जापकोपाख्यान : जप करने वालों को किस प्रकार की परम गति प्राप्त होती है?
जाप से प्राप्त परमपद
महर्षि वेदव्यास कृत महाभारतके सन्दर्भ सहित वास्तविक आख्यान पढ़ें।
शान्तिपर्व → मोक्षधर्मपर्व · अध्याय 196–200 · पृष्ठ 1252–1291
भीष्म ने युधिष्ठिर से कहा
जप की विधि और फल जानने की जिज्ञासा हेतु
युधिष्ठिर ने पूछा— "पितामह! आपने चार आश्रमों तथा राजधर्मों का वर्णन किया एवं अनेकानेक विषयों से सम्बन्ध रखने वाले बहुत-से भिन्न-भिन्न इतिहास भी सुनाये। महामते! मैंने आपके मुख से अनेक धर्मयुक्त कथाएँ सुनी हैं; फिर भी मेरे मन में एक सन्देह रह गया है, उसे आप मुझे बताने की कृपा करें। भरतनन्दन! अब मैं यह सुनना चाहता हूँ कि जप करनेवालों को फल की प्राप्ति कैसे होती है? जापकों के जप का फल क्या बताया गया है अथवा जप करनेवाले पुरुष किन लोकों में स्थान पाते हैं? अनघ! आप मुझे जप की सम्पूर्ण विधि भी बताइये। 'जापक' इस पद से क्या तात्पर्य है? क्या यह साङ्ख्ययोग, ध्यानयोग अथवा क्रियायोग का अनुष्ठान है? अथवा यह जप भी कोई यज्ञ की ही विधि है? जिसका जप किया जाता है, वह क्या वस्तु है? आप यह सारी बातें मुझे बताइये; क्योंकि आप मेरी मान्यता के अनुसार सर्वज्ञ हैं।"
भीष्मजी ने कहा— "राजन्! इस विषय में विद्वान् पुरुष उस प्राचीन इतिहास का उदाहरण दिया करते हैं, जो पूर्वकाल में यम, काल और ब्राह्मण के बीच में घटित हुआ था। मोक्षदर्शी मुनियों ने जो साङ्ख्य और योग का वर्णन किया है, उनमें से वेदान्त में तो जप का सन्न्यास ही बताया गया है। उपनिषदों के वाक्य निर्वृत्ति—परमानन्द, शान्ति तथा ब्रह्मनिष्ठता का बोध कराने वाले हैं; अतः वहाँ जप की अपेक्षा नहीं है। समदर्शी मुनियों ने जो साङ्ख्य और योग बताये हैं, वे दोनों मार्ग चित्त-शुद्धि के द्वारा ज्ञान-प्राप्ति में उपकारक होने से जप का आश्रय लेते हैं। राजन्! यहाँ जैसा कारण सुना जाता है, वैसा आगे बताया जायगा। साङ्ख्य और योग—इन दोनों मार्गों में भी मनोनिग्रह और इन्द्रिय-संयम आवश्यक माने गये हैं। सत्य, अग्निहोत्र, एकान्त-सेवन, ध्यान-तपस्या, दम, क्षमा, अनसूया, मिताहार, विषयों का सङ्कोच, मितभाषण तथा शम—यह प्रवर्तक यज्ञ है। अब निवर्तक यज्ञ का वर्णन सुनो, जिसके अनुसार जप करने वाले ब्रह्मचारी साधक के सारे कर्म निवृत्त हो जाते हैं।"
सत्यमग्निपरीचारो विविक्तानां च सेवनम् ॥
ध्यानं तपो दमः क्षान्तिरनसूया मिताशनम् ।
विषयप्रतिसंहारो मितजल्पस्तथा शमः ॥
एष प्रवर्तको यज्ञो निवर्तकमथो शृणु ।
यथा निवर्तते कर्म जपतो ब्रह्मचारिणः ॥
सत्य, अग्निहोत्र, एकान्तसेवन, ध्यान तपस्या, दम, क्षमा, अनसूया, मिताहार, विषयोंका संकोच, मितभाषण तथा शम — यह प्रवर्तक यज्ञ है । अब निवर्तक यज्ञका वर्णन सुनो; जिसके अनुसार जप करनेवाले ब्रह्मचारी साधकके सारे कर्म निवृत्त हो जाते हैं ( अर्थात् उसे मोक्ष प्राप्त हो जाता है )
"इन मनोनिग्रह आदि पूर्वोक्त सभी साधनों का निष्काम भाव से अनुष्ठान करके उन्हें प्रवृत्तिके विपरीत निवृत्तिमार्ग में बदल डाले। निवृत्ति मार्ग तीन तरह का है—व्यक्त, अव्यक्त और अनाश्रय; उस मार्ग का आश्रय लेकर स्थिरचित्त हो जाय। निवृत्तिमार्ग पर पहुँचने की विधि यह है—जपकर्ता को कुशासन पर बैठना चाहिये। उसे अपने हाथ में भी कुश रखना चाहिये। शिखा में भी कुश बाँध लेना चाहिये; वह कुशों से घिरकर बैठे और मध्य भाग में भी कुशों से आच्छादित रहे। विषयों को दूर से ही नमस्कार करे और कभी उनका अपने मन में चिन्तन न करे। मन से समता की भावना करके मन का मन में ही लय करे। फिर बुद्धिके द्वारा परब्रह्म परमात्मा का ध्यान करे तथा सर्व-हितकारिणी वेदसंहिता का एवं प्रणव और गायत्री मन्त्र का जप करे। फिर समाधि में स्थित होने पर उस संहिता एवं गायत्री मन्त्र आदि के जप को भी त्याग दे।"
"वह शुद्धचित्त होकर तप के द्वारा मन और इन्द्रियों को जीत लेता है तथा द्वेष और कामना से रहित एवं आसक्ति और मोह से रहित हुआ, शीत और उष्ण आदि समस्त द्वन्द्वों से अतीत हो जाता है। अतः वह न तो कभी शोक करता है और न कहीं भी आसक्त होता है। वह कर्मों का कारण और कार्य का कर्ता नहीं होता। वह अहङ्कार से मुक्त होकर कहीं भी अपने मन को नहीं लगाता है। वह न तो स्वार्थ-साधन में संलग्न होता है, न किसी का अपमान करता है और न अकर्मण्य होकर ही बैठता है। वह ध्यानरूप क्रिया में ही नित्य तत्पर रहता है, ध्याननिष्ठ होकर ध्यान के द्वारा ही तत्त्व का निश्चय कर लेता है और समाधिस्थ होकर क्रमशः ध्यानरूप क्रिया का भी त्याग कर देता है। वह उस अवस्थामें स्थित हुआ योगी निस्सन्देह सर्व-त्यागरूप निर्बीज समाधि से प्राप्त होने वाले दिव्य परमानन्द का अनुभव करता है। वह योग जनित अणिमा आदि सिद्धियों की भी इच्छा न रखकर सर्वथा निष्काम हो प्राणों का परत्यग कर देता है और विशुद्ध परब्रह्म परमात्मा के स्वरूप में प्रवेश कर जाता है।"
स वै तस्यामवस्थायां सर्वत्यागकृतः सुखम् ।
निरिच्छस्त्यजति प्राणान् ब्राह्मीं संविशते तनुम् ॥
वह उस अवस्थामें स्थित हुआ योगी निस्संदेह सर्वत्यागरूप निर्बीज समाधिसे प्राप्त होनेवाले दिव्य परमानन्दका अनुभव करता है । वह योगजनित अणिमा आदि सिद्धियोंकी भी इच्छा न रखकर सर्वथा निष्काम हो प्राणोंका परित्याग कर देता है और विशुद्ध परब्रह्म परमात्माके स्वरूपमें प्रवेश कर जाता है ।
"अथवा यदि वह परब्रह्म का सायुज्य प्राप्त नहीं करना चाहता, तो देवयान मार्ग पर स्थित होकर ऊपले लोकों में गमन करता है; अर्थात् परब्रह्म परमात्मा के परम धाम में चला जाता है। पुनः इस संसार में कहीं जन्म नहीं लेता। आत्म-बुद्धया समास्थाय शान्तिभूत: निरामय: अमृतं विरज: शुद्धमात्मानं प्रतिपद्यते—अर्थात् आत्मस्वरूप का बोध हो जाने से वह रजोगुण से रहित निर्मल शान्त स्वरूप योगी, अमृत स्वरूप विशुद्ध आत्मा को प्राप्त करता है।"
गतीनामुत्तमा प्राप्तिः कथितां जापकेष्विह ।
एकैवैषा गतिस्तेषामुत यान्त्यपरामपि ॥
युधिष्ठिरने पूछा- पितामह! आपने यहाँ जापकोंके लिये गतियोंमें उत्तम गतिकी प्राप्ति बतायी है । क्या उनके लिये एकमात्र यही गति है? या वे किसी दूसरी गतिको भी प्राप्त होते हैं?
युधिष्ठिर ने पूछा— "पितामह! आपने यहाँ जापकों के लिये गतियों में उत्तम गतिकी प्राप्ति बतायी है। क्या उनके लिये एकमात्र यही गति है? या वे किसी दूसरी गति को भी प्राप्त होते हैं?"
