रामोपाख्यान : परशुराम ने क्षत्रियों का संहार क्यों किया और पृथ्वी की रक्षा कैसे हुई?
धर्मरक्षा और क्षत्रिय धर्म
महाभारतके सन्दर्भ सहित वास्तविक आख्यान — मूल श्लोक और पृष्ठ-सङ्केतके साथ।
महाभारत — खण्ड ५ · शान्तिपर्व → राजधर्मानुशासनपर्व · अध्याय 49 · पृष्ठ 322–335
1,841 शब्द · 10 मिनटका पाठ · 16 श्लोक
श्रीकृष्ण ने कुन्ती से कहा
पाण्डुपुत्र कुन्ती के प्रश्न का उत्तर देने हेतु।
भगवान् श्रीकृष्ण बोले—"कुन्तीनन्दन! मैंने महर्षियों के मुख से परशुरामजी के प्रभाव, पराक्रम तथा जन्म की कथा जिस प्रकार सुनी है, वह सब आपको बताता हूँ। सुनिये, जिस प्रकार जगदग्निनन्दन परशुरामने करोड़ों क्षत्रियों का संहार किया था, पुनः जो क्षत्रिय राजवंशों में उत्पन्न हुए, वे अब फिर भारतयुद्ध में मारे गये। प्राचीनकाल में जह्नु नामक एक राजा हुए, जिनके पुत्र का नाम था अज। अज से बलाकाश्व नामक पुत्र का जन्म हुआ और बलाकाश्व के कुशिक नामक पुत्र हुए। कुशिक बड़े धर्मज्ञ थे और इस भूतल पर सहस्रनेत्रधारी इन्द्र के समान पराक्रमी थे। उन्होंने यह सोचकर कि मैं एक ऐसा पुत्र प्राप्त करूँ जो तीनों लोकों का शासक होने के साथ किसी से पराजित न हो, उत्तम तपस्या आरम्भ की। उनकी भयङ्कर तपस्या देखकर और उन्हें शक्तिशाली पुत्र उत्पन्न करने में समर्थ जानकर लोकपालों के स्वामी इन्द्र स्वयं ही उनके पुत्र रूप में अवतीर्ण हुए।
अग्ग्रं तपः समातिष्ठत् सहस्राक्षसमो भुवि ।
पुत्रं लभेयमजितं त्रिलोकेश्वरमित्युत ॥
वे इस भूतलपर सहस्रनेत्रधारी इन्द्रके समान पराक्रमी थे । उन्होंने यह सोचकर कि मैं एक ऐसा पुत्र प्राप्त करूँ, जो तीनों लोकोंका शासक होनेके साथ ही किसीसे पराजित न हो, उत्तम तपस्या आरम्भ की ।
राजन्! कुशिक का वह पुत्र गाधि नाम से प्रसिद्ध हुआ। राजा गाधि की एक कन्या थी जिसका नाम था सत्यवती। राजा गाधि ने अपनी इस कन्या का विवाह भृगुपुत्र ऋचीक के साथ कर दिया। सत्यवती बड़े शुद्ध आचार-विचार से रहती थी। उसकी शुद्धता से प्रसन्न होकर ऋचीक मुनि ने उसे तथा राजा गाधिको भी पुत्र देने के लिये चरु तैयार किया। ऋचीक ने उस समय अपनी पत्नी सत्यवती को बुलाकर कहा—'यह चरु तुम खा लेना और यह दूसरा अपनी माँ को खिला देना। तुम्हारी माता के जो पुत्र होंगे, वे अत्यन्त तेजस्वी एवं क्षत्रिय शिरोमणि होंगे। इस जगत् के क्षत्रिय उन्हें जीत नहीं सकेंगे। वह बड़े-बड़े क्षत्रियों का संहार करने वाला होगा। कल्याणि! तुम्हारे लिये जो यह चरु तैयार किया है, यह तुम्हें धैर्यवान्, शान्त एवं तपस्यापरायण श्रेष्ठ ब्राह्मण पुत्र प्रदान करेगा।' अपनी पत्नी से ऐसा कहकर भृगुनन्दन श्रीमान् ऋचीक मुनि तपस्या में तत्पर होकर जङ्गल में चले गये।
