श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड ४ — पृष्ठ 1811–1820
महाभारत — खण्ड ४ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1811–1820
पृष्ठ 1811
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
उक्त तीनों पुरोंमें निवास करनेवाला जो भी असुर अपने मनसे जिस अभीष्ट भोगका चिन्तन करता था, उसके लिये मयासुर अपनी मायासे वह वह भोग तत्काल प्रस्तुत कर देता था ॥ २६३ ॥
तारकाक्षसुतो वीरो हरिर्नाम महाबलः ॥ २७ ॥
तपस्तेपे परमकं येनातुष्यत् पितामहः । तारकाक्षका महाबली वीर पुत्र ' हरि' नामसे प्रसिद्ध था, उसने बड़ी भारी तपस्या की, जिससे ब्रह्माजी उसपर संतुष्ट हो गये ॥ २७ ॥
संतुष्टमवृणोद् देवं वापी भवतु नः पुरे ॥ २८ ॥
शस्त्रैर्विनिहता यत्र क्षिप्ताः स्युर्बलवत्तराः । संतुष्ट हुए ब्रह्माजीसे उसने यह वर माँगा कि ' हमारे पुरोंमें एक -एक ऐसी बावड़ी हो जाय, जिसके भीतर डाल दिये जानेपर शस्त्रोंके आघातसे मरे हुए दैत्य वीर और भी प्रबल होकर जीवित हो उठें ' ॥ २८ ॥
स तु लब्ध्वा वरं वीरस्तारकाक्षसुतो हरिः ॥ २९ ॥
ससृजे तत्र वापीं तां मृतानां जीविनीं प्रभो । प्रभो! वह वरदान पाकर तारकाक्षके वीर पुत्र हरिने उन पुरोंमें एक-एक बावड़ीका निर्माण किया, जो मृतकोंको जीवन प्रदान करनेवाली थी ॥ २ ९ ३ ॥ येन रूपेण दैत्यस्तु येन वेषेण चैव ह ॥ ३० ॥
मृतस्तस्यां परिक्षिप्तस्तादृशेनैव जज्ञिवान् । जो दैत्य जिस रूप और जैसे वेषमें रहता था, मरनेपर उस बावड़ीमें डालनेके पश्चात् वैसे ही रूप और वेषसे सम्पन्न होकर प्रकट हो जाता था ॥ ३०३ ॥
तां प्राप्य ते पुनस्तांस्तु लोकान् सर्वान् बबाधिरे ॥ ३१ ॥
महता तपसा सिद्धाः सुराणां भयवर्धनाः ।
न तेषामभवद् राजन् क्षयो युद्धे कदाचन ॥ ३२ ॥
उस वापीमें पहुँच जानेपर नया जीवन धारण करके वे दैत्य पुनः उन सभी लोकोंको बाधा पहुँचाने लगते थे । राजन्! वे महान् तपसे सिद्ध हुए असुर देवताओंका भय बढ़ा रहे थे । युद्धमें कभी उनका विनाश नहीं होता था ॥ ३१-३२ ॥
ततस्ते लोभमोहाभ्यामभिभूता विचेतसः ।
निर्हीकाः संस्थिताः सर्वे स्थापिताः समलूलुपन् ॥ ३३ ॥
उन पुरोंमें बसाये गये सभी दैत्य लोभ और मोहके वशीभूत हो विवेकहीन और निर्लज्ज होकर सब ओर लूटपाट करने लगे ॥ ३३ ॥
विद्राव्य सगणान् देवांस्तत्र तत्र तदा तदा ।
विचेरुः स्वेन कामेन वरदानेन दर्पिताः ॥ ३४ ॥
पृष्ठ 1812
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
वरदान पानेके कारण उनका घमंड बढ़ गया था । वे विभिन्न स्थानोंमें देवताओं और उनके गणोंको भगाकर वहाँ अपनी इच्छाके अनुसार विचरते थे ॥ ३४ ॥
देवोद्यानानि सर्वाणि प्रियाणि च दिवौकसाम् ।
ऋषीणामाश्रमान् पुण्यान् रम्याञ्जनपदांस्तथा ॥ ३५ ॥