भीष्मजी ने कहा— "राजन्! तुम सावधान होकर जापकों की गतिका वर्णन सुनो। प्रभो! पुरुष प्रवर! अब मैं यह बता रहा हूँ कि वे किस तरह नाना प्रकार के नरकों में पड़ते हैं। जो जापक जैसा पहले बताया गया है, उसी तरह नियमों का ठीक-ठीक पालन नहीं करता, एक देश का ही अनुष्ठान करता है—अर्थात् किसी एक ही नियम का पालन करता है—वह नरक में पड़ता है। जो अवहेलनापूर्वक जप करता है, उसके प्रति प्रेम या प्रसन्नता नहीं प्रकट करता है, ऐसा जापक भी निःसन्देह नरक में ही पड़ता है। जप के कारण अपने में बड़प्पन का अभिमान करने वाले सभी जापक नरकगामी होते हैं। दूसरों का अपमान करने वाला जापक भी नरक में ही पड़ता है। जो मोहित हो फल की इच्छा रखकर जप करता है, वह जिस फल का चिन्तन करता है, उसी के उपयुक्त नरक में पड़ता है।"
"यदि जप करने वाले साधक को अणिमा आदि ऐश्वर्य प्राप्त हों और वह उनमें अनुरक्त हो जाये, तो वह ही उसके लिये नरक है; वह उससे छुटकारा नहीं पाता है। रागेण जापको जप्यं कुरुते तत्र मोहित:—जो रागेण (राग के कारण) जप को जप्य करता है, वह वहीं मोहित हो जाता है; जहाँ उसका राग होता है, वहाँ वह गिरता चला जाता है। जो जापक मोह के वशीभूत होकर विषयासक्ति पूर्वक जप करता है, वह जिस फल में उसकी आसक्ति होती है, उसी के अनुरूप शरीर को प्राप्त होता है; इस प्रकार उसका पतन हो जाता है। जिसकी बुद्धि भोगों में आसक्ति के कारण दूषित है तथा जो विवेकशील नहीं है, वह जापक यदि मन के चञ्चल रहते हुए ही जप करता है, तो विनाशशील गतिको प्राप्त होता है अथवा नरक में गिरता है। जो विवेकशून्य मूढ़ जापक मोहग्रस्त हो जाता है, वह उस मोह के कारण नरक में गिरता है और उसमें गिरकर निरन्तर शोकमग्न रहता है। 'मैं निश्चय ही जप का अनुष्ठान पूरा करूँगा,' ऐसा दृढ़ आग्रह रखकर जो जापक जप में प्रवृत्त होता है, परन्तु न तो उसमें अच्छी तरह संलग्न होता है और न उसे पूरा ही कर पाता है, वह नरक में गिरता है।"
दृढग्राही करोमीति जाप्यं जपति जापकः ।
न सम्पूर्णो न संयुक्तो निरयं सोऽनुगच्छति ॥
' मैं निश्चय ही जपका अनुष्ठान पूरा करूंगा, ' ऐसा दृढ़ आग्रह रखकर जो जापक जपमें प्रवृत्त होता है, परंतु न तो उसमें अच्छी तरह संलग्न होता है और न उसे पूरा ही कर पाता है, वह नरकमें गिरता है ।
युधिष्ठिर ने पूछा— "दादाजी! जप करनेवाले को उसके दोषों के कारण किस तरह के नरक की प्राप्ति होती है? उसका मुझसे वर्णन कीजिये। राजन्! उसे जानने के लिये मेरे मन में बड़ा कौतूहल हो रहा है; अतः आप अवश्य बतावें।"
भीष्मजी ने कहा— "अनघ! तुम धर्म के अंश से उत्पन्न हुए हो और स्वभाव से ही धर्मनिष्ठ हो; अतः सावधान होकर धर्म के मूलभूत वेद और परमात्मा से सम्बन्ध रखने वाली मेरी बात सुनो। परम बुद्धिमान् देवताओं के ये जो स्थान बताये जाते हैं, उनके रूप-रङ्ग अनेक प्रकार के हैं। फल भी नाना प्रकार के हैं। देवताओं के यहाँ इच्छानुसार विचरने वाले दिव्य विमान तथा दिव्य सभाएँ होती हैं। राजन्! उनके यहाँ नाना प्रकार के क्रीडास्थल तथा सुवर्णमय कमलों से सुशोभित बावलियाँ होती हैं। तात! वरुण, कुबेर, इन्द्र और यमराज—इन चारों लोकपालों, शुक्र, बृहस्पति, मरुद्गण, विश्वेदेव, साध्य, अश्विनीकुमार, रुद्र, आदित्य, वसु तथा अन्य देवताओं के जो ऐसे ही लोक हैं, वे सब परमात्मा के परमधाम के सामने नरक ही हैं।"
धर्मस्यांशप्रसूतोऽसि धर्मिष्ठोऽसि स्वभावतः ।
धर्ममूलाश्रयं वाक्यं शृणुष्वावहितोऽनघ ॥
भीष्मजीने कहा – अनघ! तुम धर्मके अंशसे उत्पन्न हुए हो और स्वभावसे ही धर्मनिष्ठ हो; अतः सावधान होकर धर्मके मूलभूत वेद और परमात्मासे सम्बन्ध रखनेवाली मेरी बात सुनो ।
भीष्मजी आगे बोले— "परमात्मा का परमधाम विनाश के भय से रहित है; क्योंकि वह कारणरहित नित्य-सिद्ध है। वह अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष और अभिनिवेश नामक पाँच क्लेशों से घिरा हुआ नहीं है। उसमें प्रिय और अप्रिय ये दो भाव नहीं हैं। प्रिय और अप्रिय के हेतुभूत तीन गुण—सत्त्व, रज और तम भी वहाँ नहीं हैं। वह परमधाम भूत, इन्द्रिय, मन, बुद्धि, उपासना, कर्म, प्राण और अविद्या—इन आठ पुरियों से भी मुक्त है। वहाँ ज्ञाता, ज्ञान और ज्ञेय—इस त्रिपुटी का भी अभाव है। इतना ही नहीं, वह दृष्टि, श्रुति, मति और विज्ञाति—इन चार लक्षणों से रहित है। ज्ञान के कारणभूत प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान और शब्द—इन चारों से वह परे है। वहाँ इष्ट विषय की प्राप्ति से होने वाले हर्ष और उसके भोग जनित आनन्द का भी अभाव है। वह शोक और श्रम से भी सर्वथा रहित है। राजन्! काल की उत्पत्ति भी वहीं से होती है। उस धाम पर काल की प्रभुता नहीं चलती। वह परमात्मा काल का भी स्वामी और स्वर्ग का भी ईश्वर है। जो आत्मकैवल्य को प्राप्त हो चुका है, वही मनुष्य वहाँ जाकर शोक से रहित हो जाता है। उस परमधाम का स्वरूप ऐसा ही है और पहले जो नाना प्रकार के सुखभोगों से सम्पन्न लोक बताये गये हैं, वे सभी उसकी तुलना में नरक हैं। राजन्! इस प्रकार मैंने तुम्हें यथार्थ रूप से ये सभी नरक बताये हैं। उस परमपद के सामने वस्तुतः वे सभी लोक 'नरक' ही कहलाने योग्य हैं।"
आत्मकेवलतां प्राप्तस्तत्र गत्वा न शोचति ।
ईदृशं परमं स्थानं निरयास्ते च तादृशाः ॥
जो आत्मकैवल्यको प्राप्त हो चुका है वही मनुष्य वहाँ जाकर शोकसे रहित हो जाता है । उस परमधामका स्वरूप ऐसा ही है और पहले जो नाना प्रकारके सुखभोगोंसे सम्पन्न लोक बताये गये हैं, वे सभी उसकी तुलनामें नरक हैं ।
युधिष्ठिर ने पूछा— "पितामह! आपने काल, मृत्यु, यम, इक्ष्वाकु और ब्राह्मण के विवाद की पहले चर्चा की थी; अतः उसे बताने की कृपा करें।"
भीष्मजी बोले— "युधिष्ठिर! इसी प्रसङ्ग में उस प्राचीन इतिहास का उदाहरण दिया करते हैं, जिसमें राजा इक्ष्वाकु, सूर्यपुत्र यम, ब्राह्मण, काल और मृत्यु के वृत्तान्त का उल्लेख है। जिस स्थान पर और जिस रूप में उनका वह संवाद हुआ था, उसे बताता हूँ; मुझसे सुनो। कहते हैं कि हिमालय पर्वत के निकटवर्ती पहाड़ियों पर एक महायशस्वी धर्मात्मा ब्राह्मण रहता था, जो वेद के छहों अङ्गों का ज्ञाता, परम बुद्धिमान् तथा जप में तत्पर रहने वाला था। वह पिप्पलाद का पुत्र था और कौशिक वंश में उसका जन्म हुआ था। उसे वेदों का पूर्ण विज्ञान प्राप्त था, अतः वह वेदों का पारङ्गत विद्वान् था। वह अर्थज्ञानपूर्वक संहिता का जप करता हुआ इन्द्रियों को संयम में रखकर ब्राह्मणोचित तपस्या करने लगा। नियमपूर्वक जप-तप करते हुए उसके एक हजार वर्ष व्यतीत हो गये।"