तवापि पुत्रं कल्याणि धृतिमन्तं शमात्मकम् ।
तपोऽन्वितं द्विजश्रेष्ठं चरुरेष विधास्यति ॥
‘ कल्याणि! तुम्हारे लिये जो यह चरु तैयार किया है, यह तुम्हे धैर्यवान्, शान्त एवं तपस्यापरायण श्रेष्ठ ब्राह्मण पुत्र प्रदान करेगा'
इसी समय तीर्थयात्रा करते हुए राजा गाधि अपनी पत्नी के साथ ऋचीक मुनि के आश्रम पर आये। उधर सत्यवती वह दोनों चरु लेकर शान्त भाव से माता के पास गयी और बड़े हर्ष के साथ पति की कही हुई बात को उससे निवेदित किया। किन्तु, सत्यवती की माता ने अज्ञानवश अपना चरु बदलकर पुत्री को दे दिया और उसका चरु लेकर भोजन द्वारा अपने में स्थित कर लिया। तदनन्तर सत्यवती ने एक ऐसा तेजस्वी शरीर धारण किया, जिसका गर्भ क्षत्रियों का विनाश करने वाला और देखने में बड़ा भयङ्कर जान पड़ता था।
अथ सत्यवती गर्भं क्षत्रियान्तकरं तदा ।
धारयामास दीप्तेन वपुषा घोरदर्शनम् ॥
तदनन्तर सत्यवतीने अपने तेजस्वी शरीरसे एक ऐसा गर्भ धारण किया, जो क्षत्रियोंका विनाश करनेवाला था और देखनेमें बड़ा भयंकर जान पड़ता था ।
जब भृगुश्रेष्ठ ऋचीक ने अपनी इस देवरूपिणी पत्नी को देखा, तो उन्होंने कहा—'भद्रे! तुम्हारी माता ने चरु बदलकर तुम्हें ठग लिया। तुम्हारा पुत्र अत्यन्त क्रोधी और क्रूर कर्म करने वाला होगा। तुम्हारा भाई ब्राह्मण स्वरूप और तपस्यापरायण होगा; परन्तु तुम्हारे चरु में मैंने सम्पूर्ण महान् तेज ब्रह्म की प्रतिष्ठा की थी और तुम्हारी माता के लिये जो चरु था, उसमें सम्पूर्ण क्षत्रियोचित बल-पराक्रम का समावेश किया गया था। चरु बदल देने से अब ऐसा नहीं होगा—तुम्हारी माता का पुत्र तो ब्राह्मण होगा और तुम्हारा क्षत्रिय।'
शृणु कौन्तेय रामस्य प्रभावो यो मया श्रुतः ।
महर्षीणां कथयतां विक्रमं तस्य जन्म च ॥
भगवान् श्रीकृष्ण बोले-कुन्तीनन्दन! मैंने महर्षियोंके मुखसे परशुरामजीके प्रभाव, पराक्रम तथा जन्मकी कथा जिस प्रकार सुनी है, वह सब आपको बताता हूँ, सुनिये ।
पतिके ऐसे कहने पर महाभागा सत्यवती उनके चरणों में सिर रखकर गिर पड़ी और काँपती हुई बोली—'प्रभो! भगवन्! आज आप मुझसे ऐसी बात न कहें कि तुम ब्राह्मणाधम पुत्र उत्पन्न करोगी।' ऋचीक बोले—'कल्याणि! मैंने यह सङ्कल्प नहीं किया था कि तुम्हारे गर्भ से ऐसा पुत्र उत्पन्न हो, परन्तु चरु बदल जाने के कारण तुम्हें भयङ्कर कर्म करने वाले पुत्र को जन्म देना पड़ रहा है।' सत्यवती ने व्याकुल होकर कहा—'मुने! आप चाहें तो सम्पूर्ण लोकों की नयी सृष्टि कर सकते हैं; फिर इच्छानुसार पुत्र उत्पन्न करने की तो बात ही क्या है? अतः प्रभो! मुझे तो शान्त एवं सरल स्वभाव वाला पुत्र ही प्रदान कीजिये।' ऋचीक बोले—'सुन्दरी! मैंने कभी हास-परिहास में भी झूठी बात नहीं कही है। मैंने