श्रीगणेशाय नमः।

पञ्चशिखजनकसंवाद : क्या धन, तपस्या या शास्त्रों के अध्ययन से मृत्यु को जीता जा सकता है?

काल की अपरिहार्यता और आत्मज्ञान

महाभारतके सन्दर्भ सहित वास्तविक आख्यान — मूल श्लोक और पृष्ठ-सङ्केतके साथ।

महाभारत — खण्ड ५ · शान्तिपर्व → मोक्षधर्मपर्व · अध्याय 319 · पृष्ठ 2103–2106

516 शब्द · 3 मिनटका पाठ · 4 श्लोक

युधिष्ठिर से कहा गया

मृत्यु पर विजय पाने के साधनों की जिज्ञासा हेतु

युधिष्ठिर ने भीष्म से एक अत्यन्त गम्भीर प्रश्न किया— "भरतश्रेष्ठ! क्या महान ऐश्वर्य, प्रचुर धन अथवा बहुत बड़ी आयु पाकर मनुष्य किस तरह मृत्यु का उल्लङ्घन कर सकता है? क्या गुरुतर तपस्या करके, महान कर्मों का अनुष्ठान करके, वेद-शास्त्रों का अध्ययन करके अथवा नाना प्रकार के रसायनों का प्रयोग करके कोई ऐसे उपायों द्वारा जरा और मृत्यु को प्राप्त होने से रोक सकता है?"

युधिष्ठिर उवाच

तपसा वा सुमहता कर्मणा वा श्रुतेन वा ।
रसायनप्रयोगैर्वा कैर्नाप्नोति जरान्तकौ ॥

वह गुरुतर तपस्या करके, महान् कर्मोंका अनुष्ठान करके, वेद-शास्त्रोंका अध्ययन करके अथवा नाना प्रकारके रसायनोंका प्रयोग करके किन उपायोंद्वारा जरा और मृत्युको प्राप्त नहीं होता है?

महाभारत · शान्तिपर्व · मोक्षधर्मपर्व · अध्याय 319 · श्लोक 2पृष्ठ 2104

भीष्म ने युधिष्ठिर की ओर देखा और कहा— "युधिष्ठिर! इस विषय में विद्वान् पुरुष सन्न्यासी पञ्चशिख तथा राजा जनक के संवाद रूप इस प्राचीन इतिहास का उदाहरण दिया करते हैं।"

युधिष्ठिर उवाच

ऐश्वर्यं वा महत् प्राप्य धनं वा भरतर्षभ ।
दीर्घमायुरवाप्याथ कथं मृत्युमतिक्रमेत् ॥

युधिष्ठिरने पूछा— भरतश्रेष्ठ! महान् ऐश्वर्य या प्रचुर धन अथवा बहुत बड़ी आयु पाकर मनुष्य किस तरह मृत्युका उल्लंघन कर सकता है?

महाभारत · शान्तिपर्व · मोक्षधर्मपर्व · अध्याय 319 · श्लोक 1पृष्ठ 2104

एक समय की बात है, विदेह देश के राजा जनक ने वेद-वेत्ताओं में श्रेष्ठ महर्षि पञ्चशिख से प्रश्न किया, जिनके धर्म और अर्थ विषयक सन्देह नष्ट हो गए थे। राजा जनक ने पूछा— "भगवन्! किस आचार, तपस्या, बुद्धि, कर्म अथवा शास्त्रज्ञान के द्वारा मनुष्य जरा और मृत्यु को लाँघ सकता है?"

उनके इस प्रकार पूछने पर अपरोक्ष ज्ञान से सम्पन्न महर्षि पञ्चशिख ने विदेहराज को उत्तर दिया— "जरा और मृत्यु की निवृत्ति नहीं होती है। परन्तु ऐसा भी नहीं है कि किसी प्रकार उनकी निवृत्ति हो ही नहीं सकती; क्योंकि धन और ऐश्वर्य आदि से तो उनकी निवृत्ति नहीं होती, पर ज्ञान से तो पुनर्जन्म की भी निवृत्ति हो जाती है, फिर जरा और मृत्यु की तो बात ही क्या?"