भीष्मजी ने कथा जारी रखते हुए कहा— "कहते हैं, उसके उस जप से प्रसन्न होकर देवी सावित्री ने उसे प्रत्यक्ष दर्शन दिए और कहा— 'मैं तुझ पर प्रसन्न हूँ।' ब्राह्मण अपने जपनीय वेद संहिता के गायत्री मन्त्र की आवृत्ति कर रहा था; इसलिये सावित्री देवी के आने पर भी वह चुपचाप बैठा ही रह गया। उसने उनसे कुछ नहीं बोला। देवी सावित्री की उस पर कृपा हो गयी थी; अतः वे उसके उस समय के व्यवहार से भी प्रसन्न हुईं। वेदमाता ने ब्राह्मण के उस नियमानुकूल जप की मन ही मन प्रशंसा की। जब जप समाप्त हुआ, तब धर्मात्मा ब्राह्मण ने उठकर देवी सावित्री के चरणों में मस्तक रखकर साष्टाङ्ग प्रणाम किया और कहा— 'देवि! आज मेरा अहोभाग्य है कि आपने प्रसन्न होकर मुझे दर्शन दिए। यदि वास्तव में आप मुझ पर सन्तुष्ट हैं, तो ऐसी कृपा कीजिये जिससे मेरा मन सदैव जप में लगा रहे'।"
समाप्तजप्यस्तूत्थाय शिरसा पादयोस्तदा ।
पपात देव्या धर्मात्मा वचनं चेदमब्रवीत् ॥
जब जप समाप्त हो गया, तब धर्मात्मा ब्राह्मणने उठकर देवी सावित्रीके चरणोंमें मस्तक रखकर साष्टांग प्रणाम किया और इस प्रकार कहा- ।
सावित्री ने पूछा— "ब्रह्मर्षे! तुम क्या चाहते हो? कौन-सी वस्तु तुम्हें अभीष्ट है? बताओ। मैं तुम्हारा मनोरथ पूर्ण करूंगी। जप करने वालों में श्रेष्ठ ब्राह्मण! तुम अपनी अभिलाषा बताओ। तुम्हारी वह सारी इच्छा पूर्ण हो जाएगी।"
ब्राह्मण बोला— "शुभे! इस मन्त्र के जप में मेरी यह इच्छा बराबर बढ़ती रहे और मेरे मन की एकाग्रता भी प्रतिदिन बढ़े।"
सावित्री देवी ने मधुर वाणी में 'तथास्तु' कहा। इसके बाद उन्होंने ब्राह्मण का प्रिय करने के लिए दूसरा वचन कहा— "विप्रवर! जहाँ दूसरे श्रेष्ठ ब्राह्मण गये हैं, उन स्वर्गादि निम्न श्रेणी के लोकों में तुम नहीं जाओगे। तुम्हें स्वभावसिद्ध एवं निर्दोष ब्रह्मपद की प्राप्ति होगी। तुमने मुझसे जो यहाँ प्रार्थना की है, वह पूरी होगी। मैं उसे पूर्ण करने की चेष्टा करूँगी। तुम नियमपूर्वक एकाग्रचित्त होकर जप करो। धर्म स्वयं तुम्हारी सेवा में उपस्थित होगा। काल, मृत्यु और यम भी तुम्हारे निकट पधारेंगे और तुम्हारा उन सबके साथ यहाँ धर्मानुकूल वाद-विवाद भी होगा।"
भीष्मजी बोले— "राजन्! ऐसा कहकर भगवती सावित्री देवी अपने धाम को चली गयीं और ब्राह्मण भी दिव्य सौ वर्षों तक पूर्ववत् जप में संलग्न रहा। वह सदा मन और इन्द्रियों को संयम में रखता था, क्रोध को जीत चुका था। अपनी की हुई प्रतिज्ञा का सच्चाई के साथ पालन करता था और किसी के दोष नहीं देखता था। बुद्धिमान् ब्राह्मण का वह नियम पूर्ण होने पर साक्षात् भगवान् धर्म उस समय उस पर बहुत प्रसन्न हुए और उन्होंने उसे प्रत्यक्ष दर्शन दिए।"
धर्म प्रकट होकर बोले— "विप्रवर! तुम मेरी ओर देखो। मैं धर्म हूँ और तुम्हारा दर्शन करने के लिये आया हूँ। तुम्हें इस जप का जो फल प्राप्त हुआ है, वह सब मुझसे सुन लो। तुमने दिव्य और मानुष सभी लोकों पर विजय प्राप्त की है। साधो! अब तुम अपने प्राणों का परित्याग करो और अभीष्ट लोकों में जाओ। अपने शरीर का परित्याग करने के पश्चात् ही तुम उन पुण्य लोकों में जाओ।"
ब्राह्मण ने कहा— "धर्म! मुझे उन लोकों को लेकर क्या करना है? आप सुखपूर्वक यहाँ से अपने स्थान को पधारिये। प्रभो! मैंने इस शरीर के साथ बहुत दुःख और सुख उठाया है; अतः इसका त्याग नहीं कर सकता।"
धर्म बोले— "निष्पाप मुनिश्रेष्ठ! शरीर तो तुम्हें अवश्य त्यागना पड़ेगा। विप्रवर! अब स्वर्गलोक पर आरूढ़ हो जाओ अथवा तुम्हारी क्या रुचि है? बताओ।"
ब्राह्मण ने कहा— "प्रभो! मैं इस शरीर के बिना स्वर्गलोक में निवास करना नहीं चाहता; अतः धर्मदेव! आप यहाँ से जाइये। इस शरीर को छोड़कर स्वर्गलोक में जाने के लिये मेरे मन में तनिक भी उत्साह नहीं है।"
धर्म बोले— "मुने! शरीर में मन को आसक्त रखना ठीक नहीं है। तुम देह त्यागकर सुखी हो जाओ। उन रजोगुणरहित निर्मल लोकों में जाओ, जहाँ जाकर फिर तुम्हें शोक नहीं करना पड़ेगा।"
ब्राह्मण ने कहा— "महाभाग! मैं तो जप में ही सुख मानता हूँ। मुझे सनातन लोकों को लेकर क्या करना है? भगवन! यह बताइये, मैं सशरीर स्वर्गलोक में जा सकता हूँ या नहीं?"
धर्म बोले— "ब्रह्मन्! यदि तुम शरीर छोड़ना नहीं चाहते हो, तो देखो, ये काल, मृत्यु और यम तुम्हारे पास आये हैं।"
यदि त्वं नेच्छसे त्यक्तुं शरीरं पश्य वै द्विज ।
एष कालस्तथा मृत्युर्यमश्च त्वामुपागताः ॥
धर्म बोले — ब्रह्मन्! यदि तुम शरीर छोड़ना नहीं चाहते हो तो देखो, ये काल, मृत्यु और यम तुम्हारे पास आये हैं ।
भीष्मजी ने कहा— "राजन्! तदनन्तर वैवस्वत यम, काल और मृत्यु—तीनों उस महाभाग ब्राह्मण के पास जाकर इस प्रकार बोले—"
यमराज बोले— "ब्रह्मन्! तुम्हारे द्वारा भली-भाँति की हुई इस तपस्या का तथा शुभ आचरणों का भी तुम्हें उत्तम फल प्राप्त हुआ है। मैं यमराज हूँ और स्वयं तुमसे यह बात कहता हूँ।"
तपसोऽस्य सुतप्तस्य तथा सुचरितस्य च ।
फलप्राप्तिस्तव श्रेष्ठा यमोऽहं त्वामुपब्रुवे ॥
यमराज बोले — ब्रह्मन्! तुम्हारेद्वारा भलीभाँति की हुई इस तपस्याका तथा शुभ आचरणोंका भी तुम्हें उत्तम फल प्राप्त हुआ है । मैं यमराज हूँ और स्वयं तुमसे यह बात कहता हूँ ।
भीष्म बोले— राजन्! जब उस ब्राह्मण की तपस्या पूर्ण हुई, तब साक्षात् धर्म ने उसे दर्शन दिए। उसी समय काल, मृत्यु और यमराज वहाँ उपस्थित हुए। मृत्यु ने कहा— "धर्मज्ञ ब्राह्मण! मुझे मृत्यु समझो। मैं स्वयं ही शरीर धारण करके यहाँ आया हूँ। विप्रवर! मैं काल से प्रेरित होकर आज तुम्हें यहाँ से ले जाने के लिए उपस्थित हुआ हूँ।"
ब्राह्मण ने निडर होकर उनका स्वागत किया और कहा— "सूर्यपुत्र यम, महामना काल, मृत्यु तथा धर्म— इन सबका स्वागत है। बताइए, मैं आप लोगों का कौन-सा कार्य करूँ?" भीष्म कहते हैं कि जब उन दिव्य शक्तियों का समागम हुआ, तब ब्राह्मण ने उन्हें अर्घ्य और पाद्य देकर बड़ी प्रसन्नता के साथ पूछा— "देवताओ! मैं अपनी शक्ति के अनुसार आप लोगों की क्या सेवा करूँ?"
