दम्भोद्भवोपाख्यान : अहङ्कार से पूर्ण योद्धा को पराजित करने और उसे धर्म की राह पर लाने का क्या उपाय है?
अहङ्कार का दमन और धर्म
महाभारतके सन्दर्भ सहित वास्तविक आख्यान — मूल श्लोक और पृष्ठ-सङ्केतके साथ।
महाभारत — खण्ड ३ · उद्योगपर्व → भगवद्यानपर्व · अध्याय 96 · पृष्ठ 692–702
768 शब्द · 4 मिनटका पाठ · 6 श्लोक
वैशम्पायन ने जनमेजय से कहा
श्रीकृष्ण के कठिन वचनों के उत्तर में परशुराम द्वारा प्रसङ्ग सुनाना
वैशम्पायनजी ने कहा— हे जनमेजय! महात्मा श्रीकृष्ण के ऐसे वचन सुनकर सम्पूर्ण सभासद् चकित रह गए। उनके अङ्गों में रोमाञ्च हो उठा। वहाँ उपस्थित सभी भूपाल मन ही मन यह सोचने लगे कि भगवान के इन वचनों का उत्तर कोई भी मनुष्य नहीं दे सकता है। राजाओं के इस मौन को देखकर जमदग्नि-नन्दन परशुराम ने कौरव सभा में कहा— "राजन्! तुम निःशङ्क होकर मेरी यह उदाहरणयुक्त बात सुनो। सुनकर यदि इसे कल्याणकारी और उत्तम समझो, तो स्वीकार करो।"
तथा तेषु च सर्वेषु तूष्णीम्भूतेषु राजसु ।
जामदग्न्य इदं वाक्यमब्रवीत् कुरुसंसदि ॥
इस प्रकार उन सब राजाओंके मौन ही रह जानेपर जमदग्निनन्दन परशुरामने कौरवसभामें इस प्रकार कहा- ।
"राजन्! पूर्वकाल की बात है। दम्भोद्भव नाम से एक प्रसिद्ध सार्वभौम सम्राट् थे, जो इस सम्पूर्ण अखण्ड भूमण्डल का राज्य भोगते थे। वे महान महारथी और पराक्रमी नरेश थे। वे प्रतिदिन प्रातःकाल उठकर ब्राह्मणों और क्षत्रियों से यह प्रश्न किया करते थे— 'क्या इस जगत् में कोई ऐसा शस्त्रधारी शूद्र, वैश्य, क्षत्रिय अथवा ब्राह्मण है, जो युद्ध में मुझसे बढ़कर अथवा मेरे समान भी हो सके?'"
"वे राजा दम्भोद्भव महान गर्व से उन्मत्त होकर, दूसरे को कुछ भी न समझते हुए इस पृथ्वी पर विचरने लगे। विद्वान् ब्राह्मणों ने उन्हें बार-बार मना किया, किन्तु वे अहङ्कारवश फिर भी प्रश्न दोहराते रहे। उनका अहङ्कार और धन-वैभव का मद बढ़ता ही गया। तब वेद के सिद्धान्त जानने वाले उन तपस्वी ब्राह्मणों ने क्रोध से तमतमाते हुए कहा— 'राजन्! दो ऐसे पुरुषरत्न हैं, जिन्होंने युद्ध में अनेक योद्धाओं पर विजय प्राप्त की है। तुम कभी उनके समान नहीं हो सकोगे।'"
अनेकजयिनौ संख्ये यौ वै पुरुषसत्तमौ ।
तयोस्त्वं न समो राजन् भवितासि कदाचन ॥
' राजन्! दो ऐसे पुरुषरत्न हैं, जिन्होंने युद्धमें अनेक योद्धाओं पर विजय पायी है । तुम कभी उनके समान न हो सकोगे '
"राजा ने उत्सुकता से पूछा— 'वे दोनों वीर कहाँ हैं? उनका जन्म किस स्थान में हुआ है? उनके कर्म क्या हैं और उनके नाम क्या हैं?' ब्राह्मण बोले— 'भूपाल! हमने सुना है कि वे नर-नारायण नाम वाले तपस्वी हैं और इस समय मनुष्यलोक में आए हैं। तुम उन्हीं दोनों के साथ युद्ध करो। वे गन्धमादन पर्वत पर ऐसी घोर तपस्या कर रहे हैं, जिसका वर्णन वाणी द्वारा नहीं किया जा सकता।'"
"राजा दम्भोद्भव ने अपनी विशाल सेना— रथ, हाथी, घोड़े और पैदल सैनिकों सहित— उस दुर्गम पर्वत की यात्रा की। वहाँ वे उन दोनों महात्माओं के पास पहुँचे, जो भूख-प्यास से अत्यन्त कृशकाय और दुर्बल हो चुके थे। राजा ने उनके चरणों में नमस्कार कर कुशल-समाचार पूछा। तब नर और नारायण ने उनका स्वागत किया, उन्हें आसन, जल और फल देकर भोजन के लिए आमन्त्रित किया और पूछा— 'हम आपकी क्या सेवा करें?'"
