श्रीगणेशाय नमः।

हारीतगीता : परमधाम की प्राप्ति हेतु कैसा आचरण आवश्यक है?

मोक्ष का वास्तविक मार्ग

महाभारतके सन्दर्भ सहित वास्तविक आख्यान — मूल श्लोक और पृष्ठ-सङ्केतके साथ।

महाभारत — खण्ड ५ · शान्तिपर्व → मोक्षधर्मपर्व · अध्याय 278 · पृष्ठ 1792–1796

745 शब्द · 4 मिनटका पाठ · 6 श्लोक

भीष्म ने युधिष्ठिर से कहा

कुरुक्षेत्र के युद्धक्षेत्र में युधिष्ठिर द्वारा परब्रह्म के परमधाम के बारे में प्रश्न पूछने पर

कुरुक्षेत्र के युद्धक्षेत्र की नीरवता के बीच, युधिष्ठिर के मन में एक गहरा प्रश्न उमड़ा। उन्होंने भीष्म पितामह की ओर देखा और पूछा— "पितामह! प्रकृति से परे जो परब्रह्म का अविनाशी परमधाम है, उसे कैसे स्वभाव, किस तरह के आचरण, कैसी विद्या और किन कर्मों में तत्पर रहने वाला पुरुष प्राप्त कर सकता है?"

युधिष्ठिर उवाच

किंशीलः किंसमाचारः किंविद्यः किंपरायणः ।
प्राप्नोति ब्रह्मणः स्थानं यत् परं प्रकृतेर्ध्रुवम् ॥

युधिष्ठिरने पूछा — पितामह! प्रकृतिसे परे जो परब्रह्मका अविनाशी परमधाम है, उसे कैसे स्वभाव, किस तरहके आचरण, कैसी विद्या और किन कर्मोंमें तत्पर रहनेवाला पुरुष प्राप्त कर सकता है?

महाभारत · शान्तिपर्व · मोक्षधर्मपर्व · अध्याय 278 · श्लोक 1पृष्ठ 1793

भीष्म ने युधिष्ठिर के प्रश्न को गम्भीरता से लिया और कहा— "राजन्! जो पुरुष मोक्षधर्मों में तत्पर, मिताहारी और जितेन्द्रिय होता है, वह उस प्रकृति से परे परब्रह्म परमात्मा का जो अविनाशी परमधाम है, उसे प्राप्त कर लेता है। युधिष्ठिर! पूर्वकाल में हारीत मुनि ने जो ज्ञान का उपदेश दिया था, इस विषय में विज्ञ पुरुष उसी प्राचीन इतिहास का उदाहरण दिया करते हैं, उसे सुनो।"

भीष्म उवाच

मोक्षधर्मेषु निरतो लघ्वाहारो जितेन्द्रियः ।
प्राप्नोति परमं स्थानं यत् परं प्रकृतेर्ध्रुवम् ॥

भीष्मजीने कहा- राजन्! जो पुरुष मोक्षधर्मोंमें तत्पर, मिताहारी और जितेन्द्रिय होता है, वह उस प्रकृतिसे परे परब्रह्म परमात्माका जो अविनाशी परमधाम है, उसे प्राप्त कर लेता है ।

महाभारत · शान्तिपर्व · मोक्षधर्मपर्व · अध्याय 278 · श्लोक 2पृष्ठ 1793

हारीत मुनि के उस पुरातन ज्ञान के अनुसार, मुमुक्षु को अपने घर से निकलकर सन्न्यास ग्रहण कर लेना चाहिए। उसे लाभ और हानि में समान भाव रखकर मुनिवृत्ति से रहना चाहिए और भोगों के उपस्थित होने पर भी उनकी आकाङ्क्षा से रहित होना चाहिए। एक सच्चा सन्न्यासी वह है जो न नेत्र से, न मन से और न वाणी से दूसरे के दोष देखे, सोचे या कहे। वह किसी के सामने या परोक्ष में पराये दोष की चर्चा कहीं न करे। उसे समस्त प्राणियों में से किसी की भी हिंसा नहीं करनी चाहिए और न ही किसी को पीड़ा देनी चाहिए। उसे सबके प्रति मित्रभाव रखकर विचरना चाहिए और इस नश्वर जीवन को लेकर किसी के साथ शत्रुता नहीं करनी चाहिए।

