श्रीगणेशाय नमः।

महाभारत — खण्ड ३ — पृष्ठ 691–700

महाभारत — खण्ड ३ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 691–700

पृष्ठ 691

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प्रमुञ्चेमान् मृत्युपाशात् क्षत्रियान् पुरुषर्षभ ॥ ५३ ॥

जनेश्वर! आपसे पाण्डवोंका राज्य लौटा देनेके सिवा दूसरी कौन- सी बात यहाँ कही जा सकती है । इस सभामें जो भूमिपाल बैठे हैं, वे धर्म और अर्थका विचार करके स्वयं बतावें, मैं ठीक कहता हूँ या नहीं । पुरुषरत्न! आप इन क्षत्रियोंको मौतके फंदेसे छुड़ाइये ॥ ५२-५३ ॥

प्रशाम्य भरतश्रेष्ठ मा मन्युवशमन्वगाः ।

पित्र्यं तेभ्यः प्रदायांशं पाण्डवेभ्यो यथोचितम् ॥ ५४ ॥

ततः सपुत्रः सिद्धार्थो भुङ्क्ष्व भोगान् परंतप । भरतश्रेष्ठ! शान्त हो जाइये, क्रोधके वशीभूत न होइये । परंतप! पाण्डवोंको यथोचित पैतृक राज्यभाग देकर अपने पुत्रोंके साथ सफलमनोरथ हो मनोवांछित भोग भोगिये ॥ ५४ ॥अजातशत्रुं जानीषे स्थितं धर्मे सतां सदा ॥ ५५ ॥

सपुत्रे त्वयि वृत्तिं च वर्तते यां नराधिप ।

दाहितश्च निरस्तश्च त्वामेवोपाश्रितः पुनः ॥ ५६ ॥

नरेश्वर! आप जानते हैं कि अजातशत्रु युधिष्ठिर सदा सत्पुरुषोंके धर्मपर स्थित हैं । उनका पुत्रोंसहित आपके प्रति जो बर्ताव है, उससे भी आप अपरिचित नहीं हैं । आपलोगोंने उन्हें लाक्षागृहकी आगमें जलवाया तथा राज्य और देशसे निकाल दिया; तो भी वे पुनः आपकी ही शरणमें आये हैं ॥ ५५-५६ ॥

इन्द्रप्रस्थं त्वयैवासौ सपुत्रेण विवासितः ।

स तत्र विवसन् सर्वान् वशमानीय पार्थिवान् ॥ ५७ ॥

त्वन्मुखानकरोद् राजन् न च त्वामत्यवर्तत । पुत्रोंसहित आपने ही युधिष्ठिरको यहाँसे निकालकर इन्द्रप्रस्थका निवासी बनाया । वहाँ रहकर उन्होंने समस्त राजाओंको अपने वशमें किया और उन्हें आपका मुखापेक्षी बना दिया । राजन्! तो भी युधिष्ठिरने कभी आपकी आज्ञाका उल्लंघन नहीं किया ॥ ५७३ ॥

तस्यैवं वर्तमानस्य सौबलेन जिहीर्षता ॥ ५८ ॥

राष्ट्राणि धनधान्यं च प्रयुक्तः परमोपधिः । ऐसे साधु बर्ताववाले युधिष्ठिरके राज्य तथा धन- धान्यका अपहरण कर लेनेकी इच्छासे सुबलपुत्र शकुनिने जूएके बहाने अपना महान् कपटजाल फैलाया ॥ स तामवस्थां सम्प्राप्य कृष्णां प्रेक्ष्य सभागताम् ॥ ५ ९ ॥ क्षत्रधर्मादमेयात्मा नाकम्पत युधिष्ठिरः । उस दयनीय अवस्थामें पहुँचकर अपनी महारानी कृष्णाको सभामें ( तिरस्कारपूर्वक ) लायी गयी देखकर भी महामना युधिष्ठिर अपने क्षत्रियधर्मसे विचलित नहीं हुए ॥ अहं तु तव तेषां च श्रेय इच्छामि भारत ॥ ६० ॥

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धर्मादर्थात् सुखाच्चैव मा राजन् नीनशः प्रजाः ।