स्वागतं सूर्यपुत्राय कालाय च महात्मने ।
मृत्यवे चाथ धर्माय किं कार्यं करवाणि वः ॥
ब्राह्मणने कहा - सूर्यपुत्र यम, महामना काल, मृत्यु तथा धर्म - इन सबका स्वागत है । बताइये, मैं आपलोगोंका कौन - सा कार्य करूँ?
इसी समय तीर्थयात्रा के लिए आए हुए राजा इक्ष्वाकु भी उस स्थान पर पहुँच गए। नृपश्रेष्ठ इक्ष्वाकु ने उन सबको प्रणाम कर उनकी पूजा की और उनका कुशल-समाचार पूछा। ब्राह्मण ने भी राजा को अर्घ्य, पाद्य और आसन देकर विनम्रता से कहा— "महाराज! आपका स्वागत है! आपकी जो-जो इच्छा हो, उसे यहाँ बताइए। मैं अपनी शक्ति के अनुसार आपकी क्या सेवा करूँ? यह आप मुझे बतावें।"
राजा इक्ष्वाकु ने उत्तर दिया— "विप्रवर! मैं क्षत्रिय राजा हूँ और आप छः कर्मों में स्थित रहने वाले ब्राह्मण। अतः मैं आपको कुछ धन देना चाहता हूँ। आप प्रसिद्ध धन-रत्न मुझसे माँग लीजिए।"
ब्राह्मण ने शान्त भाव से कहा— "राजन्! ब्राह्मण दो प्रकार के होते हैं और धर्म भी दो प्रकार का माना गया है— प्रवृत्ति और निवृत्ति। मैं प्रतिग्रह से निवृत्त ब्राह्मण हूँ। नरेश्वर! आप उन ब्राह्मणों को दान दीजिए जो प्रवृत्तिमार्ग में हों। मैं आपसे दान नहीं लूँगा। नृपश्रेष्ठ! इस समय आपको क्या अभीष्ट है? मैं आपको क्या दूँ? बताइए, मैं अपनी तपस्या द्वारा आपका कौन-सा कार्य सिद्ध करूँ?"
तेभ्यः प्रयच्छ दानानि ये प्रवृत्ता नराधिप अहं न प्रतिगृह्णामि किमिष्टं किं ददामि ते ।
ब्रूहि त्वं नृपतिश्रेष्ठ तपसा साधयामि किम् ॥
नरेश्वर! आप उन ब्राह्मणोंको दान दीजिये, जो प्रवृत्तिमार्गमें हों । मैं आपसे दान नहीं लूँगा । नृपश्रेष्ठ! इस समय आपको क्या अभीष्ट है? मैं आपको क्या दूँ? बताइये, मैं अपनी तपस्याद्वारा आपका कौन- सा कार्य सिद्ध करूँ?
राजा बोले— "द्विजश्रेष्ठ! मैं क्षत्रिय हूँ। 'दीजिये' ऐसा कहकर याचना करने की बात को मैं कभी नहीं जानता। माँगने के नाम पर तो हम लोग यही कहना जानते हैं कि 'युद्ध दो'।"
राजोवाच क्षत्रियोऽहं न जानामि देहीति वचनं क्वचित् ।
प्रयच्छ युद्धमित्येवंवादिनः स्मो द्विजोत्तम ॥
राजा बोले – द्विजश्रेष्ठ! मैं क्षत्रिय हूँ । ' दीजिये' ऐसा कहकर याचना करनेकी बातको मैं कभी नहीं जानता । माँगनेके नामपर तो हमलोग यही कहना जानते हैं कि ' युद्ध दो'
ब्राह्मण ने उत्तर दिया— "नरेश्वर! जैसे आप अपने धर्म से सन्तुष्ट हैं, उसी तरह हम भी अपने धर्म से सन्तुष्ट हैं। हम दोनों में कोई अन्तर नहीं है। अतः आपको जो अच्छा लगे, वह कीजिए।"
राजा इक्ष्वाकु ने आग्रह किया— "ब्रह्मन्! आपने मुझसे पहले कहा है कि 'मैं अपनी शक्ति के अनुसार दान दूँगा', तो मैं आपसे यही माँगता हूँ कि आप अपने जप का फल मुझे दे दीजिए।"
ब्राह्मण मुस्कुराकर बोला— "राजन्! आप तो बहुत बढ़कर बातें बना रहे थे कि मेरी वाणी सदा युद्ध की ही याचना करती है। तब आप मेरे साथ भी युद्ध की ही याचना क्यों नहीं कर रहे हैं?" उसने आगे कहा— "राजेन्द्र! मेरी वही प्रतिज्ञा इस समय भी है। मैं अपनी शक्ति के अनुसार आपको क्या दूँ? बोलिए, विलम्ब न कीजिए। मैं शक्ति रहते आपको मुँह माँगी वस्तु अवश्य प्रदान करूँगा।"
सैवाद्यापि प्रतिज्ञा मे स्वशक्त्या किं प्रदीयताम् ।
ब्रूहि दास्यामि राजेन्द्र विभवे सति मा चिरम् ॥
ब्राह्मणने कहा— राजेन्द्र! मेरी वही प्रतिज्ञा इस समय भी है । मैं अपनी शक्तिके अनुसार आपको क्या दूँ? बोलिये, विलम्ब न कीजिये । मैं शक्ति रहते आपको मुँहमाँगी वस्तु अवश्य प्रदान करूँगा ।
राजा ने फिर कहा— "मुने! यदि आप देना ही चाहते हैं, तो पूरे सौ वर्षों तक जप करके आपने जिस फल को प्राप्त किया है, वही मुझे दे दीजिए।"
ब्राह्मण ने उदारता दिखाते हुए कहा— "राजन्! मैंने जो जप किया है, उसका उत्तम फल आप ग्रहण करें। मेरे जप का आधा फल तो आप बिना विचारे ही प्राप्त करें, अथवा यदि आप मेरे द्वारा किए हुए जप का सारा ही फल लेना चाहते हों, तो अवश्य अपनी इच्छा के अनुसार वह सब प्राप्त कर लें।"
राजोवाच यत्तद् वर्षशतं पूर्णं जप्यं वै जपता त्वया ।
फलं प्राप्तं तत् प्रयच्छ मम दित्सुर्भवान् यदि ॥
राजाने कहा – मुने! यदि आप देना ही चाहते हैं तो पूरे सौ वर्षोंतक जप करके आपने जिस फलको प्राप्त किया है, वही मुझे दे दीजिये ।
राजा बोले— "ब्रह्मन्! मैंने जो जप का फल माँगा है, उन सबकी पूर्ति हो गई। आपका भला हो, कल्याण हो। मैं चला जाऊँगा; किन्तु यह तो बता दीजिए कि उसका फल क्या है?"
