श्रीगणेशाय नमः।

बोध्यगीता : शान्ति प्राप्त करने हेतु किस प्रकार की बुद्धि और आचरण आवश्यक है?

वैराग्य और एकाग्रचित्तता का मार्ग

महाभारतके सन्दर्भ सहित वास्तविक आख्यान — मूल श्लोक और पृष्ठ-सङ्केतके साथ।

महाभारत — खण्ड ५ · शान्तिपर्व → मोक्षधर्मपर्व · अध्याय 178 · पृष्ठ 1155–1159

519 शब्द · 3 मिनटका पाठ · 4 श्लोक

भीष्म ने युधिष्ठिर से कहा

शान्ति के मार्ग पर चलने की जिज्ञासा हेतु

भीष्म बोले— हे राजन्! जब शान्ति के मार्ग पर चलने की बात आती है, तब विदेहराज जनक का वह प्राचीन इतिहास स्मरण आता है, जिन्होंने शान्तभाव को प्राप्त किया था। जनक ने कहा था— 'मेरे पास अनन्त सा धन-वैभव है; फिर भी मेरा कुछ नहीं है। इस मिथिलापुरी में आग लग जाए, तो भी मेरा कुछ नहीं जलता।' युधिष्ठिर! इसी प्रसङ्ग में वैराग्य को लक्ष्य करके बोध्य मुनि ने जो वचन कहे हैं, उन्हें मैं बताता हूँ, सुनो।

भीष्म उवाच

अत्रैवोदाहरन्तीमं बोध्यस्य पदसंचयम् ।
निर्वेदं प्रति विन्यस्तं तं निबोध युधिष्ठिर ॥

युधिष्ठिर! इसी प्रसंगमें वैराग्यको लक्ष्य करके बोध्य मुनिने जो वचन कहे हैं, उन्हें बताता हूँ, सुनो ।

महाभारत · शान्तिपर्व · मोक्षधर्मपर्व · अध्याय 178 · श्लोक 3पृष्ठ 1157

कथा उस समय की है जब नहुषनन्दन राजा ययाति के सम्मुख परम शान्त बोध्य ऋषि उपस्थित थे। वे शास्त्र के उत्कृष्ट ज्ञान से परित been (परितृप्त) और वैराग्य से शान्तभाव को प्राप्त थे। राजा ययाति ने उनकी ओर देखते हुए पूछा— 'महाप्राज्ञ! आप मुझे ऐसा उपदेश दीजिये, जिससे मुझे शान्ति मिले। कौन-सी ऐसी बुद्धि है, जिसका आश्रय लेकर आप शान्ति और सन्तोष के साथ विचरते हैं?'

भीष्म उवाच

उपदेशं महाप्राज्ञ शमस्योपदिशस्व मे ।
कां बुद्धिं समनुध्याय शान्तश्चरसि निर्वृतः ॥

‘ महाप्राज्ञ! आप मुझे ऐसा उपदेश दीजिये, जिससे मुझे शान्ति मिले । कौन - सी ऐसी बुद्धि है, जिसका आश्रय लेकर आप शान्ति और संतोषके साथ विचरते हैं? '

महाभारत · शान्तिपर्व · मोक्षधर्मपर्व · अध्याय 178 · श्लोक 5पृष्ठ 1157

बोध्य ऋषि ने अत्यन्त शान्त स्वर में उत्तर दिया— 'राजन्! मैं किसी को उपदेश नहीं देता, बल्कि स्वयं दूसरों से प्राप्त हुए उपदेश के अनुसार आचरण करता हूँ। मैं अपने को मिले हुए उन उपदेशों का लक्षण बता रहा हूँ जिनसे मुझे ज्ञान मिला है; तुम स्वयं उन पर विचार करो। पिङ्गला, कुरर पक्षी, सर्प, वन में सारङ्ग का अन्वेषण, बाण बनानेवाला और कुमारी कन्या— ये छ: मेरे गुरु हैं।'

