कृतघ्नोपाख्यान : मित्रों के साथ विश्वासघात करने वाले व्यक्ति का क्या हश्र होता है?
कृतघ्नता और मित्रता का पतन
महर्षि वेदव्यास कृत महाभारतके सन्दर्भ सहित वास्तविक आख्यान पढ़ें।
शान्तिपर्व → आपद्धर्मपर्व · अध्याय 168–173 · पृष्ठ 1095–1125
भीष्म ने युधिष्ठिर से कहा
युद्धभूमि में धर्म के गूढ़ रहस्यों पर चर्चा
कुरुक्षेत्र के युद्धभूमि में, जहाँ शान्ति की खोज थी, राजा युधिष्ठिर ने भीष्म पितामह की ओर देखा। उनके नेत्रों में जिज्ञासा थी और हृदय में धर्म के गूढ़ रहस्यों को जानने की व्याकुलता। उन्होंने अत्यन्त विनम्र स्वर में कहा— "कौरवकुल की प्रीति बढ़ाने वाले महाज्ञानी पितामह! मैं कुछ और प्रश्न आपके सामने उपस्थित कर रहा हूँ। मेरे उन प्रश्नों का विवेचन कीजिये कि सौम्य स्वभाव के मनुष्य कैसे होते हैं? किनके साथ प्रेम करना उत्तम होता है? वर्तमान और भविष्य में कौन-से मनुष्य उपकार करने में समर्थ होते हैं? उन सबका मुझसे वर्णन कीजिये।" युधिष्ठिर के स्वर में एक दृढ़ विश्वास था— "मेरी तो यह धारणा है कि जिस स्थान पर सुहृद् खड़े होते हैं, वहाँ न तो प्रचुर धन काम दे सकता है और न सम्बन्धी तथा बन्धु-बान्धव ही ठहर सकते हैं।"
न हि तत्र धनं स्फीतं न च सम्बन्धिबान्धवाः ।
तिष्ठन्ति यत्र सुहृदस्तिष्ठन्तीति मतिर्मम ॥
मेरी तो यह धारणा है कि जिस स्थानपर सुहृद् खड़े होते हैं वहाँ न तो प्रचुर धन काम दे सकता है और न सम्बन्धी तथा बन्धु बान्धव ही ठहर सकते हैं ।
भीष्म पितामह ने युधिष्ठिर की ओर देखा और गम्भीर स्वर में कहा— "राजा युधिष्ठिर! किनके साथ सन्धि करनी चाहिए और किनके साथ नहीं? यह बात मैं तुम्हें ठीक-ठीक बता रहा हूँ। तुम सब कुछ ध्यान देकर सुनो।" भीष्म के चेहरे पर गम्भीरता छा गई। उन्होंने समझाते हुए कहा— "वह मनुष्य जो पापी है, जो केवल अपना काम बनाने के लिये ही मित्रों से मेल रखता है, वास्तव में मित्रद्वेषी है; जो मुख से मित्रता की बातें करके भीतर से शत्रुभाव रखता है, जिसकी दृष्टि कुटिल है और जो विपरीतदर्शी है; वह जो भलाई से कभी पीछे न हटने वाले मित्र को भी त्याग देता है... जो शराबी, द्वेषी, क्रोधी, निर्दयी और क्रूर है; जो दूसरों को सताने वाला, मित्रद्रोही और प्राणियों की हिंसामें तत्पर रहने वाला कृतघ्न और नीच हो— संसार में ऐसे मनुष्य के साथ कभी सन्धि नहीं करनी चाहिए। जो दूसरों का छिद्र खोजता हो, वह भी सन्धि करने के योग्य नहीं है।"
संधेयान् पुरुषान् राजन्नसंधेयांश्च तत्त्वतः ।
वदतो मे निबोध त्वं निखिलेन युधिष्ठिर ॥
भीष्मजीने कहा- राजा युधिष्ठिर! किनके साथ संधि ( मित्रता ) करनी चाहिये और किनके साथ नहीं? यह बात मैं तुम्हें ठीक -ठीक बता रहा हूँ। तुम सब कुछ ध्यान देकर सुनो ।
भीष्म ने अपनी बात जारी रखते हुए श्रेष्ठ पुरुषों का लक्षण बताया— "अब मैं सन्धि करने के योग्य पुरुषों को बता रहा हूँ, सुनो। जो लोभ और मोह के वशीभूत होकर मित्र की युवतियों पर अपनी आसक्ति नहीं दिखाते; जो मित्र के विश्वासपात्र और धर्म के प्रति अनुरक्त हैं; जिनकी दृष्टि में मिट्टी का ढेला और सोना दोनों एक-से हैं; जो सदा सुहृदों के प्रति सुस्थिर बुद्धि रखने वाले हैं, शास्त्रों के अनुसार चलते हैं और प्रारब्धवश प्राप्त हुए धन में ही सन्तुष्ट रहते हैं... ऐसे श्रेष्ठ पुरुषों के साथ जो राजा सन्धि करता है, उसका राज्य उसी तरह बढ़ता है, जैसे चन्द्रमा की चाँदनी। जो प्रतिदिन शास्त्रों का स्वाध्याय करते हैं, क्रोध को काबू में रखते हैं और युद्ध में सदा प्रबल रहते हैं; जिनका उत्तम कुल में जन्म हुआ है, जो शीलवान् और श्रेष्ठ गुणों से सम्पन्न हैं— वे श्रेष्ठ पुरुष ही मित्र बनाने के योग्य होते हैं।"
भीष्म ने चेतावनी देते हुए कहा— "निष्पाप नरेश! मैंने जो दोषयुक्त मनुष्य बताये हैं, उन सबमें अधम होते हैं कृतघ्न। वे मित्रों की हत्या तक कर डालते हैं। ऐसे दुराचारी नराधमों को दूर से ही त्याग देना चाहिए। यह सबका निश्चय है।"
ये च दोषसमायुक्ता नराः प्रोक्ता मयानघ ॥
तेषामप्यधमा राजन् कृतघ्ना मित्रघातकाः ।
त्यक्तव्यास्तु दुराचाराः सर्वेषामिति निश्चयः ॥