अनर्थमर्थं मन्वानोऽप्यर्थं चानर्थमात्मनः ॥ ६१ ॥

भारत! मैं तो आपका और पाण्डवोंका भी कल्याण ही चाहता हूँ । राजन्! आप समस्त प्रजाको धर्म, अर्थ और सुखसे वंचित न कीजिये । इस समय आप अनर्थको ही अर्थ और अर्थको ही अपने लिये अनर्थ मान रहे हैं ॥ ६०-६१ ॥ लोभेऽतिप्रसृतान् पुत्रान् निगृह्णीष्व विशाम्पते ।

स्थिताः शुश्रूषितुं पार्थाः स्थिता योद्धुमरिंदमाः ।

यत् ते पथ्यतमं राजंस्तस्मिंस्तिष्ठ परंतप ॥ ६२ ॥

प्रजानाथ! आपके पुत्र लोभमें अत्यन्त आसक्त हो गये हैं, उन्हें काबूमें लाइये । राजन्! शत्रुओंका दमन करनेवाले कुन्तीके पुत्र आपकी सेवाके लिये भी तैयार हैं और युद्धके लिये भी प्रस्तुत हैं । परंतप! जो आपके लिये विशेष हितकर जान पड़े, उसी मार्गका अवलम्बन कीजिये ॥ ६२ ॥

वैशम्पायन उवाच

तद् वाक्यं पार्थिवाः सर्वे हृदयैः समपूजयन् ।

न तत्र कश्चिद् वक्तुं हि वाचं प्राक्रामदग्रतः ॥ ६३ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं -जनमेजय! भगवान् श्रीकृष्णके उस कथनका समस्त राजाओंने हृदयसे आदर किया । वहाँ उसके उत्तरमें कोई भी कुछ कहनेके लिये अग्रसर न हो सका ॥ ६३ ॥ इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि भगवद्यानपर्वणि श्रीकृष्णवाक्ये

पञ्चनवतितमोऽध्यायः ॥ १५ ॥

इसप्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत भगवद्यानपर्वमें कौरवसभामें श्रीकृष्णवाक्यविषयक पंचानबेवाँ अध्याय पूराहुआ ॥ ९५ ॥

Fara O FULL 3. दुसरोंको सुख पहुँचानेकी सहज भावनाका नाम ' कृपा ' है । २. दूसरोंका दुःख देखकर द्रवित होना एवं काँप उठना ‘ अनुकम्पा' कहलाता है । ३. दूसरोंके दुःखको दूर करनेका भाव ' करुणा ' है । ४. क्रूरताका सर्वथा अभाव ' अनृशंसता' कहलाता है ।

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षण्णवतितमोऽध्यायः परशुरामजीका दम्भोद्भवकी कथाद्वारा नर - नारायणस्वरूप अर्जुन और श्रीकृष्णका महत्त्व वर्णन करना वैशम्पायन उवाच

तस्मिन्नभिहिते वाक्ये केशवेन महात्मना ।

स्तिमिता हृष्टरोमाण आसन् सर्वे सभासदः ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! महात्मा श्रीकृष्णके ऐसी बात कहनेपर सम्पूर्ण

सभासद् चकित हो गये । उनके अंगोंमें रोमांच हो आया ॥ १ ॥

कश्चिदुत्तरमेतेषां वक्तुं नोत्सहते पुमान् ।

इति सर्वे मनोभिस्ते चिन्तयन्ति स्म पार्थिवाः ॥ २ ॥

वे सब भूपाल मन- ही-मन यह सोचने लगे कि भगवान्‌के इन वचनोंका उत्तर कोई भी मनुष्य नहीं दे सकता है ॥ २ ॥

तथा तेषु च सर्वेषु तूष्णीम्भूतेषु राजसु ।

जामदग्न्य इदं वाक्यमब्रवीत् कुरुसंसदि ॥ ३ ॥

इस प्रकार उन सब राजाओंके मौन ही रह जानेपर जमदग्निनन्दन परशुरामने कौरवसभामें इस प्रकार कहा- ॥ ३ ॥