तपस्या द्वारा यह देख लिया है कि तुम्हारे पिता का समस्त कुल ब्राह्मण होगा।' सत्यवती ने पुनः प्रार्थना की—'प्रभो! आप जप करने वाले ब्राह्मणों में सबसे श्रेष्ठ हैं; आपका और मेरा पौत्र भले ही उग्र स्वभाव का हो जाय, परन्तु पुत्र तो मुझे शान्त स्वभाव का ही मिलना चाहिये।' ऋचीक बोले—'भद्रे! मेरे लिये पुत्र और पौत्र में कोई अन्तर नहीं है। तुमने जैसा कहा है, वैसा ही होगा।'
सत्यवत्युवाच काममेवं भवेत् पौत्रो ममेह तव च प्रभो ।
शमात्मकमहं पुत्रं लभेयं जपतां वर ॥
सत्यवती बोली — प्रभो! आप जप करनेवाले ब्राह्मणोंमें सबसे श्रेष्ठ हैं, आपका और मेरा पौत्र भले ही उग्र स्वभावका हो जाय; परंतु पुत्र तो मुझे शान्तस्वभावका ही मिलना चाहिये ।
श्रीकृष्ण बोले—"राजन्! तदनन्तर सत्यवती ने शान्त, संयमपरायण और तपस्वी भृगुवंशी जमदग्निको पुत्र के रूप में उत्पन्न किया। कुशिक नन्दन गाधि ने विश्वामित्र नामक पुत्र प्राप्त किया, जो सम्पूर्ण ब्राह्मणोचित गुणों से सम्पन्न थे। ऋचीक ने तपस्या के भण्डार जमदग्नि को जन्म दिया और जमदग्नि ने जिस उग्र स्वभाव वाले पुत्र को उत्पन्न किया, वही ये सम्पूर्ण विद्याओं तथा धनुर्वेद के पारङ्गत, प्रज्वलित अग्निके समान तेजस्वी क्षत्रिय-हन्ता परशुरामजी हैं।
ऋचीको जनयामास जमदग्निं तपोनिधिम् ।
सोऽपि पुत्रं ह्यजनयज्जमदग्निः सुदारुणम् ॥
सर्वविद्यान्तगं श्रेष्ठं धनुर्वेदस्य पारगम् ।
रामं क्षत्रियहन्तारं प्रदीप्तमिव पावकम् ॥
ऋचीकने तपस्याके भंडार जमदग्निको जन्म दिया और जमदग्निने अत्यन्त उग्र स्वभाववाले जिस पुत्रको उत्पन्न किया, वही ये सम्पूर्ण विद्याओं तथा धनुर्वेदके पारङ्गत विद्वान् प्रज्वलित अग्निके समान तेजस्वी क्षत्रियहन्ता परशुरामजी हैं ।
परशुरामजी ने गन्धमादन पर्वत पर महादेवजी को सन्तुष्ट करके उनसे अनेक प्रकार के अस्त्र और अत्यन्त तेजस्वी कुठार प्राप्त किये। उस कुठार की धार कभी कुण्ठित नहीं होती थी और वह जलती हुई आग के समान उद्दीप्त दिखता था। उस अप्रमेय शक्तिशाली कुठार के कारण परशुरामजी सम्पूर्ण लोकों में अप्रतिम वीर हो गये। इसी समय राजा कृतवीर्य का बलवान् पुत्र अर्जुन हैहय वंश का राजा हुआ, जो एक तेजस्वी क्षत्रिय था। दत्तात्रेयजी की कृपा से राजा अर्जुन ने एक हजार भुजाएँ प्राप्त की थीं और वह महातेजस्वी चक्रवर्ती नरेश था। उसने अपने बाहुबल से सम्पूर्ण पृथ्वी को जीतकर अश्वमेध यज्ञ में ब्राह्मणों को दान कर दिया था।
नैष संकल्पितः कामो मया भद्रे तथा त्वयि ।
उग्रकर्मा समुत्पन्नश्चरुव्यत्यासहेतुना ॥
ऋचीक बोले — कल्याणि! मैंने यह संकल्प नहीं किया था कि तुम्हारे गर्भसे ऐसा पुत्र उत्पन्न हो । परंतु चरु बदल जानेके कारण तुम्हें भयंकर कर्म करनेवाले पुत्रको जन्म देना पड़ रहा है ।