निष्पाप नरेश! मैंने जो दोषयुक्त मनुष्य बताये हैं, उन सबमें अधम होते हैं कृतघ्न । वे मित्रोंकी हत्यातक कर डालते हैं । ऐसे दुराचारी नराधमोंको दूरसे ही त्याग देना चाहिये । यह सबका निश्चय है ।
युधिष्ठिर के मन में जिज्ञासा जाग उठी। उन्होंने पूछा— "पितामह! आपने जिसे मित्रद्रोही और कृतघ्न कहा है, उसका यथार्थ इतिहास क्या है? यह मैं विस्तारपूर्वक सुनना चाहता हूँ, आप कृपा करके मुझे बताइये।"
विस्तरेणाथ सम्बन्धं श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः ।
मित्रद्रोही कृतघ्नश्च यः प्रोक्तस्तद् वदस्व मे ॥
युधिष्ठिरने कहा - पितामह! आपने जिसे मित्रद्रोही और कृतघ्न कहा है, उसका यथार्थ इतिहास क्या है? यह मैं विस्तारपूर्वक सुनना चाहता हूँ, आप कृपा करके मुझे बताइये ।
भीष्म ने अपनी आँखें मूँद लीं और अतीत की स्मृतियों में उतर गए। उन्होंने कहा— "नरेश्वर! मैं प्रसन्नतापूर्वक तुम्हें एक पुराना इतिहास बता रहा हूँ। यह घटना उत्तर दिशा में म्लेच्छों के देश में घटित हुई थी। मध्यदेश का एक ब्राह्मण था, जिसने वेद बिलकुल नहीं पढ़ा था। वह एक सम्पन्न गाँव देखकर उसमें भीख माँगने के लिये गया। उस गाँव में एक धनी डाकू रहता था, जो समस्त वर्णों की विशेषता का जानकार था। उसके हृदय में ब्राह्मणों के प्रति भक्ति थी; वह सत्यप्रतिज्ञ और दानी था।"
उस डाकू ने ब्राह्मण की सहायता की। उसने उसे रहने के लिये एक घर दिया, वर्षभर का अन्न प्रबन्ध किया, नया वस्त्र दिया और सेवा के लिये एक युवती दासी भी दे दी। ब्राह्मण उस समृद्धिशाली भवन में अनेक वर्षों तक रहा और उस दासी के कुटुम्ब की सहायता करने लगा। वह ब्राह्मण गौतम था। उसने वहाँ बड़े यत्न से बाण चलाकर लक्ष्य बेधने का अभ्यास किया। वह डाकुओं की तरह प्रतिदिन जङ्गल में घूमकर हंसों का शिकार करता था। वह हिंसामें बड़ा प्रवीण हो गया था और उसमें दया नहीं थी; वह सदा प्राणियों को मारने की ही ताक में लगा रहता था। डाकुओं के सम्पर्क में रहने से गौतम भी उनके समान ही डाकू बन गया था।
एतत् सम्प्राप्य हृष्टात्मा दस्योः सर्वं द्विजस्तथा ।
तस्मिन् गृहवरे राजंस्तया रेमे स गौतमः ॥
राजन्! दस्युसे ये सारी वस्तुएँ पाकर ब्राह्मण मन- ही - मन बड़ा प्रसन्न हुआ; और उस सुन्दर गृहमें दासीके साथ आनन्दपूर्वक रहने लगा ।
समय बीतता गया। एक दिन एक अन्य ब्राह्मण उस गाँव में आया। वह जटा, वल्कल और मृगचर्म धारण किये हुए था; स्वाध्यायपरायण, पवित्र, विनयी और वेदों का पारङ्गत विद्वान् था। वह गौतम का परमप्रिय मित्र था और अपने घर की तलाश में भटकते हुए उसी गाँव में जा पहुँचा जहाँ गौतम रहता था। वह ब्राह्मण शूद्र का अन्न नहीं खाता था, इसलिए वह डाकुओं से भरे उस गाँव में अपने घर को खोज रहा था।
तभी वह श्रेष्ठ ब्राह्मण गौतम के घर पर पहुँचा। उसी समय गौतम भी शिकार से लौटकर वहाँ आ गया। दोनों की भेंट हुई। ब्राह्मण ने देखा कि गौतम के कन्धे पर मारे गये हंस की लाश है, हाथ में धनुष-बाण है और पूरा शरीर रक्त से सींचा हुआ है। वह घर के दरवाजे पर किसी नरभक्षी राक्षस के समान जान पड़ता था। उसे पहचानकर ब्राह्मण लज्जित हुआ और बोला— 'अरे! तू मोहवश यह क्या कर रहा है? तू तो मध्यदेश का विख्यात एवं कुलीन ब्राह्मण था। यहाँ डाकू कैसे बन गया? अपने पूर्वजों को तो याद कर, उनकी कितनी ख्याति थी! वे कैसे वेदों के पारङ्गत विद्वान् थे और तू उन्हीं के वंश में पैदा होकर ऐसा कुलकलङ्क निकला। अब भी तो अपने आप को पहचान! तू द्विज है; अतः द्विजोचित शील, शास्त्रज्ञान, संयम और दयाभाव को याद करके इस निवासस्थान को त्याग दे।'
अवबुध्यात्मनाऽऽत्मानं सत्त्वं शीलं श्रुतं दमम् ।
अनुक्रोशं च संस्मृत्य त्यज वासमिमं द्विज ॥
' अब भी तो अपने -आपको पहचान! तू द्विज है; अतः द्विजोचित सत्त्व, शील, शास्त्रज्ञान, संयम और दयाभावको याद करके अपने इस निवासस्थानको त्याग दे'
गौतम ने आर्त-सा होकर उत्तर दिया— 'द्विजश्रेष्ठ! मैं निर्धन हूँ और वेद को भी नहीं जानता; अतः मुझे धन कमाने के लिये इधर आया हुआ समझें। विप्रेन्द्र! आज आपके दर्शन से मैं कृतार्थ हो गया। अब रात भर यहीं रहिये, कल सबेरे हम दोनों साथ ही चलेंगे।'