ब्राह्मण ने कहा— "राजन्! इस जप का फल क्या मिलेगा? इसको मैं नहीं जानता; परन्तु मैंने जो कुछ जप किया था, वह सब आपको दे दिया। ये धर्म, यम, मृत्यु और काल इस बात के साक्षी हैं।"
फलप्राप्तिं न जानामि दत्तं यज्जपितं मया ।
अयं धर्मश्च कालश्च यमो मृत्युश्च साक्षिणः ॥
ब्राह्मणने कहा — राजन्! इस जपका फल क्या मिलेगा? इसको मैं नहीं जानता; परंतु मैंने जो कुछ जप किया था, वह सब आपको दे दिया । ये धर्म, यम, मृत्यु और काल इस बातके साक्षी हैं ।
राजा इक्ष्वाकु संशय में पड़ गए और बोले— "ब्रह्मन्! यदि आप मुझे अपने जप जनित धर्म का फल नहीं बता रहे हैं, तो इस धर्म का अज्ञात फल मेरे किस काम आएगा? वह सारा फल आप ही के पास रहे। मैं सन्दिग्ध फल नहीं चाहता।"
ब्राह्मण अडिग होकर बोला— "राजर्षे! अब तो मैं अपने जप का फल दे चुका; अतः दूसरी कोई बात नहीं स्वीकार करूँगा। इस विषय में आज मेरी और आपकी बातें ही प्रमाणस्वरूप हैं। राजसिंह! मैंने जप करते समय कभी फल की कामना नहीं की थी; अतः इस जप का क्या फल होगा, यह कैसे जान सकूँगा? आपने कहा था कि 'दीजिये' और मैंने कहा था कि 'दूँगा'— ऐसी दशा में मैं अपनी बात झूठी नहीं करूँगा। आप सत्य की रक्षा कीजिए और इसके लिए सुस्थिर हो जाइए। राजन्! यदि इस तरह स्पष्ट बात करने पर भी आप आज मेरे वचन का पालन नहीं करेंगे, तो आपको असत्य का महान पाप लगेगा। शत्रुदमन नरेश! आपके लिए भी झूठ बोलना उचित नहीं है और मैं भी अपनी कही हुई बात को मिथ्या नहीं कर सकता। मैंने बिना कुछ सोच-विचार किए ही पहले देने की प्रतिज्ञा कर ली है; अतः आप भी बिना विचारे मेरा दिया हुआ जप ग्रहण करें। यदि आप सत्य पर दृढ़ हैं, तो आपको ऐसा अवश्य करना चाहिए। राजन्! आपने स्वयं यहाँ आकर मुझसे जप के फल की याचना की है और मैंने उसे आपके लिए दे दिया है; अतः आप उसे ग्रहण करें और सत्य पर डटे रहें।"
अथैवं वदतो मेऽद्य वचनं न करिष्यसि ।
महानधर्मो भविता तव राजन् मृषा कृतः ॥
राजन्! यदि इस तरह स्पष्ट बात करनेपर भी आप आज मेरे वचनका पालन नहीं करेंगे तो आपको असत्यका महान् पाप लगेगा ।
ब्राह्मण ने राजा को चेतावनी देते हुए कहा— "जो झूठ बोलने वाला है, उस मनुष्य को न इस लोक में सुख मिलता है और न परलोक में ही। वह अपने पूर्वजों को भी नहीं तार सकता; फिर भविष्य में होने वाली सन्तति का उद्धार तो कर ही कैसे सकेगा? परलोक में सत्य जिस प्रकार जीवों का उद्धार करता है, उसी प्रकार यज्ञ, वेदाध्ययन, दान और नियम भी नहीं कर सकते। लोगों ने अब तक जितनी तपस्याएँ की हैं और भविष्य में भी जितनी करेंगे, उन सबको सौ गुना या लाख गुना करके एकत्र किया जाए, तो भी उनका महत्त्व सत्य से बढ़कर नहीं सिद्ध होगा।
सत्य ही एकमात्र अविनाशी ब्रह्म है। सत्य ही एकमात्र अक्षय तप है, सत्य ही एकमात्र अविनाशी यज्ञ है, सत्य ही एकमात्र नाशरहित सनातन वेद है। वेदों में सत्य ही जागता है— उसी की महिमा बताई गई है। सत्य का ही सबसे श्रेष्ठ फल माना गया है। धर्म और इन्द्रिय-संयम की सिद्धि भी सत्य से ही होती है। सत्य ही वेद और वेदाङ्ग है। सत्य ही विद्या तथा विधि है। सत्य ही व्रतचर्या तथा सत्य ही ओङ्कार है। सत्य प्राणियों को जन्म देने वाला पिता है, सत्य ही सन्तति है; सत्य से ही वायु चलती है और सत्य से ही सूर्य तपता है। सत्य से ही आग जलती है तथा सत्य पर ही स्वर्गलोक प्रतिष्ठित है। यज्ञ, तप, वेद, स्तोभ, मन्त्र और सरस्वती— सब सत्य के ही स्वरूप हैं। मैंने सुना है कि किसी समय धर्म और सत्य को तराजू पर रखा गया था, उस समय जिस ओर सत्य था, उधर का ही पलड़ा भारी हुआ। जहाँ धर्म है वहाँ सत्य है। सत्य से ही सबकी वृद्धि होती है। राजन्! आप क्यों असत्यपूर्ण बर्ताव करना चाहते हैं? महाराज! आप सत्य में ही अपने मन को स्थिर कीजिए। मिथ्यापूर्ण बर्ताव न कीजिए। यदि लेना ही नहीं था, तो आपने 'दीजिये' यह झूठा और अशुभ वचन क्यों निकाला था?"
सत्ये कुरु स्थिरं भावं मा राजन्ननृतं कृथाः ।
कस्मात्त्वमनृतं वाक्यं देहीति कुरुषेऽशुभम् ॥
महाराज! आप सत्यमें ही अपने मनको स्थिर कीजिये । मिथ्यापूर्ण बर्ताव न कीजिये । यदि लेना ही नहीं था तो आपने ' दीजिये' यह झूठा और अशुभ वचन क्यों मुँहसे निकाला था ।
ब्राह्मण ने अन्तिम चेतावनी दी— "नरेश्वर! यदि आप मेरे दिए हुए इस जप के फल को नहीं स्वीकार करेंगे, तो धर्मभ्रष्ट होकर सम्पूर्ण लोकों में भटकते फिरेंगे। जो पहले देने की प्रतिज्ञा करके फिर देना नहीं चाहता तथा जो याचना तो करता है, किन्तु मिलने पर उसे लेना नहीं चाहता, वे दोनों ही मिथ्यावादी होते हैं। अतः आप अपनी और मेरी भी बात मिथ्या न कीजिए।"
संश्रुत्य यो न दित्सेत याचित्वा यश्च नेच्छति ।
उभावानृतिकावेतौ न मृषा कर्तुमर्हसि ॥
जो पहले देनेकी प्रतिज्ञा करके फिर देना नहीं चाहता तथा जो याचना तो करता है, किंतु मिलनेपर उसे लेना नहीं चाहता, वे दोनों ही मिथ्यावादी होते हैं; अतः आप अपनी और मेरी भी बात मिथ्या न कीजिये ।
ब्राह्मण ने स्पष्ट किया— "राजन्! दान लेने के लिए मैंने आपसे अनुरोध या आग्रह नहीं किया था और न मैं देने के लिए आपके घर ही गया था। आपने स्वयं यहाँ आकर याचना की है; फिर लेने से कैसे इनकार करते हैं?"
तभी साक्षात् धर्म प्रकट हुए और बोले— "आप दोनों में विवाद न हो। आपको विदित होना चाहिए कि मैं साक्षात् धर्म यहाँ आया हूँ। ब्राह्मण देवता दान के फल से युक्त हो जाएँ और राजा भी सत्य के फल से सम्पन्न हों।"
अविवादोऽस्तु युवयोर्वित्त मां धर्ममागतम् ।
द्विजो दानफलैर्युक्तो राजा सत्यफलेन च ॥
धर्म बोले- आप दोनोंमें विवाद न हो । आपको विदित होना चाहिये कि मैं साक्षात् धर्म यहाँ आया हूँ । ब्राह्मणदेवता दानके फलसे युक्त हो जायँ और राजा भी सत्यके फलसे सम्पन्न हों ।
स्वर्गदेव ने भी कहा— "राजेन्द्र! आपको विदित हो कि मैं स्वर्ग हूँ और स्वयं ही शरीर धारण करके यहाँ आया हूँ। आप दोनों में विवाद न हो। आप दोनों समान फल के भागी हों।"
भीष्म बोले— राजन्! जब राजा इक्ष्वाकु ने ब्राह्मण के समक्ष अपना दान देने का प्रस्ताव रखा, तब उस जापक ब्राह्मण ने अत्यन्त दृढ़ता से कहा— "राजेन्द्र! मुझे स्वर्ग की कोई आवश्यकता नहीं है। स्वर्ग! तुम जैसे आये थे, वैसे ही लौट जाओ। यदि ये ब्राह्मणदेवता स्वर्ग में जाना चाहते हों तो मेरे किये हुए पुण्यफल को ग्रहण करें।"
ब्राह्मण के मुख से ये शब्द सुनकर राजा इक्ष्वाकु ने पुनः आग्रह किया, तब ब्राह्मण ने कहा— "यदि बाल्यावस्था में अज्ञानवश मैंने कभी किसी के सामने हाथ फैलाया हो तो उसका मुझे स्मरण नहीं है; परन्तु अब तो मैं संहिता-गायत्री मन्त्र का जप करता हुआ निवृत्तिधर्म की उपासना करता हूँ। राजन्! मैं निवृत्तिमार्ग का पथिक हूँ, आप बहुत देर से मुझे लुभाने का प्रयत्न क्यों करते हैं? नरेश्वर! मैं स्वयं ही अपना कर्तव्य करूँगा, आपसे कोई फल नहीं लेना चाहता। मैं प्रतिग्रह से निवृत्त होकर तप और स्वाध्याय में लगा हुआ हूँ।"
निवृत्तं मां चिराद्राजन् विप्रलोभयसे कथम् ।
स्वेन कार्यं करिष्यामि त्वत्तो नेच्छे फलं नृप ।
तपःस्वाध्यायशीलोऽहं निवृत्तश्च प्रतिग्रहात् ॥