एक समय भूखे-प्यासे हुए अग्निदेव ने पराक्रमी सहस्रबाहु अर्जुन से भिक्षा माँगी और अर्जुन ने अग्निको वह भिक्षा दे दी। इसके पश्चात, कार्तवीर्य के प्रभाव से अग्निदेव ने पर्वतों और वनस्पतियों को जलाना आरम्भ किया। हवा का सहारा पाकर प्रज्वलित होते हुए अग्निदेव ने हैहयराज को साथ लेकर महात्मा आपव के सूने एवं सुरम्य आश्रम को जलाकर भस्म कर दिया। महाबाहु अच्युत! कार्तवीर्य द्वारा अपने आश्रम के जला दिये जाने पर शक्तिशाली आपव मुनि को बड़ा रोष हुआ। उन्होंने कृतवीर्यपुत्र अर्जुन को शाप देते हुए कहा—'अर्जुन! तुमने मेरे इस विशाल वन को भी जलाये बिना नहीं छोड़ा, इसलिये सङ्ग्राम में तुम्हारी इन भुजाओं को परशुरामजी काट डालेंगे'।"
त्वया न वर्जितं यस्मान्ममेदं हि महद् वनम् ।
दग्धं तस्माद् रणे रामो बाहुंस्ते छेत्स्यतेऽर्जुन ॥
‘ अर्जुन! तुमने मेरे इस विशाल वनको भी जलाये बिना नहीं छोड़ा, इसलिये संग्राममें तुम्हारी इन भुजाओंको परशुरामजी काट डालेंगे '
अर्जुन महातेजस्वी, बलवान् और नित्य शान्ति में रहने वाले थे। वे ब्राह्मण-भक्त और शरणागतों को शरण देने वाले दानी शूरवीर थे; इसीलिए उन्होंने उस समय महात्मा अपव द्वारा दिए गए शाप पर कोई ध्यान नहीं दिया। किन्तु नियति का खेल देखिए, उसी शाप के कारण उनके बलवान पुत्र ही पिता के वध का कारण बन गये। वे घमण्डी राजकुमार एक दिन जमदग्नि मुनि की होमधेनु के बछड़े को चुरा ले आये। बुद्धिमान हैहय-राज कार्तवीर्य को इस बात का ज्ञान नहीं था, तथापि इसी घटना के कारण महात्मा परशुराम का उसके विरुद्ध घोर युद्ध छिड़ गया। क्रोध में भरे हुए प्रभावशाली जमदग्निनन्दन परशुराम ने अर्जुन की उन भुजाओं को काट डाला और इधर-उधर घूमते हुए उस बछड़े को हैहयों के अन्तःपुर से निकालकर अपने आश्रम में ले आये।
ततोऽर्जुनस्य बाहूंस्तांश्छित्त्वा रामो रुषान्वितः ।
तं भ्रमन्तं ततो वत्सं जामदग्न्यः स्वमाश्रमम् ॥
प्रत्यानयत राजेन्द्र तेषामन्तःपुरात् प्रभुः । राजेन्द्र! तब रोषमें भरे हुए प्रभावशाली जमदग्निनन्दन परशुरामने अर्जुनकी उन भुजाओंको काट डाला और इधर- उधर घूमते हुए उस बछड़ेको वे हैहयोंके अन्तःपुरसे निकालकर अपने आश्रममें ले आये ।
परन्तु दूसरी ओर, अर्जुन के पुत्र बुद्धिहीन और मूर्ख थे। उन्होंने सङ्गठित होकर महात्मा जमदग्नि के आश्रम पर आक्रमण कर दिया और भल्लों के अग्रभाग से उनके मस्तक को धड़ से काट गिराया; उस समय यशस्वी परशुरामजी समिधा और कुशा लेने के लिए आश्रम से दूर चले गये थे। पिता की इस मृत्यु को देखकर परशुराम क्रोध की सीमा पार कर गये। उन्होंने पृथ्वी को क्षत्रियों से सूनी कर देने की भीषण प्रतिज्ञा की और हथियार उठा लिये। भृगुकुल के सिंह, पराक्रमी परशुराम ने अपने पराक्रम से कार्तवीर्य के सभी पुत्रों तथा पौत्रों का शीघ्र ही संहार कर डाला। वे सहस्रों हैहयों का वध करके इस पृथ्वी पर रक्त की कीच मचा दी। इस प्रकार पृथ्वी को क्षत्रियों से हीन करके महातेजस्वी परशुराम अत्यन्त दया से द्रवित होकर वन में चले गये।