व्यनाशयन्नमर्यादा दानवा दुष्टचारिणः । स्वर्गवासियोंके परम प्रिय समस्त देवोद्यानों, ऋषियोंके पवित्र आश्रमों तथा रमणीय जनपदोंको भी वे मर्यादाशून्य दुराचारी दानव नष्ट- भ्रष्ट कर देते थे ॥ ३५३ ॥
(निःस्थानाश्च कृता देवा ऋषयः पितृभिः सह । दैत्यैस्त्रिभिस्त्रयो लोका ह्याक्रान्तास्तैः सुरेतरैः ॥ ) उन देवविरोधी तीनों दैत्योंने देवताओं, पितरों और ऋषियोंको भी उनके स्थानोंसे हटाकर निराश्रय कर दिया । वे ही नहीं, तीनों लोकोंके निवासी उनके द्वारा पददलित हो रहे थे ॥ पीड्यमानेषु लोकेषु ततः शक्रो मरुद्वृतः ॥ ३६ ॥
पुराण्यायोधयांचक्रे वज्रपातैः समन्ततः । जब सम्पूर्ण लोकोंके प्राणी पीड़ित होने लगे, तब देवताओंसहित इन्द्र चारों ओरसे वज्रपात करते हुए उन तीनों पुरोंके साथ युद्ध करने लगे ॥ ३६३ ॥
नाशकत् तान्यभेद्यानि यदा भेत्तुं पुरंदरः ॥ ३७ ॥
पुराणि वरदत्तानि धात्रा तेन नराधिप ।
तदा भीतः सुरपतिर्मुक्त्वा तानि पुराण्यथ ॥ ३८ ॥
तैरेव विबुधैः सार्धं पितामहमरिंदम ।
जगामाथ तदाख्यातुं विप्रकारं सुरेतरैः ॥ ३ ९ ॥
शत्रुदमननरेश्वर! जब देवराज इन्द्र ब्रह्माजीका वर पाये हुए उन अभेद्य पुरोंका भेदन न कर सके, तब वे भयभीत हो उन पुरोंको छोड़कर उन्हीं देवताओंके साथ ब्रह्माजीके पास उन दैत्योंका अत्याचार बतानेके लिये गये ॥ ३७–३९ ॥
ते तत्त्वं सर्वमाख्याय शिरोभिः सम्प्रणम्य च ।
वधोपायमपृच्छन्त भगवन्तं पितामहम् ॥ ४० ॥
उन्होंने मस्तक झुकाकर भगवान् ब्रह्माजीको प्रणाम किया और सारी बातें ठीक -ठीक बताकर उनसे उन दैत्योंके वधका उपाय पूछा ॥ ४० ॥
श्रुत्वा तद् भगवान् देवो देवानिदमुवाच ह ।
ममापि सोऽपराध्नोति यो युष्माकमसौम्यकृत् ॥ ४१ ॥
वह सब सुनकर भगवान् ब्रह्माने उन देवताओंसे इस प्रकार कहा – ' देवगण! जो तुम्हारी बुराई करता है, वह मेरा भी अपराधी है ॥ ४१ ॥
असुरा हि दुरात्मानः सर्व एव सुरद्विषः ।
पृष्ठ 1813
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अपराध्यन्ति सततं ये युष्मान् पीडयन्त्युत ॥ ४२ ॥
' वे समस्त देवद्रोही दुरात्मा असुर, जो सदा तुम्हें पीड़ा देते रहते हैं, निश्चय ही मेरा भी महान् अपराध करते हैं ॥ ४२ ॥
अहं हि तुल्यः सर्वेषां भूतानां नात्र संशयः ।
अधार्मिकास्तु हन्तव्या इति मे वतमाहितम् ॥ ४३ ॥
‘ इसमें संशय नहीं कि समस्त प्राणियोंके प्रति मेरा समान भाव है, तथापि मैंने यह व्रत ले रखा है कि पापात्माओंका वध कर दिया जाय ॥ ४३ ॥
एकेषुणा विभेद्यानि तानि दुर्गाणि नान्यथा ।
न च स्थाणुमृते शक्तो भेत्तुमेकेषुणा पुरः ॥ ४४ ॥
' वे तीनों पुर एक ही बाणसे वेध दिये जायँ तो नष्ट हो सकते हैं, अन्यथा नहीं; परंतु महादेवजीके सिवा दूसरा कोई ऐसा नहीं है, जो उन तीनोंको एक साथ एक ही बाणसे वेध सके ॥ ४४ ॥