इमां मे सोपमां वाचं शृणु सत्यामशङ्कितः ।

तांश्रुत्वा'श्रेय आदत्स्व यदि साध्विति मन्यसे ॥ ४ ।

‘ राजन्! तुम निःशंक होकर मेरी यह उदाहरणयुक्त बात सुनो । सुनकर यदि इसे कल्याणकारी और उत्तम समझो तो स्वीकार करो ॥ ४ ॥

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राजा दम्भोद्भवो नाम सार्वभौमः पुराभवत् ।

अखिलां बुभुजे सर्वां पृथिवीमिति नः श्रुतम् ॥ ५ ॥

'पूर्वकालकी बात है, दम्भोद्भव नामसे प्रसिद्ध एक सार्वभौम सम्राट् इस सम्पूर्ण अखण्ड भूमण्डलका राज्य भोगते थे; यह हमारे सुननेमें आया है ॥ ५ ॥

स स्म नित्यं निशापाये प्रातरुत्थाय वीर्यवान् ।

ब्राह्मणान् क्षत्रियांश्चैव पृच्छन्नास्ते महारथः ॥ ६ ॥

' वे महारथी और पराक्रमी नरेश प्रतिदिन रात बीतनेपर प्रातःकाल उठकर ब्राह्मणों और क्षत्रियोंसे इस प्रकार पूछा करते थे— ॥ ६ ॥

अस्ति कश्चिद् विशिष्टो वा मद्विधो वा भवेद् युधि ।

शूद्रो वैश्यः क्षत्रियो वा ब्राह्मणो वापि शस्त्रभृत् ॥ ७ ॥

‘ क्या इस जगत्में कोई ऐसा शस्त्रधारी शूद्र, वैश्य, क्षत्रिय अथवा ब्राह्मण है, जो युद्धमें मुझसे बढ़कर अथवा मेरे समान भी हो सके? ॥ ७ ॥

इति ब्रुवन्नन्वचरत् स राजा पृथिवीमिमाम् ।

दर्पेण महता मत्तः कंचिदन्यमचिन्तयन् ॥ ८ ॥

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‘ इसी प्रकार पूछते हुए वे राजा दम्भोद्भव महान् गर्वसे उन्मत्त हो दूसरे किसीको कुछ भी न समझते हुए इस पृथ्वीपर विचरने लगे ॥ ८ ॥

तं च वैद्या अकृपणा ब्राह्मणाः सर्वतोऽभयाः ।

प्रत्यषेधन्त राजानं श्लाघमानं पुनः पुनः ॥ ९ ॥

‘ उस समय सर्वथा निर्भय, उदार एवं विद्वान् ब्राह्मणोंने बारंबार आत्मप्रशंसा करनेवाले उन नरेशको मना किया ॥

निषिध्यमानोऽप्यसकृत् पृच्छत्येव स वै द्विजान् ।

अतिमानं श्रिया मत्तं तमूचुर्ब्राह्मणास्तदा ॥ १० ॥

तपस्विनो महात्मानो वेदप्रत्ययदर्शिनः ।

उदीर्यमाणं राजानं क्रोधदीप्ता द्विजातयः ॥ ११ ॥

' उनके मना करनेपर भी वे ब्राह्मणोंसे बार- बार प्रश्न करते ही रहे । उनका अहंकार बहुत बढ़ गया था । वे धन- वैभवके मदसे मतवाले हो गये थे । राजाको यही ( बारंबार ) प्रश्न दुहराते देख वेदके सिद्धान्तका साक्षात्कार करनेवाले महामना तपस्वी ब्राह्मण क्रोधसे तमतमा उठे और उनसे इस प्रकार बोले – ॥ १०-११ ॥

अनेकजयिनौ संख्ये यौ वै पुरुषसत्तमौ ।

तयोस्त्वं न समो राजन् भवितासि कदाचन ॥ १२ ॥

' राजन्! दो ऐसे पुरुषरत्न हैं, जिन्होंने युद्धमें अनेक योद्धाओं पर विजय पायी है । तुम कभी उनके समान न हो सकोगे ' ॥ १२ ॥