राजन्! मैं निवृत्तिमार्गका पथिक हूँ, आप बहुत देरसे मुझे लुभानेका प्रयत्न क्यों करते हैं? नरेश्वर! मैं स्वयं ही अपना कर्तव्य करूँगा, आपसे कोई फल नहीं लेना चाहता । मैं प्रतिग्रहसे निवृत्त होकर तप और स्वाध्यायमें लगा हुआ हूँ ।
राजा इक्ष्वाकु ने हार नहीं मानी और बोले— "विप्रवर! यदि आपने अपने जप का उत्तम फल दे ही दिया है तो ऐसा कीजिये कि हम दोनों के जो भी पुण्यफल हों, उन्हें एकत्र करके हम दोनों साथ ही भोगें— हम दोनों का उन पर समान अधिकार रहे। ब्राह्मणों को दान लेने का अधिकार है और क्षत्रिय केवल दान देते हैं, लेते नहीं; यह धर्म आपने भी सुना होगा; अतः विप्रवर! हम दोनों के कार्य का फल साथ ही हम दोनों के उपयोग में आवे। अथवा यदि आपकी इच्छा न हो तो हमें साथ रहकर कर्मफल भोगने की आवश्यकता नहीं है। उस अवस्था में मैं यही प्रार्थना करूँगा कि यदि आपका मुझ पर अनुग्रह हो तो आप ही मेरे शुभकर्मों का पूरा-पूरा फल ग्रहण कर लें। मैंने जो कुछ भी धर्म किया है, वह सब आप स्वीकार कर लें।"
द्विजाः प्रतिग्रहे युक्ता दातारो राजवंशजाः ।
यदि धर्मः श्रुतो विप्र सहैव फलमस्तु नौ ॥
ब्राह्मणोंको दान लेनेका अधिकार है और क्षत्रिय केवल दान देते हैं, लेते नहीं; यह धर्म आपने भी सुना होगा; अतः विप्रवर! हम दोनोंके कार्यका फल साथ ही हम दोनोंके उपयोगमें आवे ।
भीष्म कहते हैं— राजन्! उसी समय वहाँ विकराल वेषधारी दो पुरुष उपस्थित हुए। दोनों ने एक-दूसरे को पकड़कर अपने हाथों से आवेष्टित कर रखा था। उनके शरीर पर मैले वस्त्र थे। उनमें से एक का नाम विकृत था और दूसरे का विरूप। वे दोनों बारम्बार इस प्रकार कह रहे थे— "भाई! तुम्हारे ऊपर मेरा कोई ऋण नहीं है।" दूसरा कहता— "नहीं, मैं तुम्हारा ऋणी हूँ।" पहले ने कहा— "यहाँ जो हम दोनों का विवाद है, इसका निर्णय ये सबका शासन करने वाले राजा करेंगे।"
दूसरा बोला— "मैं सच कहता हूँ कि तुम पर मेरा कोई ऋण नहीं है।" पहले ने कहा— "तुम झूठ बोलते हो। मुझ पर तुम्हारा ऋण है।" वे दोनों अत्यन्त सन्तप्त होकर राजा से बोले— "आप हमारे मामले की जाँच-पड़ताल करके फैसला कर दें, जिससे हम दोनों यहाँ दोष के भागी और निन्दा के पात्र न हों।"
तभी विरूप बोला— "पुरुषसिंह! मैं विकृत के एक गोदान का फल ऋण के तौर पर अपने यहाँ रखता हूँ। पृथ्वीनाथ! उस ऋण को आज मैं दे रहा हूँ; परन्तु यह विकृत ले नहीं रहा है।" विकृत ने तुरन्त कहा— "नरेश्वर! इस विरूप पर मेरा कोई ऋण नहीं है। यह आपसे झूठ बोलता है। इसकी बात में सत्य का आभास मात्र है।"
धारयामि नरव्याघ्र विकृतस्येह गोः फलम् ।
ददतश्च न गृह्णाति विकृतो मे महीपते ॥
विरूप बोला – पुरुषसिंह! मैं विकृतके एक गोदानका फल ऋणके तौरपर अपने यहाँ रखता हूँ । पृथ्वीनाथ! उस ऋणको आज मैं दे रहा हूँ; परंतु यह विकृत ले नहीं रहा है ।
राजा इक्ष्वाकु ने गम्भीर होकर पूछा— "विरूप! तुम्हारे ऊपर विकृत का कौन-सा ऋण है? बताओ, मैं उसे सुनकर कोई निर्णय करूँगा।" राजा का निश्चय अटल था। विरूप बोला— "राजन्! नरेश्वर! आप सावधान होकर सुनें, राजर्षे! इस विकरीत का ऋण जिस प्रकार मैं धारण करता हूँ, वह सब पूर्ण रूप से बता रहा हूँ। निष्पाप राजर्षे! इसने धर्म की प्राप्ति के लिये एक तपस्वी और स्वाध्यायशील ब्राह्मण को एक दूध देने वाली उत्तम गाय दी थी। राजन्! मैंने इसके घर जाकर इससे उसी गोदान का फल माँगा था और विकृत ने शुद्ध हृदय से मुझे वह दे दिया था। तदनन्तर मैंने भी अपनी शुद्धि के लिये पुण्यकर्म किया। राजन्! दो अधिक दूध देने वाली कपिला गौएँ, जिनके साथ उनके बछड़े भी थे, खरीदकर उन्हें एक उञ्छवृत्ति वाले ब्राह्मण को विधि और श्रद्धा पूर्वक दे दिया। प्रभो! उसी गोदान का फल मैं पुनः इसे वापस करना चाहता हूँ। पुरुषसिंह! इससे एक गोदान का फल लेकर आज मैं इसे दूना फल लौटा रहा हूँ। ऐसी परिस्थिति में आप स्वयं निर्णय कीजिये कि हम दोनों में से कौन शुद्ध है और कौन दोषी? नरेश्वर! इस प्रकार आपस में विवाद करते हुए हम दोनों यहाँ आपके समीप आये हैं। आप निर्णय कीजिये। अब आप चाहे न्याय करें या अन्याय। इस झगड़े का निपटारा कर दें। इसने जिस तरह मुझे दान दिया है, उसी तरह यदि स्वयं भी मुझसे लेना नहीं चाहता है तो आप स्वयं सुस्थिर होकर हम दोनों को धर्म के मार्ग पर स्थापित कर दें।"
यदि नेच्छति मे दानं यथा दत्तमनेन वै ।
भवानत्र स्थिरो भूत्वा मार्गे स्थापयिताद्य नौ ॥
इसने जिस तरह मुझे दान दिया है, उसी तरह यदि स्वयं भी मुझसे लेना नहीं चाहता है तो आप स्वयं सुस्थिर होकर हम दोनोंको धर्मके मार्गपर स्थापित कर दें ।
राजा इक्ष्वाकु ने विकृत से कहा— "विकृत! जब विरूप तुम्हें तुम्हारा दिया हुआ ऋण लौटा रहा है, तब तुम उसे आज ग्रहण क्यों नहीं करते? जैसे इसने तुम्हारी दी हुई वस्तु स्वीकार कर ली थी, उसी प्रकार तुम भी इसकी दी हुई वस्तु को ले लो। विलम्ब न करो।"
परन्तु विकृत अडिग था। उसने कहा— "राजन्! विरूप ने अभी आपसे कहा है कि मैं ऋण धारण करता हूँ; परन्तु मैंने उस समय 'दान' कह करके वह वस्तु इसे दी थी; इसलिये इसके ऊपर मेरा कोई ऋण नहीं है। अब यह जहाँ जाना चाहे, जा सकता है।"
धारयामीत्यनेनोक्तं ददानीति तथा मया ।
नायं मे धारयत्यद्य गच्छतां यत्र वाञ्छति ॥
विकृत बोला - राजन्! विरूपने अभी आपसे कहा है कि मैं ऋण धारण करता हूँ; परंतु मैंने उस समय ‘ दान' कह करके वह वस्तु इसे दी थी; इसलिये इसके ऊपर मेरा कोई ऋण नहीं है । अब यह जहाँ जाना चाहे, जा सकता है ।
राजा इक्ष्वाकु बोले— "विकृत! यह तुम्हें तुम्हारी वस्तु दे रहा है और तुम लेते नहीं हो। यह मुझे अनुचित जान पड़ता है; अतः मेरे मत में तुम दण्डनीय हो; इसमें कोई संशय नहीं।"
विकृत ने चुनौती देते हुए कहा— "राजर्षे! मैंने इसे दान दिया था; फिर वह दान इससे वापस कैसे ले लूँ? भले, इसमें मेरा अपराध समझा जाय; परन्तु मैं दिया हुआ दान वापस नहीं ले सकता। प्रभो! मुझे दण्ड भोगने की आज्ञा प्रदान करें।" विरूप ने चेतावनी दी— "विकृत! यदि तुम मेरी दी हुई वस्तु स्वीकार नहीं करोगे तो ये धर्मपूर्ण शासन करने वाले नरेश तुम्हें कैद कर लेंगे।"
मयास्य दत्तं राजर्षे गृह्णीयां तत् कथं पुनः ।
काममत्रापराधो मे दण्डमाज्ञापय प्रभो ॥
विकृत बोला — राजर्षे! मैंने इसे दान दिया था; फिर वह दान इससे वापस कैसे ले लूँ । भले, इसमें मेरा अपराध समझा जाय; परंतु मैं दिया हुआ दान वापस नहीं ले सकता । प्रभो! मुझे दण्ड भोगनेकी आज्ञा प्रदान करें ।
विकृत ने अन्त में कहा— "तुम्हारे माँगने पर मैंने अपना धन दान के रूप में दिया था; फिर आज उसे वापस कैसे ले सकता हूँ? तुम्हारे ऊपर मेरा कुछ भी पावना नहीं है। मैं तुम्हें जाने के लिये आज्ञा देता हूँ, तुम जाओ।"
इसी बीच में जापक ब्राह्मण बोल उठा— "राजन्! आपने इन दोनों की बातें सुन लीं। मैंने आपको देने के लिये जो प्रतिज्ञा की है, उसके अनुसार आप मेरा दान बिना विचारे ग्रहण करें।"
राजा इक्ष्वाकु मन ही मन सोचने लगे— 'इन दोनों का बड़ा भारी और गहन कार्य सामने आ गया है। इधर जापक ब्राह्मण का सुदृढ़ आग्रह ज्यों-का-त्यों बना हुआ है। इससे निपटारा कैसे होगा? यदि मैं आज ब्राह्मण की दी हुई वस्तु ग्रहण न करूँ तो किस प्रकार महान पाप से निर्लिप्त रह सकूँगा?'