त्वद्दर्शनात् तु विप्रेन्द्र कृतार्थोऽस्म्यद्य वै द्विज ।
आवां हि सह यास्यावः श्वो वसस्वाद्य शर्वरीम् ॥
‘ विप्रेन्द्र! आज आपके दर्शनसे मैं कृतार्थ हो गया । ब्रह्मन्! अब रातभर यहीं रहिये, कल सबेरे हम दोनों साथ ही चलेंगे '
वह ब्राह्मण दयालु था। गौतम के अनुरोध पर वह वहीं ठहर गया, किन्तु उसने वहाँ का अन्न ग्रहण नहीं किया।
अगले दिन सुबह होते ही वह श्रेष्ठ ब्राह्मण वहाँ से चला गया। गौतम ने भी अपना घर छोड़ा और समुद्र की ओर चल दिया। रास्ते में उसने देखा कि कुछ व्यापारी वैश्य दल के साथ जा रहे हैं। वह उन्हीं के दल में शामिल हो गया। अचानक एक मतवाले हाथी ने उन पर आक्रमण कर दिया और दल के अधिकांश लोग मारे गये। गौतम उस भय से तो बच गया, पर घबराहट में वह उत्तर दिशा की ओर भाग चला। व्यापारियों का दल छूट जाने के बाद वह अकेला ही वन में विचरने लगा।
स तु सार्थपरिभ्रष्टस्तस्माद् देशात् तथा च्युतः ।
एकाकी व्यचरत् तत्र वने किंपुरुषो यथा ॥
व्यापारियोंके दलका साथ छूट गया, अतः उस देशसे भी भ्रष्ट होकर वह अकेला ही उस वनमें विचरने लगा; मानो कोई किंपुरुष घूम रहा हो ।
चलते-चलते उसे समुद्र की ओर जाने वाला एक मार्ग मिला, जो उसे एक दिव्य और रमणीय वन में ले गया। वहाँ के वृक्ष फूलों से लदे थे और आम्रवृक्षों की पङ्क्तियाँ शोभा बढ़ा रही थीं। वह स्थान नन्दनवन के समान मनोहर था। चारों ओर सुगन्धित पर्वतीय समतल प्रदेशों में पक्षी कलरव कर रहे थे। कहीं 'भारुण्ड' नामक पक्षी बोलते थे, तो कहीं भूलिङ्ग पक्षी चहचहा रहे थे।
पक्षियों के मधुर कलरवों को सुनते हुए गौतम आगे बढ़ता चला गया। उस रमणीय प्रदेश में एक स्वर्णमयी बालुकाराशि के पास उसने एक अत्यन्त शोभायमान बरगद का विशाल वृक्ष देखा। वह वृक्ष अपनी अनेक शाखाओं के कारण एक महान छत्र के समान जान पड़ता था, जिसकी जड़ें चन्दन मिश्रित जल से सींची गयी थीं।
ततोऽपश्यत् सुरम्येषु सुवर्णसिकताचिते ॥
देशे समे सुखे चित्रे स्वर्गोद्देशसमे नृप ।
श्रिया जुष्टं महावृक्षं न्यग्रोधं च सुमण्डलम् ॥
शाखाभिरनुरूपाभिर्भूयिष्ठं क्षत्रसंनिभम् ।
तस्य मूलं च संसिक्तं वरचन्दनवारिणा ॥
नरेश्वर! तदनन्तर उन रमणीय प्रदेशोंमेंसे एक ऐसे स्थानपर जो सुवर्णमयी बालुकाराशिसे व्याप्त, समतल, सुखद, विचित्र तथा स्वर्गीय भूमिके समान मनोहर था, गौतमने एक अत्यन्त शोभायमान बरगदका विशाल वृक्ष देखा, जो चारों ओर मण्डलाकार फैला हुआ था । अपनी बहुत-सी सुन्दर शाखाओंके कारण वह वृक्ष एक महान् छत्रके समान जान पड़ता था । उसकी जड़ चन्दनमिश्रित जलसे सींची गयी थी ।
भीष्म बोले— हे युधिष्ठिर! वह वृक्ष ब्रह्माजी की सभा के समान शोभा पाने वाला था और दिव्य पुष्पों से सुशोभित था। उस परम उत्तम मनोरम वटवृक्ष को देखकर गौतम को बड़ी प्रसन्नता हुई। वह पवित्र, देवगृह के समान सुन्दर और खिले हुए वृक्षों से घिरा हुआ था। वह गौतम उस वृक्ष के पास जाकर बड़े हर्ष के साथ उसकी छाया में बैठ गया।
कुन्तीनन्दन! जैसे ही गौतम वहाँ बैठा, फूलों का स्पर्श करके एक सुन्दर-मन्द सुगन्धित वायु चलने लगी। वह वायु अत्यन्त सुखद और कल्याणप्रद थी। नरेश्वर! वह वायु गौतम के सम्पूर्ण अङ्गों को आह्लाद प्रदान कर रही थी। उस पवित्र वायु के स्पर्श ने गौतम को बड़ी शान्ति दी। वह सुख का अनुभव करता हुआ वहीं लेट गया, जबकि उधर सूर्य भी अस्ताचल की ओर चला गया था।
स तु विप्रः प्रशान्तश्च स्पृष्टः पुण्येन वायुना ।
सुखमासाद्य सुष्वाप भास्करश्चास्तमभ्ययात् ॥
उस पवित्र वायुका स्पर्श पाकर गौतमको बड़ी शान्ति मिली । वह सुखका अनुभव करता हुआ वहीं लेट गया । उधर सूर्य भी डूब गया ।
तदनन्तर, सूर्य के डूब जाने और सन्ध्याकाल के उपस्थित होने पर, ब्रह्मलोक से वहाँ एक श्रेष्ठ पक्षी आया। वह वृक्ष ही उसका वासस्थान था। वह महर्षि कश्यप का पुत्र और ब्रह्माजी का प्रिय सखा 'नाडीजङ्ग' था। वह बगुलों का राजा और महाबुद्धिमान था। इस भूतल पर वह 'राजधर्मा' के नाम से विख्यात था। देवकन्या से उत्पन्न होने के कारण उसके शरीर की कान्ति देवताओं के समान थी। वह दिव्य तेज से सम्पन्न और अत्यन्त विद्वान था। उसके अङ्गों में सूर्य की किरणों के समान चमकीले आभूषण शोभा दे रहे थे। वह देवकुमार अपने सभी अङ्गों में विशुद्ध और दिव्य आभरणों से विभूषित होकर देदीप्यमान दिख रहा था।
