श्रीगणेशाय नमः।

शाकुलोपाख्यान : सङ्कट आने से पहले ही उसका समाधान कैसे प्राप्त किया जाए?

दूरदर्शिता और समय का प्रबन्धन

महाभारतके सन्दर्भ सहित वास्तविक आख्यान — मूल श्लोक और पृष्ठ-सङ्केतके साथ।

महाभारत — खण्ड ५ · शान्तिपर्व → आपद्धर्मपर्व · अध्याय 137 · पृष्ठ 873–877

789 शब्द · 4 मिनटका पाठ · 7 श्लोक

भीष्म ने युधिष्ठिर से कहा

कर्तव्य और अकर्तव्य के निश्चय में विलम्ब करने वाले स्वभाव की चेतावनी देने हेतु

भीष्म बोले - युधिष्ठिर! जो सङ्कट आने से पहले ही अपने बचाव का उपाय कर लेता है, उसे अनागतविधाता कहते हैं तथा जिसे ठीक समय पर ही आत्मरक्षा का उपाय सूझ जाता है, वह ‘प्रत्युत्पन्नमति' कहलाता है। ये दो ही प्रकार के लोग सुख से अपनी उन्नति करते हैं; परन्तु जो प्रत्येक कार्य में अनावश्यक विलम्ब करने वाला होता है, वह दीर्घसूत्री मनुष्य नष्ट हो जाता है। कर्तव्य और अकर्तव्य का निश्चय करने में जो दीर्घसूत्री होता है, उसको लेकर मैं एक सुन्दर उपाख्यान सुना रहा हूँ। तुम स्वस्थचित्त होकर सुनो कुन्तीनन्दन!

भीष्म उवाच

अत्रैव चेदमव्यग्रं शृणुष्वाख्यानमुत्तमम् ।
दीर्घसूत्रमुपाश्रित्य कार्याकार्यविनिश्चये ॥

कर्तव्य और अकर्तव्यका निश्चय करनेमें जो दीर्घसूत्री होता है, उसको लेकर मैं एक सुन्दर उपाख्यान सुना रहा हूँ। तुम स्वस्थचित्त होकर सुनो ।

महाभारत · शान्तिपर्व · आपद्धर्मपर्व · अध्याय 137 · श्लोक 2पृष्ठ 874

कहते हैं, एक तालाब था जो अधिक गहरा नहीं था। उस जलाशय में बहुत-सी मछलियाँ रहती थीं और उन्हीं के बीच तीन कार्यकुशल मत्स्य भी रहते थे, जो सदा साथ-साथ विचरने वाले और एक-दूसरे के सुहृद् थे। उन तीनों सहचारियों में से एक अनागतविधाता था, जो आने वाले दीर्घकाल की बात सोच लेता था; दूसरा प्रत्युत्पन्नमति था, जिसकी प्रतिभा ठीक समय पर ही काम दे देती थी; और तीसरा दीर्घसूत्री था, जो प्रत्येक कार्य में अनावश्यक विलम्ब करता था।

भीष्म उवाच

अनागतविधाता च प्रत्युत्पन्नमतिश्च यः ।
द्वावेव सुखमेधेते दीर्घसूत्री विनश्यति ॥

भीष्मजी कहते हैं - युधिष्ठिर! जो संकट आनेसे पहले ही अपने बचावका उपाय कर लेता है, उसे अनागतविधाता कहते हैं तथा जिसे ठीक समयपर ही आत्मरक्षाका उपाय सूझ जाता है, वह ‘ प्रत्युत्पन्नमति' कहलाता है । ये दो ही प्रकारके लोग सुखसे अपनी उन्नति करते हैं; परंतु जो प्रत्येक कार्यमें अनावश्यक विलम्ब करनेवाला होता है, वह दीर्घसूत्री मनुष्य नष्ट हो जाता है ।