भीष्म उवाच

न हिंस्यात् सर्वभूतानि मैत्रायणगतश्चरेत् ।
नेदं जीवितमासाद्य वैरं कुर्वीत केनचित् ॥

समस्त प्राणियोंमेंसे किसीकी भी हिंसा न करे - किसीको भी पीड़ा न दे । सबके प्रति मित्रभाव रखकर विचरता रहे । इस नश्वर जीवनको लेकर किसीके साथ शत्रुता न करे ।

महाभारत · शान्तिपर्व · मोक्षधर्मपर्व · अध्याय 278 · श्लोक 5पृष्ठ 1793

यदि कोई सन्न्यासी के प्रति अमर्यादित बात कहे, उसकी निन्दा करे या कटु वचन सुनाए, तो उसे उन वचनों को चुपचाप सह लेना चाहिए। उसे अपने भीतर अहङ्कार या घमण्ड प्रकट नहीं करना चाहिए। यदि कोई क्रोध करे, तो उसे बदले में केवल प्रिय वचन ही बोलने चाहिए; यदि कोई गाली दे, तो उसके प्रति भी हितकर वचन ही मुँह से निकालने चाहिए। यदि कोई उस पर धूल या कीचड़ फेंके, तो उसे केवल आत्मरक्षामात्र करनी चाहिए और बदले में स्वयं वैसा व्यवहार न करते हुए, न ही मुख से कोई अप्रिय वचन निकालना चाहिए। उसे सर्वदा मृदुता का बर्ताव करना चाहिए और बिना किसी कारण के बड़ी-बड़ी बातें नहीं बनानी चाहिए।

भिक्षा के विषय में मुनि ने स्पष्ट निर्देश दिए हैं। जब रसोईघर से धुआँ निकलना बन्द हो जाए, अनाज कूटने के लिए मूसल अलग रख दिया जाए, चूल्हे की आग ठण्डी पड़ जाए और घर के लोग भोजन कर चुके हों तथा बर्तनों का इधर-उधर जाना थम जाए, उस समय सन्न्यासी को भिक्षा प्राप्त करने की चेष्टा करनी चाहिए। उसे केवल अपनी प्राणयात्रा के निर्वाह मात्र का यत्न करना चाहिए; भर पेट भोजन मिल जाए, ऐसी इच्छा नहीं रखनी चाहिए। यदि भिक्षा न मिले तो मन में पीड़ा न हो और यदि मिल जाए तो हर्ष का आवेग न आए। उसे भिक्षा में मिले अन्न के दोष बताकर निन्दा नहीं करनी चाहिए और न ही उसके गुण बताकर प्रशंसा करनी चाहिए।

प्राणयात्रिकमात्रः स्यान्मात्रालाभेष्वनादृतः ।
अलाभे न विहन्येत लाभश्चैनं न हर्षयेत् ॥

उसे केवल अपनी प्राणयात्राके निर्वाहमात्रका यत्न करना चाहिये । भर पेट भोजन मिल जाय, इसकी इच्छा नहीं रखनी चाहिये । यदि भिक्षा न मिले तो उससे मनमें पीड़ाका अनुभव न करे और मिल जाय तो उसके कारण वह हर्षित न हो ।