ते यूयं स्थाणुमीशानं जिष्णुमक्लिष्टकारिणम् ।
योद्धारं वृणुतादित्याः स तान् हन्ता सुरेतरान् ॥ ४५ ॥
‘ अतः अदितिकुमारो! तुमलोग अनायास ही महान् कर्म करनेवाले, विजयशील, ईश्वर,
महादेवजीका योद्धाके रूपमें वरण करो । वे ही उन दैत्योंको मार सकते हैं ' ॥ ४५ ॥
इति तस्य वचः श्रुत्वा देवाः शक्रपुरोगमाः ।
ब्रह्माणमग्रतः कृत्वा वृषाङ्कं शरणं ययुः ॥ ४६ ॥
उनकी यह बात सुनकर इन्द्र आदि सम्पूर्ण देवता ब्रह्माजीको आगे करके महादेवजीकी शरणमें गये ॥ ४६ ॥
तपो नियममास्थाय गृणन्तो ब्रह्म शाश्वतम् ।
ऋषिभिः सह धर्मज्ञा भवं सर्वात्मना गताः ॥ ४७ ॥
तप और नियमका आश्रय ले ऋषियोंसहित धर्मज्ञ देवता सनातन ब्रह्मस्वरूप महादेवजीकी स्तुति करते हुए सम्पूर्ण हृदयसे उनकी शरणमें गये ॥ ४७ ॥
तुष्टुवुर्वाग्भिरिष्टाभिर्भयेष्वभयदं नृप ।
सर्वात्मानं महात्मानं येनाप्तं सर्वमात्मना ॥ ४८ ॥
नरेश्वर! जिन्होंने आत्मस्वरूपसे सबको व्याप्त कर रखा है तथा जो भयके अवसरोंपर अभय प्रदान करनेवाले हैं, उन सर्वात्मा, महात्मा भगवान् शिवकी उन देवताओंने अभीष्ट वाणीद्वारा स्तुति की ॥ ४८ ॥
तपोविशेषैर्विविधैर्योगं यो वेद चात्मनः ।
यः सांख्यमात्मनो वेत्ति यस्य चात्मा वशे सदा ॥ ४ ९ ॥
तं ते ददृशुरीशानं तेजोराशिमुमापतिम् ।
अनन्यसदृशं लोके भगवन्तमकल्मषम् ॥ ५० ॥
पृष्ठ 1814
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
जो नाना प्रकारकी विशेष तपस्याओंद्वारा मनकी सम्पूर्ण वृत्तियोंके निरोधका उपाय जानते हैं, जिन्हें अपनी ज्ञानस्वरूपताका बोध नित्य बना रहता है, जिनका अन्तःकरण सदा अपने वशमें रहता है, जगत्में जिनकी कहीं भी तुलना नहीं है, उन निष्पाप, तेजोराशि, महेश्वर भगवान् उमापतिका उन देवताओंने दर्शन किया ॥ ४ ९ -५० ॥
एकं च भगवन्तं ते नानारूपमकल्पयन् ।
आत्मनः प्रतिरूपाणि रूपाण्यथ महात्मनि ॥ ५१ ॥
परस्परस्य चापश्यन् सर्वे परमविस्मिताः । उन्होंने एक ही भगवान् शिवको अपनी भावनाके अनुसार अनेक रूपोंमें कल्पित किया । उन परमात्मामें अपने तथा दूसरोंके प्रतिबिम्ब देखे । यह सब देखकर परस्पर दृष्टिपात करके वे सब - के - सब अत्यन्त आश्चर्यचकित हो उठे ॥ ५१३ ॥
सर्वभूतमयं दृष्ट्वा तमजं जगतः प्रतिम् ॥ ५२ ॥
देवा ब्रह्मर्षयश्चैव शिरोभिर्धरणीं गताः । उन सर्वभूतमय अजन्मा जगदीश्वरको देखकर सम्पूर्ण देवताओं तथा ब्रह्मर्षियोंने धरतीपर मस्तक टेक दिये ॥ ५२३ ॥
तान् स्वस्तिवादेनाभ्यर्च्य समुत्थाप्य च शङ्करः ॥ ५३ ॥
ब्रूत ब्रूतेति भगवान् स्मयमानोऽभ्यभाषत । तब भगवान् शंकरने ‘ तुम्हारा कल्याण हो ' ऐसा कहकर उनका समादर करते हुए उनको उठाया और मुसकराते हुए कहा — ' बोलो, बोलो; क्या है?' ॥ ५३३ ॥