महाभारत · शान्तिपर्व · आपद्धर्मपर्व · अध्याय 137 · श्लोक 1पृष्ठ 874

एक दिन कुछ मछलीमारों ने उस जलाशय में चारों ओर से नालियाँ बनाकर अनेक द्वारों से उसका पानी आसपास की नीची भूमि में निकालना आरम्भ कर दिया। जलाशय का जल घटता देख, भय आने की सम्भावना समझकर उस दूरदर्शी मत्स्य ने अपने उन दोनों सुहृदों से कहा— 'बन्धुओ! जान पड़ता है कि इस जलाशय में रहने वाले सभी मत्स्यों पर सङ्कट आ पहुँचा है; इसलिये जब तक हमारे निकलने का मार्ग दूषित न हो जाय, तबतक शीघ्र ही हमें यहाँ से अन्यत्र चले जाना चाहिये। जो आने वाले सङ्कट को उसके आने से पहले ही अपनी अच्छी नीति द्वारा मिटा देता है, वह कभी प्राण जाने के संशय में नहीं पड़ता। यदि आप लोगों को मेरी बात ठीक जान पड़े तो चलिये, दूसरे जलाशय को चलें।'

अनागतमनर्थं हि सुनयैर्यः प्रबाधयेत् ।
स न संशयमाप्नोति रोचतां भो व्रजामहे ॥

' जो आनेवाले संकटको उसके आनेसे पहले ही अपनी अच्छी नीतिद्वारा मिटा देता है, वह कभी प्राण जानेके संशयमें नहीं पड़ता । यदि आपलोगोंको मेरी बात ठीक जान पड़े तो चलिये, दूसरे जलाशयको चलें '

महाभारत · शान्तिपर्व · आपद्धर्मपर्व · अध्याय 137 · श्लोक 8पृष्ठ 875

इस पर वहाँ जो दीर्घसूत्री था, उसने कहा— 'मित्र! तुम बात तो ठीक कहते हो; परन्तु मेरा यह दृढ़ विचार है कि अभी हमें जल्दी नहीं करनी चाहिये।' तदनन्तर प्रत्युत्पन्नमति ने दूरदर्शी से कहा— 'मित्र! जब समय आ जाता है, तब मेरी बुद्धि न्यायतः कोई युक्ति ढूँढ़ निकालने में कभी नहीं चूकती है।' यह सुनकर परम बुद्धिमान् दीर्घदर्शी मत्स्य वहाँ से निकलकर एक नाली के रास्ते से दूसरे गहरे जलाशय में चला गया।

अथ सम्प्रतिपत्तिज्ञः प्राब्रवीद् दीर्घदर्शिनम् ।
प्राप्ते काले न मे किंचिन्न्यायतः परिहास्यते ॥

तदनन्तर प्रत्युत्पन्नमतिने दूरदर्शीसे कहा - ' मित्र! जब समय आ जाता है, तब मेरी बुद्धि न्यायतः कोई युक्ति ढूँढ़ निकालनेमें कभी नहीं चूकती है '

महाभारत · शान्तिपर्व · आपद्धर्मपर्व · अध्याय 137 · श्लोक 10पृष्ठ 875

तदनन्तर मछलियों से ही जीविका चलाने वाले मछलीमारों ने जब यह देखा कि जलाशय का जल प्रायः बाहर निकल चुका है, तब उन्होंने अनेक उपायों द्वारा वहाँ की सब मछलियों को फँसा लिया। वह जलाशय जब मथा जाने लगा, तब दीर्घसूत्री भी दूसरे मत्स्यों के साथ जाल में फँस गया। जब मछलीमार रस्सी खींचकर मछलियों से भरे हुए उस जाल को उठाने लगे, तब प्रत्युत्पन्नमति मत्स्य भी उन्हीं मत्स्यों के भीतर घुसकर जाल में बँध-सा गया। वह जाल मुख से पकड़ने योग्य था; अतः उसकी ताँत को मुँह में लेकर वह भी अन्य मछलियों की तरह बँधा हुआ प्रतीत होने लगा। मछलीमारों ने उन सब मछलियों को वहाँ बँधा हुआ ही समझा।

तदनन्तर उस जाल को लेकर वे मछलीमार जब दूसरे अगाध जल वाले जलाशय के समीप गये और उन मछलियों को धोने लगे, उसी समय प्रत्युत्पन्नमति मत्स्य मुख में ली हुई जाल की रस्सी को छोड़कर उसके बन्धन से मुक्त हो गया और जल में समा गया। परन्तु बुद्धिहीन और आलसी मूर्ख दीर्घसूत्री अचेत होकर मृत्यु को प्राप्त हुआ, जैसे कोई इन्द्रियों के नष्ट होने से नष्ट हो जाता है।

दीर्घसूत्रस्तु मन्दात्मा हीनबुद्धिरचेतनः ।
मरणं प्राप्तवान् मूढो यथैवोपहतेन्द्रियः ॥

