श्रीगणेशाय नमः।

सेदुकवृषदर्भचरित : क्या अपनी मर्यादा भङ्ग करने वाले को दण्ड देना उचित है?

धर्म और अनुशासन का सन्तुलन

महाभारतके सन्दर्भ सहित वास्तविक आख्यान — मूल श्लोक और पृष्ठ-सङ्केतके साथ।

महाभारत — खण्ड २ · वनपर्व → मार्कण्डेयसमास्यापर्व · अध्याय 196 · पृष्ठ 1355–1357

358 शब्द · 2 मिनटका पाठ · 4 श्लोक

मार्कण्डेय ने युधिष्ठिर से कहा

क्षत्रिय धर्म के माहात्म्य की जिज्ञासा हेतु

वैशम्पायनजी ने कहा— हे जनमेजय! जब पाण्डुनन्दन युधिष्ठिर ने मार्कण्डेयजी से पुनः यह अनुरोध किया कि 'भगवन्! फिर मुझे क्षत्रियोंका माहात्म्य सुनाइये', तब मार्कण्डेयजी ने उन्हें कथा सुनाई। उन्होंने कहा— महाराज! पूर्वकाल में वृषदर्भ और सेदुक नाम के दो राजा थे। वे दोनों ही नीतिके मार्ग पर चलने वाले तथा अस्त्र-उपास्त्रों की विद्या में अत्यन्त निपुण थे।

राजा वृषदर्भ ने अपने बचपन से ही एक गुप्त व्रत धारण कर रखा था कि 'ब्राह्मणको केवल सोना और चाँदी के सिवा और कुछ नहीं देना चाहिये'। उनके इस गुप्त नियम और व्रत को राजा सेदुक भली-भाँति जानते थे। एक समय की बात है, एक वेदाध्ययन सम्पन्न ब्राह्मण राजा सेदुक के पास पहुँचा। उसने राजा को आशीर्वाद दिया और गुरु-दक्षिणा के लिए भिक्षा माँगते हुए कहा— 'राजन्! आप मुझे एक हजार घोड़े दीजिये।'

वैशम्पायन उवाच

अथ तं सेदिकं ब्राह्मणः कश्चिद् वेदाध्ययनसम्पन्न आशिषं दत्त्वा गुर्वर्थी भिक्षितवान् ॥

अश्वसहस्रं मे भवान् ददात्विति तं सेदुको ब्राह्मणमब्रवीत् ॥

नास्ति सम्भवो गुर्वर्थं दातुमिति ॥

'एक दिन कोई वेदाध्ययनसम्पन्न ब्राह्मण राजा सेदुकके पास आया और उन्हें आशीर्वाद देकर गुरु- दक्षिणाके लिये भिक्षा माँगता हुआ बोला -' राजन्! आप मुझे एक हजार घोड़े दीजिये। ' तब सेदुकने उस ब्राह्मण- से कहा — ' ब्रह्मन्! आपकी अभीष्ट गुरु-दक्षिणा देना मेरे लिये सम्भव नहीं है ।

महाभारत · वनपर्व · मार्कण्डेयसमास्यापर्व · अध्याय 196 · श्लोक 4-6पृष्ठ 1356

सेदुक ने उस ब्राह्मण की माङ्ग सुनी तो उत्तर दिया— 'ब्रह्मन्! आपकी अभीष्ट गुरु-दक्षिणा देना मेरे लिये सम्भव नहीं है। अतः आप वृषदर्भ के पास चले जाइये। राजा वृषदर्भ बड़े धर्मज्ञ हैं, आप उन्हींसे याचना कीजिये। वे आपकी अभीष्ट वस्तु अवश्य दे देंगे; यह उनका गुप्त नियम है।'

वैशम्पायन उवाच

स त्वं गच्छ वृषदर्भसकाशम् ।
राजा परम धर्मज्ञो ब्राह्मण तं भिक्षस्व ।
स ते दास्यति तस्यैतदुपांशुव्रतमिति ॥