"दम्भोद्भव ने अपना सारा वृत्तान्त सुनाते हुए कहा— 'मैंने अपने बाहुबल से सारी पृथ्वी जीत ली है। अब आप दोनों से युद्ध करने की इच्छा लेकर इस पर्वत पर आया हूँ। यही मेरा चिरकाल से अभिलषित मनोरथ है। इसे ही अतिथि सत्कार के रूप में पूर्ण कीजिए।' नर और नारायण ने उन्हें शान्त करते हुए कहा— 'नृपश्रेष्ठ! हमारा यह आश्रम क्रोध और लोभ से रहित है। यहाँ युद्ध नहीं होता। आप कहीं और जाकर अपनी इच्छा पूर्ण करें।' किन्तु दम्भोद्भव युद्ध की इच्छा से उन तपस्वियों को ललकारते रहे।"
नरनारायणावूचतुः अपेतक्रोधलोभोऽयमाश्रमो राजसत्तम ॥
न ह्यस्मिन्नाश्रमे युद्धं कुतः शस्त्रं कुतोऽनृजुः ।
अन्यत्र युद्धमाकाङ्क्ष बहवः क्षत्रियाः क्षितौ ॥
नर- नारायण बोले – नृपश्रेष्ठ! हमारा यह आश्रम क्रोध और लोभसे रहित है । इस आश्रममें कभी युद्ध नहीं होता, फिर अस्त्र - शस्त्र और कुटिल मनोवृत्तिका मनुष्य यहाँ कैसे रह सकता है? इस पृथ्वीपर बहुत - से क्षत्रिय हैं, अतः आप कहीं और जाकर युद्धकी अभिलाषा पूर्ण कीजिये ।
"दम्भोद्भव ने क्रोध में कहा— 'मैं तुम दोनों को जीत लूँगा! मैं तुम्हारे ब्राह्मणों के गर्व को चूर कर दूँगा!' तब महात्मा नर ने हाथ में एक मुट्ठी सींक लेकर कहा— 'युद्ध चाहने वाले क्षत्रिय! आ, युद्ध कर। अपने सारे अस्त्र-शस्त्र और सेना तैयार कर ले। तू बड़े घमण्ड में आकर ब्राह्मणों को ललकारता फिरता है; इसलिए मैं आज तेरे युद्ध के निश्चय को दूर कर देता हूँ।' दम्भोद्भव ने कहा— 'यदि आप यही उपयुक्त मानते हैं, तो मैं आपके साथ युद्ध अवश्य करूँगा!'"