एवमुक्तः स राजा तु पुनः पप्रच्छ तान् द्विजान् ।

क्व तौ वीरौ क्वजन्मानो किंकर्माणौ च कौ च तौ ॥ १३ ॥

‘ उनके ऐसा कहनेपर राजाने पुनः उन ब्राह्मणोंसे पूछा- ' वे दोनों वीर कहाँ हैं? उनका जन्म किस स्थानमें हुआ है? उनके कर्म कौन- कौन- से हैं और उनके नाम क्या हैं? ' ॥ १३ ॥

ब्राह्मणाऊचुः

नरो नारायणश्चैव तापसाविति नः श्रुतम् ।

आयातौ मानुषे लोके ताभ्यां युध्यस्व पार्थिव ॥ १४ ॥

ब्राह्मण बोले- भूपाल! हमने सुना है कि वे नर- नारायण नामवाले तपस्वी हैं और इस

समय मनुष्यलोकमें आये हैं । तुम उन्हीं दोनोंके साथ युद्ध करो ॥ १४ ॥

श्रूयेते तौ महात्मानौ नरनारायणावुभौ ।

तपो घोरमनिर्देश्यं तप्येते गन्धमादने ॥ १५ ॥

सुना है, वे दोनों महात्मा नर और नारायण गन्धमादन पर्वतपर ऐसी घोर तपस्या कर रहे हैं, जिसका वाणीद्वारा वर्णन नहीं हो सकता ॥ १५ ॥

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स राजा महतीं सेनां योजयित्वा षडङ्गिनीम् ।

अमृष्यमाणः सम्प्रायाद् यत्र तावपराजितौ ॥ १६ ॥

राजाको यह सहन नहीं हुआ । उन्होंने (रथ, हाथी, घोड़े, पैदल, शकट और ऊँट– इन ) छः अंगोंसे युक्त विशाल सेनाको सुसज्जित करके उस स्थानकी यात्रा की, जहाँ कभी पराजित न होनेवाले वे दोनों महात्मा विद्यमान थे ॥ १६ ॥

स गत्वा विषमं घोरं पर्वतं गन्धमादनम् ।

मार्गमाणोऽन्वगच्छत् तौ तापसौ वनमाश्रितौ ॥ १७ ॥

राजा उनकी खोज करते हुए दुर्गम एवं भयंकर गन्धमादन पर्वतपर गये और वनमें स्थित उन तपस्वी महात्माओंके पास जा पहुँचे ॥ १७ ॥

तौ दृष्ट्वा क्षुत्पिपासाभ्यां कृशौ धमनिसंततौ ।

शीतवातातपैश्चैव कर्शितौ पुरुषोत्तमौ ॥ १८ ॥

वे दोनों पुरुषरत्न भूख - प्याससे दुर्बल हो गये थे । उनके सारे अंगोंमें फैली हुई नस-नाड़ियाँ स्पष्ट दिखायी देती थीं । वे सर्दी -गरमी और हवाका कष्ट सहते - सहते अत्यन्त कृशकाय हो रहे थे ॥ १८ ॥

अभिगम्योपसंगृह्य पर्यपृच्छदनामयम् ।

तमर्चित्वा मूलफलैरासनेनोदकेन च ॥ १ ९ ॥

न्यमन्त्रयेतां राजानं किं कार्यं क्रियतामिति ।

ततस्तामानुपूर्वी स पुनरेवान्वकीर्तयत् ॥ २० ॥

निकट जाकर उनके चरणोंमें नमस्कार करके दम्भोद्भवने उन दोनोंका कुशल- समाचार पूछा । तब नर और नारायणने राजाका स्वागत - सत्कार करके आसन, जल और फल - मूल देकर उन्हें भोजनके लिये निमन्त्रित किया । तदनन्तर पूछा कि हम आपकी क्या सेवा करें? यह सुनकर उन्होंने अपना सारा वृत्तान्त पुनः अक्षरशः सुना दिया ॥ १ ९ -२० ॥

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बाहुभ्यां मे जिता भूमिर्निहताः सर्वशत्रवः ।