तब राजर्षि इक्ष्वाकु ने उन दोनों से कहा— "तुम दोनों अपने विवाद का निपटारा हो जाने पर ही यहाँ से जाना। इस समय मेरे पास आकर अपना कार्य पूर्ण हुए बिना मुझे भय है कि राजधर्म मिथ्या अथवा कलङ्कित न हो जाय। राजाओं को अपने धर्म का पालन करना चाहिये, यही शास्त्र का सिद्धान्त है। इधर मुझ अजितात्मा के भीतर गहन ब्राह्मणधर्म ने प्रवेश किया है।"
स्वधर्मः परिपाल्यस्तु राज्ञामिति विनिश्चयः ।
विप्रधर्मश्च गहनो मामनात्मानमाविशत् ॥
राजाओंको अपने धर्मका पालन करना चाहिये, यही शास्त्रका सिद्धान्त है । इधर मुझ अजितात्माके भीतर गहन ब्राह्मणधर्मने प्रवेश किया है ।
ब्राह्मण ने पुनः आग्रह करते हुए कहा— "राजन्! आपने जो वस्तु माँगी थी और जिसे देने की मैंने प्रतिज्ञा कर ली थी, उसे मैं आपकी धरोहर के रूप में अपने पास रखता हूँ; अतः शीघ्र उसे ले लें। यदि नहीं लेंगे तो निस्सन्देह मैं आपको शाप दे दूँगा।"
गृहाण धारयेऽहं च याचितं संश्रुतं मया ।
न चेद् ग्रहीष्यसे राजन् शपिष्ये त्वां न संशयः ॥
ब्राह्मणने कहा — राजन्! आपने जो वस्तु माँगी थी और जिसे देनेकी मैंने प्रतिज्ञा कर ली थी, उसे मैं आपकी धरोहरके रूपमें अपने पास रखता हूँ; अतः शीघ्र उसे ले लें । यदि नहीं लेंगे तो निस्संदेह मैं आपको शाप दे दूँगा ।
राजा इक्ष्वाकु ने व्याकुल होकर कहा— "धिक्कार है राजधर्म को, जिसके कार्य का यहाँ यह परिणाम निकला! ब्राह्मण को और मुझको समान फल की प्राप्ति कैसे हो, इसी उद्देश्य से मुझे यह दान ग्रहण करना है।"
राजोवाच धिग्राजधर्मं यस्यायं कार्यस्येह विनिश्चयः ।
इत्यर्थं मे ग्रहीतव्यं कथं तुल्यं भवेदिति ॥
राजाने कहा — धिक्कार है राजधर्मको, जिसके कार्यका यहाँ यह परिणाम निकला । ब्राह्मणको और मुझको समान फलकी प्राप्ति कैसे हो, इसी उद्देश्यसे मुझे यह दान ग्रहण करना है ।
ब्राह्मण बोला— "राजन्! मैंने संहिता का जप करते हुए कहीं से जितना भी पुण्य अथवा सद्गुण सङ्ग्रह किया है, वह सब आप ले लें। इसके सिवा भी मेरे पास जो कुछ पुण्य हो, उसे ग्रहण करें।"
राजा ने सङ्कल्प के जल के स्पर्श के साथ कहा— "द्विजश्रेष्ठ! मेरा और आपका सारा पुण्य हम दोनों के लिये समान हो और हम साथ-साथ उसका उपभोग करें; इस उद्देश्य से आप मेरा दिया हुआ दान भी ग्रहण करें।"
तभी अचानक विरूप प्रकट हुआ और बोला— "राजन्! आपको विदित हो कि हम दोनों काम और क्रोध हैं। हमने ही आपको इस कार्य में लगाया है। आपने जो साथ-साथ फल भोगने की बात कही है, इससे आपको और इस ब्राह्मण को एक समान लोक प्राप्त होंगे। यह मेरा साथी कुछ भी धारण नहीं करता अथवा मुझ पर भी इसका कोई ऋण नहीं है। यह सब खेल तो हमने आपकी परीक्षा लेने के लिये किया था। काल, धर्म, मृत्यु, काम— सब एक-दूसरे की कसौटी पर आपके देखते-देखते कसे गये हैं। अब जहाँ आपकी इच्छा हो, अपने कर्म से जीते हुए उन लोकों में जाइये।"
नायं धारयते किञ्चिज्जिज्ञासा त्वत्कृते कृता ।
कालो धर्मस्तथा मृत्युः कामक्रोधौ तथा युवाम् ॥
सर्वमन्योन्यनिष्कर्षे निघृष्टं पश्यतस्तव ।
गच्छ लोकान् जितान् स्वेन कर्मणा यत्र वाञ्छसि ॥
यह मेरा साथी कुछ भी धारण नहीं करता अथवा मुझपर भी इसका कोई ऋण नहीं है । यह सब खेल तो हमलोगोंने आपकी परीक्षा लेनेके लिये किया था । काल, धर्म, मृत्यु, काम, - सब एक - दूसरेकी कसौटीपर - - -क्रोध और आप दोनों ये सब के- आपके देखते देखते कसेगये हैं । अब जहाँ आपकी इच्छा हो, अपने कर्मसे जीते हुए उन लोकोंमें जाइये ।
युधिष्ठिर ने पूछा—"पितामह! उस समय विरूप के पूर्वोक्त वचन कहने पर ब्राह्मण और राजा इक्ष्वाकु, उन दोनों ने उसे क्या उत्तर दिया, यह मुझे बताइये। तथा आपने जो यह सद्योमुक्ति, क्रममुक्ति और लोकान्तर की प्राप्ति रूप तीन प्रकार की गति बतायी है, उनमें से वे दोनों किस गति को प्राप्त हुए? उस समय उन दोनों में क्या बातचीत हुई और उन्होंने क्या किया?"
