाका विश्वास दिलाकर मेरे राज्यमें ले आना । ' महाराजकी यह बात सुनते ही वेश्याओंका रंग फीका पड़ गया । वे अचेत- सी हो गयीं । एक ओर तो उन्हें राजाका भय था और दूसरी ओर वे मुनिके शापसे

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डरी हुई थीं; अतः उन्होंने इस कार्यको असम्भव बताया । उन सबमें एक बूढ़ी स्त्री थी । उसने राजासे इस प्रकार कहा- ॥ ५४-५५ ॥

प्रयतिष्ये महाराज तमानेतुं तपोधनम् ।

अभिप्रेतांस्तु मे कामांस्त्वमनुज्ञातुमर्हसि ॥ ५६ ॥

ततः शक्ष्याम्यानयितुमृष्यशृङ्गमृषेः सुतम् ।

तस्याः सर्वमभिप्रेतमन्वजानात् स पार्थिवः ॥ ५७ ॥

' महाराज! मैं उन तपोधन मुनिकुमारको लानेका प्रयत्न करूँगी; परंतु आप यह आज्ञा दें कि मैं इसके लिये मनचाही व्यवस्था कर सकूँ । यदि मेरी इच्छा पूर्ण हुई तो मैं मुनिपुत्र ऋष्यशृंगको यहाँ लानेमें सफल हो सकूँगी। ' राजाने उसकी इच्छाके अनुसार व्यवस्था करनेकी आज्ञा दे दी ॥ ५६-५७ ॥ धनं च प्रददौ भूरि रत्नानि विविधानि च ।

ततो रूपेण सम्पन्ना वयसा च महीपते ।

स्त्रिय आदाय काश्चित् सा जगाम वनमञ्जसा ॥ ५८ ॥

साथ ही उसे प्रचुर धन और नाना प्रकारके रत्न भी दिये । युधिष्ठिर! तदनन्तर वह वेश्या रूप और यौवनसे सम्पन्न कुछ सुन्दरी स्त्रियोंको साथ लेकर शीघ्रतापूर्वक वनकी ओर चल दी ॥ ५८ ॥

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि लोमशतीर्थयात्रायामृष्यशृंगोपाख्याने दशाधिकशततमोऽध्यायः ॥ ११० ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें लोमशतीर्थयात्राके प्रसंगमें ऋष्यशृंगोपाख्यानविषयक एक सौ दसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ११० ॥

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एकादशाधिकशततमोऽध्यायः वेश्याका ऋष्यशृंगको लुभाना और विभाण्डक मुनिका आश्रमपर आकर अपने पुत्रकी चिन्ताका कारण पूछना लोमशउवाच

सा तु नाव्याश्रमं चक्रे राजकार्यार्थसिद्धये ।

संदेशाच्चैव नृपतेः स्वबुद्धया चैव भारत ॥ १ ॥

लोमशजी कहते हैं- भरतनन्दन! उस वेश्याने राजाकी आज्ञाके अनुसार और अपनी बुद्धिसे भी उनका कार्य सिद्ध करनेके लिये नावपर एक सुन्दर आश्रम बनाया ॥ १ ॥

नानापुष्पफलैर्वृक्षैः कृत्रिमैरुपशोभितैः ।

नानागुल्मलतोपेतैः स्वादुकामफलप्रदैः ॥ २ ॥

वह आश्रम भाँति- भाँतिके पुष्प और फलोंसे सुशोभित कृत्रिम वृक्षोंसे घिरा हुआ था । उन वृक्षोंपर नाना प्रकारके गुल्म और लतासमूह फैले हुए थे और वे वृक्ष स्वादिष्ट एवं वांछनीय फल देनेवाले थे ॥ २ ॥

अतीव रमणीयं तदतीव च मनोहरम् ।

चक्रे नाव्याश्रमं रम्यमद्भुतोपमदर्शनम् ॥ ३ ॥

उन वृक्षोंके कारण वह आश्रम अत्यन्त रमणीय और परम मनोहर दिखायी देता था । वेश्याने उस नावपर जिस सुन्दर आश्रमका निर्माण किया था, वह देखनेमें अद्भुत- सा था ॥ ३ ॥