उस अनुपम पक्षी को आते देख गौतम आश्चर्यचकित हो उठा। वह भूखा-प्यासा था और मार्ग चलने की थकावट से चूर-चूर हो रहा था। उसने राजधर्मा को मार डालने की इच्छा से उसकी ओर देखा। तभी राजधर्मा पास आया और बोला— "विप्रवर! आपका स्वागत है। यह मेरा घर है। आप यहाँ पधारे, यह मेरे लिए बड़े सौभाग्य की बात है। सूर्यदेव अस्ताचल को चले गए हैं और सन्ध्याकाल उपस्थित है। आप मेरे घर आए हुए प्रिय एवं उत्तम अतिथि हैं। मैं शास्त्रीय विधिके अनुसार आज आपकी पूजा करूँगा। रात में मेरा आतिथ्य स्वीकार करके कल प्रातःकाल यहाँ से जाइएगा।"
राजधर्मोवाच स्वागतं भवतो विप्र दिष्ट्या प्राप्तोऽसि मे गृहम् ।
अस्तं च सविता यातः संध्येयं समुपस्थिता ॥
राजधर्मा ( पास आकर ) बोला - विप्रवर! आपका स्वागत है । यह मेरा घर है । आप यहाँ पधारे, यह मेरे लिये बड़े सौभाग्यकी बात है । सूर्यदेव अस्ताचलको चले गये । यह संध्याकाल उपस्थित है ।
भीष्म बोले— राजन्! पक्षी की वह मधुर वाणी सुनकर गौतम को बड़ा आश्चर्य हुआ और वह कौतूहलपूर्ण दृष्टि से राजधर्मा की ओर देखने लगा। राजधर्मा ने पुनः कहा— "द्विजश्रेष्ठ! मैं महर्षि कश्यप का पुत्र हूँ। मेरी माता दक्ष प्रजापतिकी कन्या हैं। आप गुणवान अतिथि हैं, मैं आपका स्वागत करता हूँ।"
राजधर्मोवाच भोः कश्यपस्य पुत्रोऽहं माता दाक्षायणी च मे I अतिथिस्त्वं गुणोपेतः स्वागतं ते द्विजोत्तम ॥
राजधर्मा बोला — द्विजश्रेष्ठ! मैं महर्षि कश्यपका पुत्र हूँ । मेरी माता दक्ष प्रजापतिकी कन्या हैं । आप गुणवान् अतिथि हैं, मैं आपका स्वागत करता हूँ ।
ऐसा कहकर राजधर्मा ने शास्त्रीय विधिके अनुसार गौतम का सत्कार किया। उसने शाल के फूलों का आसन बनाकर उसे बैठने के लिए दिया। राजा भगीरथ के रथ से आक्रान्त उन भूभागों में, जहाँ गङ्गाजी प्रवाहित होती हैं, वहाँ के बड़े-बड़े मत्स्यों को लाकर राजधर्मा ने गौतम के लिए भोजन की व्यवस्था की। कश्यप के उस पुत्र ने अग्नि प्रज्वलित की और उन मोटे-मोटे मत्स्यों को अपने अतिथि गौतम को अर्पित कर दिया।
जब वह ब्राह्मण उन मत्स्यों को पकाकर खा चुका और उसकी अन्तरात्मा तृप्त हो गई, तब उस महातपस्वी पक्षी ने गौतम की थकावट दूर करने के लिए अपने पङ्खों से हवा करना शुरू किया। विश्राम के पश्चात् जब वह बैठा, तब राजधर्मा ने उससे उसका गोत्र पूछा। गौतम ने कहा— "मेरा नाम गौतम है और मैं जाति से ब्राह्मण हूँ।" इससे अधिक वह कुछ न बता सका। तब पक्षी ने उसके लिए पत्तों का एक दिव्य बिछावन तैयार किया, जो सुगन्धित फूलों से भरा होने के कारण महक रहा था। वह बिछावन उसे दिया गया और गौतम उस पर सुखपूर्वक सो गया।
धर्मराज! जब गौतम उस बिछौने पर बैठा, तब बातचीत के क्रम में कुशल कश्यपकुमार ने पूछा— "ब्रह्मन्! आप इधर किसलिए आए हैं?" भारत! तब गौतम ने उससे कहा— "महामते! मैं दरिद्र हूँ और धन के लिए समुद्र तट पर जाने की इच्छा लेकर घर से चला हूँ।" यह सुनकर राजधर्मा ने प्रसन्न होकर कहा— "द्विजश्रेष्ठ! अब आप वहाँ तक जाने के लिए उत्सुक न हों, यहीं आपका काम हो जाएगा। आप यहीं से धन लेकर अपने घर को जाइएगा। प्रभो! बृहस्पतिजी के मत के अनुसार अर्थ की सिद्धि चार प्रकार से होती है— वंश-परम्परा से, प्रारब्ध की अनुकूलता से, धन के लिए किए गए सकामकर्म से और मित्र के सहयोग से। मैं आपका मित्र हो गया हूँ और मेरे हृदय में आपके प्रति सौहार्द बढ़ गया है; अतः मैं ऐसा प्रयत्न करूँगा जिससे आपको अर्थ की प्राप्ति हो जाएगी।"
चतुर्विधा ह्यर्थसिद्धिर्बृहस्पतिमतं यथा ।
पारम्पर्यं तथा दैवं काम्यं मैत्रमिति प्रभो ॥
'प्रभो! बृहस्पतिजीके मतके अनुसार अर्थकी सिद्धि चार प्रकारसे होती है— वंशपरम्परासे, प्रारब्धकी अनुकूलतासे, धनके लिये किये गये सकामकर्मसे और मित्रके सहयोगसे ।
