शम्पाकगीता : धन और राज्य के मोह से मुक्ति कैसे प्राप्त करें?
त्याग और अकिञ्चनता का मार्ग
महाभारतके सन्दर्भ सहित वास्तविक आख्यान — मूल श्लोक और पृष्ठ-सङ्केतके साथ।
महाभारत — खण्ड ५ · शान्तिपर्व → मोक्षधर्मपर्व · अध्याय 176 · पृष्ठ 1143–1147
849 शब्द · 5 मिनटका पाठ · 10 श्लोक
भीष्म ने युधिष्ठिर से कहा
शम्पाक द्वारा त्याग की महिमा का वर्णन
भीष्म बोले— युधिष्ठिर! इस विषय में विद्वान् पुरुष इस पुरातन इतिहास का उदाहरण देते हैं, जिसे परम शान्त जीवन्मुक्त शम्पाक ने यहाँ कहा था।
आकिंचन्यं च राज्यं च तुलया समतोलयम् ।
अत्यरिच्यत दारिद्रयं राज्यादपि गुणाधिकम् ॥
‘ मैंने अकिंचनता तथा राज्यको बुद्धिकी तराजूपर रखकर तौला तो गुणोंमें अधिक होनेके कारण राज्यसे भी अकिंचनताका ही पलड़ा भारी निकला ।
यह कथा उस समय की है जब एक त्यागी ब्राह्मण, जिसका नाम शम्पाक था, अत्यन्त कष्टों के बीच जीवन व्यतीत कर रहा था। उसके पास न पहनने को अच्छे वस्त्र थे—केवल फटे-पुराने वस्त्र ही तन पर थे; न पर्याप्त भोजन था और न ही उसकी स्त्री दुष्ट थी। भूख और अभाव के उस भीषण सङ्कट में भी उसका मन शान्त था। वह शम्पाक, जिसने सब कुछ त्याग दिया था, जीवन की उन गहराइयों को समझ चुका था जहाँ केवल अकिञ्चनता का वास होता है।
आकिंचन्ये च राज्ये च विशेषः सुमहानयम् ।
नित्योद्विग्नो हि धनवान् मृत्योरास्यगतो यथा ॥
‘ अकिंचनता तथा राज्यमें बड़ा भारी अन्तर यह है कि धनी राजा सदा इस प्रकार उद्विग्न रहता है, मानो मौतके मुखमें पड़ा हुआ हो ।
शम्पाक ने अपने जीवन के अनुभवों को शब्दों में पिरोते हुए कहा— 'इस संसार में जो भी मनुष्य उत्पन्न होता है, वह धनी हो या निर्धन, उसे जन्म से ही नाना प्रकार के सुख-दुःख प्राप्त होने लगते हैं। विधाता यदि उसे सुख और दुःख इन दोनों में से किसी एक के मार्ग पर ले जाए, तो वह न तो सुख पाकर प्रसन्न हो सके और न ही दुःख में पड़कर परितप्त हो। तुम जो कामना रहित होकर भी अपने कल्याण का साधन नहीं कर रहे हो और मन को वश में नहीं कर रहे हो, इसका कारण यही है कि तुमने राज्य का बोझा अपने ऊपर उठा रखा है।'
नैवास्याग्निर्न चारिष्टो न मृत्युर्न च दस्यवः ।
प्रभवन्ति धनत्यागाद् विमुक्तस्य निराशिषः ॥
' परंतु जो मनुष्य धनको त्यागकर उसकी आसक्तिसे मुक्त हो गया है और मनमें किसी तरहकी कामना नहीं रखता, उसपर न अग्निका जोर चलता है, न अरिष्टकारी ग्रहोंका, न मृत्यु उसका कुछ बिगाड़ सकती है, न डाकू और लुटेरे ही ।