स हैहयसहस्राणि हत्वा परममन्युमान् ॥
चकार भार्गवो राजन् महीं शोणितकर्दमाम् । राजन्! परम क्रोधी परशुरामने सहस्रों हैहयोंका वध करके इस पृथ्वीपर रक्तकी कीच मचा दी ।
कई हजार वर्ष बीत जाने के बाद, एक दिन वहाँ स्वभावतः क्रोधी परशुराम पर आक्षेप किया गया। विश्वामित्र के पौत्र और रैभ्य के पुत्र परावसुत ने भरी सभा में आते हुए कहा— 'राम! राजा ययाति के समय जो सज्जन पुरुष यज्ञ में एकत्र हुए थे, क्या वे क्षत्रिय नहीं थे? तुम्हारी प्रतिज्ञा झूठी है। तुम व्यर्थ ही डींग हाँकते हो कि तुमने क्षत्रियों का अन्त कर दिया। मैं तो समझता हूँ कि तुमने क्षत्रिय वीरों के भय से ही पर्वत की शरण ली है। इस समय पृथ्वी पर पुनः सैकड़ों क्षत्रिय भर गये हैं।'
विश्वामित्रस्य पौत्रस्तु रैभ्यपुत्रो महातपाः ॥
परावसुर्महाराज क्षिप्त्वाऽऽह जनसंसदि ।
ये ते ययातिपतने यज्ञे सन्तः समागताः ॥
प्रतर्दनप्रभृतयो राम किं क्षत्रिया न ते ।
मिथ्याप्रतिज्ञो राम त्वं कत्थसे जनसंसदि ॥
भयात् क्षत्रियवीराणां पर्वतं समुपाश्रितः ।
सा पुनः क्षत्रियशतैः पृथिवी सर्वतः स्तृता ॥
महाराज! विश्वामित्रके पौत्र तथा रैभ्यके पुत्र महातेजस्वी परावसुने भरी सभामें आक्षेप करते हुए कहा — ‘ राम! राजा ययातिके स्वर्गसे गिरनेके समय जो प्रतर्दन आदि सज्जन पुरुष यज्ञमें एकत्र हुए थे, क्या वे क्षत्रिय नहीं थे? तुम्हारी प्रतिज्ञा झूठी है । तुम व्यर्थ ही जनताकी सभामें डींग हाँका करते हो कि मैंने क्षत्रियोंका अन्त कर दिया । मैं तो समझता हूँ कि तुमने क्षत्रिय वीरोंके भयसे ही पर्वतकी शरण ली है । इस समय पृथ्वीपर सब ओर पुनः सैकड़ों क्षत्रिय भर गये हैं '
परावसुत की बात सुनकर भृगुवंशी परशुराम ने पुनः शस्त्र उठा लिया। जो सैकड़ों क्षत्रिय उन्होंने छोड़ दिए थे, वे अब बढ़कर महापराक्रमी भूपाल बन बैठे थे। उन्होंने पुनः उन सबके छोटे-छोटे बच्चों तक का संहार कर डाला; जो बच्चे गर्भ में रह गये थे, उन्हीं से पुनः यह सारी पृथ्वी व्याप्त हो गयी। परशुरामजी एक-एक गर्भ के उत्पन्न होने पर उसका वध कर डालते थे। उस समय क्षत्राणियाँ केवल कुछ ही पुत्रों को बचा सकी थीं। इस प्रकार शक्तिशाली परशुरामजी ने पृथ्वी को इक्कीस बार क्षत्रियों से हीन करके अश्वमेध यज्ञ किया और उसकी समाप्ति पर दक्षिणा स्वरूप यह सारी पृथ्वी कश्यपजी को दे दी।
त्रिःसप्तकृत्वः पृथिवीं कृत्वा निःक्षत्रियां प्रभुः ॥