त्र्यम्बकेणाभ्यनुज्ञातास्ततस्ते स्वस्थचेतसः ॥ ५४ ॥
नमो नमो नमस्तेऽस्तु प्रभो इत्यब्रुवत् वचः । भगवान् त्रिलोचनकी आज्ञा पाकर स्वस्थचित्त हुए वे देवगण इस प्रकार उनकी स्तुति करने लगे — ‘ प्रभो! आपको नमस्कार है, नमस्कार है, नमस्कार है ॥ ५४३ ॥
नमो देवाधिदेवाय धन्विने वनमालिने ॥ ५५ ॥
प्रजापतिमखघ्नाय प्रजापतिभिरीड्यते ।
नमः स्तुताय स्तुत्याय स्तूयमानाय शम्भवे ॥ ५६ ॥
‘ आप देवताओंके अधिदेवता, धनुर्धर और वनमालाधारी हैं। आपको नमस्कार है । आप दक्षप्रजापतिके यज्ञका विध्वंस करनेवाले हैं, प्रजापति भी आपकी स्तुति करते हैं, सबके द्वारा आपकी ही स्तुति की गयी है, आप ही स्तुतिके योग्य हैं तथा सब लोग आपकी ही स्तुति करते हैं । आप कल्याणस्वरूप शम्भुको नमस्कार है ॥ ५५-५६ ॥
विलोहिताय रुद्राय नीलग्रीवाय शूलिने ।
अमोघाय मृगाक्षाय प्रवरायुधयोधिने ॥ ५७ ॥
‘ आप विशेषतः लाल वर्णके हैं, पापियोंको रुलानेवाले रुद्र हैं, नीलकण्ठ और त्रिशूलधारी हैं, आपका दर्शन अमोघ फल देनेवाला है, आपके नेत्र मृगोंके समान हैं तथा
पृष्ठ 1815
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
आप श्रेष्ठ आयुधोंद्वारा युद्ध करनेवाले हैं । आपको नमस्कार है ॥ ५७ ॥
अर्हाय चैव शुद्धाय क्षयाय क्रथनाय च ।
दुर्वारणाय शुक्राय ब्रह्मणे ब्रह्मचारिणे ॥ ५८ ॥
ईशानायाप्रमेयाय नियन्त्रे चर्मवाससे ।
तपोरताय पिङ्गाय व्रतिने कृत्तिवाससे ॥ ५ ९ ॥
'आप पूजनीय, शुद्ध, प्रलयकालमें सबका संहार करनेवाले हैं । आपको रोकना या पराजित करना सर्वथा कठिन है । आप शुक्लवर्ण, ब्रह्म, ब्रह्मचारी, ईशान, अप्रमेय, नियन्ता तथा व्याघ्रचर्ममय वस्त्र धारण करनेवाले हैं । आप सदा तपस्यामें तत्पर रहनेवाले,
पिंगलवर्ण, व्रतधारी और कृत्तिवासा हैं । आपको नमस्कार है ॥ ५८-५९ ॥
कुमारपित्रे त्र्यक्षाय प्रवरायुधधारिणे ।
प्रपन्नार्तिविनाशाय ब्रह्मद्विट्संघघातिने ॥ ६० ॥
' आप कुमार कार्तिकेयके पिता, त्रिनेत्रधारी, उत्तम आयुध धारण करनेवाले शरणागतदुःखभंजन तथा ब्रह्मद्रोहियोंके समुदायका विनाश करनेवाले हैं । आपको नमस्कार है ॥ ६० ॥
वनस्पतीनां पतये नराणां पतये नमः ।
गवां च पतये नित्यं यज्ञानां पतये नमः ॥ ६१ ॥
‘ आप वनस्पतियोंके पालक और मनुष्योंके अधिपति हैं । आप ही गौओंके स्वामी और
सदा यज्ञोंके अधीश्वर हैं । आपको बारंबार नमस्कार है ॥ ६१ ॥
नमोऽस्तु ते ससैन्याय त्र्यम्बकायामितौजसे ।
मनोवाक्कर्मभिर्देव त्वां प्रपन्नान् भजस्व नः ॥ ६२ ॥
‘ सेनासहित आप अमिततेजस्वी भगवान् त्र्यम्बकको नमस्कार है । देव! हम मन, वाणी
और क्रियाद्वारा आपकी शरणमें आये हैं । आप हमें अपनाइये ' ॥ ६२ ॥
ततः प्रसन्नो भगवान् स्वागतेनाभिनन्द्य च ।
