श्रीगणेशाय नमः।

त्रिपुराख्यान : अजेय पुरों का विनाश करने वाला योद्धा कौन है?

अधर्म का अन्त और शिव की शरण

महाभारतके सन्दर्भ सहित वास्तविक आख्यान — मूल श्लोक और पृष्ठ-सङ्केतके साथ।

महाभारत — खण्ड ४ · कर्णपर्व · अध्याय 33 · पृष्ठ 1806–1815

1,337 शब्द · 7 मिनटका पाठ · 26 श्लोक

दुर्योधन ने मद्रराज शल्य से कहा

युद्ध के समय पूर्वकाल की कथा सुनाते हुए

दुर्योधन ने मद्रराज की ओर देखा और गम्भीर स्वर में कहा— "मद्रराज! मैं पुनः आपसे जो कुछ कह रहा हूँ, उसे सुनिये। पूर्वकाल में देवासुर-सङ्ग्राम के अवसर पर जो घटना घटी थी, जिसे महर्षि मार्कण्डेय ने मेरे पिता को सुनाया था, वह सब मैं आपको पूर्ण रूप से बता रहा हूँ। आप मन लगाकर इसे सुनिये, इसके विषय में कोई अन्यथा विचार न कीजिये।"

दुर्योधन उवाच

भूय एव तु मद्रेश यत्ते वक्ष्यामि तच्छृणु ।
यथा पुरावृत्तमिदं युद्धे देवासुरे विभो ॥

यदुक्तवान् पितुर्मह्यं मार्कण्डेयो महानृषिः ।
तदशेषेण ब्रुवतो मम राजर्षिसत्तम ॥

निबोध मनसा चात्र न ते कार्या विचारणा । दुर्योधन बोला - मद्रराज! मैं पुनः आपसे जो कुछ कह रहा हूँ, उसे सुनिये । प्रभो! पूर्वकालमें देवासुर- संग्रामके अवसरपर जो घटना घटित हुई थी तथा जिसे महर्षि मार्कण्डेयने मेरे पिताजीको सुनाया था, वह सब मैं पूर्णरूपसे बता रहा हूँ । राजर्षिप्रवर! आप मन लगाकर इसे सुनिये, इसके विषयमें आपको कोई अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये ।

महाभारत · कर्णपर्व · अध्याय 33 · श्लोक 1-2पृष्ठ 1807

उस समय देवताओं और असुरों के बीच पहला सङ्ग्राम हुआ था—तारकामय सङ्ग्राम। उस युद्ध में देवताओं ने दैत्यों को परास्त कर दिया था। हार के पश्चात तारकासुर के तीनों पुत्र—ताराक्ष, कमलाक्ष और विद्युन्माली—ने उग्र तपस्या का मार्ग चुना। वे अत्यन्त कठिन नियमों का पालन करने लगे; उन्होंने तपस्या द्वारा अपने शरीरों को सुखा दिया और इन्द्रिय-संयम तथा समाधि में लीन हो गए। उनकी इस उग्र तपस्या से प्रसन्न होकर वरदायक भगवान ब्रह्मा उन्हें वर देने के लिए उद्यत हुए।

दुर्योधन उवाच

निर्जितेषु च दैत्येषु तारकस्य सुतास्त्रयः ।
ताराक्षः कमलाक्षश्च विद्युन्माली च पार्थिव ॥

तप उग्रं समास्थाय नियमे परमे स्थिताः । उस समय देवताओंने दैत्योंको परास्त कर दिया था, यह हमारे सुननेमें आया है । राजन्! दैत्योंके परास्त हो जानेपर तारकासुरके तीन पुत्र ताराक्ष, कमलाक्ष और विद्युन्माली उग्र तपस्याका आश्रय ले उत्तम नियमोंका पालन करने लगे ।

महाभारत · कर्णपर्व · अध्याय 33 · श्लोक 5पृष्ठ 1807

परन्तु, उन तीनों ने एक साथ मिलकर सम्पूर्ण लोकों के पितामह ब्रह्मा से यह वर माँगा कि वे 'सदा सम्पूर्ण भूतों से अवध्य हों'। तब लोकनाथ ब्रह्मा ने उन्हें समझाया— "असुरो! सबके लिये अमरत्व सम्भव नहीं है। तुम इस तपस्या से निवृत्त हो जाओ और दूसरा कोई वर माँग लो जो तुम्हें रुचे।"