महर्षि ने आगे कहा— "काल समस्त प्राणियों का उच्छेद कर डालता है। जैसे जल का प्रवाह किसी वस्तु को बहा ले जाता है, उसी प्रकार काल सदा ही प्राणियों को अपने वेग से बहाया करता है। यह काल बिना नौका के समुद्र की भाँति लहरा रहा है। जरा और मृत्यु विशाल ग्राहका रूप धारण करके उसमें बैठे हुए हैं। उस काल-सागर में बहते और डूबते हुए जीव को कोई भी बचा नहीं सकता। यहाँ इस जीव का कोई भी अपना नहीं है और वह भी किसी का अपना नहीं है। रास्ते में मिले हुए राहगीरों के समान यहाँ पत्नी तथा अन्य बन्धु-बान्धवों का साथ हो जाता है, परन्तु यहाँ पहले कभी किसी ने किसी के साथ चिरकाल तक सहवास का सुख नहीं उठाया है। जैसे गर्जते हुए बादलों को हवा बारम्बार उड़ाकर छिन्न-भिन्न कर देती है, उसी प्रकार काल यहाँ जन्म लेने वाले प्राणियों को उनके रोने-चिल्लाने पर भी विनाश की आग में झोंक देता है। कोई बलवान हो या दुर्बल, बड़ा हो या छोटा, उन सब प्राणियों को बुढ़ापा और मौत व्याघ्र की भाँति खा जाती है।"

जरामृत्यू हि भूतानां खादितारौ वृकाविव ।
बलिनां दुर्बलानां च ह्रस्वानां महतामपि ॥

कोई बलवान् हों या दुर्बल, बड़ा हों या छोटा, उन सब प्राणियोंको बुढ़ापा और मौत व्याघ्रकी भाँति खा जाती है ।

महाभारत · शान्तिपर्व · मोक्षधर्मपर्व · अध्याय 319 · श्लोक 12पृष्ठ 2105

महर्षि पञ्चशिख ने शान्त स्वर में कहा— "इस प्रकार जब सभी प्राणी विनाशशील ही हैं, तब नित्य स्वरूप जीवात्मा उन प्राणियों के लिये जन्म लेने पर हर्ष किसलिए माने और मर जाने पर शोक क्यों करे? मैं कौन हूँ? कहाँ से आया हूँ? कहाँ जाऊँगा? किसके साथ मेरा क्या सम्बन्ध है? किस स्थान में स्थित होकर कहाँ फिर जन्म लूँगा? इन सब बातों को लेकर तुम किसलिए शोक कर रहे हो?"

अन्त में उन्होंने उपदेश देते हुए कहा— "जो शुभ और अशुभ कर्म करता है, उसके सिवा दूसरा कौन ऐसा है जो उन कर्मों के फलस्वरूप स्वर्ग और नरक का दर्शन एवं उपभोग करेगा; अतः शास्त्र की आज्ञा का उल्लङ्घन न करते हुए सब लोगों को दान और यज्ञ आदि सत्कर्म करते रहना चाहिए।"

द्रष्टा स्वर्गस्य कोऽन्योऽस्ति तथैव नरकस्य च ।
आगमांस्त्वनतिक्रम्य दद्याच्चैव यजेत च ॥

जो शुभ और अशुभ कर्म करता है, उसके सिवा दूसरा कौन ऐसा है जो उन कर्मोंके फलस्वरूप स्वर्ग और नरकका दर्शन एवं उपभोग करेगा; अतः शास्त्रकी आज्ञाका उल्लंघन न करते हुए सब लोगोंको दान और यज्ञ आदि सत्कर्म करते रहना चाहिये ।

महाभारत · शान्तिपर्व · मोक्षधर्मपर्व · अध्याय 319 · श्लोक 15पृष्ठ 2106

In English

Yudhisthira's Question and the Wisdom of Panchashikha

Yudhisthira asks Bhishma how a person can avoid aging and death through wealth, penance, or science. Bhishma recounts a dialogue where King Janaka asks the sage Panchashikha the same question. Panchashikha explains that while physical death cannot be avoided, spiritual knowledge can end the cycle of rebirth.

This page answers

  • How can one avoid aging and death according to panchashikha?
  • What did king janaka ask panchashikha?
  • Can wealth or penance stop death?
  • What is the difference between avoiding death and ending rebirth?

Also written: Panchashikhajanakasanvada, Yudhishthira, Bhishma, पञ्चशिखजनकसंवाद