प्रोवाच व्येतु वस्त्रासो ब्रूत किं करवाणि वः ॥ ६३ ॥
तब भगवान् शंकरने प्रसन्न होकर स्वागत- सत्कारके द्वारा देवताओंको आनन्दित करके कहा — ‘ देवगण! तुम्हारा भय दूर हो जाना चाहिये; बोलो, मैं तुम्हारे लिये क्या करूँ? ' ॥ इति श्रीमहाभारते कर्णपर्वणि त्रिपुराख्याने त्रयस्त्रिंशोऽध्यायः ॥ ३३ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत कर्णपर्वमें त्रिपुराख्यानविषयक तैंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३३ ॥
( दाक्षिणात्य अधिक पाठके ४३ श्लोक मिलाकर कुल ६७२ श्लोक हैं ) OF FULL
पृष्ठ 1816
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
चतुस्त्रिंशोऽध्यायः दुर्योधनका शल्यको शिवके विचित्र रथका विवरण सुनाना और शिवजीद्वारा त्रिपुर- वधका उपाख्यान सुनाना एवं परशुरामजीके द्वारा कर्णको दिव्य अस्त्र मिलनेकी बात कहना दुर्योधन उवाच
पितृदेवर्षिसंघेभ्योऽभये दत्ते महात्मना ।
सत्कृत्य शङ्करं प्राह ब्रह्मा लोकहितं वचः ॥ १ ॥
दुर्योधन बोला— राजन्! परमात्मा शिवने जब देवताओं, पितरों तथा ऋषियोंके समुदायको अभय दे दिया, तब ब्रह्माजीने उन भगवान् शंकरका सत्कार करके यह लोक-हितकारी वचन कहा— ॥ १ ॥
तवातिसर्गाद् देवेश प्राजापत्यमिदं पदम् ।
मयाधितिष्ठता दत्तो दानवेभ्यो महान् वरः ॥ २ ॥
‘ देवेश्वर! आपके आदेशसे इस प्रजापतिपदपर स्थित रहते हुए मैंने दानवोंको एक महान् वर दे दिया है ॥
तानतिक्रान्तमर्यादान् नान्यः संहर्तुमर्हति ।
त्वामृते भूतभव्येश त्वं ह्येषां प्रत्यरिर्वधे ॥ ३ ॥
‘ उस वरको पाकर वे मर्यादाका उल्लंघन कर चुके हैं । भूत, वर्तमान और भविष्यके स्वामी महेश्वर! आपके सिवा दूसरा कोई भी उनका संहार नहीं कर सकता । उनके वधके लिये आप ही प्रतिपक्षी शत्रु हो सकते हैं ॥ ३ ॥
स त्वं देव प्रपन्नानां याचतां च दिवौकसाम् ।
कुरु प्रसादं देवेश दानवाञ्जहि शङ्कर ॥ ४ ॥
' देव! हम सब देवता आपकी शरणमें आकर याचना करते हैं । देवेश्वर शंकर! आप हमपर कृपा कीजिये और इन दानवोंको मार डालिये ॥ ४ ॥
त्वत्प्रसादाज्जगत् सर्वं सुखमैधत मानद ।
शरण्यस्त्वं हि लोकेश ते वयं शरणं गताः ॥ ५ ॥
‘ मानद! आपके प्रसादसे सम्पूर्ण जगत् सुखपूर्वक उन्नति करता आया है, लोकेश्वर! आप ही आश्रयदाता हैं; इसलिये हम आपकी शरणमें आये हैं ' ॥ ५ ॥
स्थाणुरुवाच
पृष्ठ 1817
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
हन्तव्याः शत्रवः सर्वे युष्माकमिति मे मतिः ।
न त्वेक उत्सहे हन्तुं बलस्था हि सुरद्विषः ॥ ६ ॥
भगवान् शिवने कहा- देवताओ! मेरा ऐसा विचार है कि तुम्हारे सभी शत्रुओंका वध किया जाय, परंतु मैं अकेला ही उन सबको नहीं मार सकता; क्योंकि वे देवद्रोही दैत्य बड़े बलवान् हैं ॥ ६ ॥