दक्षिणामश्वमेधान्ते कश्यपायाददत् ततः । इस प्रकार शक्तिशाली परशुरामजीने इस पृथ्वीको इक्कीस बार क्षत्रियोंसे हीन करके अश्वमेध यज्ञ किया और उसकी समाप्ति होनेपर दक्षिणाके रूपमें यह सारी पृथ्वी उन्होंने कश्यपजीको दे दी ।
ततपश्चात, कुछ क्षत्रियों को बचाए रखने की इच्छा से कश्यपजी ने स्रुक् लिये हुए हाथों से सङ्केत करते हुए कहा— 'महामुने! अब तुम दक्षिण समुद्र के तट पर चले जाओ। अब कभी मेरे राज्य में निवास न करना।' यह सुनकर परशुमाचarya चले गये। समुद्र ने उनके लिए जगह खाली करके शूर्पारक देश का निर्माण किया, जिसे अपरान्तभूमि भी कहते हैं। कश्यपजी ने पृथ्वी को दान में लेकर उसे ब्राह्मणों के अधीन कर दिया और स्वयं विशाल वन के भीतर चले गये।
स क्षत्रियाणां शेषार्थं करेणोद्दिश्य कश्यपः ॥
स्रुक्प्रग्रहवता राजंस्ततो वाक्यमथाब्रवीत् ।
गच्छ तीरं समुद्रस्य दक्षिणस्य महामुने ॥
न ते मद् विषये राम वस्तव्यमिह कर्हिचित् । राजन्! तदनन्तर कुछ क्षत्रियोंको बचाये रखनेकी इच्छासे कश्यपजीने स्रुक् लिये हुए हाथसे संकेत करते हुए यह बात कही - ' महामुने! अब तुम दक्षिण समुद्रके तटपर चले जाओ । अब कभी मेरे राज्यमें निवास न करना '
इसके बाद, स्वेच्छाचारी वैश्य और शूद्र, द्विजों की स्त्रियों के साथ अनाचार करने लगे। पूरे जीव-जगत् में अराजकता फैल गयी; बलवान मनुष्य दुर्बलों को पीड़ा देने लगे। ब्राह्मणों में किसी का प्रभुत्व न रहा। इस उलट-फेर से पृथ्वी शीघ्र ही रसातल में गिरने लगी, क्योंकि उस समय धर्मरक्षक क्षत्रियों द्वारा विधिपूर्वक पृथ्वी की रक्षा नहीं की जा रही थी। भय के मारे पृथ्वी को रसातल की ओर भागते देख महामनस्वी कश्यपजी ने अपने ऊरुओं (जाँघों) का सहारा देकर उसे रोक दिया।
तां दृष्ट्वा द्रवतीं तत्र संत्रासात् स महामनाः ।
ऊरुणा धारयामास कश्यपः पृथिवीं ततः ॥
भयके मारे पृथ्वीको रसातलकी ओर भागती देख महामनस्वी कश्यपने अपने ऊरुओंका सहारा देकर उसे रोक दिया ।
कश्यपजी ने इस प्रकार पृथ्वी को धारण किया, इसलिए यह 'उर्वी' नाम से प्रसिद्ध हुई। तब पृथ्वी देवी ने कश्यपजी को प्रसन्न करके अपनी रक्षा हेतु यह वर माँगा कि उन्हें भूपाल प्रदान किए जाएँ। पृथ्वी बोली— 'ब्रह्मन्! मैंने स्त्रियों में कई क्षत्रिय शिरोमणियों को छिपा रखा है। मुने! वे सब हैहय कुल में उत्पन्न हुए हैं, जो मेरी रक्षा कर सकते हैं। मेरे पास ऋक्षवान् पर्वत पर रीछों द्वारा पाला गया विदूरथ का पुत्र है; वह राजा होकर मेरी रक्षा करे। वन में गोभि: द्वारा संवर्धित 'गोपति' भी है; उसे मेरी रक्षा हेतु नियुक्त करें। वत्स नामक राजकुमार को गोशाला में बछड़ों ने पाला है, वह भी मेरी रक्षा कर सकता है। दधिवाहन का पौत्र