परंतु बुद्धिहीन और आलसी मूर्ख दीर्घसूत्री अचेत होकर मृत्युको प्राप्त हुआ, जैसे कोई इन्द्रियोंके नष्ट होनेसे नष्ट हो जाता है ।

महाभारत · शान्तिपर्व · आपद्धर्मपर्व · अध्याय 137 · श्लोक 17पृष्ठ 876

इसी प्रकार जो पुरुष मोहवश अपने सिर पर आये हुए काल को नहीं समझ पाता, वह उस दीर्घसूत्री मत्स्य के समान शीघ्र ही नष्ट हो जाता है। जो पुरुष यह समझकर कि मैं बड़ा कार्यकुशल हूँ, पहले से ही अपने कल्याण का उपाय नहीं करता, वह प्रत्युत्पन्नमति मत्स्य के समान प्राण-संशय की स्थिति में पड़ जाता है। जो पुरुष सङ्कट आने से पहले ही अपने बचाव का उपाय कर लेता है, वह 'अनागतविधाता’ और जिसे ठीक समय पर ही आत्मरक्षा का कोई उपाय सूझ जाता है, वह 'प्रत्युत्पन्नमति'- ये दो ही सुखपूर्वक अपनी उन्नति करते हैं; परन्तु प्रत्येक कार्य में अनावश्यक विलम्ब करने वाला ‘दीर्घसूत्री' नष्ट हो जाता है।

एवं प्राप्ततमं कालं यो मोहान्नावबुद्धयते ।
स विनश्यति वै क्षिप्रं दीर्घसूत्रो यथा झषः ॥

इसी प्रकार जो पुरुष मोहवश अपने सिरपर आये हुए कालको नहीं समझ पाता, वह उस दीर्घसूत्री मत्स्यके समान शीघ्र ही नष्ट हो जाता है ।

महाभारत · शान्तिपर्व · आपद्धर्मपर्व · अध्याय 137 · श्लोक 18पृष्ठ 876

काष्ठा, कला, मुहूर्त, दिन, रात, लव, मास, पक्ष, छः ऋतु, संवत्सर और कल्प — इन्हें ‘काल’ कहते हैं तथा पृथ्वी को 'देश' कहा जाता है। इनमें से देश का तो दर्शन होता है, किन्तु काल दिखाई नहीं देता है। अभीष्ट मनोरथ की सिद्धि के लिये जिस देश और काल को उपयोगी मानकर उसका विचार किया जाता है, उसको ठीक-ठीक ग्रहण करना चाहिये। ऋषियों ने धर्मशास्त्र, अर्थशास्त्र तथा मोक्षशास्त्र में इन देश और काल को ही कार्य-सिद्धि का प्रधान उपाय बताया है। मनुष्यों की कामना-सिद्धि में भी ये देश और काल ही प्रधान माने गये हैं। जो पुरुष सोच-समझकर या जान-बूझकर काम करने वाला तथा सतत सावधान रहने वाला है, वह अभीष्ट देश और काल का ठीक-ठीक उपयोग करता है और उनके सहयोग से इच्छानुसार फल प्राप्त कर लेता है।

परीक्ष्यकारी युक्तश्च स सम्यगुपपादयेत् ।
देशकालावभिप्रेतौ ताभ्यां फलमवाप्नुयात् ॥

जो पुरुष सोच-समझकर या जान-बूझकर काम करनेवाला तथा सतत सावधान रहनेवाला है, वह अभीष्ट देश और कालका ठीक-ठीक उपयोग करता है और उनके सहयोगसे इच्छानुसार फल प्राप्त कर लेता है ।

महाभारत · शान्तिपर्व · आपद्धर्मपर्व · अध्याय 137 · श्लोक 24पृष्ठ 877

In English

The Three Fish

Bhishma tells Yudhishthira a story about three fish living in a pond. One fish anticipates danger and leaves early, one fish uses quick wit to escape a fisherman's net at the last moment, and one fish delays action until it is caught and killed.

This page answers

  • What are the three types of fish in the story?
  • How did the second fish escape the fishermen?
  • Why did the third fish die?
  • What is the difference between an anagatavidhata and a pratyutpannamati?

Also written: Shakulopakhyana, Shakula, Machhalimara, शाकुलोपाख्यान