ते यूयं संहताः सर्वे मदीयेनार्धतेजसा ।
जयध्वं युधि ताञ्शत्रून् संहता हि महाबलाः ॥ ७ ॥
अतः तुम सब लोग एक साथ संघ बनाकर मेरे आधे तेजसे पुष्ट हो युद्धमें उन शत्रुओंको जीत लो; क्योंकि जो संघटित होते हैं वे महान् बलशाली हो जाते हैं ॥ ७ ॥
देवा ऊचुः
अस्मत्तेजोबलं यावत् तावद्विगुणमाहवे ।
तेषामिति हि मन्यामो दृष्टतेजोबला हि ते ॥ ८ ॥
देवता बोले — प्रभो! युद्धमें हमलोगोंका जितना भी तेज और बल है, उससे दूना उन दैत्योंका है, ऐसा हम मानते हैं; क्योंकि उनके तेज और बलको हमने देख लिया है ॥ ८ ॥
स्थाणुरुवाच
वध्यास्ते सर्वतः पापा ये युष्मास्वपराधिनः ।
मम तेजोबलार्धेन सर्वान् निघ्नत शात्रवान् ॥ ९ ॥
भगवान् शिव बोले- देवताओ! जो पापी तुम लोगोंके अपराधी हैं, वे सब प्रकारसे वधके ही योग्य हैं । मेरे तेज और बलके आधे भागसे युक्त हो तुमलोग समस्त शत्रुओंको मार डालो ॥ ९ ॥
देवा ऊचुः
बिभर्तु भवतोऽर्थं तु न शक्ष्यामो महेश्वर ।
सर्वेषां नो बलार्धेन त्वमेव जहि शात्रवान् ॥ १० ॥
देवताओंने कहा - महेश्वर! हम आपका आधा बल धारण नहीं कर सकते; अतः आप ही हम सब लोगोंके आधे बलसे युक्त हो शत्रुओंका वध कीजिये ॥ १० ॥
स्थाणुरुवाच
यदि शक्तिर्न वः काचिद् बिभर्तुं मामकं बलम् ।
अहमेतान् हनिष्यामि युष्मत्तेजोऽर्धबृंहितः ॥ ११ ॥
भगवान् शिव बोले — देवगण! यदि मेरे बलको धारण करनेमें तुम्हारी सामर्थ्य नहीं है तो मैं ही तुमलोगोंके आधे तेजसे परिपुष्ट हो इन दैत्योंका वध करूँगा ॥ ११ ॥
ततस्तथेति देवेशस्तैरुक्तो राजसत्तम ।
पृष्ठ 1818
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अर्धमादाय सर्वेषां तेजसाभ्यधिकोऽभवत् ॥ १२ ॥
नृपश्रेष्ठ! तदनन्तर देवताओंने देवेश्वर भगवान् शिवसे ' तथास्तु' कह दिया और सबके तेजका आधा भाग लेकर वे अधिक तेजस्वी हो गये ॥ १२ ॥
स तु देवो बलेनासीत् सर्वेभ्यो बलवत्तरः ।
महादेव इति ख्यातस्ततः प्रभृति शङ्करः ॥ १३ ॥
वे देवबलके द्वारा उन सबकी अपेक्षा अधिक बलशाली हो गये । इसलिये उसी समयसे उन भगवान् शंकरका महादेव नाम विख्यात हो गया ॥ १३ ॥
ततोऽब्रवीन्महादेवो धनुर्बाणधरो ह्यहम् ।
हनिष्यामि रथेनाजौ तान् रिपून् वो दिवौकसः ॥ १४ ॥
तत्पश्चात् महादेवजीने कहा – ' देवताओ! मैं धनुष- बाण धारण करके रथपर बैठकर युद्धस्थलमें तुम्हारे उन शत्रुओंका वध करूँगा ॥ १४ ॥
ते यूयं मे रथं चैव धनुर्बाणं तथैव च ।
पश्यध्वं यावदद्यैतान् पातयामि महीतले ॥ १५ ॥
‘ अतः तुमलोग मेरे लिये रथ और धनुष- बाणकी खोज करो, जिसके द्वारा आज इन दैत्योंको भूतलपर मार गिराऊँ? ' ॥ १५ देवा ऊचुः
मूर्तीः सर्वाः समाधाय त्रैलोक्यस्य ततस्ततः ।
रथं ते कल्पयिष्यामो देवेश्वर सुवर्चसम् ॥ १६ ॥