गङ्गा तट पर महर्षि गौतम द्वारा सुरक्षित है। बृहद्रथ महान ऐश्वर्य से सम्पन्न है, जिसे गृध्रकूट पर्वत पर लङ्गूरों ने बचाया है। राजा मरुत्त के वंश में भी कई बालक हैं, जिनकी रक्षा समुद्र ने की है; उनका पराक्रम इन्द्र के तुल्य है। ये सभी कहीं-कहीं शिल्पी और सुनार जैसी जातियों के आश्रित होकर रहते हैं। यदि ये क्षत्रिय मेरी रक्षा करें तो मैं स्थिर हो सकूँगी। मेरे पूर्वजों को तो परशुरामजी ने मार डाला था, मुझे उन राजाओं से उऋण होने के लिये उनके वंशजों का सत्कार करना चाहिए। मैं धर्म की मर्यादा लाँघने वाले क्षत्रिय की रक्षा नहीं चाहती; जो अपने धर्म में स्थित हो, मैं उसी के संरक्षण में रहूँ। अतः आप शीघ्र व्यवस्था करें।'
तेषामपचितिश्चैव मया कार्या महामुने ।
न ह्यहं कामये नित्यमतिक्रान्तेन रक्षणम् ।
वर्तमानेन वर्तेयं तत् क्षिप्रं संविधीयताम् ॥
महामुने! मुझे उन राजाओंसे उऋण होनेके लिये उनके इन वंशजोंका सत्कार करना चाहिये । मैं धर्मकी मर्यादाको लाँघनेवाले क्षत्रियके द्वारा कदापि अपनी रक्षा नहीं चाहती । जो अपने धर्ममें स्थित हो, उसीके संरक्षणमें रहूँ, यही मेरी इच्छा है; अतः आप इसकी शीघ्र व्यवस्था करें ।
श्रीकृष्ण कहते हैं— राजन्! तदनन्तर पृथ्वी द्वारा बताए गए उन सब पराक्रमी क्षत्रिय भूपालों को बुलाकर कश्यपजी ने उनका भिन्न-भिन्न राज्यों पर अभिषेक कर दिया। उन्हीं के पुत्र और पौत्र बढ़े, जिनके वंश आज प्रतिष्ठित हैं। पाण्डुनन्दन! तुमने जिसके विषय में पूछा था, वह पुरातन वृत्तान्त ऐसा ही है।
तेषां पुत्राश्च पौत्राश्च येषां वंशाः प्रतिष्ठिताः ।
एवमेतत् पुरावृत्तं यन्मां पृच्छसि पाण्डव ॥
उन्हींके पुत्र - पौत्र बढ़े, जिनके वंश इस समय प्रतिष्ठित हैं । पाण्डुनन्दन! तुमने जिसके विषयमें मुझसे पूछा था, वह पुरातन वृत्तान्त ऐसा ही है ।
In English
The Story of Parashurama and the Destruction of Kshatriyas
Due to a swapped ritual drink, Satyavati gives birth to Jamadagni, a fierce warrior rather than a peaceful sage. Parashurama, Jamadagni's son, kills the thousand-armed King Kartavirya Arjuna and his descendants after they kill Jamadagni, leading him to cleanse the earth of Kshatriyas twenty-one times.
This page answers
- Why was parashurama born with a fierce nature?
- How did parashurama kill kartavirya arjuna?
- Why did parashurama fight the kshatriyas twenty-one times?
- What did kashyapa do to save the earth?
Also written: Ramopakhyana, Rama, Parashurama, Jamadagni, Arjuna, Kashyapa, Satyavati, Richika, Gadhi, Apava, Paravasuta, Prithvi, रामोपाख्यान