तदनन्तर, जब प्रातःकाल हुआ, तब राजधर्मा ने ब्राह्मण के सुख का उपाय सोचते हुए कहा— "सौम्य! इस मार्ग से जाइए, आपका कार्य सिद्ध हो जाएगा। यहाँ से तीन योजन दूर जाने पर जो नगर मिलेगा, वहाँ महाबली राक्षसराज विरूपाक्ष रहते हैं। वे मेरे महान मित्र हैं। 'तं गच्छ द्विजमुख्य त्वं स मद्वाक्यप्रचोदितः। कामानभीप्सितांस्तुभ्यं दाता नास्त्यत्र संशयः' (हे द्विजमुख्य! आप उनके पास जाइए, मैं आपके आदेश से कह रहा हूँ; वे आपकी इच्छा की कामनाएँ पूर्ण करेंगे, इसमें कोई संशय नहीं है)। द्विजश्रेष्ठ! आप उनके पास जाइए। वे मेरे कहने पर आपको यथेष्ट धन देंगे।"
राजन्! उसके ऐसा कहने पर गौतम वहाँ से चल दिया। उसकी सारी थकावट दूर हो चुकी थी। मार्ग में तेजपतों के वन में, जहाँ चन्दन और अगुरु के वृक्षों की प्रधानता थी, वह विश्राम करता और अमृत के समान मधुर फल खाता हुआ बड़ी तेजी से आगे बढ़ता चला गया। चलते-चलते वह 'मेरुव्रज' नामक नगर में जा पहुँचा। उस नगर के चारों ओर पर्वतों के टीले थे और उसकी चहारदीवारी भी पर्वतों जैसी थी। नगर की रक्षा के लिए शिला की बड़ी-बड़ी चट्टानें और मशीनें लगी थीं।
ततो मेरुव्रजं नाम नगरं शैलतोरणम् ।
शैलप्राकारवप्रं च शैलयन्त्राकुलं तथा ॥
चलते - चलते वह मेरुव्रज नामक नगरमें जा पहुँचा, जिसके चारों ओर पर्वतोंके टीले और पर्वतोंकी ही चहारदीवारी थी । उसका सदर फाटक भी एक पर्वत ही था । नगरकी रक्षाके लिये सब ओर शिलाकी बड़ी- बड़ी चट्टानें और मशीनें थीं ।
परम बुद्धिमान राक्षसराज विरूपाक्ष को उनके सेवकों द्वारा सूचना दी गई— "राजन! आपके मित्र ने अपने एक प्रिय अतिथि को आपके पास भेजा है, वह बहुत प्रसन्न है।" युधिष्ठिर! यह समाचार पाते ही राक्षसराज ने अपने सेवकों से कहा— "गौतम को नगर द्वार से शीघ्र यहाँ लाया जाए!"
यह आदेश प्राप्त होते ही राजसेवक बाज की तरह झपटकर उस श्रेष्ठ नगर के फाटक पर आए और ब्राह्मण से कहने लगे— "ब्रह्मन्! जल्दी कीजिये। शीघ्र आइये। महाराज आपसे मिलना चाहते हैं। विरूपाक्ष नाम से प्रसिद्ध वीर राक्षसराज आपको देखने के लिए उतावले हो रहे हैं; अतः आप शीघ्रता कीजिये।"
तमूचुर्महाराज राजप्रेष्यास्तदा द्विजम् ।
त्वरस्व तूर्णमागच्छ राजा त्वां द्रष्टुमिच्छति ॥
महाराज! राजाके उन सेवकोंने उस समय उस ब्राह्मणसे कहा- ' ब्रह्मन्! जल्दी कीजिये । शीघ्र आइये । महाराज आपसे मिलना चाहते हैं ।
बुलावा सुनते ही गौतम की थकावट दूर हो गई। वह विस्मित होकर दौड़ पड़ा। राक्षसराज की उस महा-समृद्धि को देखकर उसे बड़ा आश्चर्य होता था। राक्षसराज के दर्शन की इच्छा मन में लिए वह ब्राह्मण उन सेवकों के साथ शीघ्र ही राजमहल में जा पहुँचा।
इस प्रकार, जब राजा को उसके आगमन की सूचना दी गई और वह उनके उत्तम भवन में प्रविष्ट हुआ, तब राक्षसराज ने उसका विधिवत् पूजन किया। तत्पश्चात् वह एक उत्तम आसन पर विराजमान हुआ। विरूपाक्ष ने गौतम से उसके गोत्र, शाखा और स्वाध्याय के विषय में प्रश्न किया; परन्तु उसने केवल अपने गोत्र का नाम बताया। ब्राह्मणोचित तेज से हीन और स्वाध्याय से उपरत उस ब्राह्मण से राजा ने उसका निवास स्थान पूछा।
ब्रह्मवर्चसहीनस्य स्वाध्यायोपरतस्य च ।
गोत्रमात्रविदो राजा निवासं समपृच्छत ॥
तब ब्राह्मणोचित तेजसे हीन, स्वाध्यायसे उपरत, केवल गोत्र अथवा जातिका नाम जाननेवाले उस ब्राह्मणसे राजाने उसका निवासस्थान पूछा ।
राक्षसराज बोले— "भद्र! तुम्हारा निवास कहाँ है? तुम्हारी पत्नी किस गोत्र की कन्या है? यह सब ठीक-ठीक बताओ। भय न करो, मुझ पर विश्वास करो और सुख से रहो।" गौतम ने कहा— "राक्षसराज! मेरा जन्म तो मध्यदेश में हुआ है, किन्तु मैं एक भील के घर में रहता हूँ। मेरी स्त्री शूद्र जाति की है और मुझसे पहले दूसरे की पत्नी रह चुकी है। यह बात मैं आपसे सत्य ही कहता हूँ।"
मध्यदेशप्रसूतोऽहं वासो मे शबरालये ।
शूद्रा पुनर्भूर्भार्या मे सत्यमेतद् ब्रवीमि ते ॥
गौतमने कहा— राक्षसराज! मेरा जन्म तो हुआ है मध्यदेशमें, किंतु मैं एक भीलके घरमें रहता हूँ । मेरी स्त्री शूद्र जातिकी है और मुझसे पहले दूसरेकी पत्नी रह चुकी है । यह बात मैं आपसे सत्य ही कहता हूँ ।