ततो नरस्त्विषीकाणां मुष्टिमादाय भारत ॥
अब्रवीदेहि युद्धयस्व युद्धकामुक क्षत्रिय ।
सर्वशस्त्राणि चादत्स्व योजयस्व च वाहिनीम् ॥
अहं हि ते विनेष्यामि युद्धश्रद्धामितः परम् । ( यदाह्वयसि दर्पेण ब्राह्मणप्रमुखाञ्जनान् ॥ ) भरतनन्दन! तब महात्मा नरने हाथमें एक मुट्ठी सींक लेकर कहा -' युद्ध चाहनेवाले क्षत्रिय! आ, युद्ध कर । अपने सारे अस्त्र- शस्त्र ले ले । सारी सेनाको तैयार कर ले, कवच बाँध ले, तेरे पास और भी जितने साधन हों, उन सबसे सम्पन्न हो जा । तू बड़े घमंडमें आकर ब्राह्मण आदि सभी वर्णके लोगोंको ललकारता फिरता है; इसलिये मैं आजसे तेरे युद्धविषयक निश्चयको दूर किये देता हूँ '
"यह कहते ही दम्भोद्भव ने अपने सैनिकों के साथ उन तपस्वियों पर बाणों की वर्षा शुरू कर दी। वे भयङ्कर बाण शत्रुओं के शरीर को छिन्न-भिन्न करने वाले थे। किन्तु मुनि नर ने उन बाणों की परवाह न करते हुए, केवल सींकों से ही उन्हें बींध डाला। इसके पश्चात, मुनि ने अपनी मायावी शक्ति से सींकों के माध्यम से दम्भोद्भव के सैनिकों की आँखों, कानों और नासिकाओं को भेद दिया। जब राजा ने देखा कि आकाश सींकों से भर गया है, तो वह भयभीत होकर मुनि के चरणों में गिर पड़ा और बोला— 'भगवन्! मेरा कल्याण हो!'"
"भगवान नर ने कहा— 'राजन्! आज से तुम ब्राह्मण-हितैषी और धर्मात्मा बनो। फिर कभी ऐसा साहस न करना। शत्रुनगर विजयी वीर पुरुष को भी क्षत्रियधर्म का स्मरण रखना चाहिए। घमण्ड में आकर किसी पर आक्षेप मत करना। विनीतबुद्धि, लोभशून्य और अहङ्काररहित होकर प्रजा का पालन करो। जाओ, तुम्हारा कल्याण हो!'"
अनुज्ञातः स्वस्ति गच्छ मैवं भूयः समाचरेः ।
कुशलं ब्राह्मणान् पृच्छेरावयोर्वचनाद् भृशम् ॥
' मैंने तुम्हें आज्ञा दे दी, तुम्हारा कल्याण हो, जाओ । फिर ऐसा बर्ताव न करना । विशेषतः हम दोनोंके कहनेसे तुम ब्राह्मणोंसे उनका कुशल- समाचार पूछते रहना '
"राजा दम्भोद्भव उन महात्माओं के चरणों में प्रणाम करके अपनी राजधानी लौटे और धर्म का आचरण करने लगे। हे जनमेजय! परशुरामजी ने आगे कहा— 'राजन्! जो नर-नारायण थे, वे वास्तव में अर्जुन और श्रीकृष्ण हैं। अर्जुन युद्धभूमि में दुःसह हैं, जिनकी समानता कोई नहीं कर सकता। यदि तुम्हें मुझ पर सन्देह है, तो श्रेष्ठ बुद्धि का आश्रय लेकर पाण्डवों के साथ सन्धि कर लो। तुम्हारा कुल पृथ्वी पर बहुत प्रतिष्ठित है; अपने कल्याण के लिए सन्धि करके शान्त हो जाओ।'"
यद्येतदेवं जानासि न च मामभिशङ्कसे ।
आर्यां मतिं समास्थाय शाम्य भारत पाण्डवैः ॥
भारत! यदि तुम इस बातको इस रूपमें जानते हो और मुझपर तुम्हें तनिक भी संदेह नहीं है तो मेरे कहनेसे श्रेष्ठ बुद्धिका आश्रय लेकर पाण्डवोंके साथ संधि कर लो ।
In English
The Story of King Dambhodbhava and Nara-Narayana
King Dambhodbhava challenges the ascetics Nara and Narayana to a fight on Gandhamadana mountain. After the king's army attacks, Nara uses simple sticks to defeat the soldiers and humbles the king. Parashurama explains that these ascetics were actually Arjuna and Krishna.
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