तथैव बुद्ध्या विहितं विश्वकर्मकृतं शुभम् । देवता बोले- देवेश्वर! हमलोग तीनों लोकोंके तेजकी सारी मात्राओंको एकत्र करके आपके लिये परम तेजस्वी रथका निर्माण करेंगे । विश्वकर्माका बुद्धिपूर्वक बनाया हुआ वह रथ बहुत ही सुन्दर होगा ॥ १६३ ॥
ततो विबुधशार्दूलास्ते रथं समकल्पयन् ॥ १७ ॥
विष्णुं सोमं हुताशं च तस्येषु समकल्पयन् । तदनन्तर उन देवसंघोंने रथका निर्माण किया और विष्णु, चन्द्रमा तथा अग्नि–इन तीनोंको उनका बाण बनाया ॥ १७३ ॥
शृङ्गमग्निर्बभूवास्य भल्लः सोमो विशाम्पते ॥ १८ ॥
कुड्मलश्चाभवद् विष्णुस्तस्मिन्निषुवरे तदा । प्रजानाथ! उस बाणका शृंग ( गाँठ ) अग्नि हुए । उसका भल्ल ( फल) चन्द्रमा हुए और उस श्रेष्ठ बाणके अग्रभागमें भगवान् विष्णु प्रतिष्ठित हुए ॥ १८३ ॥
रथं वसुन्धरां देवीं विशालपुरमालिनीम् ॥ १९ ॥
सपर्वतवनद्वीपां चक्रुर्भूतधरां तदा ।
पृष्ठ 1819
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
बड़े - बड़े नगरोंसे सुशोभित, पर्वत, वन और द्वीपोंसे युक्त, प्राणियोंकी आधारभूता पृथ्वीदेवीको उस समय देवताओंने रथ बनाया ॥ १ ९ ३ ॥ मन्दरः पर्वतश्चाक्षो जङ्घा तस्य महानदी ॥ २० ॥
दिशश्च प्रदिशश्चैव परिवारो रथस्य तु । मन्दराचल उस रथका धुरा था, महानदी गंगा जंघा ( धुरेका आश्रय ) बनी थीं, दिशाएँ और विदिशाएँ उस रथका आवरण थीं ॥ २० ॥
ईषा नक्षत्रवंशश्च युगः कृतयुगोऽभवत् ॥ २१ ॥
कूबरश्च रथस्यासीद् वासुकिर्भुजगोत्तमः ।
अपस्करमधिष्ठाने हिमवान् विन्ध्यपर्वतः ।
उदयास्तावधिष्ठाने गिरी चक्रुः सुरोत्तमाः ॥ २२ ॥
नक्षत्रोंका समूह ईषादण्ड हुआ और कृतयुगने जूएका रूप धारण किया । नागराज वासुकि उस रथका कूबर बन गये थे । हिमालय पर्वत अपस्कर (रथके पीछेका काठ ) और विन्ध्याचलने उसके आधारकाष्ठका रूप धारण किया । उदयाचल और अस्ताचल दोनोंको उन श्रेष्ठ देवताओंने पहियोंका आधारभूत काष्ठ बनाया ॥ २१-२२ ॥
समुद्रमक्षमसृजन् दानवालयमुत्तमम् ।
सप्तर्षिमण्डलं चैव रथस्यासीत् परिष्करः ॥ २३ ॥
दानवोंके उत्तम निवासस्थान समुद्रको बन्धनरज्जु बनाया । सप्तर्षियोंका समुदाय रथका परिस्कर ( चक्ररक्षा आदिका साधन) बन गया ॥ २३ ॥
गङ्गा सरस्वती सिन्धुर्धुमाकाशमेव च ।
उपस्करो रथस्यासन्नापः सर्वाश्च निम्नगाः ॥ २४ ॥
गंगा, सरस्वती और सिंधु - इन तीनों नदियोंके साथ आकाश त्रिवेणुकाष्ठयुक्त धुरेका भाग हुआ । उस रथके बन्धन आदिकी सामग्री जल तथा सम्पूर्ण नदियाँ थीं ॥ २४ ॥
अहोरात्रं कलाश्चैव काष्ठाश्च ऋतवस्तथा ।
अनुकर्षं ग्रहा दीप्ता वरूथं चापि तारकाः ॥ २५ ॥
दिन, रात, कला, काष्ठा और छहों ऋतुएँ उस रथका अनुकर्ष ( नीचेका काष्ठ ) बन गयीं ।
चमकते हुए ग्रह और तारे वरूथ (रथकी रक्षाके लिये आवरण) हुए ॥ २५ ॥
