स्वर्णष्ठीविसम्भवोपाख्यान : अत्यधिक शक्तिशाली सन्तान के जन्म पर भयभीत राजा को क्या परामर्श देना चाहिए?
वरदान और नियति का सन्तुलन
महाभारतके सन्दर्भ सहित वास्तविक आख्यान — मूल श्लोक और पृष्ठ-सङ्केतके साथ।
महाभारत — खण्ड ५ · शान्तिपर्व → राजधर्मानुशासनपर्व · अध्याय 31 · पृष्ठ 215–222
695 शब्द · 4 मिनटका पाठ · 6 श्लोक
नारद मुनि ने राजा युधिष्ठिर से कहा
सुवर्णष्ठीवी के जन्म की कथा सुनने की इच्छा पर
वैशम्पायनजी कहते हैं— हे जनमेजय! तदनन्तर पाण्डुपुत्र राजा युधिष्ठिर ने नारदजी से कहा— ‘भगवन्! मैं सुवर्णष्ठीवी के जन्म का वृत्तान्त सुनना चाहता हूँ।' जब उन्होंने यह पूछा, तब नारद मुनि ने उन्हें कथा सुनाना आरम्भ किया।
एवमेतन्महाबाहो यथायं केशवोऽब्रवीत् ।
कार्यस्यास्य तु यच्छेषं तत् ते वक्ष्यामि पृच्छतः ॥
नारदजी बोले – महाबाहो! भगवान् श्रीकृष्णने इस विषयमें जैसा कहा है, वह सब सत्य है । इस प्रसङ्गमें जो कुछ शेष है, वह तुम्हारे प्रश्नके अनुसार मैं बता रहा हूँ ।
महाबाहो! भगवान श्रीकृष्ण ने इस विषय में जैसा कहा है, वह सब सत्य है। मैं और मेरे भानजे महामुनि पर्वत दोनों विजयी वीरों में श्रेष्ठ राजा सृजय के यहाँ निवास करने गये थे। वहाँ राजा ने हमारा शास्त्रीय विधिके अनुसार पूजन किया और हमारे लिए सभी मनोवाञ्छित वस्तुओं की सुव्यवस्था कर दी। हम दोनों उनके महल में रहने लगे। जब वर्षा के चार महीने बीत गये और हमारे चलने का समय आया, तब पर्वत ने मुझसे सार्थक वचन कहा— ‘मामा! हम लोग राजा सृजय के घर में बड़े आदर-सत्कार के साथ रहे हैं, अतः इस समय इनका कुछ उपकार करने की बात सोचिये।'
मैंने पर्वत से कहा— ‘भगिनीपुत्र! यह सब तुम्हें ही शोभा देता है। राजा को मनोवाञ्छित वर देकर सन्तुष्ट करो। तुम्हारी राय हो तो हम दोनों की तपस्या से उनके मनोरथ की सिद्धि हो।' तब पर्वत ने राजा सृजय को बुलाकर कहा— ‘नरेश्वर! हम दोनों तुम्हारे द्वारा किये गये सत्कार से बहुत प्रसन्न हैं। हम तुम्हें आज्ञा देते हैं कि तुम इच्छानुसार कोई वर सोचकर माँग लो। कोई ऐसा वर माँग लो जिससे न तो देवताओं की हिंसा हो और न मनुष्यों का संहार ही हो सके।'
देवानामविहिंसायां न भवेन्मानुषक्षयम् ।
तद् गृहाण महाराज पूजार्हो नौ मतो भवान् ॥
महाराज! कोई ऐसा वर माँग लो, जिससे न तो देवताओंकी हिंसा हो और न मनुष्योंका संहार ही हो सके । तुम हमारी दृष्टिमें आदरके योग्य हो '
सृजय ने कहा— ‘ब्रह्मन्! यदि आप दोनों प्रसन्न हैं तो मैं इतने से ही कृतकृत्य हो गया।' तब पर्वत मुनि ने कहा— 'राजन्! तुम्हारे हृदय में जो चिरकाल से सङ्कल्प है, वही माँग लो।' पर्वत ने आगे चेतावनी दी— 'तुम्हारा वह पुत्र सुवर्णष्ठीवी के नाम से विख्यात होगा तथा देवराज इन्द्र के समान तेजस्वी होगा। तुम्हें देवराज से सदा उसकी रक्षा करनी चाहिये।' यह सुनकर सृजय ने कहा— 'ऐसा न हो मुने! आपकी तपस्या से मेरा पुत्र दीर्घजीवी होना चाहिये।' परन्तु इन्द्र का ख्याल करके पर्वत मुनि कुछ नहीं बोले। तब मैंने दीन हुए उस नरेश से कहा— 'महाराज! सङ्कट के समय मुझे याद करना। मैं तुम्हारे पुत्र को तुमसे मिला दूँगा। पृथ्वीनाथ! चिन्ता न करो। यमराज के वश में पड़े हुए तुम्हारे उस प्रिय पुत्र को मैं पुनः उस रूप में लाकर तुम्हें दे दूँगा।'
तमहं नृपतिं दीनमब्रवं पुनरेव च ।
स्मर्तव्योऽस्मि महाराज दर्शयिष्यामि ते सुतम् ॥
अहं ते दयितं पुत्रं प्रेतराजवशं गतम् ।
पुनर्दास्यामि तद्रूपं मा शुचः पृथिवीपते ॥