अस्मभ्यं त्वं वरं देव सम्प्रयच्छ पितामह ॥

( वस्तुमिच्छाम नगरं कृत्वा कामगमं शुभम् । सर्वकामसमृद्धार्थमवध्यं देवदानवैः ॥ यक्षरक्षोरगगणैर्नानाजातिभिरेव च । न कृत्याभिर्न शस्त्रैश्च न शापैर्ब्रह्मवादिनाम् ॥ वध्येत त्रिपुरं देव प्रसन्ने त्वयि सादरम् ॥ ‘पितामह! देव! हम सबको आप वर प्रदान कीजिये । हमलोग इच्छानुसार चलनेवाला नगराकार सुन्दर विमान बनाकर उसमें निवास करना चाहते हैं । हमारा वह पुर सम्पूर्ण अभीष्ट वस्तुओंसे सम्पन्न तथा देवताओं और दानवोंके लिये अवध्य हो । देव! आपके सादर प्रसन्न होनेसे हमारे तीनों पुर यक्ष, राक्षस, नाग तथा नाना जातिके अन्य प्राणियोंद्वारा भी विनष्ट न हों । उन्हें न तो कृत्याएँ नष्ट कर सकें, न शस्त्र छिन्न-भिन्न कर सकें और न ब्रह्मवादियोंके शापोंद्वारा ही इनका विनाश हो'

महाभारत · कर्णपर्व · अध्याय 33 · श्लोक 11पृष्ठ 1808

तभी उन तीनों ने बार-बार विचार किया और ब्रह्माजी को शीश नवाकर बड़े ही आग्रह के साथ कहा— "पितामह! देव! हम सबको आप वर प्रदान कीजिये। हम इच्छानुसार चलने वाला नगराकार सुन्दर विमान बनाकर उसमें निवास करना चाहते हैं। हमारा वह पुर सम्पूर्ण अभीष्ट वस्तुओं से सम्पन्न हो और देवताओं तथा दानवों के लिये अवध्य हो। आपके सादर प्रसन्न होने से हमारे ये तीनों पुर यक्ष, राक्षस, नाग तथा अन्य प्राणियों द्वारा भी विनष्ट न किए जा सकें; उन्हें न तो कृत्याएँ नष्ट कर सकें, न शस्त्र छिन्न-भिन्न कर सकें और न ही ब्रह्मवादियों के शापों द्वारा इनका विनाश हो सके।"

ततो मयः स्वतपसा चक्रे धीमान् पुराणि च ।
त्रीणि काञ्चनमेकं वै रौप्यं कार्ष्णायसं तथा ॥

तब बुद्धिमान् मयासुरने अपनी तपस्याद्वारा तीन पुरोंका निर्माण किया । उनमेंसे एक सोनेका, दूसरा चाँदीका और तीसरा पुर लोहेका बना था ।

महाभारत · कर्णपर्व · अध्याय 33 · श्लोक 17पृष्ठ 1809

ब्रह्माजी ने गम्भीर स्वर में कहा— "दैत्यो! समय पूरा होने पर सबका लय होता है। जो आज जीवित है, उसकी भी एक दिन मृत्यु होती है। इस बात को समझ लो और इन तीनों पुरों के वध का कोई निमित्त कह दो।" तब दैत्यों ने कहा— "भगवन्! हम तीनों पुरों में ही रहकर इस पृथ्वी पर और इस जगत् में आपकी कृपा से विचरेंगे। एक हजार वर्ष पूर्ण होने पर हम एक-दूसरे से मिलेंगे। हे देव! जब ये तीनों पुर एकत्र होकर एकीभाव को प्राप्त हो जाएँ, उस समय जो एक ही बाण से इन तीनों पुरों को नष्ट कर सके, वही देवेश्वर हमारी मृत्यु का कारण होगा।" ब्रह्माजी ने 'एवमस्तु' कहकर अपने धाम को प्रस्थान किया।

ततो वर्षसहस्रे तु समेष्यामः परस्परम् ।
एकीभावं गमिष्यन्ति पुराण्येतानि चानघ ॥

समागतानि चैतानि यो हन्याद् भगवंस्तदा ।
एकेषुणा देववरः स नो मृत्युर्भविष्यति ॥

अनघ! तदनन्तर एक हजार वर्ष पूर्ण होनेपर हमलोग एक- दूसरे से मिलेंगे । भगवन्! ये तीनों पुर जब एकत्र होकर एकीभावको प्राप्त हो जायँ, उस समय जो एक ही बाणसे इन तीनों पुरोंको नष्ट कर सके, वही देवेश्वर हमारी मृत्युका कारण होगा ।