उसने त्याग की महिमा बताते हुए आगे कहा— 'यदि तुम सब कुछ त्यागकर किसी वस्तु का सङ्ग्रह नहीं रखोगे, तो सर्वत्र विचरते हुए सुख का ही अनुभव करोगे; क्योंकि जो अकिञ्चन होता है—जिसके पास कुछ नहीं रहता है—वह सुख से सोता और जागता है। संसार में अकिञ्चनता ही सुख है। वही हितकारक, कल्याणकारी और निरापद है। इस मार्ग में किसी प्रकार के शत्रु का भी खटका नहीं है। यह दुर्लभ होने पर भी सुलभ है। मैं तीनों लोकों पर दृष्टि डालकर देखता हूँ, तो मुझे अकिञ्चन, शुद्ध एवं सब ओर से वैराग्य सम्पन्न पुरुष के समान दूसरा कोई नहीं दिखाई देता।'
तं वै सदा कामचरमनुपस्तीर्णशायिनम् ।
बाहूपधानं शाम्यन्तं प्रशंसन्ति दिवौकसः ॥
‘वह सदा दैव- इच्छाके अनुसार विचरता है । बिना बिछौनेके भूतलपर सोता है । बाँहोंकी ही तकिया लगाता है और सदा शान्तभावसे रहता है । देवतालोग भी उसकी भूरि- भूरि प्रशंसा करते हैं ।
शम्पाक ने बुद्धि की तराजू पर जीवन को तोला और कहा— 'मैंने अकिञ्चनता तथा राज्य को बुद्धिकी तराजू पर रखकर तौला, तो गुणों में अधिक होने के कारण राज्य से भी अकिञ्चनता का ही पलड़ा भारी निकला। अकिञ्चनता तथा राज्य में बड़ा भारी अन्तर यह है कि धनी राजा सदा इस प्रकार उद्विग्न रहता है, मानो मौत के मुख में पड़ा हुआ हो। परन्तु जो मनुष्य धन को त्यागकर उसकी आसक्ति से मुक्त हो गया है और मन में किसी तरह की कामना नहीं रखता, उस पर न अग्निका जोर चलता है, न अरिष्टकारी ग्रहों का, न मृत्यु उसका कुछ बिगाड़ सकती है और न ही डाकू और लुटेरे।'
धनवान् क्रोधलोभाभ्यामाविष्टो नष्टचेतनः ।
तिर्यगीक्षः शुष्कमुखः पापको भ्रुकुटीमुखः ॥
'जो धनवान् है, वह क्रोध और लोभके आवेशमें आकर अपनी विचारशक्तिको खो बैठता है, टेढ़ी आँखोंसे देखता है, उसका मुँह सूखा रहता है, भौंहें चढ़ी होती हैं और वह पापमें ही मग्न रहा करता है ।
उसका जीवन सादगी की पराकाष्ठा था। वह बोला— 'वह सदा दैव-इच्छा के अनुसार विचरता है। बिना बिछौने के भूतल पर सोता है, अपनी बाँहों की ही तकिया लगाता है और सदा शान्त भाव से रहता है। देवता लोक भी उसकी भूरि-भूरि प्रशंसा करते हैं।'
निर्दशन्नधरोष्ठं च क्रुद्धो दारुणभाषिता ।
कस्तमिच्छेत् परिद्रष्टुं दातुमिच्छति चेन्महीम् ॥
'क्रोधके कारण वह ओठ चबाता रहता है और अत्यन्त कठोर वचन बोलता है । ऐसा मनुष्य सारी पृथ्वीका राज्य ही दे देना चाहता हो, तो भी उसकी ओर कौन देखना चाहेगा?
परन्तु शम्पाक ने धनवान मनुष्य की दशा का वर्णन अत्यन्त मार्मिक ढङ्ग से किया। उसने कहा कि जो धनवान है, वह क्रोध और लोभ के आवेश में आकर अपनी विचारशक्ति को खो बैठता है। उसका चेहरा बदल जाता है—वह टेढ़ी आँखों से देखता है, उसका मुँह सूखा रहता है और भौंहें चढ़ी होती हैं। वह क्रोध के कारण अपने ओठ चबाता रहता है और अत्यन्त कठोर वचन बोलता है। ऐसा मनुष्य सारी पृथ्वी का राज्य ही दे देना चाहे, तो भी उसकी ओर कौन देखना चाहेगा?