ततो निबध्य तां नावमदूरे काश्यपाश्रमात् ।

चारयामास पुरुषैर्विहारं तस्य वै मुनेः ॥ ४ ॥

तदनन्तर उसने अपनी उस नावको काश्यप गोत्रीय विभाण्डक मुनिके आश्रमसे थोड़ी ही दूरपर बाँध दिया और गुप्तचरोंको भेजकर यह पता लगा लिया कि इस समय विभाण्डक मुनि अपनी कुटियासे बाहर गये हैं ॥ ४ ॥

ततो दुहितरं वेश्यां समाधायेतिकार्यताम् ।

दृष्ट्वान्तरं काश्यपस्य प्राहिणोद् बुद्धिसम्मताम् ॥ ५ ॥

तदनन्तर विभाण्डक मुनिको दूर गया देख उस वेश्याने अपनी परम बुद्धिमती पुत्रीको जो उसीकी भाँति वेश्यावृति अपनाये हुए थी, कर्तव्यकी शिक्षा देकर मुनिके आश्रमपर भेजा ॥ ५ ॥

सा तत्र गत्वा कुशला तपोनित्यस्य संनिधौ ।

आश्रमं तं समासाद्य ददर्श तमृषेः सुतम् ॥ ६ ॥

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वह भी कार्यसाधनमें कुशल थी । उसने वहाँ जाकर निरन्तर तपस्यामें लगे रहनेवाले ऋषिकुमार ऋष्यशृंगके समीप उस आश्रममें पहुँचकर उनको देखा ॥ ६ ॥

वेश्योवाच कच्चिन्मुने कुशलं तापसानां

कच्चिच्च वो मूलफलं प्रभूतम् ।

कच्चिद् भवान् रमते चाश्रमेऽस्मिं- स्त्वां वै द्रष्टुं साम्प्रतमागतोऽस्मि ॥ ७ ॥

‘ तत्पश्चात्' वेश्याने कहा - मुने! तपस्वीलोग कुशलसे तो हैं न? आपलोगोंको पर्याप्त फल- मूल तो मिल जाते हैं न? आप इस आश्रममें प्रसन्न तो हैं न? मैं इस समय आपके दर्शनके लिये ही यहाँ आयी हूँ ॥ ७ ॥

कच्चित् तपो वर्धते तापसानां पिता च ते कच्चिदहीनतेजाः । कच्चित् त्वया प्रीयते चैव विप्र कच्चित् स्वाध्यायः क्रियते चर्ष्यशृङ्ग ॥ ८ ॥

क्या तपस्वीलोगोंकी तपस्या उत्तरोत्तर बढ़ रही है? आपके पिताका तेज क्षीण तो नहीं हो रहा है? ब्रह्मन्! आप मजेमें हैं न? ऋष्यशृंगजी! आपके स्वाध्यायका क्रम चल रहा है न? ॥ ८ ॥

ऋष्यशृङ्ग उवाच ऋद्धया भवाञ्ज्योतिरिव प्रकाशते मन्ये चाहं त्वामभिवादनीयम् । पाद्यं वै ते सम्प्रदास्यामि कामाद् यथाधर्मं फलमूलानि चैव ॥ ९ ॥

ऋष्यशृंग बोले – ब्रह्मन्! आप अपनी समृद्धिसे ज्योतिकी भाँति प्रकाशित हो रहे हैं । मैं आपको अपने लिये वन्दनीय मानता हूँ और स्वेच्छासे धर्मके अनुसार आपके लिये पाद्य- अर्घ्य एवं फल - मूल अर्पण करता हूँ ॥ ९ ॥

कौश्यां बृष्यामास्स्व यथोपजोषं कृष्णाजिनेनावृतायां सुखायाम् । क्व चाश्रमस्तव किं नाम चेदं व्रतं ब्रह्मंश्चरसि हि देववत् त्वम् ॥ १० ॥

इस कुशासनपर आप सुखपूर्वक बैठें । इसपर काला मृगचर्म बिछाया गया है, इसलिये इसपर बैठनेमें आराम रहेगा । आपका आश्रम कहाँ है? और आपका नाम क्या है? ब्रह्मन्! आप देवताके समान यह किस व्रतका आचरण कर रहे हैं? ॥ १० ॥