भीष्म बोले— युधिष्ठिर! यह सुनकर राक्षसराज मन ही मन विचार करने लगे कि अब किस तरह काम करना चाहिए ताकि पुण्य प्राप्त हो सके। उन्होंने बार-बार बुद्धि लगाकर सोचा। वे सोचने लगे— "यह केवल जन्म से ही ब्राह्मण है; परन्तु महात्मा राजधर्मा का सुहृद् है। उन कश्यपकुमार ने ही इसे मेरे पास भेजा है; अतः उनका प्रिय कार्य अवश्य करूँगा। वह सदा मुझ पर भरोसा रखता है और मेरा भाई तथा हार्दिक मित्र भी है। आज कार्तिक की पूर्णिमा है। आज के दिन सहस्रों श्रेष्ठ ब्राह्मण मेरे यहाँ भोजन करेंगे। इन्हीं में यह भी भोजन कर लेगा और इन्हें भी धन देना चाहिए। आज पुण्य दिवस है, यह ब्राह्मण अतिथि रूप से आया है और मैंने धन दान करने का सङ्कल्प किया है।"
अयं वै जन्मना विप्रः सुहृत् तस्य महात्मनः ।
सम्प्रेषितश्च तेनायं काश्यपेन ममान्तिकम् ॥
तस्य प्रियं करिष्यामि स हि मामाश्रितः सदा ।
भ्राता मे बान्धवश्चासौ सखा च हृदयङ्गमः ॥
वे मन ही मन कहने लगे, ' यह केवल जन्मसे ही ब्राह्मण है; परंतु महात्मा राजधर्माका सुहृद् है । उन कश्यपकुमारने ही इसे यहाँ मेरे पास भेजा है; अतः उनका प्रिय कार्य अवश्य करूँगा । वह सदा मुझपर भरोसा रखता है और मेरा भाई, बान्धव तथा हार्दिक मित्र भी है ।
तदनन्तर भोजन के समय हजारों विद्वान् ब्राह्मण स्नान करके रेशमी वस्त्र और अलङ्कार धारण किए वहाँ पहुँच गए। राक्षसराज ने उन श्रेष्ठ ब्राह्मणों का शास्त्रीय विधिके अनुसार स्वागत-सत्कार किया। सेवक उनके लिए जमीन पर कुश के सुन्दर आसन बिछा दिए। जब वे ब्राह्मण उन आसनों पर विराजमान हो गए, तब विरूपाक्ष ने तिल, कुश और जल लेकर उनका विधिवत् पूजन किया। उसने विश्वेदेवों, पितरों तथा अग्निदेव की भावना करके उन सबको चन्दन लगाया, फूलों की मालाएँ पहनाईं और सुन्दर रीति से उनकी पूजा की। वे ब्राह्मण चन्द्रमा की भाँति शोभा पाने लगे। तत्पश्चात् उसने हीरों से जड़ी सोने की स्वच्छ थालियों में घी से बने मीठे पकवान उनके सामने परोस दिए।
उसके यहाँ आषाढ़ और माघ की पूर्णिमा को सदा बहुत-से ब्राह्मण सत्कारपूर्वक उत्तम भोजन पाते थे। विशेषतः कार्तिक की पूर्णिमा को, जब शरद् ऋतु समाप्त होती थी, वह ब्राह्मणों को रत्नों का दान करता था।
भीष्म बोले— हे युधिष्ठिर! जब राक्षसराज विरूपाक्ष ने उन ब्राह्मणों से कहा कि 'द्विजवरो! आपलोग अपनी इच्छा और उत्साह के अनुसार इन रत्नों को उठा ले जाएँ और जिनमें आप लोगों ने भोजन किया है, उन पात्रों को भी अपने घर लेते जाएँ', तब उन महात्माओं ने प्रसन्न होकर इच्छानुसार रत्नों को ले लिया। वे सभी उज्ज्वल वस्त्रधारी ब्राह्मण अत्यन्त प्रसन्न हुए। इसके पश्चात राक्षसराज विरूपाक्ष ने नाना देशों से आए हुए अन्य राक्षसों को हिंसा करने से रोकते हुए कहा— 'विप्रगण! आज एक दिन के लिए आप लोगों को राक्षसों की ओर से कहीं कोई भय नहीं है; अतः आनन्द कीजिये और शीघ्र ही अपने अभीष्ट स्थान को चले जाइये। विलम्ब न कीजिये।' यह सुनकर सब ब्राह्मण समुदाय वहाँ से भाग चले।
अद्यैकं दिवसं विप्रा न वोऽस्तीह भयं क्वचित् ।
राक्षसेभ्यः प्रमोदध्वमिष्टतो यात माचिरम् ॥
राजन्! इसके बाद राक्षसराज विरूपाक्षने नाना देशोंसे आये हुए राक्षसोंको हिंसा करनेसे रोककर उन ब्राह्मणोंसे कहा– ' विप्रगण! आज एक दिनके लिये आपलोगोंको राक्षसोंकी ओरसे कहीं कोई भय नहीं है; अतः आनन्द कीजिये और शीघ्र ही अपने अभीष्ट स्थानको चले जाइये । विलम्ब न कीजिये '
गौतम भी सुवर्ण का भारी भार लेकर बड़ी कठिनाई से ढोता हुआ जल्दी-जल्दी चलकर उस बरगद के पेड़ के पास आया। वहाँ पहुँचते ही वह थककर बैठ गया; वह भूख से पीड़ित और अत्यन्त क्लान्त था। तभी पक्षियों में श्रेष्ठ, मित्रवत् वत्सल राजधर्मा उसके पास आया और स्वागतपूर्वक उसका अभिनन्दन किया। उस बुद्धिमान पक्षी ने अपने पङ्खों के अग्रभाग का सञ्चालन करके उसे हवा दी, जिससे गौतम की सारी थकावट दूर हो गई; फिर उसने गौतम का पूजन किया और उसके लिए भोजन की व्यवस्था की।