भवद्भयां युद्धमाकाङ्क्षन्नुपयातोऽस्मि पर्वतम् ॥ २१ ॥

आतिथ्यं दीयतामेतत् काङ्क्षितं मे चिरं प्रति । और कहा — ' मैंने अपने बाहुबलसे सारी पृथ्वीको जीत लिया है तथा सम्पूर्ण शत्रुओंका संहार कर डाला है । अब आप दोनोंसे युद्ध करनेकी इच्छा लेकर इस पर्वतपर आया हूँ । यही मेरा चिरकालसे अभिलषित मनोरथ है । आप अतिथि सत्कारके रूपमें इसे ही पूर्ण कर दीजिये ॥ २१३ ॥

नरनारायणावूचतुः अपेतक्रोधलोभोऽयमाश्रमो राजसत्तम ॥ २२ ॥

न ह्यस्मिन्नाश्रमे युद्धं कुतः शस्त्रं कुतोऽनृजुः ।

अन्यत्र युद्धमाकाङ्क्ष बहवः क्षत्रियाः क्षितौ ॥ २३ ॥

नर- नारायण बोले – नृपश्रेष्ठ! हमारा यह आश्रम क्रोध और लोभसे रहित है । इस आश्रममें कभी युद्ध नहीं होता, फिर अस्त्र - शस्त्र और कुटिल मनोवृत्तिका मनुष्य यहाँ कैसे रह सकता है? इस पृथ्वीपर बहुत - से क्षत्रिय हैं, अतः आप कहीं और जाकर युद्धकी अभिलाषा पूर्ण कीजिये ॥ २२-२३ ॥

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राम उवाच

उच्यमानस्तथापि स्म भूय एवाभ्यभाषत ।

पुनः पुनः क्षम्यमाणः सान्त्व्यमानश्च भारत ॥ २४ ॥

दम्भोद्भवो युद्धमिच्छन्नाह्वयत्येव तापसौ । परशुरामजी कहते हैं- भारत! उन दोनों महात्माओंने बारंबार ऐसा कहकर राजासे क्षमा माँगी और उन्हें विविध प्रकारसे सान्त्वना दी । तथापि दम्भोद्भव युद्धकी इच्छासे उन दोनों तापसोंको कहते और ललकारते ही रहे ॥ २४ ॥

ततो नरस्त्विषीकाणां मुष्टिमादाय भारत ॥ २५ ॥

अब्रवीदेहि युद्धयस्व युद्धकामुक क्षत्रिय ।

सर्वशस्त्राणि चादत्स्व योजयस्व च वाहिनीम् ॥ २६ ॥

( संनह्यस्व च वर्माणि यानि चान्यानि सन्ति ते । ) अहं हि ते विनेष्यामि युद्धश्रद्धामितः परम् । ( यदाह्वयसि दर्पेण ब्राह्मणप्रमुखाञ्जनान् ॥ ) भरतनन्दन! तब महात्मा नरने हाथमें एक मुट्ठी सींक लेकर कहा -' युद्ध चाहनेवाले क्षत्रिय! आ, युद्ध कर । अपने सारे अस्त्र- शस्त्र ले ले । सारी सेनाको तैयार कर ले, कवच बाँध ले, तेरे पास और भी जितने साधन हों, उन सबसे सम्पन्न हो जा । तू बड़े घमंडमें आकर ब्राह्मण आदि सभी वर्णके लोगोंको ललकारता फिरता है; इसलिये मैं आजसे तेरे युद्धविषयक निश्चयको दूर किये देता हूँ ' ॥ २५-२६ ॥ दम्भोद्भव उवाच यद्येतदस्त्रमस्मासु युक्तं तापस मन्यसे ॥ २७ ॥

एतेनापि त्वया योत्स्ये युद्धार्थी ह्यहमागतः । दम्भोद्भवने कहा – तापस! यदि आप यही अस्त्र हमारे लिये उपयुक्त मानते हैं तो मैं इसके होनेपर भी आपके साथ युद्ध अवश्य करूँगा; क्योंकि मैं युद्धके लिये ही यहाँ आया हूँ ॥ २७ ॥