तब मैंने दीन हुए उस नरेशसे कहा - ' महाराज! संकटके समय मुझे याद करना । मैं तुम्हारे पुत्रको तुमसे मिला दूँगा । पृथ्वीनाथ! चिन्ता न करो । यमराजके वशमें पड़े हुए तुम्हारे उस प्रिय पुत्रको मैं पुनः उस रूपमें लाकर तुम्हें दे दूँगा'
तदनन्तर किसी समय राजा सृजय के एक पुत्र हुआ, जो अपने तेज से प्रज्वलित सा हो रहा था। वह महान बलशाली था और मुख से स्वर्ण उगलने के कारण सुवर्णष्ठीवी नाम से प्रसिद्ध हुआ। उसका वह अद्भुत वृत्तान्त सारे जगत् में फैल गया। देवराज इन्द्र को भी यह मालूम हो गया कि वह बालक महर्षि पर्वत के वरदान का फल है। अपनी पराजय से डरकर इन्द्र उस राजकुमार के वध का अवसर देखने लगे। इन्द्र ने मूर्तिमान होकर अपने दिव्य अस्त्र वज्र से कहा— ‘वज्र! तुम बाघ बनकर इस राजकुमार को मार डालो। जैसा कि पर्वत ने बताया है, बड़ा होने पर सृजय का यह पुत्र मुझे परास्त कर देगा।'
चोदयामास तद् वज्रं दिव्यास्त्रं मूर्तिमत् स्थितम् ।
व्याघ्रो भूत्वा जहीमं त्वं राजपुत्रमिति प्रभो ॥
प्रवृद्धः किल वीर्येण मामेषोऽभिभविष्यति ।
सृजयस्य सुतो वज्र यथैनं पर्वतोऽब्रवीत् ॥
प्रभो! इन्द्रने मूर्तिमान् होकर सामने खड़े हुए अपने दिव्य अस्त्र वज्रसे कहा — ' वज्र! तुम बाघ बनकर इस राजकुमारको मार डालो । जैसा कि इसके विषयमें पर्वतने बताया है, बड़ा होनेपर सृजयका यह पुत्र अपने पराक्रमसे मुझे परास्त कर देगा '
एक दिन वह बालक पाँच वर्ष की अवस्था में अपनी धात्री के साथ गङ्गाजी के तट पर निर्जन वन में खेलने गया। वह अचानक उछलकर एक महाबली बाघ के पास जा पहुँचा। उस बाघ ने काँपते हुए राजकुमार को गिराकर पीस डाला और वह प्राणशून्य होकर पृथ्वी पर गिर पड़ा। इन्द्र द्वारा भेजा गया वह वज्ररूपी बाघ माया से वहीं अदृश्य हो गया। बालक की हत्या देखकर धात्री चिल्ला उठी। उसका आर्तनाद सुनकर राजा सृजय स्वयं वहाँ दौड़े आए। उन्होंने देखा कि राजकुमार आकाश से गिरे हुए चन्द्रमा की भाँति पड़ा है; उसका सारा रक्त बाघ ने पी लिया है। राजा व्याकुल होकर विलाप करने लगे और शोक से पीड़ित उसकी माताएँ भी वहाँ दौड़ती हुई आईं।
उस समय अचेत होकर राजा ने मेरा ही स्मरण किया। मैंने उनका चिन्तन जानकर उन्हें दर्शन दिए। पृथ्वीनाथ! यदुवीर श्रीकृष्ण ने जो बातें तुम्हारे सामने कही हैं, उन्हीं को मैंने उस शोकाकुल राजा को सुनाया। इन्द्र की अनुमति से उस बालक को जीवित भी कर दिया गया। वह महायशस्वी सुवर्णष्ठीवी जीवित होकर पिता और माता के चित्त को प्रसन्न कर आया।
तत ऊर्ध्वं कुमारस्तु स्वर्णष्ठीवी महायशाः ।
चित्तं प्रसादयामास पितुर्मातुश्च वीर्यवान् ॥
तदनन्तर महायशस्वी और शक्तिशाली कुमार सुवर्णष्ठीवीने जीवित होकर पिता और माताके चित्तको प्रसन्न किया ।
उस पराक्रमी कुमार ने अपने पिता के स्वर्गवासी हो जाने पर ग्यारह सौ वर्षों तक राज्य किया। उसने अनेक महायज्ञ किए और उनके द्वारा देवताओं तथा पितरों की तृप्ति की। तदनन्तर उसने बहुत-से वंशप्रवर्तक पुत्र उत्पन्न किये और दीर्घकाल के पश्चात् वह काल-धर्म को प्राप्त हुआ।
उत्पाद्य च बहून् पुत्रान् कुलसंतानकारिणः ।
कालेन महता राजन् कालधर्ममुपेयिवान् ॥
राजन्! इसके बाद उसने बहुत -से वंशप्रवर्तक पुत्र उत्पन्न किये और दीर्घकालके पश्चात् वह काल - धर्मको प्राप्त हुआ ।
In English
The Story of Suvarnasthivi
Narada tells Yudhishthira about King Srijaya and his son Suvarnasthivi. After the boy is killed by a tiger sent by Indra, Narada restores him to life.
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