महाभारत · शान्तिपर्व · मोक्षधर्मपर्व · अध्याय 278 · श्लोक 10पृष्ठ 1794

सोने और बैठने के लिए उसे सदा एकान्त का ही आदर करना चाहिए। वह सूने घर, वृक्ष की जड़, जङ्गल, पर्वत की गुफा अथवा अन्य किसी गुप्त स्थान में अज्ञातभाव से रहकर आत्मचिन्तन में लगा रहे। लोगों के अनुरोध या विरोध पर भी उसे निश्चल और स्थिरचित्त रहना चाहिए। उसे अपने कर्मों द्वारा पुण्य और पाप का अनुसरण नहीं करना चाहिए, बल्कि सर्वदा तृप्त और सन्तुष्ट रहकर मुख और इन्द्रियों को प्रसन्न रखना चाहिए। भय को पास न आने देकर, प्रणव आदि का जप करते हुए वैराग्य का आश्रय लेकर मौन रहना चाहिए। जो समदर्शी होकर पके और कच्चे भोजन से जीवन निर्वाह करता है, आत्मलाभ के लिए शान्तचित्त, मिताहारी और जितेन्द्रिय है, वही वास्तव में सन्न्यासी कहलाने योग्य है।

एक सच्चा तपस्वी वह है जो वाणी, मन, क्रोध, हिंसा, उदर और उपस्थ के वेगों को वश में रखता है। दूसरों द्वारा की गई निन्दा उसके हृदय में कोई विकार उत्पन्न न कर सके; प्रशंसा और निन्दा—दोनों में समान भाव रखकर उसे उदासीन रहना चाहिए। सन्न्यासाश्रम में इस प्रकार का आचरण परम पवित्र माना गया है। उसे महामनस्वी, जितेन्द्रिय, असङ्ग और सौम्य होना चाहिए। उसे अपने पूर्व आश्रम के परिचित स्थानों में नहीं विचरना चाहिए और न ही वानप्रस्थों या गृहस्थों के साथ संसर्ग रखना चाहिए। अपनी रुचि प्रकट किए बिना जो प्राप्त हो जाए, उसी से सन्तोष करना चाहिए।

मध्यस्थ एव तिष्ठेत प्रशंसानिन्दयोः समः ।
एतत् पवित्रं परमं परिव्राजक आश्रमे ॥

प्रशंसा और निन्दा—दोनोंमें समान भाव रखकर उदासीन ही रहना चाहिये । संन्यासाश्रममें इस प्रकारका आचरण परम पवित्र माना गया है ।

महाभारत · शान्तिपर्व · मोक्षधर्मपर्व · अध्याय 278 · श्लोक 18पृष्ठ 1796

हारीत मुनि ने इस सम्पूर्ण धर्म को ज्ञानियों के लिए मोक्ष का विमान बताया है; किन्तु अज्ञानियों के लिए यह केवल श्रम है। जो पुरुष सबको अभय-दान देकर घर से निकल जाता है, वह तेजोमय लोकों की प्राप्ति करता है और उस अनन्त परमात्मपद को प्राप्त करने में समर्थ होता है।

विजानतां मोक्ष एष श्रमः स्यादविजानताम् ।
मोक्षयानमिदं कृत्स्नं विदुषां हारितोऽब्रवीत् ॥

यह संन्यासाश्रम ज्ञानियोंके लिये तो मोक्षरूप है, परंतु अज्ञानियोंके लिये श्रमरूप ही है । हारीत मुनिने विद्वानोंके लिये इस सम्पूर्ण धर्मको मोक्षका विमान बताया है ।

महाभारत · शान्तिपर्व · मोक्षधर्मपर्व · अध्याय 278 · श्लोक 21पृष्ठ 1796

In English

Yudhisthira's Question on the Supreme Abode

Yudhisthira asks Bhishma how a person can reach the eternal supreme abode. Bhishma explains the qualities of a true sannyasi based on the teachings of Harita Muni, emphasizing self-control, equanimity, and detachment.

This page answers

  • How to reach the supreme abode according to bhishma?
  • What are the qualities of a true sannyasi?
  • How should a sannyasi accept alms?
  • What did harita muni teach about renunciation?

Also written: Haritagita, Harita, Yudhishthira, Bhishma, हारीतगीता