महाभारत · कर्णपर्व · अध्याय 33 · श्लोक 13-14पृष्ठ 1809

वरदान पाकर वे तीनों असुर अत्यन्त प्रसन्न हुए। उन्होंने दैत्य-दानव-पूजित, अजर-अमर विश्वकर्मा मयका चयन किया। बुद्धिमान् मयासुर ने अपनी तपस्या द्वारा तीन पुरों का निर्माण किया। उनमें से एक सोने का था जो स्वर्गलोक में स्थित हुआ, दूसरा चाँदी का अन्तरिक्षलोक में और तीसरा लोहे का भूलोक में। प्रत्येक नगर की लम्बाई-चौड़ाई सौ योजन के बराबर थी। वे नगर विशाल सड़कों, बड़े-बड़े महलों, अट्टालिकाओं और अनेक परकोटों से सुशोभित थे।

एवमस्त्विति तान् देवः प्रत्युक्त्वा प्राविशद् दिवम् ।
ते तु लब्धवराः प्रीताः सम्प्रधार्य परस्परम् ॥

पुरत्रयविसृष्ट्यर्थं मयं वव्रुर्महासुरम् ।
विश्वकर्माणमजरं दैत्यदानवपूजितम् ॥

'एवमस्तु ' ( ऐसा ही हो ) यों कहकर भगवान् ब्रह्मा अपने धामको चले गये । वरदान पाकर वे तीनों असुर बड़े प्रसन्न हुए और परस्पर विचार करके उन्होंने दैत्य - दानव- पूजित, अजर-अमर विश्वकर्मा महान् असुर मयका तीन पुरोके निर्माणके लिये वरण किया ।

महाभारत · कर्णपर्व · अध्याय 33 · श्लोक 15-16पृष्ठ 1809

सुवर्णमय पुर महामना तारकाक्ष के अधिकार में था, चाँदी का पुर कमलाक्ष के और लोहे का विद्युन्माली के पास। उन तीनों दैत्यराजों के पास करोड़ों-अरबों अभिमानी और मांसभक्षी वीर आए थे। मयासुर उन्हें सब प्रकार की अप्राप्त वस्तुएँ प्रदान करता था और वे सभी इन दुर्गम पुरों के आश्रय में निर्भय होकर रहते थे।

गृहाट्टालकसंयुक्तं बहुप्राकारतोरणम् ॥

प्रत्येक नगरकी लंबाई - चौड़ाई बराबर- बराबर सौ योजनकी थी । सबमें बड़े - बड़े महल और अट्टालिकाएँ थीं । अनेकानेक प्राकार ( परकोटे ) और तोरण ( फाटक ) सुशोभित थे ।

महाभारत · कर्णपर्व · अध्याय 33 · श्लोक 19पृष्ठ 1810

मद्रराज शल्य को दुर्योधन ने यह कथा सुनाई कि कैसे उन असुरों के अत्याचार बढ़ते चले गए। उन तीनों पुरों में निवास करने वाला जो भी असुर अपने मन से जिस अभीष्ट भोग का चिन्तन करता था, मयासुर अपनी माया से वह भोग तत्काल प्रस्तुत कर देता था। इसी बीच तारकाक्ष का महाबली वीर पुत्र 'हरि', जो अत्यन्त प्रसिद्ध था, उसने बड़ी भारी तपस्या की। उसकी इस उग्र तपस्या से ब्रह्माजी प्रसन्न हुए। सन्तुष्ट होकर ब्रह्माजी ने उसे वर माँगने को कहा, तब उस वीर ने यह वर माँगा कि "हमारे पुरों में एक-एक ऐसी बावड़ी हो जाए, जिसके भीतर डाल दिए जाने पर शस्त्रों के आघात से मरे हुए दैत्य वीर और भी प्रबल होकर जीवित उठें।"

संतुष्टमवृणोद् देवं वापी भवतु नः पुरे ॥

शस्त्रैर्विनिहता यत्र क्षिप्ताः स्युर्बलवत्तराः । संतुष्ट हुए ब्रह्माजीसे उसने यह वर माँगा कि ' हमारे पुरोंमें एक -एक ऐसी बावड़ी हो जाय, जिसके भीतर डाल दिये जानेपर शस्त्रोंके आघातसे मरे हुए दैत्य वीर और भी प्रबल होकर जीवित हो उठें '