धर्मार्थकामं संयुक्तं त्रिवेणुं दारु बन्धुरम् ।
ओषधीर्वीरुधश्चैव घण्टाः पुष्पफलोपगाः ॥ २६ ॥
त्रिवेणु - तुल्य धर्म, अर्थ और काम- तीनोंको संयुक्त करके रथकी बैठक बनाया । फल और फूलोंसे युक्त ओषधियों एवं लताओंको घण्टाका रूप दिया ॥ २६ ॥
सूर्याचन्द्रमसौ कृत्वा चक्रे रथवरोत्तमे ।
पक्षौ पूर्वापरौ तत्र कृते सत्र्यहनी शुभे ॥ २७ ॥
पृष्ठ 1820
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
उस श्रेष्ठ रथमें सूर्य और चन्द्रमाको दोनों पहिये बनाकर सुन्दर रात्रि और दिनको वहाँ पूर्वपक्ष और अपरपक्षके रूपमें प्रतिष्ठित किया ॥ २७ ॥
दश नागपतीनीषां धृतराष्ट्रमुखांस्तदा ।
योक्त्राणि चक्रुर्नागांश्च निःश्वसन्तो महोरगान् ॥ २८ ॥
धृतराष्ट्र आदि दस नागराजोंको भी ईषादण्डमें ही स्थान दिया । फुफकारते हुए बड़े - बड़े सर्पोंको उस रथके जोत बनाये ॥ २८ ॥
द्यां युगं युगचर्माणि संवर्तकबलाहकान् ।
कालपृष्ठोऽथ नहुषः कर्कोटकधनंजयौ ॥ २ ९ ॥
इतरे चाभवन् नागा हयानां बालबन्धनाः ।
दिशश्च प्रदिशश्चैव रश्मयो रथवाजिनाम् ॥ ३० ॥
द्युलोकको भी जूएमें ही स्थान दिया । प्रलयकालके मेघोंको युगचर्म बनाया । कालपृष्ठ, नहुष, कर्कोटक, धनंजय तथा दूसरे दूसरे नाग घोड़ोंके केसर बाँधनेकी रस्सी बनाये गये । दिशाओं और विदिशाओंने रथमें जुते हुए घोड़ोंकी बागडोरका भी रूप धारण किया ॥ २ ९ -३० ॥
संध्यां धृतिं च मेधां च स्थितिं संनतिमेव च ।
ग्रहनक्षत्रताराभिश्चर्म चित्रं नभस्तलम् ॥ ३१ ॥
संध्या, धृति, मेधा, स्थिति और संनतिसहित आकाशको, जो ग्रह, नक्षत्र और तारोंसे विचित्र शोभा धारण करता है, चर्म (रथका ऊपरी आवरण ) बनाया ॥ ३१ ॥
सुराम्बुप्रेतवित्तानां पतील्लोँकेश्वरान् हयान् ।
सिनीवालीमनुमतिं कुहूं राकां च सुव्रताम् ॥ ३२ ॥
योक्त्राणि चक्रुर्वाहानां रोहकांस्तत्र कण्टकान् । इन्द्र, वरुण, यम और कुबेर- इन चार लोकपालोंको देवताओंने उस रथके घोड़े बनाये । सिनीवाली, अनुमति, कुहू तथा उत्तम व्रतका पालन करनेवाली राका इनकी अधिष्ठात्री देवियोंको घोड़ोंके जोतेका रूप दिया और इनके अधिकारी देवताओंको घोड़ोंकी लगामोंके काँटे बनाया ॥ ३२ ॥
धर्मः सत्यं तपोऽर्थश्च विहितास्तत्र रश्मयः ॥ ३३ ॥
अधिष्ठानं मनश्चासीत् परिरथ्या सरस्वती ।
नानावर्णाश्च चित्राश्च पताकाः पवनेरिताः ॥ ३४ ॥
विद्युदिन्द्रधनुर्नद्धं रथं दीप्तं व्यदीपयन् । धर्म, सत्य, तप और अर्थ- इनको वहाँ लगाम बनाया गया । रथकी आधारभूमि मन हुआ और सरस्वती देवी रथके आगे बढ़नेका मार्ग थीं । नाना रंगोंकी विचित्र पताकाएँ पवनसे प्रेरित होकर फहरा रही थीं, जो बिजली और इन्द्रधनुषसे बँधे हुए उस देदीप्यमान रथकी शोभा बढ़ाती थीं ॥ ३३-३४ ॥