भोजन करके विश्राम करने के बाद गौतम इस प्रकार चिन्ता करने लगा— 'अहो! मैंने लोभ और मोह से प्रेरित होकर सुन्दर सुवर्ण का यह महान भार ले लिया है। अभी मुझे बहुत दूर जाना है और रास्ते में खाने के लिए कुछ भी नहीं है जिससे मेरे प्राणों की रक्षा हो सके। अब मैं कौन-सा उपाय करके अपने प्राणों को धारण कर सकूँगा?' वह इसी चिन्ता में मग्न था। मार्ग में भोजन न देखकर उस कृतघ्न ने मन ही मन विचार किया— 'यह बगुलों का राजा राजधर्मा मेरे पास ही तो है। यह मांस का एक बहुत बड़ा ढेर है। इसी को मारकर ले लूँ और शीघ्रतापूर्वक यहाँ से चल दूँ।'
कृतघ्नः पुरुषव्याघ्र मनसेदमचिन्तयत् ।
अयं बकपतिः पार्श्वे मांसराशिः स्थितो महान् ॥
इमं हत्वा गृहीत्वा च यास्येऽहं समभिद्रुतम् ॥
' अब मैं कौन- सा उपाय करके अपने प्राणोंको धारण कर सकूँगा? ' इस प्रकारकी चिन्तामें वह मग्न हो गया । पुरुषसिंह! तदनन्तर मार्गमें भोजनके लिये कुछ भी न देखकर उस कृतघ्नने मन- ही- मन इस प्रकार विचार किया — ' यह बगुलोंका राजा राजधर्मा मेरे पास ही तो है । यह मांसका एक बहुत बड़ा ढेर है। इसीको मारकर ले लूँ और शीघ्रतापूर्वक यहाँसे चल दूँ'
पक्षीराज राजधर्मा ने अपने मित्र गौतम की रक्षा के लिए उससे थोड़ी दूर पर आग प्रज्वलित कर दी थी, जिससे हवा का सहारा पाकर बड़ी-बड़ी लपटें उठ रही थीं। बकराज को अपने मित्र पर पूर्ण विश्वास था, इसलिए वह वहीं पास में सो गया। इधर वह दुष्टात्मा कृतघ्न गौतम, मित्र के वध की इच्छा से उठा और विश्वासपूर्वक सोए हुए राजधर्मा को सामने से जलती हुई लकड़ी लेकर मार डाला। उसे मारकर वह बहुत प्रसन्न हुआ; मित्र के वध से जो पाप लगता है, उसकी ओर उसकी दृष्टि नहीं गई। उसने मरे हुए पक्षी के पङ्ख और बाल नोचकर उन्हें आग में पकाया और फिर सुवर्ण का बोझ सिर पर उठाकर वह ब्राह्मण बड़ी तेजी के साथ वहाँ से चल दिया।
स चापि पार्श्वे सुष्वाप विश्वस्तो बकराट् तदा ।
कृतघ्नस्तु स दुष्टात्मा तं जिघांसुरथाग्रतः ॥
ततोऽलातेन दीप्तेन विश्वस्तं निजघान तम् ।
निहत्य च मुदा युक्तः सोऽनुबन्धं न दृष्टवान् ॥
बकराजको भी मित्रपर विश्वास था; इसलिये उस समय उसके पास ही सो गया । इधर वह दुष्टात्मा कृतघ्न उसका वध करनेकी इच्छासे उठा और विश्वासपूर्वक सोये हुए राजधर्माको सामनेसे जलती हुई लकड़ी लेकर उसके द्वारा मार डाला । उसे मारकर वह बहुत प्रसन्न हुआ, मित्रके वधसे जो पाप लगता है, उसकी ओर उसकी दृष्टि नहीं गयी ।
उस दिन दक्षकन्या का पुत्र राजधर्मा अपने मित्र विरूपाक्ष के पास नहीं जा सका, जिससे विरूपाक्ष व्याकुल हृदय से उसकी चिन्ता करने लगा। दूसरा दिन भी बीत गया, तब विरूपाक्ष ने अपने पुत्र से कहा— 'बेटा! मैं आज पक्षियों में श्रेष्ठ राजधर्मा को नहीं देख पा रहा हूँ। वे प्रतिदिन प्रातः काल ब्रह्माजी की वन्दना करके लौटते थे और मुझसे मिले बिना घर नहीं जाते थे। आज दो सन्ध्याएँ व्यतीत हो गई हैं, किन्तु वह मेरे घर नहीं पधारे; मेरे मन में सन्देह है कि कहीं वह अधम ब्राह्मण गौतम, जो स्वाध्यायरहित और ब्रह्मतेज से शून्य था, मेरे मित्र को मार न डाले। उसकी चेष्टाओं से वह मुझे दुराचारी और दयाहीन प्रतीत होता था। वह आकार से भी भयानक और दस्यु के समान दिखता है। बेटा! तुम शीघ्र यहाँ से राजधर्मा के घर जाओ और पता लगाओ कि वे जीवित हैं या नहीं।'
दुराचारस्तु दुर्बुद्धिरिङ्गितैर्लक्षितो मया ।
निष्कृपो दारुणाकारो दुष्टो दस्युरिवाधमः ॥
‘ उसकी चेष्टाओंसे मैंने लक्षित किया तो वह मुझे दुर्बुद्धि एवं दुराचारी तथा दयाहीन प्रतीत होता था । वह आकारसे ही बड़ा भयानक और दुष्ट दस्युके समान अधम जान पड़ता था ।
जब विरूपाक्ष का पुत्र उस वटवृक्ष के पास पहुँचा, तो उसने वहाँ राजधर्मा का कङ्काल देखा— हड्डियों और पैरों का समूह बिखरा पड़ा था। यह देखकर वह रो पड़ा और उसने पूरी शक्ति लगाकर गौतम को पकड़ने की चेष्टा की। कुछ दूर जाने पर राक्षसों ने गौतम को पकड़ लिया; उनके पास राजधर्मा का वह शरीर भी मिला जो पङ्ख, पैर और हड्डियों से रहित था। वे उसे लेकर मेरुव्रज के राजा के पास पहुँचे। अपने मित्र की यह दशा देखकर राजा विरूपाक्ष, अपने मन्त्रियों और पुरोहितों सहित फूट-फूटकर रोने लगे; पूरे नगर में महान आर्तनाद गूँज उठा और शोक छा गया। तब राजा ने अपने पुत्र से कहा— 'बेटा! इस पापी को मार डालो। ये समस्त राक्षस इसके मांस का यथेष्ट उपयोग करें। यह पापाचारी, पापकर्मा और पापात्मा है; अतः तुम्हें इसका वध कर देना चाहिए।'