ऋषि ने अपने गुरुओं के माध्यम से जीवन का मर्म समझाते हुए कहा कि आशा बड़ी प्रबल है और वही सबको दुःख देती है। पिङ्गला नामक वेश्या ने जब अपनी आशा को निराशा में बदल दिया, तब वह सुख से सो गयी; अतः आशा के त्याग का उपदेश देने के कारण पिङ्गला मेरी गुरु हुई। वहीं, क्रौंच पक्षी (कुरर) की कथा भी अद्भुत है। वह चोंच में मांस का टुकड़ा लिये उड़ रहा था, जिसे देखकर दूसरे पक्षी उसे मारने लगे। तब उसने उस मांस के टुकड़े को त्याग दिया और इस प्रकार पक्षियों ने उसका पीछा करना छोड़ दिया। भोगों के इसी परित्याग से वह सुखी हुआ; अतः भोग त्याग का उपदेश देने के कारण कुरर मेरा गुरु हुआ।

भीष्म उवाच

सामिषं कुररं दृष्ट्वा वध्यमानं निरामिषैः ।
आमिषस्य परित्यागात् कुररः सुखमेधते ॥

चोंचमें मांसका टुकड़ा लिये उड़ते हुए कुरर ( क्रौंच पक्षीको देखकर दूसरे पक्षी जो मांस नहीं लिये हुए थे, उसे मारने लगे । तब उसने उस मांसके टुकड़ेको त्याग दिया । अतः पक्षियोंने उसका पीछा करना छोड़ दिया । इस प्रकार आमिषके त्यागसे क्रौंचपक्षी सुखी हो गया । भोगोंके परित्यागका उपदेश देनेके कारण कुरर ( क्रौंच पक्षी गुरु हुआ ।

महाभारत · शान्तिपर्व · मोक्षधर्मपर्व · अध्याय 178 · श्लोक 9पृष्ठ 1158

बोध्य ऋषि आगे बोले— 'घर बनाने का खटपट तो केवल दुःख का ही कारण है, उससे कभी सुख नहीं मिलता। देखो, साँप दूसरों के बनाये हुए बिल में प्रवेश करके सुख से रहता है।' इस प्रकार अनिकेत रहने यानी घर-द्वार के चक्कर में न पड़ने का उपदेश देने के कारण सर्प गुरु हुआ। मुनिजन भी पपीहा पक्षी की भाँति किसी प्राणी से वैर न करके, केवल याचनावृत्ति और भिक्षावृत्ति का आश्रय लेकर सुख से जीवन व्यतीत करते हैं; अतः अद्रोह का उपदेश देने के कारण पपीहा मेरा गुरु बना।

ऋषि ने एकाग्रता का उदाहरण देते हुए कहा कि मैंने एक बाण बनानेवाले को देखा, जो अपने काम में इतना दत्तचित्त था कि उसके पास से राजा की सवारी निकल गई, पर उसे कुछ पता न चला। इस एकाग्रचित्तता के उपदेश के कारण वह भी मेरा गुरु हुआ। अन्त में उन्होंने अकेले चलने का मार्ग बताया— 'बहुत मनुष्य एक साथ रहें तो उनमें प्रतिदिन कलह होता है और दो रहें तो भी बातचीत अवश्य ही होती है; अतः मैं कुमारी कन्या के हाथ में धारण किए हुए शङ्ख की एक-एक चूड़ी के समान अकेला ही विचरूँगा।'

बहूनां कलहो नित्य द्वयोः संकथनं ध्रुवम् ।
एकाकी विचरिष्यामि कुमारीशंखको यथा ॥

बहुत मनुष्य एक साथ रहें तो उनमें प्रतिदिन कलह होता है और दो रहें तो भी उनमें बातचीत तो अवश्य ही होती है; अतः मैं कुमारी कन्याके हाथमें धारण की हुई शंखकी एक-एक चूड़ीके समान अकेला ही विचरूँगा* ।

महाभारत · शान्तिपर्व · मोक्षधर्मपर्व · अध्याय 178 · श्लोक 13पृष्ठ 1159

In English

The Six Teachers of Bodhya Muni

King Yayati asks the sage Bodhya Muni how to achieve peace and contentment. Bodhya Muni explains that he learned these lessons from six different teachers: Pingala, a Kurara bird, a snake, a Papiha bird, an arrow-maker, and a maiden.

This page answers

  • Who are the six gurus of bodhya muni?
  • How did the bird kurar teach detachment?
  • What lesson did pingala teach about hope?
  • Why is the snake considered a teacher?
  • What does the arrow maker teach about concentration?

Also written: Bodhyagita, Bodhya, Pingala, Papiha, Kumari, Kurara, बोध्यगीता