श्रिया ह्यभीक्ष्णं संवासो मोहयत्यविचक्षणम् ।
सा तस्य चित्तं हरति शारदाभ्रमिवानिलः ॥
‘ सदा धन- सम्पत्तिका सहवास मूर्ख मनुष्यके चित्तको लुभाकर उसे मोहमें ही डाले रहता है । जैसे वायु शरद् ऋतुके बादलोंको उड़ा ले जाती है, उसी प्रकार वह सम्पत्ति मनुष्यके मनको हर लेती है ।
सम्पत्ति मनुष्य को मोह में डाल देती है। शम्पाक ने समझाया— 'सदा धन-सम्पत्ति का सहवास मूर्ख मनुष्य के चित्त को लुभाकर उसे मोह में ही डाले रखता है। जैसे वायु शरद् ऋतु के बादलों को उड़ा ले जाती है, उसी प्रकार वह सम्पत्ति मनुष्य के मन को हर लेती है। फिर उसके ऊपर रूप का अहङ्कार और धन का मद सवार हो जाता है और वह ऐसा मानने लगता है कि मैं बड़ा कुलीन हूँ, सिद्ध हूँ, कोई साधारण मनुष्य नहीं हूँ।'
अथैनं रूपमानश्च धनमानश्च विन्दति ।
अभिजातोऽस्मि सिद्धोऽस्मि नास्मि केवलमानुषः ॥
‘ फिर उसके ऊपर रूपका अहंकार और धनका मद सवार हो जाता है और वह ऐसा मानने लगता है कि मैं बड़ा कुलीन हूँ, सिद्ध हूँ, कोई साधारण मनुष्य नहीं हूँ ।
रूप, धन और कुल के इस अभिमान से मनुष्य का चित्त प्रमाद से भर जाता है। वह भोगों में आसक्त होकर अपने बाप-दादों के जोड़े हुए पैसों को खो बैठता है; और अन्ततः दरिद्र होकर दूसरों के धन को हड़प लाना अच्छा मानने लगता है। शम्पाक ने चेतावनी दी कि जब वह मर्यादा का उल्लङ्घन करके इधर-उधर से लूट-खसोट कर धन ले आता है, तब राजा उसे उसी प्रकार कठोर दण्ड देकर रोकते हैं, जैसे व्याध बाणों से मारकर मृगों की गति रोक देते हैं। इस तरह मन को तप्त करने वाले और शरीर के स्पर्श से होने वाले ये नाना प्रकार के दुःख मनुष्य को प्राप्त होते हैं।
इत्येभिः कारणैस्तस्य त्रिभिश्चित्तं प्रमाद्यति ।
सम्प्रसक्तमना भोगान् विसृज्य पितृसंचितान् ।
परिक्षीणः परस्वानामादानं साधु मन्यते ॥
' रूप, धन और कुल— इन तीनोंके अभिमानके कारण उसके चित्तमें प्रमाद भर जाता है । वह भोगोंमें आसक्त होकर बाप- दादोंके जोड़े हुए पैसोंको खो बैठता है; और दरिद्र होकर दूसरोंके धनको हड़प लाना अच्छा मानने लगता है ।
अन्त में शम्पाक ने जीवन का सार प्रस्तुत करते हुए कहा— 'अतः अनित्य शरीरों के साथ सदैव लगे रहने वाले पुत्र-ैषणा आदि लोकधर्मों की अवहेलना करके अवश्य प्राप्त होने वाले महान दुःखों की विचारपूर्वक चिकित्सा करनी चाहिए। कोई मनुष्य त्याग किए बिना सुख नहीं पाता, त्याग किए बिना परमात्मा को नहीं पा सकता और त्याग किए बिना निर्भय नहीं सो सकता। इसलिये तुम भी सब कुछ त्यागकर सुखी हो जाओ।'
तमतिक्रान्तमर्यादमाददानं ततस्ततः ।
प्रतिषेधन्ति राजानो लुब्धा मृगमिवेषुभिः ॥
‘ इस तरह मर्यादाका उल्लंघन करके जब वह इधर- उधरसे लूट-खसोटकर धन ले आता है, तब राजा उसे उसी प्रकार कठोर दण्ड देकर रोकते हैं । जैसे व्याध बाणोंसे मारकर मृगोंकी गति रोक देते हैं ।
भीष्म ने युधिष्ठिर से कहा— 'इस प्रकार पूर्वकाल में शम्पाक नामक ब्राह्मण ने हस्तिनापुर में मुझसे त्याग की महिमा का वर्णन किया था। अतः त्याग ही सबसे श्रेष्ठ माना गया है।'
In English
The Story of Shampaka and the Virtue of Renunciation
A wandering Brahmin named Shampaka describes his life of poverty and peace to Bhishma. He explains to Yudhishthira that true happiness comes from renouncing possessions rather than accumulating wealth or a kingdom.
This page answers
- What did shampaka tell bhishma?
- Why is renunciation better than being a king?
- How does wealth affect a person's mind?
- What are the characteristics of an akinchana man?
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