दस्यवश्चापि नैच्छन्त तमत्तुं पापकारिणम् ।
क्रव्यादा अपि राजेन्द्र कृतघ्नं नोपभुञ्जते ॥
राजेन्द्र! उन दस्युओंने भी उस पापाचारीका मांस खानेकी इच्छा नहीं की । मांसाहारी जीव- जन्तु भी कृतघ्नका मांस काममें नहीं लेते हैं ।
किन्तु भयानक पराक्रमी राक्षसों ने गौतम को खाने की इच्छा नहीं की; वे बोले— 'महाराज! इस नराधम का मांस दस्युओं को दे दिया जाए, आप हमें इसका पाप खाने के लिए न दें।' यह सुनकर राक्षसराज ने आज्ञा दी कि इस कृतघ्न को आज ही डाकुओं के हवाले कर दो। राक्षसों ने गौतम के टुकड़े-टुकड़े करके उसे दस्युओं को सौंप दिया। उन दस्युओं ने भी उस पापाचारी का मांस खाने से मना कर दिया; क्योंकि वह अत्यन्त अधम था। शास्त्र कहते हैं कि ब्रह्महत्यारे, चोर और व्रतभङ्ग करने वालों के लिए प्रायश्चित्त है, परन्तु कृतघ्न के उद्धार का कोई उपाय नहीं है।
तदनन्तर विरूपाक्ष ने राजधर्मा के लिए एक चिता तैयार करवाई, जिसे रत्नों और सुगन्धित चन्दनों से सजाया गया। जब उसमें आग लगाई गई, तब राजधर्मा के मुख से दूधमिश्रित फेन की लपटें उस चिता पर गिरीं। उसी समय देवराज इन्द्र विरूपाक्ष के नगर में आए और बोले— 'सौभाग्य है कि तुम्हारे द्वारा बकराज को जीवन मिला।' इन्द्र ने बताया कि ब्रह्माजी ने पहले क्रोध में आकर उसे शाप दिया था कि वह सभा में नहीं आया, जिससे उसे वध का कष्ट भोगना पड़ेगा। परन्तु अब इन्द्र ने अमृत छिड़ककर उसे जीवन दान दिया है।
श्रावयामास चेन्द्रस्तं विरूपाक्षं पुरातनम् ।
यथा शापः पुरा दत्तो ब्रह्मणा राजधर्मणः ॥
इन्द्रने विरूपाक्षको एक प्राचीन घटना सुनायी, जिसके अनुसार ब्रह्माजीने पहले राजधर्माको शाप दिया था ।
स्वयं जीवित होने के बाद राजधर्मा ने इन्द्र से प्रार्थना की— 'सुरेश्वर! यदि आपकी कृपा है तो मेरे प्रिय मित्र गौतम को भी जीवित कर दीजिए।' इन्द्र ने गौतम को भी अमृत देकर जीवित कर दिया। राजधर्मा ने प्रसन्न होकर अपने मित्र गौतम को सारा धन देकर विदा किया और स्वयं अपने घर में प्रवेश किया।
गौतम पुनः उन्हीं भीलों के गाँव में जाकर रहने लगा, जहाँ उसने एक शूद्र जाति की स्त्री के पेट से अनेक पापाचारी पुत्र उत्पन्न किए। इस पाप के कारण देवताओं ने उसे महान शाप दिया— 'यह पापी कृतघ्न है और दूसरे पति को स्वीकार करने वाली शूद्र स्त्री से सन्तान पैदा करता आ रहा है; इस कारण यह घोर नरक में पड़ेगा।'
गौतमश्चापि सम्प्राप्य पुनस्तं शबरालयम् ।
शूद्रायां जनयामास पुत्रान् दुष्कृतकारिणः ॥
गौतम भी पुनः भीलोंके ही गाँवमें जाकर रहने लगा । वहाँ उसने उस शूद्रजातिकी स्त्रीके पेटसे ही अनेक पापाचारी पुत्रोंको उत्पन्न किया ।
भीष्म बोले— हे भरतश्रेष्ठ! कृतघ्न को कैसे यश मिल सकता है? उसे न तो सुख प्राप्त होता है और न ही उसका उद्धार सम्भव है। मित्र का त्याग कर देने वाले मनुष्य अनन्तकाल के लिए घोर नरक में पड़ता है। इसलिए मनुष्य को सदा कृतज्ञ होना चाहिए, क्योंकि मित्र के सहयोग से ही सम्मान और सुख की प्राप्ति होती है।
एष धर्मभृतां श्रेष्ठ प्रोक्तः पापो मया तव ।
मित्रद्रोही कृतघ्नो वै किं भूयः श्रोतुमिच्छसि ॥
धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ युधिष्ठिर! इस प्रकार यह मैंने तुम्हें पापी, मित्रद्रोही और कृतघ्न पुरुषका परिचय दिया है । अब और क्या सुनना चाहते हो?
In English
Bhishma's advice to Yudhishthira and the story of Gautama
Bhishma explains the qualities of good and bad friends to Yudhishthira. He tells a story about a Brahmin named Gautama who became a hunter and was later hosted by a divine bird named Rajadharma.
This page answers
- What are the characteristics of a good friend according to bhishma?
- Who is the bird rajadharma?
- How did gautama become a hunter?
- Why did the wise brahmin leave gautama?
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