माण्डव्यजनकसंवाद : धन और सम्पत्ति की असीमित तृष्णा से मुक्ति कैसे पाएं?
तृष्णा का त्याग और परम सुख
महाभारतके सन्दर्भ सहित वास्तविक आख्यान — मूल श्लोक और पृष्ठ-सङ्केतके साथ।
महाभारत — खण्ड ५ · शान्तिपर्व → मोक्षधर्मपर्व · अध्याय 276 · पृष्ठ 1782–1785
502 शब्द · 3 मिनटका पाठ · 4 श्लोक
भीष्म ने युधिष्ठिर से कहा
पाप कर्मों की ग्लानि और तृष्णा से मुक्ति हेतु प्रश्न
युद्धभूमि की नीरवता के बीच युधिष्ठिर के भीतर एक गहरा द्वन्द्व उठ रहा था। उनके स्वर में भारीपन और ग्लानि थी। उन्होंने पितामह की ओर देखते हुए कहा, “पितामह! हम लोग बड़े पापी और क्रूर हैं। हमने धन के लिये ही भाई, पिता, पौत्र, कुटुम्बीजन, सुहृद् और पुत्र—इन सबका संहार कर डाला। यह जो धनजनित तृष्णा है, इसीने हमसे बड़े-बड़े पाप करवाये हैं। हम इस तृष्णा को किस तरह दूर करें?”
भीष्म ने युधिष्ठिर के व्याकुल स्वर को सुना और शान्त भाव से बोले, “राजन्! एक बार माण्डव्य मुनि ने विदेहराज जनक से ऐसा ही प्रश्न किया था। उसके उत्तर में विदेहराज ने जो उद्गाहो प्रकट किए थे, विज्ञ पुरुष उसी प्राचीन इतिहास को ऐसे अवसरों पर उदाहरण के तौर पर दुहराया करते हैं।”
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।
गीतं विदेहराजेन माण्डव्यायानुपृच्छते ॥
भीष्मजी बोले – राजन्! एक बार माण्डव्य मुनिने विदेहराज जनकसे ऐसा ही प्रश्न किया था, उसके उत्तरमें विदेहराजने जो उद्गार प्रकट किया था, उसी प्राचीन इतिहासको विज्ञ पुरुष ऐसे अवसरोंपर उदाहरणके तौरपर दुहराया करते हैं ।
भीष्म ने कथा आगे बढ़ाते हुए कहा कि राजा जनक ने माण्डव्य मुनि से कहा था, “मैं बड़े सुख से जीवन व्यतीत करता हूँ; क्योंकि इस जगत् की कोई भी वस्तु मेरी नहीं है। किसी पर भी मेरा ममत्व नहीं है। यदि सारी मिथिला में आग लग जाए, तो भी मेरा कुछ नहीं जलता है।” राजा जनक के इन वचनों में एक गहरा ठहराव था। उन्होंने स्पष्ट किया कि जो विवेकी हैं, उन्हें बड़े समृद्धिसम्पन्न विषय भी दुःखरूप ही जान पड़ते हैं; परन्तु अज्ञानियों को तुच्छ विषय भी सदा मोह में डाले रहते हैं। लोक में जो कामजनित सुख है तथा जो स्वर्ग का दिव्य एवं महान् सुख है, वे दोनों तृष्णाक्षय से होने वाले सुख की सोलहवीं कला की भी तुला पाने के योग्य नहीं हैं।
सुसुखं बत जीवामि यस्य मे नास्ति किंचन ।
मिथिलायां प्रदीप्तायां न मे दह्यति किंचन ॥
राजा जनकने कहा था कि मैं बड़े सुखसे जीवन व्यतीत करता हूँ; क्योंकि इस जगत्की कोई भी वस्तु मेरी नहीं है । किसीपर भी मेरा ममत्व नहीं है । यदि सारी मिथिलामें आग लग जाय तो भी मेरा कुछ नहीं जलता है ।
भीष्म ने युधिष्ठिर को समझाते हुए कहा कि जिस प्रकार समयानुसार बड़े होते हुए बछड़े का सींग भी उसके शरीर के साथ ही बढ़ता है, उसी प्रकार बढ़ते हुए धन के साथ उसकी तृष्णा भी बढ़ती जाती है। कोई भी वस्तु क्यों न हो, जब उसके प्रति ममता कर ली जाती है—वह वस्तु अपनी मान ली जाती है—तब नष्ट होने पर वही सन्ताप का कारण बन जाती है। इसलिए कामनाओं या भोगों की वृद्धि के लिये आग्रह नहीं रखना चाहिए; क्योंकि भोगों में जो आसक्ति होती है, वह दुःखरूप ही है। धन पाकर भी उसे धर्म में ही लगा देना चाहिए और काम-भोगों को तो सर्वथा त्याग ही देना चाहिए।
विद्वान् पुरुष सभी प्राणियों के प्रति अपने समान ही भाव रखते हैं। ऐसा करने से वह कृतकृत्य और शुद्धचित्त होकर समस्त दोषों को त्याग देता है। वह सत्य-असत्य, हर्ष-शोक, प्रिय-अप्रिय तथा भय-अभय जैसे सभी द्वन्द्वों को त्यागकर अत्यन्त शान्त और निर्विकार हो जाता है। खोटि बुद्धि वाले मूढ़ पुरुषों के लिये जिसका त्याग करना कठिन है—जो शरीर के जराजीर्ण हो जाने पर भी स्वयं जीर्ण नहीं होता और जिसे प्राणान्तकाल तक रहने वाला रोग माना गया है—उस तृष्णा को जो त्याग देता है, उसी को परम सुख मिलता है। जो अपने सदाचार को चन्द्रमा के समान शुद्ध, उज्ज्वल एवं निर्विकार देखता है, वह धर्मात्मा पुरुष इहलोक और परलोक में कीर्ति एवं उत्तम सुख पाता है।
या दुस्त्यजा दुर्मतिभिर्या न जीर्यति जीर्यतः ।
योऽसौ प्राणान्तिको रोगस्तां तृष्णां त्यजतः सुखम् ॥
खोटी बुद्धिवाले मूढ़ पुरुषोंके लिये जिसका त्याग करना कठिन है, जो शरीरके जराजीर्ण हो जानेपर भी स्वयं जीर्ण न होकर नयी नवेली ही बनी रहती है तथा जिसे प्राणान्तकालतक रहनेवाला रोग माना गया है, उस तृष्णाको जो त्याग देता है, उसीको परम सुख मिलता है ।
राजा जनक के इन गम्भीर वचनों को सुनकर ब्रह्मर्षि माण्डव्य बड़े प्रसन्न हुए। उन्होंने राजा के कथन की प्रशंसा की और स्वयं मोक्षमार्ग का आश्रय लिया।
राज्ञस्तद् वचनं श्रुत्वा प्रीतिमानभवद् द्विजः ।
पूजयित्वा च तद् वाक्यं माण्डव्यो मोक्षमाश्रितः ॥
राजाके ये वचन सुनकर ब्रह्मर्षि माण्डव्य बड़े प्रसन्न हुए । उनके कथनकी प्रशंसा करके मुनिने मोक्षमार्गका आश्रय लिया ।
In English
Yudhisthira's struggle with greed and Bhishma's advice
Yudhisthira expresses guilt to Bhishma about the violence caused by his desire for wealth. Bhishma shares a story of King Janaka to explain how detachment from possessions can end suffering. He advises Yudhisthira that one should use wealth for dharma and avoid attachment to worldly pleasures.
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