राम उवाच इत्युक्त्वा शरवर्षेण सर्वतः समवाकिरत् ॥ २८ ॥

दम्भोद्भवस्तापसं तं जिघांसुः सहसैनिकः । परशुरामजी कहते हैं- ऐसा कहकर सैनिकोंसहित दम्भोद्भवने तपस्वी नरको मार डालनेकी इच्छासे सब ओरसे उनपर बाणोंकी वर्षा आरम्भ कर दी ॥ २८३ ॥

तस्य तानस्यतो घोरानिषून् परतनुच्छिदः ॥ २९ ॥

कदर्थीकृत्य स मुनिरिषीकाभिः समार्पयत् ।

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उनके भयंकर बाण शत्रुके शरीरको छिन्न- भिन्न कर देनेवाले थे; परंतु मुनिने उन बाणोंका प्रहार करनेवाले दम्भोद्भवकी कोई परवा न करके सींकोंसे ही उनको बींध डाला ॥ २ ९ ३ ॥ प्रासृजद् घोरमैषीकमपराजितः ॥ ३० ॥

अस्त्रमप्रतिसंधेयं तदद्भुतमिवाभवत् । तब किसीसे पराजित न होनेवाले महर्षि नरने उनके ऊपर भयंकर ऐषीकास्त्रका प्रयोग

किया; जिसका निवारण करना असम्भव था । यह एक अद्भुत- सी घटना हुई ॥ ३० ॥

तेषामक्षीणि कर्णांश्च नासिकाश्चैव मायया ॥ ३१ ॥

निमित्तवेधी स मुनिरिषीकाभिः समार्पयत् । इस प्रकार लक्ष्यवेध करनेवाले नर मुनिने मायाद्वारा सींकके बाणोंसे ही दम्भोद्भवके सैनिकोंकी आँखों, कानों और नासिकाओंको बींध डाला ॥ ३१३ ॥

स दृष्ट्वा श्वेतमाकाशमिषीकाभिः समाचितम् ॥ ३२ ॥

पादयोर्न्यपतद् राजा स्वस्ति मेऽस्त्विति चाब्रवीत् । राजा दम्भोद्भव सींकोंसे भरे हुए समूचे आकाशको श्वेतवर्ण हुआ देखकर मुनिके चरणोंमें गिर पड़े और बोले— ' भगवन्! मेरा कल्याण हो ' ॥ ३२३ ॥

तमब्रवीन्नरो राजन् शरण्यः शरणैषिणाम् ॥ ३३ ॥

ब्रह्मण्यो भव धर्मात्मा मा च स्मैवं पुनः कृथाः । ‘ राजन्! शरण चाहनेवालोंको शरण देनेवाले भगवान् नरने उनसे कहा- ' आजसे तुम

ब्राह्मणहितैषी और धर्मात्मा बनो । फिर कभी ऐसा साहस न करना ॥ ३३३ ॥

नैतादृक् पुरुषो राजन् क्षत्रधर्ममनुस्मरन् ॥ ३४ ॥

मनसा नृपशार्दूल भवेत् परपुरंजयः । ‘नरेश्वर! नृपश्रेष्ठ! शत्रुनगरविजयी वीर पुरुष क्षत्रियधर्मको स्मरण रखते हुए कभी मनसे भी ऐसा व्यवहार नहीं कर सकता, जैसा कि तुमने किया है ॥ मा च दर्पसमाविष्टः क्षेप्सीः कांश्चित् कथंचन ॥ ३५ ॥

अल्पीयांसं विशिष्टं वा तत् ते राजन् समाहितम् । ' राजन्! आजसे फिर कभी घमंडमें आकर अपनेसे बड़े या छोटे किन्हीं राजाओंपर

किसी प्रकार भी आक्षेप न करना । इस बातके लिये मैंने तुम्हें सावधान कर दिया ॥

कृतप्रज्ञो वीतलोभो निरहंकार आत्मवान् ॥ ३६ ॥

दान्तः क्षान्तो मृदुः सौम्यः प्रजाः पालय पार्थिव ।

मा स्म भूयः क्षिपेः कंचिदविदित्वा बलाबलम् ॥ ३७ ॥

' भूपाल! तुम विनीतबुद्धि, लोभशून्य, अहंकाररहित, मनस्वी, जितेन्द्रिय, क्षमाशील, कोमलस्वभाव और सौम्य होकर प्रजाका पालन करो । फिर कभी दूसरोंके बलाबलको जाने बिना किसीपर आक्षेप न करना ॥ ३६-३७ ॥