महाभारत · कर्णपर्व · अध्याय 33 · श्लोक 28पृष्ठ 1811

वरदान पाकर हरि ने उन पुरों में एक-एक बावड़ी का निर्माण कर दिया, जो मृतकों को जीवन प्रदान करने वाली थी। जो दैत्य जिस रूप और जैसे वेष में रहता था, मरने पर उस बावली में डाल दिए जाने के पश्चात वह वैसे ही रूप और वेष से सम्पन्न होकर प्रकट हो जाता था। नया जीवन पाकर वे दैत्य पुनः उन सभी लोकों को बाधा पहुँचाने लगे। वे महान तप से सिद्ध हुए असुर देवताओं का भय बढ़ा रहे थे; युद्ध में कभी उनका विनाश नहीं होता था। लोभ और मोह के वशीभूत होकर वे विवेकहीन और निर्लज्ज हो गए थे। वे विभिन्न स्थानों में देवताओं और उनके गणों को भगाकर अपनी इच्छा अनुसार विचरने लगे। मर्यादाशून्य दुराचारी दानव स्वर्गवासियों के परम प्रिय देवोद्यानों, ऋषियों के पवित्र आश्रमों तथा रमणीय जनपदों को भी नष्ट-भ्रष्ट करने लगे। उन देवविरोधी तीनों दैत्यों ने देवताओं, पितरों और ऋषियों को उनके स्थानों से हटाकर निराश्रय कर दिया; तीनों लोकों के निवासी उनके द्वारा पददलित हो रहे थे।

तारकाक्षसुतो वीरो हरिर्नाम महाबलः ॥

तपस्तेपे परमकं येनातुष्यत् पितामहः । तारकाक्षका महाबली वीर पुत्र ' हरि' नामसे प्रसिद्ध था, उसने बड़ी भारी तपस्या की, जिससे ब्रह्माजी उसपर संतुष्ट हो गये ।

महाभारत · कर्णपर्व · अध्याय 33 · श्लोक 27पृष्ठ 1811

जब सम्पूर्ण लोकों के प्राणी पीड़ित होने लगे, तब इन्द्र देवताओं सहित चारों ओर से वज्रपात करते हुए उन तीनों पुरों पर आक्रमण करने लगे। किन्तु देवराज इन्द्र ब्रह्माजी का वर पाए हुए उन अभेद्य पुरों का भेदन न कर सके। इससे भयभीत होकर देवता उन पुरों को छोड़कर ब्रह्माजी के पास गए और उनसे इन दैत्यों के अत्याचार की बात बताई। उन्होंने मस्तक झुकाकर ब्रह्माजी को प्रणाम किया और उन दैत्यों के वध का उपाय पूछा।

उन देवताओं की बातें सुनकर ब्रह्माजी ने कहा, "देवगण! जो तुम्हारी बुराई करता है, वह मेरा भी अपराधी है। वे समस्त देवद्रोही दुरात्मा असुर, जो सदा तुम्हें पीड़ा देते रहते हैं, निश्चय ही मेरा भी महान अपराध करते हैं। इसमें संशय नहीं कि समस्त प्राणियों के प्रति मेरा समान भाव है, तथापि मैंने यह व्रत ले रखा है कि पापात्माओं का वध कर दिया जाए। वे तीनों पुर एक ही बाण से वेध दिए जाएँ तो नष्ट हो सकते हैं, अन्यथा नहीं; परन्तु महादेवजी के सिवा दूसरा कोई ऐसा नहीं है जो उन तीनों को एक साथ एक ही बाण से वेध सके। अतः तुम लोग विजयशील ईश्वर महादेवजी का योद्धा के रूप में वरण करो। वे ही उन दैत्यों को मार सकते हैं।"

एकेषुणा विभेद्यानि तानि दुर्गाणि नान्यथा ।
न च स्थाणुमृते शक्तो भेत्तुमेकेषुणा पुरः ॥

' वे तीनों पुर एक ही बाणसे वेध दिये जायँ तो नष्ट हो सकते हैं, अन्यथा नहीं; परंतु महादेवजीके सिवा दूसरा कोई ऐसा नहीं है, जो उन तीनोंको एक साथ एक ही बाणसे वेध सके ।