भीष्मजी ने कहा—"प्रभो! तब 'बहुत अच्छा' कहकर ब्राह्मण ने धर्म, यम, काल, मृत्यु और स्वर्ग—इन सभी पूजनीय देवताओं का पूजन किया। वहाँ पहले से जो ब्राह्मण मौजूद थे और दूसरे भी जो श्रेष्ठ ब्राह्मण वहाँ पधारे थे, उन सबके चरणों में सिर झुकाकर सबकी यथोचित पूजा करके ब्राह्मण ने राजा से कहा—‘राजर्षे! इस फल से संयुक्त होकर आप श्रेष्ठ गति को प्राप्त कीजिये और आपकी आज्ञा लेकर मैं फिर जप में लग जाऊँगा। महाबली प्रजानाथ! मुझे देवी सावित्री ने वर दिया है कि जप में तुम्हारी नित्य श्रद्धा बनी रहेगी।'
तथेत्येवं प्रतिश्रुत्य धर्मं सम्पूज्य च प्रभो ।
यमं कालं च मृत्युं च स्वर्गं सम्पूज्य चार्हतः ॥
पूर्वं ये चापरे तत्र समेता ब्राह्मणर्षभाः ।
सर्वान् सम्पूज्य शिरसा राजानं सोऽब्रवीद् द्विजः ॥
भीष्मजीने कहा — प्रभो! तब ' बहुत अच्छा' कहकर ब्राह्मणने धर्म, यम, काल, मृत्यु और स्वर्ग— इन सभी पूजनीय देवताओंका पूजन किया । वहाँ पहलेसे जो ब्राह्मण मौजूद थे और दूसरे भी जो श्रेष्ठ ब्राह्मण वहाँ पधारे थे, उन सबके चरणोंमें सिर झुकाकर सबकी यथोचित पूजा करके ब्राह्मणने राजासे कहा- ।
राजाने कहा—'विप्रवर! यदि इस प्रकार मुझे फल समर्पण करने के कारण आपको फल की प्राप्ति नहीं हो रही है और पुनः जप करने में ही आपकी श्रद्धा होती है, तो आप मेरे साथ ही चलें और जप-दान जनित फल को प्राप्त करें।'
ब्राह्मण ने कहा—'राजन्! मैंने यहाँ सबके समीप आपको अपने जप का फल देने के लिये महान् प्रयत्न किया है; फिर भी आपका आग्रह साथ-साथ फल का उपभोग करने का रहा है; अतः हम दोनों समान फल के ही भागी हों। चलिये, जहाँ तक हम दोनों की गति हो सके, साथ-साथ चलें।'
कृतः प्रयत्नः सुमहान् सर्वेषां संनिधाविह ।
सह तुल्यफलावावं गच्छावो यत्र नौ गतिः ॥
ब्राह्मणने कहा- राजन्! मैंने यहाँ सबके समीप आपको अपने जपका फल देनेके लिये महान् प्रयत्न किया है; फिर भी आपका आग्रह साथ- साथ फलका उपभोग करनेका रहा है; अतः हम दोनों समान फलके ही भागी हों । चलिये, जहाँतक हम दोनोंकी गति हो सके, साथ- साथ चलें ।
तभी लोकपालों के साथ देवराज इन्द्र उस स्थान पर आये। उनके साथ साध्यगण, विश्वेदेवगण और मरुद्गण भी थे। बड़े-बड़े वाद्य बज रहे थे। नदियाँ, पर्वत, समुद्र, नाना प्रकार के तीर्थ, तपस्या, संयोग विधि, वेद, स्तोभ, सरस्वती, नारद, पर्वत, विश्वावसु, हाहा, हूहू, परिवार सहित चित्रसेन गन्धर्व, नाग, सिद्ध, मुनि, देवाधिदेव प्रजापति ब्रह्मा, सहस्रों मस्तक वाले शेषनाग तथा अचिन्त्य देव भगवान् विष्णु भी वहाँ पधरे। उस समय आकाश में भेरियाँ और तुरही आदि बाजे बज रहे थे। वहाँ उन महात्माओं पर दिव्य फूलों की वर्षा होने लगी। झुण्ड की झुण्ड अप्सराएँ सब ओर नृत्य करने लगीं।
तदनन्तर मूर्तिमान स्वर्ग ने ब्राह्मण से कहा—'महाभाग! तुम सिद्ध हो गये।' फिर राजा से कहा—'नरेश्वर! तुम भी सिद्ध हो गये।' राजन्! तदनन्तर वे दोनों एक-दूसरे का उपकार करते हुए एक साथ हो गये। उन्होंने एक ही साथ अपने मन को विषयों की ओर से हटा लिया। तदनन्तर प्राण, अपान, उदान, समान और व्यान—इन पाँचों प्राण वायुओं को हृदय में स्थापित किया; इस प्रकार स्थित हुए उन दोनों ने मन को प्राण और अपान के साथ मिला दिया। भौहों के नीचे नासिका के अग्र भाग पर दृष्टि रखते हुए मन सहित प्राण-अपान को उन्होंने दोनों भौहों के बीच स्थिर कर दिया।
अथ तौ सहितौ राजन्नन्योन्यविधिना ततः ।
विषयप्रतिसंहारमुभावेव प्रचक्रतुः ॥
राजन्! तदनन्तर वे दोनों एक- दूसरेका उपकार करते हुए एक साथ हो गये । उन्होंने एक ही साथ अपने मनको विषयोंकी ओरसे हटा लिया ।
इस प्रकार मन को जीतकर दृष्टिको एकाग्र करके उन दोनों ने प्राण सहित मन को सुषुम्णा मार्ग द्वारा मूर्धाम में स्थापित कर दिया। फिर वे दोनों समाधि में स्थित हो गये। उस समय उन दोनों के शरीर जड़ की भाँति चेष्टाहीन हो गये। इसी समय महात्मा ब्राह्मण के तालु देश (ब्रह्म रन्ध्र) का भेदन करके एक ज्योतिर्मयी विशाल ज्वाला निकली और स्वर्ग की ओर चल दी।
फिर तो सम्पूर्ण दिशाओं में महान् कोलाहल मच गया। उस ज्योति की सभी लोग स्तुति करने लगे। प्रजानाथ! प्रादेश के बराबर लम्बे पुरुष का आकार धारण किये वह तेजःपुञ्ज ब्रह्माजी के पास पहुँचा, तब ब्रह्माजी ने आगे बढ़कर उसका स्वागत किया। ब्रह्माजी ने उस तेजोमय पुरुष का स्वागत करने के पश्चात् पुनः उससे मधुर वाणी में कहा—'विप्रवर! योगियों को जो फल मिलता है, निस्सन्देह वही फल जप करने वालों को भी प्राप्त होता है। योगियों को जिस फल की प्राप्ति होती है, वह इन सभासदोंने प्रत्यक्ष देखा है; किन्तु जापकों को उनसे भी श्रेष्ठ फल प्राप्त होता है, यह सूचित करने के लिये ही मैंने उठकर तुम्हारा स्वागत किया है। अब तुम मेरे भीतर सुखपूर्वक निवास करो।'
भूयश्चैवापरं प्राह वचनं मधुरं तदा ।
जापकैस्तुल्यफलता योगानां नात्र संशयः ॥
ब्रह्माजीने उस तेजोमय पुरुषका स्वागत करनेके पश्चात् पुनः उससे मधुर वाणी इस प्रकार कहा— ‘ विप्रवर! योगियोंको जो फल मिलता है, निस्संदेह वही फल जप करनेवालोंको भी प्राप्त होता है ।
इतना कहकर ब्रह्माजी ने उसे पुनः तत्त्वज्ञान प्रदान किया। आज्ञा पाकर वह ब्राह्मण—तेज, रोग और शोक से मुक्त होकर—ब्रह्माजी के मुखारविन्द में प्रविष्ट हो गया। राजा इक्ष्वाकु भी उस श्रेष्ठ ब्राह्मण की ही भाँति विधिपूर्वक भगवान् ब्रह्माजी के मुखारविन्द में प्रविष्ट हो गये।
तदनन्तर देवताओं ने ब्रह्माजी को प्रणाम करके कहा—'भगवन्! आपने जो आगे बढ़कर इस ब्राह्मण का स्वागत किया है, इससे सिद्ध हो गया कि जापकों को योगियों से भी श्रेष्ठ फल की प्राप्ति होती है। इस जापक ब्राह्मण को सद्गति देने के लिये ही आपने ऐसा उद्योग किया था। इसी को देखने के लिये हम लोग भी आये थे। आपने इन दोनों का समान रूप से आदर किया और ये दोनों ही एक-सी स्थिति में पहुँचकर आपके समान फल के भागी हुए हैं। आज हम लोगों ने योगी और जापक के महान् फल को प्रत्यक्ष देख लिया है। वे सम्पूर्ण लोकों को लाँघकर जहाँ उनकी इच्छा हो, वहाँ जा सकते हैं।'
योगजापकयोर्दृष्टं फलं सुमहदद्य वै ।
सर्वाल्लोँकानतिक्रम्य गच्छेतां यत्र वाञ्छितम् ॥
‘ आज हमलोगोंने योगी और जापकके महान् फलको प्रत्यक्ष देख लिया । वे सम्पूर्ण लोकोंको लाँघकर जहाँ उनकी इच्छा हो, जा सकते हैं '
ब्रह्माजी ने कहा—'देवताओ! जो महास्मृति तथा कल्याणमयी अनुस्मृति का पाठ करता है, वह भी इसी विधि से मेरा सालोक्य प्राप्त कर लेता है। जो योग का भक्त है, वह भी देहत्याग के पश्चात् इसी विधि से मेरे लोकों को प्राप्त कर लेता है, इसमें संशय नहीं है। अब तुम सब लोग अपनी अभीष्ट सिद्धि के लिये अपने-अपने स्थान को जाओ। मैं तुम लोगों की अभीष्ट सिद्धि करता रहूँगा।'
विधिनानेन देहान्ते मम लोकानवाप्नुयात् ।
साधये गम्यतां चैव यथास्थानानि सिद्धये ॥
ब्रह्माजीने कहा- देवताओ! जो महास्मृति तथा कल्याणमयी अनुस्मृतिका पाठ करता है, वह भी इसी विधिसे मेरा सालोक्य प्राप्त कर लेता है । जो योगका भक्त है, वह भी देहत्यागके पश्चात् इसी विधिसे मेरे लोकोंको प्राप्त कर लेता है, इसमें संशय नहीं है । अब तुम सब लोग अपनी अभीष्ट सिद्धिके लिये अपने - अपने स्थानको जाओ । मैं तुम लोगों अभीष्ट साधन करता रहूँगा ।
ऐसा कहकर ब्रह्माजी वहीं अन्तर्धान हो गये। देवता भी उनकी आज्ञा पाकर अपने-अपने स्थान को चले गये। महाराज! मैंने जैसा सुना था, उसके अनुसार जापकों को मिलने वाले इस उत्तम फल और गति का वर्णन किया। अब तुम और क्या सुनना चाहते हो?"
एतत् फलं जापकानां गतिश्चैषा प्रकीर्तिता ।
यथाश्रुतं महाराज किं भूयः श्रोतुमिच्छसि ॥
महाराज! मैंने जैसा सुना था, उसके अनुसार जापकोंको मिलनेवाले इस उत्तम फल और गतिका वर्णन किया । अब तुम और क्या सुनना चाहते हो?
In English
Bhishma explains the fruits of Japa to Yudhishthira
Bhishma describes the correct method of performing Japa and how it leads to spiritual liberation. He warns that performing rituals with ego, attachment, or incomplete dedication results in falling into various hells rather than reaching the supreme state.
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