‘ अतः आप वृषदर्भके पास चले जाइये । ब्राह्मण! राजा वृषदर्भ बड़े धर्मज्ञ हैं । आप उन्हींसे याचना कीजिये । वे आपकी अभीष्ट वस्तु अवश्य दे देंगे। यह उनका गुप्त नियम है '

महाभारत · वनपर्व · मार्कण्डेयसमास्यापर्व · अध्याय 196 · श्लोक 7पृष्ठ 1356

वही ब्राह्मण देवता राजा वृषदर्भ के पास पहुँचे और उनसे एक हजार घोड़ों की माङ्ग की। किन्तु जैसे ही उन्होंने यह सुना, राजा वृषदर्भ क्रोधित हो उठे और उन्हें कोड़े से पीटने लगे। पीड़ा से व्याकुल होकर ब्राह्मण ने उनसे पूछा— 'राजन्! मुझ निरपराधको आप क्यों मार रहे हैं?' इतना कहकर वह ब्राह्मण देवता शाप देने के लिए उद्यत हो गए।

एवमुक्त्वा तं शपन्तं राजाऽऽह ।
विप्र किं यो न ददाति तुभ्यमुताहोस्विद् ब्राह्मण्यमेतत् ॥

'ऐसा कहकर ब्राह्मण देवता शाप देनेको उद्यत हो गये । तब राजाने उनसे कहा —‘विप्रवर! क्या जो आपको अपना धन न दे, उसको शाप देना ही उचित है? अथवा यही ब्राह्मणोचित कर्म है? '

महाभारत · वनपर्व · मार्कण्डेयसमास्यापर्व · अध्याय 196 · श्लोक 10पृष्ठ 1357

यह देखकर राजा वृषदर्भ ने उनसे प्रश्न किया— 'विप्रवर! क्या जो आपको अपना धन न दे, उसको शाप देना ही उचित है? अथवा यही ब्राह्मणोचित कर्म है?' तब ब्राह्मण ने उत्तर दिया— 'राजाधिराज! आपके पास राजा सेदुक ने मुझे भेजा है, तभी आपसे गुरु-दक्षिणा माँगने आया हूँ। उनके उपदेश के अनुसार ही मैंने आपसे याचना की है।'

ब्राह्मण उवाच

राजाधिराज तव समीपं सेदुकेन प्रेषितो भिक्षितु- मागतः ।
तेनानुशिष्टेन मया त्वं भिक्षितोऽसि ॥

ब्राह्मणने कहा — ‘ राजाधिराज! आपके पास राजा सेदुकने मुझे भेजा है, तभी आपसे गुरु- दक्षिणा माँगने आया हूँ । उनके उपदेशके अनुसार ही मैंने आपसे याचना की है '

महाभारत · वनपर्व · मार्कण्डेयसमास्यापर्व · अध्याय 196 · श्लोक 11पृष्ठ 1357

राजा वृषदर्भ ने शान्त होकर कहा— 'ब्रह्मन्! आज जो भी राजकीय कर मेरे पास आयेगा, उसे कल पूर्वाह्ण में ही आपको दे दूँगा। जिसे कोड़े से पीटा जाय, उसे खाली हाथ कैसे लौटाया जा सकता है?' ऐसा कहकर राजा ने उस ब्राह्मण को एक दिन की राजकीय आय प्रदान कर दी, जो एक हजार से अधिक घोड़ों के मूल्य के समान थी।

In English

The Story of King Vrishadrabha and the Brahmin

King Vrishadrabha followed a strict rule to only give gold or silver to Brahmins. When a Brahmin requested one thousand horses as a gift, the king became angry and beat him with a whip. To make amends, the king gave the Brahmin a sum of money worth more than one thousand horses.

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Also written: Sedukavrishadarbhacharita, Sedukavrishadarbha, Vrishadarbha, Seduka, Markandeya, Yudhishthira, सेदुकवृषदर्भचरित