महाभारत · कर्णपर्व · अध्याय 33 · श्लोक 44पृष्ठ 1813

ब्रह्माजी की यह बात सुनकर इन्द्र आदि सम्पूर्ण देवता उन्हें आगे करके महादेवजी की शरण में गए। तप और नियम का आश्रय लेकर, ऋषियों सहित धर्मज्ञ देवता सनातन ब्रह्मस्वरूप महादेवजी की स्तुति करते हुए सम्पूर्ण हृदय से उनकी शरण में पहुँचे। उन देवताओं ने—जो आत्मस्वरूप से सबको व्याप्त किए हुए हैं, जो भय के अवसरों पर अभय प्रदान करने वाले हैं, जो ज्ञानस्वरूपता का बोध रखते हैं और जिनका अन्तःकरण सदा अपने वश में रहता है—उन निष्पाप, तेजोराशि, महेश्वर भगवान् उमापतिका की शरण ली।

वहाँ उन्होंने एक ही भगवान शिव को अपनी भावना के अनुसार अनेक रूपों में कल्पित किया और परमात्मा में अपने तथा दूसरों के प्रतिबिम्ब देखे। यह सब देखकर वे परस्पर दृष्टिपात करते हुए अत्यन्त आश्चर्यचकित हो उठे। उन सर्वभूतमय, अजन्मा जगदीश्वर को देखकर सम्पूर्ण देवताओं तथा ब्रह्मर्षियों ने धरती पर मस्तक टेक दिए। तब भगवान शङ्कर ने मुस्कुराते हुए कहा, "तुम्हारा कल्याण हो! बोलो, बोलो; क्या है?"

अपराध्यन्ति सततं ये युष्मान् पीडयन्त्युत ॥

' वे समस्त देवद्रोही दुरात्मा असुर, जो सदा तुम्हें पीड़ा देते रहते हैं, निश्चय ही मेरा भी महान् अपराध करते हैं ।

महाभारत · कर्णपर्व · अध्याय 33 · श्लोक 42पृष्ठ 1813

भगवान त्रिलोचन की आज्ञा पाकर स्वस्थचित्त हुए वे देवगण उनकी स्तुति करने लगे—"प्रभो! आपको नमस्कार है, नमस्कार है, नमस्कार है। आप देवताओं के अधिदेवता, धनुर्धर और वनमालाधारी हैं। आपको नमस्कार है। आप दक्ष प्रजापतिके यज्ञ का विध्वंस करने वाले हैं; प्रजापति भी आपकी स्तुति करते हैं। आप कल्याणस्वरूप शम्भुको नमस्कार है। आप विशेषतः लाल वर्ण के हैं, पापियों को रुलाने वाले रुद्र हैं, नीलकण्ठ और त्रिशूलधारी हैं। आपका दर्शन अमोघ फल देने वाला है। आप पूजनीय, शुद्ध, प्रलयकाल में सबका संहार करने वाले हैं। आपको रोकना या पराजित करना सर्वथा कठिन है। आप शुक्ल वर्ण, ब्रह्म, ब्रह्मचारी, ईशान, अप्रमेय, नियन्ता तथा व्याघ्रचर्ममय वस्त्र धारण करने वाले हैं। आप कुमार कार्तिकेय के पिता, त्रिनेत्रधारी, उत्तम आयुध धारण करने वाले, शरणागत दुःखभञ्जन और ब्रह्मद्रोहियों का विनाश करने वाले हैं। आप वनस्पतियों के पालक और मनुष्यों के अधिपति हैं; आप ही गौओं के स्वामी और सदा यज्ञों के अधीश्वर हैं। हे सेनासहित अमिततेजस्वी भगवान त्र्यम्बक! हम मन, वाणी और क्रिया द्वारा आपकी शरण में आए हैं। आप हमें अपनाइये।"

अहं हि तुल्यः सर्वेषां भूतानां नात्र संशयः ।
अधार्मिकास्तु हन्तव्या इति मे वतमाहितम् ॥

‘ इसमें संशय नहीं कि समस्त प्राणियोंके प्रति मेरा समान भाव है, तथापि मैंने यह व्रत ले रखा है कि पापात्माओंका वध कर दिया जाय ।

महाभारत · कर्णपर्व · अध्याय 33 · श्लोक 43पृष्ठ 1813

In English

The Legend of the Three Cities

Duryodhana tells Shalya about the three cities built by Mayasura for the sons of Tarakasura. These impregnable cities can only be destroyed by a single arrow when they align every thousand years, leading the gods to seek help from Shiva.

This page answers

  • What are the three cities of the asuras?
  • How can the three puras be destroyed?
  • Who built the three cities?
  • Why did the gods go to shiva?

Also written: Tripurakhyana, Tripura, Tarakaksha, Kamalakaksha, Vidyanmali, Brahmaji, Maya, Hari, Indra, Mayasura, त्रिपुराख्यान