पृष्ठ 700

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अनुज्ञातः स्वस्ति गच्छ मैवं भूयः समाचरेः ।

कुशलं ब्राह्मणान् पृच्छेरावयोर्वचनाद् भृशम् ॥ ३८ ॥

' मैंने तुम्हें आज्ञा दे दी, तुम्हारा कल्याण हो, जाओ । फिर ऐसा बर्ताव न करना ।

विशेषतः हम दोनोंके कहनेसे तुम ब्राह्मणोंसे उनका कुशल- समाचार पूछते रहना ' ॥ ३८ ॥

ततो राजा तयोः पादावभिवाद्य महात्मनोः ।

प्रत्याजगाम स्वपुरं धर्मं चैवाचरद् भृशम् ॥ ३ ९ ॥

तदनन्तर राजा दम्भोद्भव उन दोनों महात्माओंके चरणोंमें प्रणाम करके अपनी राजधानीमें लौट आये और विशेषरूपसे धर्मका आचरण करने लगे ॥ ३ ९ ॥

सुमहच्चापि तत् कर्म तन्नरेण कृतं पुरा ।

ततो गुणैः सुबहुभिः श्रेष्ठो नारायणोऽभवत् ॥ ४० ॥

इस प्रकार पूर्वकालमें महात्मा नरने वह महान् कर्म किया था । उनसे भी बहुत गुणोंके कारण भगवान् नारायण श्रेष्ठ हैं ॥ ४० ॥

तस्माद् यावद् धनुःश्रेष्ठे गाण्डीवेऽस्त्रं न युज्यते ।

तावत् त्वं मानमुत्सृज्य गच्छ राजन् धनंजयम् ॥ ४१ ॥

अतः राजन्! जबतक श्रेष्ठ धनुष गाण्डीवपर ( दिव्य ) अस्त्रोंका संधान नहीं किया जाता, तबतक ही तुम अभिमान छोड़कर अर्जुनसे मिल जाओ ॥ ४१ ॥

काकुदीकं शुकं नाकमक्षिसंतर्जनं तथा ।

संतानं नर्तकं घोरमास्यमोदकमष्टमम् ॥ ४२ ॥

काकुदीक ( प्रस्वापन ), शुक ( मोहन ), नाक (उन्मादन ), अक्षिसंतर्जन ( त्रासन ), संतान ( दैवत ), नर्तक ( पैशाच ), घोर ( राक्षस ) और आस्यमोदक ( याम्य ) * —ये आठ प्रकारके अस्त्र हैं ॥ ४२ ॥

एतैर्विद्धाः सर्व एव मरणं यान्ति मानवाः ।

कामक्रोधौ लोभमोहौ मदमानौ तथैव च ॥ ४३ ॥

मात्सर्याहंकृती चैव क्रमादेव उदाहृताः । इन अस्त्रोंसे विद्ध होनेपर सभी मनुष्य मृत्युको प्राप्त होते हैं । काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मान, मात्सर्य और अहंकार – ये क्रमशः आठ दोष बताये गये हैं, जिनके प्रतीकस्वरूप उपयुक्त आठ अस्त्र हैं ॥ ४३३ ॥

उन्मत्ताश्च विचेष्टन्ते नष्टसंज्ञा विचेतसः ॥ ४४ ॥

स्वपन्ति च प्लवन्ते च छर्दयन्ति च मानवाः ।

मूत्रयन्ते च सततं रुदन्ति च हसन्ति च ॥ ४५ ॥

इन अस्त्रोंके प्रयोगसे कुछ लोग उन्मत्त हो जाते हैं और वैसी ही चेष्टाएँ करने लगते हैं । कितनोंको सुध- बुध नहीं रह जाती, वे अचेत हो जाते हैं । कई मनुष्य सोने लगते हैं । कुछ